श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 58

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 42 मिनट का पठन 135 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः | इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||५८||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
यदा
जब
संहरते
समेट लेता है
च
और
अयम्
यह
कूर्मः
कछुआ
अङ्गानि
अंगों को
इव
जैसे
सर्वशः
सब ओर से
इन्द्रियाणि
इन्द्रियों को
इन्द्रियार्थेभ्यः
इन्द्रियों के विषयों से
तस्य
उसकी
प्रज्ञा
प्रज्ञा
प्रतिष्ठिता
स्थिर है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जैसे कछुआ सब ओर से अपने अंगों को समेट लेता है, वैसे ही जब यह (पुरुष) इन्द्रियों को इन्द्रिय-विषयों से हटा लेता है, तब उसकी प्रज्ञा स्थिर होती है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भूमिका एवं आध्यात्मिक महत्त्व

सनातन संस्कृति और श्रीमद्भागवतगीता के अगाध ज्ञानसागर में 'स्थितप्रज्ञ' (वह पुरुष जिसकी बुद्धि परमात्मा में स्थिर हो चुकी है) के लक्षणों का वर्णन करते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने द्वितीय अध्याय के श्लोक संख्या 58 में एक अत्यंत ही सुंदर, व्यावहारिक और दार्शनिक दृष्टान्त प्रस्तुत किया है। इस श्लोक में कछुए (कूर्म) का उदाहरण देते हुए इंद्रिय निग्रह की पराकाष्ठा को समझाया गया है। मानव जीवन में हमारी इंद्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा) निरंतर बाह्य विषयों (रूप, रस, गंध, शब्द और स्पर्श) की ओर आकर्षित होती रहती हैं। यह आकर्षण ही मनुष्य के मन में कामनाओं, विकारों, और तत्पश्चात क्रोध एवं मोह को जन्म देता है।

जब तक मनुष्य की इंद्रियाँ उसके नियंत्रण से बाहर रहती हैं, तब तक उसकी बुद्धि विचलित और अशांत बनी रहती है। इस श्लोक का मूल संदेश यह है कि जिस प्रकार एक कछुआ संकट या आवश्यकता पड़ने पर अपने सभी अंगों (हाथ, पैर और सिर) को अपने कठोर आवरण के भीतर पूरी तरह समेट लेता है, ठीक उसी प्रकार एक साधक या संयमी पुरुष को भी अपनी इंद्रियों को उनके विषयों से खींचकर अपने भीतर स्थित कर लेना चाहिए। यह बाह्य जगत से वैराग्य और अंतर्जगत में स्थित परमात्मा के साथ एकाग्रता स्थापित करने का सबसे अचूक साधन है। इसका कॉस्मिक (ब्रह्मांडीय) महत्व यह है कि जब व्यक्ति अपनी ऊर्जा को बाह्य प्रपंच से समेटकर आत्म-केंद्रित करता है, तब उसकी चेतना संकुचित नहीं बल्कि विराट हो जाती है, और वह परम शांति व आनंद का अनुभव करता है। Bhaktilok.in के इस विस्तृत आलेख में हम इसी गूढ़ श्लोक के प्रत्येक पक्ष का शास्त्रीय, दार्शनिक और व्यावहारिक विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ५८ ॥

अध्याय 2 (सांख्य योग), श्लोक 58 - श्रीमद्भगवद्गीता

पाठ विधि एवं ध्यान: इस श्लोक का प्रतिदिन प्रातः काल ब्रह्म बेला में अथवा संध्या वंदन के समय मानसिक जप करने से चित्त की चंचलता समाप्त होती है। श्लोक का उच्चारण करते समय अपनी श्वासों पर नियंत्रण रखें और यह भाव करें कि आपकी इंद्रियाँ भी प्रभु के चरणों में समर्पित हो रही हैं। गीता के इस ज्ञान का पठन केवल एक श्लोक का पाठ नहीं है, अपितु यह जीवन जीने की एक उत्कृष्ट कला है जो मानसिक विकारों और बाह्य प्रलोभनों से रक्षा करती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

आइए इस श्लोक के प्रत्येक शब्द के शाब्दिक और आध्यात्मिक अर्थ को गहराई से समझें:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
यदा जब वह विशिष्ट समय या अवस्था जब साधक का विवेक जाग्रत होता है।
संहरते खींच लेता है / समेट लेता है बाहर की ओर भागने वाली ऊर्जा को भीतर की ओर मोड़ने की प्रक्रिया।
च अयम् और यह (पुरुष) वह बुद्धिमान साधक जो आत्म-कल्याण के मार्ग पर अग्रसर है।
कूर्मः कछुआ प्रकृति का वह जीव जो आत्म-रक्षा के लिए अपने अंगों को संकुचित कर लेता है।
अङ्गानि इव अपने अंगों के समान जिस प्रकार कछुआ अपने अंगों को खोल के भीतर करता है।
सर्वशः सब प्रकार से / पूरी तरह से किसी भी प्रकार का कोई भी अंग बाहर न छूटे, पूर्ण नियंत्रण।
इन्द्रियाणि समस्त इंद्रियाँ (पाँच ज्ञानेंद्रियाँ और पाँच कर्मेंद्रियाँ) कर्म और ज्ञान के बाह्य उपकरण जो विषयों की ओर भागते हैं।
इन्द्रियार्थेभ्यः इन्द्रियों के विषयों से (शब्द, रूप आदि) भोग-विलासिता और संसार की नश्वर वस्तुएँ जो आकर्षण पैदा करती हैं।
तस्य उस पुरुष की उस उच्च कोटि के योगी या स्थितप्रज्ञ महापुरुष की।
प्रज्ञा बुद्धि / चेतना दिव्य ज्ञान से परिपूर्ण, स्थिर और अचल बुद्धि।
प्रतिष्ठिता प्रतिष्ठित है / स्थिर है जो कभी विचलित नहीं होती, परमात्मा में अचल रूप से लीन है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस महान संवाद की पृष्ठभूमि कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में रची गई है, जहाँ अर्जुन अपने स्वजनों के मोह और युद्ध की विभीषिका से विचलित होकर अपने गांडीव धनुष को रख देते हैं और भगवान श्रीकृष्ण को अपना गुरु मानकर शरण लेते हैं। अर्जुन का यह प्रश्न कि "हे केशव! समाधि में स्थित स्थिर बुद्धि वाले पुरुष के क्या लक्षण हैं? वह कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?" इसी जिज्ञासा के उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण ने सांख्य योग के अंतर्गत स्थितप्रज्ञ के विभिन्न लक्षणों का वर्णन किया है।

कछुए (कूर्म) का यह दृष्टान्त केवल गीता तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय सनातन साहित्य (विशेषकर पुराणों और उपनिषदों) में इसका अत्यधिक गहरा दार्शनिक महत्व है। कूर्म अवतार भगवान विष्णु का दूसरा मुख्य अवतार है, जिसमें उन्होंने समुद्र मंथन के दौरान मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर उठाया था। उस प्रसंग में भी कछुए की स्थिरता, सहनशीलता और विपत्ति के समय अपनी शक्तियों को समेटने के गुण का दर्शन होता है। महर्षि वेद व्यास रचित महाभारत और विभिन्न पुराणों में बार-बार इस बात पर बल दिया गया है कि संसार रूपी भवसागर में तैरते हुए यदि मनुष्य को अपने आंतरिक दिव्य स्वरूप को पहचानना है, तो उसे कछुए की तरह अपनी इंद्रियों को बाह्य विषयों के विषैले प्रभावों से बचाना होगा। जब अर्जुन ने पूछा कि मन अति चंचल और बलवान है, तो भगवान ने इसी कछुए के दृष्टान्त के माध्यम से यह समझाया कि निरंतर अभ्यास (अभ्यास) और वैराग्य के द्वारा इस पर विजय पाई जा सकती है।

यह शास्त्रीय पृष्ठभूमि हमें सिखाती है कि मनुष्य जीवन संग्राम (कुरुक्षेत्र) में निरंतर संघर्ष कर रहा है। यहाँ इन्द्रियों रूपी घोड़े अत्यंत तीव्र हैं, और यदि सारथी (बुद्धि) सतर्क न हो, तो रथ खाई में गिर सकता है। भगवान श्रीकृष्ण का यह उपदेश समस्त मानवजाति के लिए एक शाश्वत मार्गदर्शिका है, जो अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाती है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के इस विशिष्ट श्लोक का स्मरण, मनन और इसके मर्म को जीवन में उतारने से साधक को निम्नलिखित असीम लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति एवं स्थिरता

इंद्रियों के निग्रह से मन का भटकाव रुकता है, जिससे अत्यधिक तनाव, चिंता और अवसाद से मुक्ति मिलती है और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है।

2. सकारात्मक ऊर्जा का संचय (Aura Purification)

बाह्य विषयों में व्यर्थ नष्ट होने वाली प्राण ऊर्जा शरीर के भीतर संचित होने लगती है, जिससे साधक के औरा (Aura) में दिव्य चमक और सकारात्मकता बढ़ती है।

3. कर्म शुद्धि एवं विकारों का नाश

काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसे आंतरिक शत्रुओं पर नियंत्रण पाना सहज हो जाता है, जिससे पापकर्मों से मुक्ति मिलती है और कर्म शुद्ध होते हैं।

4. आत्म-नियंत्रण और एकाग्रता में वृद्धि

विद्यार्थियों, साधકો और कर्मयोगियों के लिए यह श्लोक एकाग्रता की कुंजी है। इससे स्मरण शक्ति और निर्णय लेने की क्षमता में अभूतपूर्व सुधार होता है।

5. भगवत्कृपा और दिव्य चेतना की प्राप्ति

जब इंद्रियाँ भगवान के स्मरण में लग जाती हैं और बाह्य प्रपंच से हट जाती हैं, तो साधक को सहज ही भगवत्कृपा और आत्मानुभूति का अनुभव होने लगता है।

6. वैराग्य भाव का जागरण

संसार की नश्वरता का बोध होता है और क्षणिक सुखों के प्रति आसक्ति समाप्त होकर वास्तविक आध्यात्मिकता और वैराग्य मार्ग पर प्रवृत्ति होती है।

7. निर्णय क्षमता और विवेक की वृद्धि

इंद्रियों के आवेग में आकर गलत निर्णय लेने की संभावना समाप्त हो जाती है। विवेक जाग्रत होने से जीवन के हर क्षेत्र में सफलता मिलती है।

8. आध्यात्मिक स्वतंत्रता (जीवन मुक्ति)

व्यक्ति इंद्रियों का गुलाम न रहकर उनका स्वामी बन जाता है, यही वास्तविक आध्यात्मिक स्वतंत्रता है जो जीवन को सुखमय और सार्थक बनाती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख सनातन ग्रंथों, विशेषकर महर्षि वेदव्यास रचित 'श्रीमद्भगवद्गीता' (द्वितीय अध्याय, सांख्य योग) के मूल संस्कृत श्लोकों और आचार्यों की पारंपरिक टीकाओं (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और संत ज्ञानेश्वर महाराज के वचनों) के गहन अध्ययन पर आधारित है। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री यह सुनिश्चित करती है कि पाठकों को वेदों, उपनिषदों और पुराणों का शुद्ध, अकाट्य और व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त हो। हमारा उद्देश्य किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि गीता के वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक सत्यों को आधुनिक संदर्भ में सहज हिंदी भाषा के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाना है। सभी तथ्य पूरी प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत किए गए हैं ताकि साधक अपने आध्यात्मिक मार्ग पर बिना किसी संशय के आगे बढ़ सकें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

उत्तर: इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने समझाया है कि जिस प्रकार कछुआ संकट आने पर या आवश्यकता पड़ने पर अपने सभी अंगों को अपने कठोर खोल के भीतर पूरी तरह समेट लेता है, उसी प्रकार एक स्थितप्रज्ञ (स्थिर बुद्धि वाले) पुरुष को अपनी इंद्रियों को उनके बाह्य विषयों (शब्द, रूप, रस आदि) से हटाकर अपने वश में कर लेना चाहिए। इससे मन और बुद्धि में पूर्ण स्थिरता आती है।

उत्तर: 'स्थितप्रज्ञ' दो शब्दों से मिलकर बना है—'स्थित' (अचल या स्थिर) और 'प्रज्ञ' (बुद्धि)। आध्यात्मिक रूप से स्थितप्रज्ञ वह महापुरुष है जिसकी बुद्धि सुख-दुःख, मान-अपमान, लाभ-हानि और बाह्य प्रलोभनों से विचलित नहीं होती और सदैव परमात्मा के स्वरूप में अचल रूप से स्थापित रहती है।

उत्तर: दैनिक जीवन में जब भी हमारा मन बाह्य प्रलोभनों, अनावश्यक चर्चाओं, सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग या भोग-विलासिता की ओर भागे, तब हमें इस श्लोक का स्मरण करना चाहिए। कछुए की भाँति अपने ध्यान को उस भटकाव से खींचकर अपने भीतर स्थित आराध्य या श्वास पर केंद्रित करना चाहिए। यही इस उपदेश को जीवन में उतारने की व्यावहारिक विधि है।

उत्तर: इस श्लोक के नियमित मनन से अत्यधिक सोचने (Overthinking), चिंता, क्रोध और तनाव में कमी आती है। ऊर्जा का बाह्य अपव्यय रुकने से मानसिक एकाग्रता बढ़ती है, आत्मबल मजबूत होता है और व्यक्ति शांत तथा संतुलित जीवन जीता है।

उत्तर: यह श्लोक संपूर्ण मानवजाति के लिए है। भगवान श्रीकृष्ण ने इसे कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में एक गृहस्थ कर्मयोगी अर्जुन को उपदेशित किया था। अतः गृहस्थ जीवन जीते हुए भी अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए मन और इंद्रियों पर संयम रखना ही इस श्लोक का वास्तविक और मुख्य उद्देश्य है।

© Bhaktilok.in - सर्वाधिकार सुरक्षित। सनातन संस्कृति, भक्ति और शास्त्रीय ज्ञान का विश्वसनीय डिजिटल मंच।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जैसे कछुआ अपने अंगों को समेट लेता है, वैसे ही जब पुरुष इन्द्रियों को इन्द्रिय-विषयों से हटा लेता है, तब उसकी प्रज्ञा स्थिर होती है। When, like a tortoise which withdraws its limbs, he withdraws his senses from sense objects, then his wisdom is steady.

इन्द्रिय-निग्रह / Sense Control

इन्द्रियों को विषयों से हटाना ही स्थितप्रज्ञता का लक्षण है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 58 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 58/72 81% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!