सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 57

श्लोक ५७ में कहा गया है कि जो शुभ-अशुभ में हर्ष-द्वेष नहीं करता, उसकी बुद्धि स्थिर है।

संस्कृत श्लोक

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् | नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||५७||

yaḥ sarvatrānabhisnehas tat tat prāpya śubhāśubham | nābhinandati na dveṣṭi tasya prajñā pratiṣṭhitā ||57||

पदच्छेद / शब्दार्थ

यः: जो; सर्वत्र: सर्वत्र; अनभिस्नेहः: स्नेहरहित (बिना आसक्ति); तत् तत्: वह-वह; प्राप्य: प्राप्त करके; शुभाशुभम्: शुभ और अशुभ; न: नहीं; अभिनन्दति: हर्षित होता; न: नहीं; द्वेष्टि: द्वेष करता; तस्य: उसकी; प्रज्ञा: प्रज्ञा; प्रतिष्ठिता: स्थिर है।

हिंदी अनुवाद

जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित (बिना आसक्ति) है और इस प्रकार शुभ या अशुभ को प्राप्त होकर न हर्षित होता है, न द्वेष करता है, उसकी प्रज्ञा स्थिर है।

English Translation

He who is without attachment everywhere, who neither rejoices nor hates on obtaining good or evil – his wisdom is established.

टीका / Commentary

स्थितप्रज्ञ शुभ-अशुभ परिस्थितियों में भी समान रहता है – न हर्ष, न द्वेष।