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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 55

अध्याय 2 · श्लोक 55

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

श्रीभगवानुवाच | प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् | आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ||५५||

śrī-bhagavān uvāca | prajahāti yadā kāmān sarvān pārtha mano-gatān | ātmany evātmanā tuṣṭaḥ sthita-prajñas tadocyate ||55||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

श्रीभगवान्: भगवान; उवाच: बोले; प्रजहाति: त्याग देता है; यदा: जब; कामान्: कामनाओं को; सर्वान्: सब; पार्थ: हे पार्थ; मनोगतान्: मन में स्थित; आत्मनि: आत्मा में; एव: ही; आत्मना: आत्मा द्वारा; तुष्टः: सन्तुष्ट; स्थितप्रज्ञः: स्थितप्रज्ञ; तदा: तब; उच्यते: कहा जाता है।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

श्रीभगवान् बोले: हे पार्थ! जब पुरुष मन में स्थित सब कामनाओं को पूर्णतः त्याग देता है और आत्मा द्वारा आत्मा में ही सन्तुष्ट रहता है, तब वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।

English Translation

The Supreme Lord said: O Partha, when one completely casts off all desires of the mind, and is satisfied in the Self by the Self, then he is said to be a man of steady wisdom.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

स्थितप्रज्ञ की पहली पहचान – उसने सभी मानसिक कामनाओं का त्याग कर दिया है, और वह आत्मा में ही आत्मा से सन्तुष्ट है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।