श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 56

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 42 मिनट का पठन 148 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः | वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ||५६||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

8 पद
दुःखेषु
दुःखों में
अनुद्विग्नमनाः
उद्विग्न न हुए मन वाला
सुखेषु
सुखों में
विगतस्पृहः
स्पृहा (इच्छा) से रहित
वीतरागभयक्रोधः
राग, भय और क्रोध से रहित
स्थितधीः
स्थिर बुद्धि
मुनिः
मुनि
उच्यते
कहा जाता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

दुःखों में जिसका मन उद्विग्न नहीं होता, सुखों में जिसकी स्पृहा (इच्छा) नहीं रहती, और जो राग, भय तथा क्रोध से रहित है, वह स्थिर बुद्धि मुनि कहा जाता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

प्रस्तावना: भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय का दिव्य मुकुटमणि

सनातन धर्म के आर्ष ग्रंथों में श्रीमद्भगवद्गीता को केवल एक ग्रंथ मात्र नहीं, अपितु समस्त उपनिषदों का सार और मानव चेतना के रूपांतरण का मार्गदर्शक माना गया है। गीता के द्वितीय अध्याय (सांख्य योग) के उत्तरार्ध में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के अत्यंत गूढ़ और व्यावहारिक प्रश्न—"स्थितप्रज्ञस्य का भाषा..." यानी स्थिर बुद्धि वाले मनुष्य के क्या लक्षण हैं, वह कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे व्यवहार करता है—का विस्तार से उत्तर देते हैं। इसी शृंखला में भगवान द्वारा कहा गया यह श्लोक—"दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः | वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ||५६||"—मानव मनोविज्ञान, आत्म-संयम और आध्यात्मिक चेतना का एक ऐसा अद्वितीय स्तंभ है, जो भौतिकता की अंधी दौड़ में भटकते आधुनिक मानव को परम शांति का मार्ग दिखाता है।

इस श्लोक में वर्णित 'स्थितधीः' (स्थिर बुद्धि वाला मुनि) वह दृष्टा पुरुष है जो सांसारिक सुख और दुःख के द्वंद्वों (Duality) से परे उठ चुका है। इस आधुनिक युग में जहाँ तनाव, अवसाद, क्रोध और असुरक्षा की भावना चरम पर है, यह श्लोक एक अचूक औषध का कार्य करता है। यह हमें सिखाता है कि किस प्रकार बाहरी परिस्थितियों के थपेड़ों के बीच भी अंतःकरण की पवित्रता, संतुलन और स्थिरता को बनाए रखा जा सकता है। भाक्तलोक (Bhaktilok.in) के इस विशेष आलेख में हम इसी दिव्य श्लोक के प्रत्येक पक्ष—व्याकरण, शब्दार्थ, दार्शनिक глуби (गहराई), पौराणिक संदर्भ और आधुनिक जीवन में इसके व्यावहारिक उपयोग—का अत्यंत सूक्ष्म और प्रामाणिक विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं, ताकि साधक अपनी जीवन यात्रा को सुगम और सार्थक बना सकें।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

श्रीमद्भगवद्गीता — द्वितीय अध्याय (सांख्य योग), श्लोक 56

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥ ५६ ॥


पदच्छेद: दुःखेषु + अनुद्विग्नमनाः + सुखेषु + विगतस्पृहः + वीतरागभयक्रोधः + स्थितधीः + मुनिः + उच्यते।

सस्वर पाठ विधि: इस श्लोक का उच्चारण करते समय 'दुःखेषु' पर विराम, 'अनुद्विग्नमनाः' में विसर्ग का उच्चारण स्पष्ट, तथा 'स्थितधीर्मुनिरुच्यते' का प्रवाह लयबद्ध होना चाहिए। प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त्त में स्नान के पश्चात पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके इस श्लोक का तीन, ग्यारह या इक्कीस बार मानसिक जप करने से चित्त में अगाध शांति और एकाग्रता की अनुभूति होती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में वेदों और उपनिषदों का अगाध ज्ञान छिपा है। नीचे दी गई सारणी में इसके हर एक पद का सरल हिंदी अर्थ और उसका उच्चकोणीय दार्शनिक भावार्थ प्रस्तुत है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
दुःखेषु विपत्ति, पीड़ा, या संकट के समय शारीरिक, मानसिक या आध्यात्मिक तापों (दुःखों) की प्राप्ति होने पर। यह जीवन के अपरिहार्य यथार्थ को स्वीकार करने का संकेत है।
अनुद्विग्नमनाः जिसका मन उद्विग्न (व्याकुल या भयभीत) नहीं होता संकटों के आने पर भी जिसका अंतःकरण विचलित न हो, धैर्य और संतुलन न खोए, उसे 'अनुद्विग्नमनाः' कहते हैं।
सुखेषु अनुकूलता, प्राप्ति, या आनंद के अवसरों पर भौतिक सुख-सुविधाओं, यश, मान-सम्मान और अनुकूल परिस्थितियों के प्राप्त होने पर।
विगतस्पृहः जिसकी स्पृहा (लालसा या आसक्ति) समाप्त हो चुकी है सुखों को भोगते समय उनमें लिप्त न होना तथा भविष्य के लिए सुखों की तृष्णा या लालसा न रखना।
वीत-राग राग (मोह या अत्यधिक लगाव) से रहित वस्तुओं, व्यक्तियों और परिस्थितियों के प्रति जो ममत्व या आकर्षण होता है, उसका पूरी तरह छूट जाना।
भय भय (असुरक्षा या होने वाले नुकसान की चिंता) से मुक्त अहंकार और देहाध्यास के कारण उत्पन्न होने वाली अनिष्ट की आशंका से पूरी तरह निर्भय हो जाना।
क्रोधः क्रोध (असंतोष या कामनाओं के अवरोध से उत्पन्न आवेश) से रहित इच्छाओं के पूरा न होने पर मन में उत्पन्न होने वाली दुर्भावना और गुस्से का सर्वथा शमन हो जाना।
स्थितधीः स्थिर बुद्धि वाला (जिसकी प्रज्ञा अडिग है) जिसकी बुद्धि सत्य और असत्य, नित्य और अनित्य के विवेक में प्रतिष्ठित हो चुकी है, जो भ्रमित नहीं होता।
मुनिः मननशील, साधक या संन्यासी जो निरंतर आत्म-चिंतन, मनन और परमात्मा के स्वरूप में रमण करता है, वह श्रेष्ठ मुनि है।
उच्यते कहा जाता है (संबोधित किया जाता है) भगवान श्रीकृष्ण ऐसे महापुरुष को आधिकारिक रूप से 'स्थितप्रज्ञ' या 'मुनि' की उपाधि से विभूषित करते हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

महाभारत के कुरुक्षेत्र के मैदान में जब पांडव सेना और कौरव सेना आमने-सामने थीं, तब धर्मसंकट में फँसे अर्जुन ने अपने गाण्डीव धनुष को रख दिया था और वे कर्तव्यविमूढ़ होकर भगवान श्रीकृष्ण की शरण में गए थे। अर्जुन का यह विषाद केवल एक व्यक्ति का दुःख नहीं था, बल्कि यह संपूर्ण मानव जाति का वह सनातन प्रश्न था जो हर युग में व्यक्ति के सामने आता है—'मैं कौन हूँ?', 'मेरा कर्तव्य क्या है?' और 'इस नश्वर संसार के दुखों से कैसे मुक्ति मिल सकती है?'

भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत श्रीमद्भगवद्गीता के माध्यम से अर्जुन के इस विषाद का निवारण किया। द्वितीय अध्याय के 54वें श्लोक में अर्जुन ने जिज्ञासा प्रकट की थी कि समाधि में स्थित, स्थिर बुद्धि वाले पुरुष के क्या लक्षण होते हैं। उसी प्रश्न के उत्तर की श्रंखला में भगवान श्रीकृष्ण ने 56वें श्लोक में स्थितप्रज्ञ के व्यावहारिक जीवन का यह अद्भुत खाका खींचा।

शास्त्रों में महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत और विशेषकर गीता के इन श्लोकों को वेदों का निचोड़ माना गया है। प्राचीन काल में राजा जनक, महर्षि वशिष्ठ, शुकदेव महामुनि और आदि शंकराचार्य जैसे महान आचार्यों ने इसी 'स्थितधी' अवस्था को अपने जीवन में चरितार्थ किया था। राजा जनक को 'विदेह' कहा जाता था क्योंकि वे महलों में रहते हुए भी राज्य के सुख और युद्ध/संकट के दुखों से पूरी तरह अलिप्त थे। यही इस श्लोक की मूल प्रेरणा है—बाहर से कर्तव्य कर्म करते रहना, परंतु भीतर से पूर्णतः स्थितप्रज्ञ और अलिप्त रहना।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

इस दिव्य श्लोक का नियमित मनन, पठन और इसके अर्थ को जीवन में उतारने से साधक को असीम आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति एवं स्थिरता (Mental Equanimity)

नियमित रूप से इस श्लोक के स्मरण से मन की चंचलता शांत होती है। सुख और दुःख के क्षणों में अतिरेक प्रतिक्रिया (Over-reaction) देने की आदत छूट जाती है और चित्त में एक स्थाई संतुलन बना रहता है।

2. भय और चिंता से मुक्ति (Freedom from Anxiety & Fear)

'वीतरागभयक्रोधः' की स्थिति साधक के भीतर से भविष्य की अनिश्चितताओं का भय और भूतकाल का पश्चाताप समाप्त कर देती है, जिससे वह वर्तमान में पूरी सजगता के साथ जी पाता है।

3. सकारात्मक ऊर्जा का संचार (Positive Aura)

जब व्यक्ति राग और द्वेष से मुक्त होता है, तो उसका अंतःकरण ईर्ष्या, द्वेष और नकारात्मकता से मुक्त होकर एक उच्च सकारात्मक ऊर्जा (Divine Aura) से परिपूर्ण हो जाता है।

4. कर्मिक शुद्धि और निष्कर्मता (Karmic Purification)

सुखों में आसक्ति न होने और दुखों से उद्विग्न न होने के कारण मनुष्य निष्काम कर्म (Selfless Action) की ओर अग्रसर होता है, जिससे उसके पुराने कर्मों के बंधन कटने लगते हैं।

5. निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि (Enhanced Decision Making)

स्थिर बुद्धि ('स्थितधीः') होने पर संकट के समय भी भ्रम की स्थिति उत्पन्न नहीं होती। व्यक्ति विवेकपूर्ण, न्यायसंगत और दूरदर्शी निर्णय लेने में सक्षम हो जाता है।

6. भावनात्मक बुद्धिमत्ता का विकास (Emotional Resilience)

आधुनिक मनोविज्ञान जिसे 'इमोशनल इंटेलिजेंस' कहता है, उसका मूल स्रोत यही श्लोक है। यह प्रतिकूल परिस्थितियों में भी टूटने न देने की आंतरिक शक्ति प्रदान करता है।

7. आत्मसाक्षात्कार और ब्रह्मभाव (Self-Realization)

निरंतर मुनि तुल्य आचरण करने से साधक की चेतना देहाध्यास से ऊपर उठकर आत्मा और परमात्मा के अद्वैत संबंध का अनुभव करने लगती है।

8. भगवत कृपा की प्राप्ति (Divine Grace)

भगवान श्रीकृष्ण स्वयं ऐसे समदर्शी भक्त और मुनि को अत्यंतप्रिय मानते हैं। ऐसे साधक पर भगवान की अहैतुकी कृपा और योगक्षेम का वहहन सीधे परमात्मा द्वारा किया जाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री (Editorial Note)

Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख वेदों, उपनिषदों और श्रीमद्भगवद्गीता के पारंपरिक भाष्यों (विशेषकर आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और स्वामी ज्ञाननानंद जी महाराज के दृष्टिकोण) के गहन अध्ययन पर आधारित है। हमारी संपादकीय टीम यह सुनिश्चित करती है कि सनातन संस्कृति के मूल ग्रंथों का मर्म आधुनिक पाठकों तक उनकी सहज, सरल और प्रामाणिक हिंदी में पहुंचे।

इस लेख में किसी भी प्रकार के अतिशयोक्तिपूर्ण दावों से बचा गया है और इसे पूर्णतः शास्त्रीय, तार्किक एवं आध्यात्मिक अनुशासनों के अंतर्गत प्रस्तुत किया गया है। यदि आप अपने दैनिक जीवन में मानसिक शांति, स्थिरता और आत्म-विकास चाहते हैं, तो भगवद्गीता के इन श्लोकों का स्वाध्याय और आचरण आपके लिए सर्वोत्तम मार्ग साबित होगा।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

'स्थितप्रज्ञ' वह पुरुष है जिसकी बुद्धि (प्रज्ञा) परमात्मा और सत्य में स्थिर हो चुकी है। इस श्लोक (56वें) के अनुसार, जो व्यक्ति दुखों से विचलित नहीं होता, सुखों की लालसा नहीं रखता तथा राग, भय और क्रोध से पूरी तरह मुक्त होता है, उसे ही 'स्थितधी' या स्थिर बुद्धि वाला मुनि कहा गया है।

नहीं, सुख और दुःख का शारीरिक या मानसिक स्तर पर आभास होना प्रकृति का नियम है। स्थितप्रज्ञ पुरुष भी इन्हें महसूस करता है, परंतु वह उनके प्रति 'उद्विग्न' (व्याकुल) या 'विगतस्पृह' (आसक्त) नहीं होता। वह जानता है कि ये परिस्थितियाँ अनित्य हैं और आत्मा इनसे सर्वथा भिन्न और अछूती है।

राग (मोह), भय और क्रोध तीनों का मूल कारण 'अहंकार' और 'अपेक्षाएं' हैं। जब साधक निष्काम भाव से अपने कर्म करता है, हर परिस्थिति को ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार करता है (प्रसाद बुद्धि), और नियमित रूप से गीता का स्वाध्याय एवं ध्यान करता है, तब ये विकार स्वतः ही क्षीण होने लगते हैं।

इस श्लोक का पाठ प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में या संध्याकाल में शांत चित्त से करना सर्वोत्तम माना गया है। स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण कर, पूर्व दिशा की ओर मुख करके इस श्लोक का सस्वर पाठ या मानसिक जप करने से मन को अत्यधिक शांति और ऊर्जा मिलती है।

निश्चित रूप से। भगवद्गीता मूलतः युद्धभूमि (यानी संघर्षपूर्ण जीवन) में ही कही गई थी। कॉर्पोरेट तनाव, पारिवारिक दबाव और जीवन की अनिश्चितताओं के बीच यदि व्यक्ति इस श्लोक के मर्म—सुख-दुःख में सम रहना—को अपना ले, तो वह कभी भी मानसिक अवसाद या तनाव का शिकार नहीं होगा।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

दुःखों में जिसका मन उद्विग्न नहीं होता, सुखों में जिसकी इच्छा नहीं रहती, और जो राग, भय तथा क्रोध से रहित है, वह स्थिर बुद्धि मुनि कहा जाता है। He whose mind is not distressed in calamities, who has no longing for pleasures, and who is free from attachment, fear, and anger – he is called a sage of steady mind.

समत्व / Equanimity

स्थितप्रज्ञ सुख-दुःख में समान रहता है और सभी विकारों से मुक्त होता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 56 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 56/72 78% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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