सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 60
श्लोक ६० में इन्द्रियों की प्रबलता बताई गई है – वे प्रयत्नशील बुद्धिमान का भी मन हर सकती हैं।
संस्कृत श्लोक
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः | इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ||६०||
yatato hy api kaunteya puruṣasya vipaścitaḥ | indriyāṇi pramāthīni haranti prasabhaṃ manaḥ ||60||
पदच्छेद / शब्दार्थ
यततः: प्रयत्न करते हुए; हि: निश्चय ही; अपि: भी; कौन्तेय: हे कौन्तेय; पुरुषस्य: पुरुष के; विपश्चितः: बुद्धिमान; इन्द्रियाणि: इन्द्रियाँ; प्रमाथीनि: प्रमाथी (प्रबल); हरन्ति: हर लेती हैं; प्रसभम्: बलपूर्वक; मनः: मन को।
हिंदी अनुवाद
हे कौन्तेय! प्रयत्न करते हुए भी बुद्धिमान पुरुष के प्रबल (चंचल) इन्द्रियाँ बलपूर्वक मन को हर लेती हैं।
English Translation
The senses are so strong and impetuous, O Arjuna, that they forcibly carry away the mind even of a wise man who is striving (to control them).
टीका / Commentary
इन्द्रियाँ इतनी प्रबल हैं कि प्रयत्नशील और बुद्धिमान व्यक्ति का भी मन वे बलपूर्वक हर सकती हैं। यह इन्द्रिय-दमन की कठिनाई को दर्शाता है।