सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 61

श्लोक ६१ में इन्द्रियों को वश में करके भगवत्परायण होने का उपदेश दिया गया है।

संस्कृत श्लोक

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः | वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||६१||

tāni sarvāṇi saṃyamya yukta āsīta mat-paraḥ | vaśe hi yasyendriyāṇi tasya prajñā pratiṣṭhitā ||61||

पदच्छेद / शब्दार्थ

तानि: उन (इन्द्रियों) को; सर्वाणि: सब; संयम्य: वश में करके; युक्तः: योगी; आसीत: स्थित हो; मत्परः: मुझ परमात्मा में परायण; वशे: वश में; हि: निश्चय ही; यस्य: जिसके; इन्द्रियाणि: इन्द्रियाँ; तस्य: उसकी; प्रज्ञा: प्रज्ञा; प्रतिष्ठिता: स्थिर है।

हिंदी अनुवाद

उन सब इन्द्रियों को वश में करके योगी मुझ परमात्मा में परायण होकर बैठे (स्थित हो)। क्योंकि जिसकी इन्द्रियाँ वश में हैं, उसकी प्रज्ञा स्थिर है।

English Translation

Having controlled all the senses, one should remain steadfast in yoga, devoted to Me. For one whose senses are under control, his wisdom is steady.

टीका / Commentary

इन्द्रिय-निग्रह के बाद योगी को भगवत्परायण होना चाहिए। ऐसे व्यक्ति की बुद्धि स्थिर होती है।