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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 59

अध्याय 2 · श्लोक 59

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः | रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ||५९||

viṣayā vinivartante nirāhārasya dehinaḥ | rasa-varjaṃ raso 'py asya paraṃ dṛṣṭvā nivartate ||59||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

विषयाः: विषय; विनिवर्तन्ते: निवृत्त हो जाते हैं; निराहारस्य: आहार (भोग) का त्याग करने वाले; देहिनः: शरीरी की; रसवर्जम्: रस (स्वाद) को छोड़कर; रसः: रस; अपि: भी; अस्य: इसकी; परम्: परम (ब्रह्म); दृष्ट्वा: देखकर; निवर्तते: निवृत्त हो जाता है।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

भोगों का त्याग करने वाले पुरुष के विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, पर उनका रस (आस्वाद) निवृत्त नहीं होता। किन्तु परम (ब्रह्म) को देख लेने पर उसका रस भी निवृत्त हो जाता है।

English Translation

The objects of the senses turn away from the abstinent person, leaving the longing behind. But even the longing turns away when one sees the Supreme.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

केवल भोगों का त्याग करने से उनकी इच्छा (रस) शेष रह जाती है, पर ब्रह्म-साक्षात्कार के बाद वह इच्छा भी समाप्त हो जाती है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।