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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 56

अध्याय 2 · श्लोक 56

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः | वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ||५६||

duḥkheṣv anudvigna-manāḥ sukheṣu vigata-spṛhaḥ | vīta-rāga-bhaya-krodhaḥ sthita-dhīr munir ucyate ||56||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

दुःखेषु: दुःखों में; अनुद्विग्नमनाः: उद्विग्न न हुए मन वाला; सुखेषु: सुखों में; विगतस्पृहः: स्पृहा (इच्छा) से रहित; वीतरागभयक्रोधः: राग, भय और क्रोध से रहित; स्थितधीः: स्थिर बुद्धि; मुनिः: मुनि; उच्यते: कहा जाता है।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

दुःखों में जिसका मन उद्विग्न नहीं होता, सुखों में जिसकी स्पृहा (इच्छा) नहीं रहती, और जो राग, भय तथा क्रोध से रहित है, वह स्थिर बुद्धि मुनि कहा जाता है।

English Translation

He whose mind is not distressed in calamities, who has no longing for pleasures, and who is free from attachment, fear, and anger – he is called a sage of steady mind.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

स्थितप्रज्ञ के और लक्षण – दुःख में विचलित नहीं, सुख में आसक्त नहीं, राग, भय, क्रोध से मुक्त।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।