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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 57

अध्याय 2 · श्लोक 57

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् | नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||५७||

yaḥ sarvatrānabhisnehas tat tat prāpya śubhāśubham | nābhinandati na dveṣṭi tasya prajñā pratiṣṭhitā ||57||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

यः: जो; सर्वत्र: सर्वत्र; अनभिस्नेहः: स्नेहरहित (बिना आसक्ति); तत् तत्: वह-वह; प्राप्य: प्राप्त करके; शुभाशुभम्: शुभ और अशुभ; न: नहीं; अभिनन्दति: हर्षित होता; न: नहीं; द्वेष्टि: द्वेष करता; तस्य: उसकी; प्रज्ञा: प्रज्ञा; प्रतिष्ठिता: स्थिर है।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित (बिना आसक्ति) है और इस प्रकार शुभ या अशुभ को प्राप्त होकर न हर्षित होता है, न द्वेष करता है, उसकी प्रज्ञा स्थिर है।

English Translation

He who is without attachment everywhere, who neither rejoices nor hates on obtaining good or evil – his wisdom is established.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

स्थितप्रज्ञ शुभ-अशुभ परिस्थितियों में भी समान रहता है – न हर्ष, न द्वेष।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।