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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 58

अध्याय 2 · श्लोक 58

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः | इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||५८||

yadā saṃharate cāyaṃ kūrmo 'ṅgānīva sarvaśaḥ | indriyāṇīndriyārthebhyas tasya prajñā pratiṣṭhitā ||58||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

यदा: जब; संहरते: समेट लेता है; च: और; अयम्: यह; कूर्मः: कछुआ; अङ्गानि: अंगों को; इव: जैसे; सर्वशः: सब ओर से; इन्द्रियाणि: इन्द्रियों को; इन्द्रियार्थेभ्यः: इन्द्रियों के विषयों से; तस्य: उसकी; प्रज्ञा: प्रज्ञा; प्रतिष्ठिता: स्थिर है।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जैसे कछुआ सब ओर से अपने अंगों को समेट लेता है, वैसे ही जब यह (पुरुष) इन्द्रियों को इन्द्रिय-विषयों से हटा लेता है, तब उसकी प्रज्ञा स्थिर होती है।

English Translation

When, like a tortoise which draws in its limbs from all sides, he withdraws his senses from the sense objects, then his wisdom is steady.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

कछुए का दृष्टान्त – वह जैसे अपने अंगों को भीतर खींच लेता है, वैसे ही स्थितप्रज्ञ इन्द्रियों को विषयों से हटाकर अपने वश में कर लेता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।