श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 57

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 41 मिनट का पठन 148 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् | नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||५७||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
यः
जो
सर्वत्र
सर्वत्र
अनभिस्नेहः
स्नेहरहित (बिना आसक्ति)
तत् तत्
वह-वह
प्राप्य
प्राप्त करके
शुभाशुभम्
शुभ और अशुभ
न
नहीं
अभिनन्दति
हर्षित होता
न
नहीं
द्वेष्टि
द्वेष करता
तस्य
उसकी
प्रज्ञा
प्रज्ञा
प्रतिष्ठिता
स्थिर है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित (बिना आसक्ति) है और इस प्रकार शुभ या अशुभ को प्राप्त होकर न हर्षित होता है, न द्वेष करता है, उसकी प्रज्ञा स्थिर है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भक्तिकुल (Bhaktilok.in) - विशेष आध्यात्मिक एवं दार्शनिक मार्गदर्शिका

सनातन धर्म, उपनिषदों और श्रीमद्भागवत गीता के पावन मर्म में यदि किसी एक सर्वोच्च मानसिक स्थिति की खोज की जाए, तो वह है 'स्थितप्रज्ञता' — यानी चेतना की वह अखंड अवस्था जो सुख और दुख, लाभ और हानि, तथा जय और पराजय के द्वंद्वों से कोसों दूर स्थित होती है। भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय के इस अत्यंत महत्वपूर्ण श्लोक (57) में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को उस महान पुरुष के आंतरिक लक्षणों का दर्शन कराते हैं, जिसकी बुद्धि परमात्मा में पूरी तरह से स्थिर हो चुकी है। मानव जीवन का मूल उद्देश्य केवल भौतिक उपलब्धियां हासिल करना नहीं, बल्कि आंतरिक शांति और आत्मिक संतुलन को प्राप्त करना है।

यह श्लोक केवल कुछ शब्दों का समुच्चय मात्र नहीं है, बल्कि यह जीवन के उतार-चढ़ाव से जूझ रहे प्रत्येक साधक के लिए एक संजीवनी बूटी है। आधुनिक युग में जहां तनाव, अवसाद, महत्वाकांक्षाओं की अंधी दौड़ और अनिश्चितता ने मनुष्य को मानसिक रूप से अशांत कर दिया है, वहां यह वैदिक श्लोक एक अचूक दार्शनिक औषधि का कार्य करता है। 'सर्वत्रानभिस्नेहः' का अर्थ है सभी परिस्थितियों में आसक्ति या मोह से मुक्त होना। जब मनुष्य शुभ और अशुभ दोनों प्रकार की परिस्थितियों को एक समान भाव से देखना सीख जाता है, तब उसके भीतर समता योग का उदय होता है।

इस विस्तृत आलेख में, हम भगवद्गीता के इस शाश्वत श्लोक के गूढ़ रहस्यों, शब्दशः अर्थों, महाभारत कालीन ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, नियमित पाठ के मानसिक व आध्यात्मिक लाभों और साधकों के लिए इसके व्यावहारिक अनुप्रयोगों का संपूर्ण विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं। Bhaktilok.in के इस मंच पर हमारा उद्देश्य आपको शास्त्रों के सबसे शुद्ध और प्रामाणिक ज्ञान से जोड़ना है, ताकि आपका जीवन भक्ति, ज्ञान और वैराग्य के त्रिवेणी संगम से प्लावित हो सके।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

श्रीकृष्णार्जुन संवाद के अंतर्गत श्रीमद्भागवत गीता के दूसरे अध्याय (सांख्य योग) का यह श्लोक अत्यंत पवित्र और कंठस्थ करने योग्य है। इसका पाठ विधि-विधान और एकाग्रता के साथ करने से मन को असीम शांति मिलती है।

श्लोकः

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् ।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ५७ ॥


पदच्छेदः

यः सर्वत्र अनभिस्नेहः तत् तत् प्राप्य शुभ-अशुभम् ।
न अभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥

पाठ विधि एवं नियम:

  • प्रतिदिन ब्रह्ममुहूर्त में या संध्याकाल में स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर शांत चित्त से बैठें।
  • भगवान श्री कृष्ण और गीता ग्रंथ के समक्ष दीप प्रज्वलित करें।
  • इस श्लोक का न्यूनतम 11, 21 या 108 बार स्पष्ट उच्चारण के साथ मानसिक जप करें।
  • पाठ के अंत में अपनी समस्त चिंताओं और कर्मों को ईश्वर को समर्पित कर दें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्लोक के प्रत्येक शब्द की व्याकरणिक और दार्शनिक गहराई को समझने से ही इसका वास्तविक मर्म हृदय में उतरता है। नीचे दी गई सारणी में इसका विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत है:

पद / शब्द (Sanskrit Term) सरल हिंदी अर्थ (Literal Meaning) आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ (Spiritual Interpretation)
यः (यः) जो मनुष्य वह विशिष्ट साधक या ज्ञानी पुरुष जो अपनी चेतना को जागृत कर चुका है।
सर्वत्र (सर्वत्र) सब जगह, सभी परिस्थितियों में चाहे वह अनुकूल परिस्थिति हो या प्रतिकूल, मान हो या अपमान, सफलता हो या विफलता।
अनभिस्नेहः (अनभिस्नेहः) आसक्ति या मोह से रहित संसार की वस्तुओं, संबंधों और परिणामों से अत्यधिक जुड़ाव या राग न रखना।
तत् तत् (तत् तत्) उस-उस प्रकार की (विभिन्न) जीवन में अनपेक्षित या अपेक्षित रूप से सामने आने वाली भिन्न-भिन्न स्थितियां।
प्राप्य (प्राप्य) प्राप्त करके, पाकर कर्म फल के रूप में उन परिस्थितियों का सामना होने पर या उनके समक्ष आने पर।
शुभ-अशुभम् (शुभाशुभम्) भले और बुरे (सुखद और दुखद) परिणामों को लोक दृष्टि में जिसे अच्छा (सुख, लाभ, प्रशंसा) या बुरा (दुख, हानि, निंदा) कहा जाता है।
न अभिनन्दति (नाभिनन्दति) न तो अत्यधिक प्रसन्न होता है शुभ या अनुकूल प्राप्ति पर अहंकार या अति-उत्साह में होश न खोना (हर्ष का त्याग)।
न द्वेष्टि (न द्वेष्टि) और न ही द्वेष करता है अशुभ या प्रतिकूल परिस्थिति आने पर क्रोध, निराशा या घृणा न करना (शोक का त्याग)।
तस्य (तस्य) उस पुरुष की उस महान आत्मा या ब्रह्मलीन साधक की बुद्धि।
प्रज्ञा प्रतिष्ठिता (प्रज्ञा प्रतिष्ठिता) बुद्धि पूरी तरह स्थिर है विवेक रूपी चेतना अडिग, अचल और परमात्मा में एकाग्र हो चुकी है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

इस श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत के महायुद्ध के ठीक आरंभ से जुड़ी है। कुरुक्षेत्र के पावन रणक्षेत्र में जब पांडव सेना और कौरव सेना आमने-सामने खड़ी थीं, तब धर्मसंकट में पड़े अर्जुन ने अपने ही प्रियजनों, गुरुओं (भीष्म और द्रोणाचार्य) और सगे-संबंधियों को देखकर अपने गांडीव धनुष को रख दिया था। अर्जुन पूरी तरह से मानसिक भ्रम, विषाद और कर्तव्यच्युति की स्थिति में चले गए थे। उनके भीतर मोह (स्नेह) और भय का ऐसा तूफान उठा कि उनका शरीर कांपने लगा और मुंह सूखने लगा।

ऐसी विकट स्थिति में अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण को अपना सारथी और गुरु स्वीकार करते हुए उनसे शरण मांगी और कहा — "कार्पण्यदोषहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः..." (हे प्रभु! मैं कायरता रूपी दोष से ग्रस्त होकर आपसे पूछ रहा हूँ कि मेरे लिए श्रेयस्कर क्या है?)। अर्जुन के इस आर्त निवेदन के उत्तर में भगवान श्री कृष्ण ने सांख्य योग का उपदेश देना आरंभ किया।

अध्याय 2 के अंत में, अर्जुन भगवान से पूछते हैं — "स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव..." (हे केशव! समाधि में स्थित, स्थिर बुद्धि वाले पुरुष के क्या लक्षण हैं? वह कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?)। अर्जुन के इसी गूढ़ प्रश्न के उत्तर में भगवान श्री कृष्ण ने 54वें श्लोक से लेकर 72वें श्लोक तक स्थितप्रज्ञ के विभिन्न लक्षणों का विस्तार से वर्णन किया है।

वर्तमान श्लोक (57वां) उसी श्रृंखला की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत और श्रीमद्भागवत गीता का यह प्रसंग हमें यह सिखाता है कि युद्ध केवल बाहरी धरातल पर नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चलने वाले राग और द्वेष के द्वंद्व के बीच भी लड़ा जाता है। जो व्यक्ति इस आंतरिक युद्ध को जीत लेता है, वही जीवन के हर क्षेत्र में विजयी बनता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस दिव्य श्लोक का निरंतर मनन, पाठ और इसके अर्थ को जीवन में उतारने से साधक को असीम आध्यात्मिक और मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति और स्थिरता

सुख और दुख के थपेड़ों से मन को बचाकर एक समान भाव (समता) में रखने की अद्भुत शक्ति प्रदान करता है।

2. तनाव और अवसाद से मुक्ति

परिणामों की चिंता और अतीत के पछतावे से मुक्ति दिलाकर वर्तमान क्षण में जीने की कला सिखाता है।

3. कर्म योग का सही बोध

फल की आसक्ति से मुक्त होकर केवल निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने की प्रेरणा देता है।

4. भावनात्मक संतुलन (Emotional Balance)

अत्यधिक हर्ष में बह जाने या अत्यधिक विपत्ति में टूट जाने की कमजोर प्रवृत्ति को हमेशा के लिए समाप्त कर देता है।

5. सकारात्मक ऊर्जा का संचार

नियमित जप से व्यक्ति की आभा (Aura) शुद्ध होती है और उसके आसपास एक शांत व सकारात्मक आध्यात्मिक ऊर्जा का विस्तार होता है।

6. कर्म बंधन से शुद्धि

राग और द्वेष ही सभी कर्म बंधनों के मूल कारण हैं। इनसे मुक्त होने पर साधक धीरे-धीरे karmic cycle से ऊपर उठने लगता है।

7. ईश्वरीय कृपा की प्राप्ति

जो भक्त सुख-दुख में समान रहता है, भगवान कृष्ण ऐसे भक्त को अत्यंत प्रिय मानते हैं ("स मे प्रियः")।

8. आत्म-साक्षात्कार का मार्ग

प्रज्ञा की यह स्थिरता साधक को अंततः मोक्ष और आत्म-साक्षात्कार (Self-realization) के सर्वोच्च द्वार तक पहुंचाती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख सनातन धर्म के मूल ग्रंथों, विशेषकर महर्षि वेदव्यास विरचित श्रीमद्भागवत गीता (द्वितीय अध्याय, श्लोक 57) के मूल संस्कृत वचनों, आद्य शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास जी और अन्य प्रामाणिक टीकाकारों के भाष्यों के गहन अध्ययन के आधार पर संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। हमारा यह प्रयास है कि आधुनिक पाठकों और साधकों तक वेदों, पुराणों और उपनिषदों का शाश्वत ज्ञान अत्यंत सरल, स्पष्ट और गरिमामयी हिंदी में पहुंचे।

यदि आपके पास इस विषय से संबंधित कोई भी प्रश्न या सुझाव है, तो आप हमारी संपादकीय टीम से संपर्क कर सकते हैं। हमारा उद्देश्य धार्मिक सत्यों का प्रामाणिक प्रस्तुतिकरण करना है, जो किसी भी प्रकार के भ्रम या अतिशयोक्ति से परे हो।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

उत्तर: 'स्थितप्रज्ञ' वह पुरुष है जिसकी बुद्धि (प्रज्ञा) परमात्मा में पूरी तरह स्थिर हो चुकी है। इस श्लोक (57) के अनुसार, स्थितप्रज्ञ वह है जो सभी परिस्थितियों में आसक्तिहीन (अनभिस्नेहः) रहता है, जीवन में शुभ या अशुभ परिस्थितियां आने पर न तो अत्यधिक हर्षित होता है (न अभिनन्दति) और न ही उनसे घृणा या द्वेष करता है (न द्वेष्टि)।

उत्तर: दैनिक जीवन में अपने कर्तव्यों का पूरी ईमानदारी से निर्वाह करते हुए परिणामों (सफलता या असफलता, लाभ या हानि) के प्रति अत्यधिक मोह या आश्रित न होना ही 'सर्वत्रानभिस्नेहः' का पालन है। जब हम किसी वस्तु या व्यक्ति से सुख की अत्यधिक अपेक्षा छोड़ देते हैं, तब मन अनासक्त हो जाता है।

उत्तर: बिल्कुल नहीं। यह भावनाओं को मारना नहीं, बल्कि उन्हें उच्च और स्थिर चेतना में रूपांतरित करना है। जब मनुष्य समझ जाता है कि सुख और दुख प्रकृति के नियम के अनुसार आते-जाते हैं, तब वह उनके प्रति प्रतिक्रिया देने के बजाय साक्षी भाव (Observer mode) में जीना सीख जाता है, जिससे आंतरिक शांति बनी रहती है।

उत्तर: यह श्लोक श्रीमद्भागवत गीता के दूसरे अध्याय (सांख्य योग) का 57वां श्लोक है। यह उस प्रसंग का हिस्सा है जहां भगवान श्री कृष्ण अर्जुन के पूछने पर एक स्थितप्रज्ञ (समदर्शी) पुरुष के आचार, विचार और लक्षणों का वर्णन कर रहे हैं।

उत्तर: जब कोई साधक इस श्लोक का बार-बार पाठ करता है, तो इसके शब्द और अर्थ उसके अवचेतन मन में स्थापित हो जाते हैं। इससे व्यक्ति को यह बौद्धिक स्पष्टता मिलती है कि हर परिस्थिति अस्थायी है। यह बोध ही चिंता, भय और तनाव की जड़ों को कमजोर कर देता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो पुरुष सर्वत्र आसक्ति रहित है, और शुभ या अशुभ को प्राप्त होकर न हर्षित होता है न द्वेष करता है, उसकी प्रज्ञा स्थिर है। He who is without attachment everywhere, who neither rejoices nor hates on obtaining good or evil – his wisdom is established.

निर्विकार / Unaffected

स्थितप्रज्ञ पर किसी भी बाहरी परिस्थिति का प्रभाव नहीं पड़ता।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 57 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 57/72 79% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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