सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 55
श्लोक ५५ में स्थितप्रज्ञ के प्रथम लक्षण का वर्णन – समस्त कामनाओं का त्याग और आत्मसंतुष्टि।
संस्कृत श्लोक
श्रीभगवानुवाच | प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् | आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ||५५||
śrī-bhagavān uvāca | prajahāti yadā kāmān sarvān pārtha mano-gatān | ātmany evātmanā tuṣṭaḥ sthita-prajñas tadocyate ||55||
पदच्छेद / शब्दार्थ
श्रीभगवान्: भगवान; उवाच: बोले; प्रजहाति: त्याग देता है; यदा: जब; कामान्: कामनाओं को; सर्वान्: सब; पार्थ: हे पार्थ; मनोगतान्: मन में स्थित; आत्मनि: आत्मा में; एव: ही; आत्मना: आत्मा द्वारा; तुष्टः: सन्तुष्ट; स्थितप्रज्ञः: स्थितप्रज्ञ; तदा: तब; उच्यते: कहा जाता है।
हिंदी अनुवाद
श्रीभगवान् बोले: हे पार्थ! जब पुरुष मन में स्थित सब कामनाओं को पूर्णतः त्याग देता है और आत्मा द्वारा आत्मा में ही सन्तुष्ट रहता है, तब वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।
English Translation
The Supreme Lord said: O Partha, when one completely casts off all desires of the mind, and is satisfied in the Self by the Self, then he is said to be a man of steady wisdom.
टीका / Commentary
स्थितप्रज्ञ की पहली पहचान – उसने सभी मानसिक कामनाओं का त्याग कर दिया है, और वह आत्मा में ही आत्मा से सन्तुष्ट है।