सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 58
श्लोक ५८ में इन्द्रिय-निग्रह का वर्णन कछुए के दृष्टान्त से किया गया है।
संस्कृत श्लोक
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः | इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||५८||
yadā saṃharate cāyaṃ kūrmo 'ṅgānīva sarvaśaḥ | indriyāṇīndriyārthebhyas tasya prajñā pratiṣṭhitā ||58||
पदच्छेद / शब्दार्थ
यदा: जब; संहरते: समेट लेता है; च: और; अयम्: यह; कूर्मः: कछुआ; अङ्गानि: अंगों को; इव: जैसे; सर्वशः: सब ओर से; इन्द्रियाणि: इन्द्रियों को; इन्द्रियार्थेभ्यः: इन्द्रियों के विषयों से; तस्य: उसकी; प्रज्ञा: प्रज्ञा; प्रतिष्ठिता: स्थिर है।
हिंदी अनुवाद
जैसे कछुआ सब ओर से अपने अंगों को समेट लेता है, वैसे ही जब यह (पुरुष) इन्द्रियों को इन्द्रिय-विषयों से हटा लेता है, तब उसकी प्रज्ञा स्थिर होती है।
English Translation
When, like a tortoise which draws in its limbs from all sides, he withdraws his senses from the sense objects, then his wisdom is steady.
टीका / Commentary
कछुए का दृष्टान्त – वह जैसे अपने अंगों को भीतर खींच लेता है, वैसे ही स्थितप्रज्ञ इन्द्रियों को विषयों से हटाकर अपने वश में कर लेता है।