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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 60

अध्याय 2 · श्लोक 60

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः | इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ||६०||

yatato hy api kaunteya puruṣasya vipaścitaḥ | indriyāṇi pramāthīni haranti prasabhaṃ manaḥ ||60||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

यततः: प्रयत्न करते हुए; हि: निश्चय ही; अपि: भी; कौन्तेय: हे कौन्तेय; पुरुषस्य: पुरुष के; विपश्चितः: बुद्धिमान; इन्द्रियाणि: इन्द्रियाँ; प्रमाथीनि: प्रमाथी (प्रबल); हरन्ति: हर लेती हैं; प्रसभम्: बलपूर्वक; मनः: मन को।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे कौन्तेय! प्रयत्न करते हुए भी बुद्धिमान पुरुष के प्रबल (चंचल) इन्द्रियाँ बलपूर्वक मन को हर लेती हैं।

English Translation

The senses are so strong and impetuous, O Arjuna, that they forcibly carry away the mind even of a wise man who is striving (to control them).

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

इन्द्रियाँ इतनी प्रबल हैं कि प्रयत्नशील और बुद्धिमान व्यक्ति का भी मन वे बलपूर्वक हर सकती हैं। यह इन्द्रिय-दमन की कठिनाई को दर्शाता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।