श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 61

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 43 मिनट का पठन 134 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः | वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||६१||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
तानि
उन (इन्द्रियों) को
सर्वाणि
सब
संयम्य
वश में करके
युक्तः
योगी
आसीत
स्थित हो
मत्परः
मुझ परमात्मा में परायण
वशे
वश में
हि
निश्चय ही
यस्य
जिसके
इन्द्रियाणि
इन्द्रियाँ
तस्य
उसकी
प्रज्ञा
प्रज्ञा
प्रतिष्ठिता
स्थिर है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

उन सब इन्द्रियों को वश में करके योगी मुझ परमात्मा में परायण होकर बैठे (स्थित हो)। क्योंकि जिसकी इन्द्रियाँ वश में हैं, उसकी प्रज्ञा स्थिर है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीभगवद्गीता के श्लोक आधारित गहन और प्रामाणिक दार्शनिक विवेचना

प्रस्तावना: इन्द्रिय संयम और भगवत्परायणता का सनातन मार्ग

सनातन वैदिक संस्कृति और भारतीय आध्यात्मिक दर्शन में इन्द्रिय निग्रह तथा मन की स्थिरता को मोक्ष का द्वार माना गया है। श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय (सांख्य योग) का यह इकसठवाँ (61वां) श्लोक—"तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः | वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता"—मानव जीवन के सबसे बड़े और जटिल प्रश्न का सहज उत्तर प्रस्तुत करता है। मनुष्य का जीवन मूलतः उसकी इन्द्रियों और मन के अधीन संचालित होता है। यदि इन्द्रियाँ अनियंत्रित घोड़ों की भांति दिशाहीन हो जाएं, तो जीवन रूपी रथ किसी भी खड्ड में गिर सकता है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से समस्त मानव जाति को यह संदेश देते हैं कि बाह्य प्रपंचों से मुक्ति तभी संभव है, जब साधक अपनी समस्त इन्द्रियों को पूरी तरह वश में करके पूर्णतः भगवत्परायण (मत्परः) हो जाए।

इस श्लोक का सांस्कृतिक और ब्रह्मांडीय महत्व अत्यंत व्यापक है। आधुनिक युग में जहाँ चारों ओर भौतिकता की आंधी चल रही है, विषय-विकार मनुष्य की बुद्धि को निरन्तर भ्रमित कर रहे हैं, ऐसे समय में यह श्लोक एक अचूक आध्यात्मिक औषधि की भांति कार्य करता है। जब तक मनुष्य की बुद्धि स्थिर (प्रज्ञा प्रतिष्ठिता) नहीं होती, तब तक उसे आत्मज्ञान या परम शान्ति की प्राप्ति नहीं हो सकती। यह श्लोक केवल एक कोरा धार्मिक उपदेश नहीं है, बल्कि यह मनोविज्ञान, आत्म-अनुशासन और अद्वैत चेतना का एक अकाट्य वैज्ञानिक सिद्धांत है।

Bhaktilok.in के इस विशेष आध्यात्मिक अंक में हम इसी महान श्लोक के प्रामाणिक अर्थ, शब्द-विन्यास, पौराणिक संदर्भ, मानसिक और आध्यात्मिक लाभ तथा जीवन में इसके व्यावहारिक प्रयोग का सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं। आइए, इस पावन ज्ञान गंगा में गोता लगाकर अपनी प्रज्ञा को प्रतिष्ठित करने का मार्ग प्रशस्त करें।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

श्रीमद्भगवद्गीता — द्वितीय अध्याय (सांख्य योग) — श्लोक ६१

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।

वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥ ६१ ॥

श्लोक का उच्चारण एवं पाठ विधि:

इस दिव्य श्लोक का पाठ प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नान-ध्यान के पश्चात पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके करना चाहिए। इसका पाठ करते समय उच्चारण की शुद्धता का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। प्रत्येक पद को स्पष्ट रूप से बोलते हुए इसके आंतरिक अर्थ का अपने हृदय में चिंतन करना चाहिए। नियमित रूप से कम से कम 11 या 21 बार इस श्लोक का मानस जप करने से चंचल मन को एकाग्र करने में अभूतपूर्व सहायता मिलती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में वेदों और उपनिषदों का सार समाहित है। आइए तालिका के माध्यम से इसके हर पद का व्याकरणिक और आध्यात्मिक अर्थ समझें:

w
पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
तानि (Tani) उन (सम्पूर्ण) को समस्त बाह्य विषयों और विकारों की ओर दौड़ने वाली इन्द्रियों को संकेतित करता है।
सर्वाणि (Sarvani) सब प्रकार से / संपूर्ण कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों—दोनों प्रकार की कुल दसों इन्द्रियों और ग्यारहवें मन को।
संयम्य (Samyamya) वश में करके / भली-भांति संयमित कर दमन (suppression) नहीं, अपितु उचित विवेक द्वारा उन्हें उनके गलत मार्गों से मोड़ना।
युक्तः (Yuktaḥ) साधना में युक्त / समाहित मन वालावह योगी जो योग साधना में निरंतर संलग्न है और जिसकी चेतना परमात्मा से जुड़ी है।
आसीत (Asita) स्थित हो जाए / बैठे स्थिरता को प्राप्त हो, अर्थात विचलित न हो, अडिग भाव से अपनी स्थिति में रहे।
मत्परः (Matparaḥ) मेरे परायण / मुझमें ही मन वाला भगवान श्रीकृष्ण स्वयं को परम आश्रय बताते हुए कहते हैं कि साधक का लक्ष्य केवल भगवान हों।
वशे (Vashe) वश में (नियंत्रण में) पूरी तरह आज्ञाकारी, जो साधक के निर्देशानुसार चलें, न कि अपनी वासनाओं के अनुसार।
हि (Hi) निश्चित रूप से / क्योंकि यह एक अटल और अकाट्य नियम है, इसमें कोई अपवाद नहीं है।
यस्येन्द्रियाणि (Yasyendriyani) जिसकी इन्द्रियाँ (यस्य + इन्द्रियाणि) वह मनुष्य, पुरुष या स्त्री, जिसने अपने संवेदी अंगों पर पूर्ण विजय प्राप्त कर ली है।
तस्य (Tasya) उस (पुरुष) की उस विशिष्ट और उन्नत आत्मा की, जो इस साधना को अपने जीवन में उतार चुका है।
प्रज्ञा प्रतिष्ठिता (Prajna Pratishthita) बुद्धि स्थिर / प्रज्ञा प्रतिष्ठित है वह दिव्य बुद्धि जो सुख-दुःख, मान-अपमान में कभी विचलित नहीं होती, वही स्थिर प्रज्ञा है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस द्वितीय अध्याय की पृष्ठभूमि महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के ठीक पहले की है। जब पांडव पुत्र अर्जुन अपने ही सगे-सम्बन्धियों, गुरुओं और प्रियजनों को सामने युद्ध के लिए खड़ा देखते हैं, तो उनका मोहग्रस्त मन कांप उठता है। वे अपने धनुष-बाण रख देते हैं और भगवान श्रीकृष्ण को अपना सारथी बनाते हुए अपने गुरु और मार्गदर्शक के रूप में स्वीकार करते हैं। अर्जुन पूछते हैं कि हे कृष्ण! स्थिर बुद्धि वाला मनुष्य कौन है? वह कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?

इस प्रश्न के उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण सांख्य योग का विस्तार करते हुए विभिन्न श्लोकों के माध्यम से समझाते हैं कि कैसे मनुष्य विषयों का चिंतन करते-करते उनमें आसक्त हो जाता है, आसक्ति से काम (इच्छा) उत्पन्न होती है, काम से क्रोध और क्रोध से मोह उत्पन्न होता है। इस संपूर्ण पतन चक्र का मूल कारण इन्द्रियों की असामंजस्यता और अनियंत्रण है।

पौराणिक कथाओं और वेदों में भी इन्द्रिय संयम के अनेकों आख्यान मिलते हैं। उदाहरणार्थ, कठोपनिषद में शरीर को एक रथ, आत्मा को रथ का स्वामी (रथी), बुद्धि को सारथी, मन को लगाम और इन्द्रियों को घोड़े बताया गया है। यदि सारथी (बुद्धि) कमजोर हो और लगाम (मन) ढीली हो, तो घोड़े रूपी इन्द्रियाँ अमार्ग पर ले जाकर जीवन रथ को नष्ट कर देती हैं। भगवान श्रीकृष्ण इसी वैदिक दृष्टांत को आधुनिक और व्यावहारिक रूप में इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन के सम्मुख रखते हैं। महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत के इस अंश में यह शهد की भांति मीठा और वज्र की भांति कठोर सत्य है, जो मनुष्य को उसकी आंतरिक दुर्बलताओं से लड़ने की असीम शक्ति प्रदान करता है।

इतिहास साक्षी है कि जितने भी ऋषि-मुनि, योगी और महापुरुष हुए हैं, उन्होंने इसी सिद्धांत के बल पर अपनी चेतना को ऊंचे आयामों तक पहुँचाया है। महर्षि पतंजलि ने भी अपने योगसूत्र में 'प्रत्याहार' (इन्द्रियों को बाह्य विषयों से समेट कर अंतर्मुखी करना) को अष्टांग योग का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंग माना है, जो प्रत्यक्षतः इसी श्लोक के दर्शन से मेल खाता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस श्लोक का नियमित चिंतन, मनन और इसके मर्म को जीवन में उतारने से साधक को निम्नलिखित अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति और स्थिरता

चंचल मन और विचारों के भंवर से मुक्ति मिलती है। व्यक्ति हर परिस्थिति में शांत और संयमित रहना सीख जाता है।

2. सकारात्मक और ऊर्जावान आभा (Aura)

इन्द्रियों के संयम से शारीरिक और मानसिक ऊर्जा का क्षय रुकता है, जिससे साधक के चेहरे पर तेज और ओज की वृद्धि होती है।

3. कर्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

जब इन्द्रियाँ वश में होती हैं, तो पाप और अनैतिक कर्मों से स्वतः रक्षा हो जाती है, जिससे संचित कर्मों का भार हल्का होता है।

4. भगवत्कृपा की प्राप्ति (Divine Grace)

'मत्परः' होने के कारण साधक को प्रत्यक्ष रूप से भगवान की अतुकांत कृपा और प्रेम का अनुभव होने लगता है।

5. निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता

स्थिर प्रज्ञा के कारण जीवन के बड़े से बड़े संकटकाल में भी व्यक्ति भ्रमित नहीं होता और सटीक निर्णय लेता है।

6. व्यसनों और कुप्रवृत्तियों से मुक्ति

काम, क्रोध, लोभ, मोह जैसे आंतरिक शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने की आंतरिक आत्मबल शक्ति जागृत होती है।

7. उच्च कोटि की एकाग्रता

विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और आध्यात्मिक साधकों के लिए यह श्लोक स्मरण शक्ति और एकाग्रता को चरम पर ले जाता है।

8. जीवन के अंतिम लक्ष्य (मोक्ष) की प्राप्ति

जन्म-मरण के चक्र से छूटकर परम शांति और सच्चिदानंद स्वरूप परमात्मा में तल्लीन होने का मार्ग प्रशस्त होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री (Editorial Note)

Bhaktilok.in पर प्रकाशित यह लेख हमारे मुख्य देवर्षि विद्वानों, संस्कृत भाषाविदों और Google Helpful Content दिशानिर्देशों के विशेषज्ञों की देखरेख में तैयार किया गया है। श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक (अध्याय 2, श्लोक 61) की व्याख्या करते समय आदिशंकराचार्य, स्वामी रामानुजचार्य और स्वामी गीतानंद जैसे महान आचार्यों के भाष्यों का सूक्ष्म अध्ययन किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को बिना किसी भ्रम या अतिशयोक्ति के, शुद्ध, सनातन और वेदों-पुराणों पर आधारित अकाट्य आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करना है।

प्रामाणिक संदर्भ ग्रंथ: श्रीमद्भगवद्गीता (गीता प्रेस गोरखपुर संस्करण), कठोपनिषद, महर्षि पतंजलि योगसूत्र तथा महाभारत का उद्योग एवं भीष्म पर्व। सभी व्याख्याएँ पारंपरिक गुरुकुल परंपरा और आधुनिक भाषाई विश्लेषण पर आधारित हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय (सांख्य योग) से लिया गया है। इस प्रसंग में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को स्थिर प्रज्ञा (स्थिर बुद्धि वाले मनुष्य) के लक्षण और उसे प्राप्त करने के उपायों का विस्तार से उपदेश दे रहे हैं।

'मत्परः' शब्द का अर्थ है—"मुझ (भगवान) पर ही पूर्णतः आश्रित या परायण होना"। इसका तात्पर्य यह है कि साधक को केवल अपनी इन्द्रियों के बल पर नहीं, अपितु भगवान को अपना सर्वस्व मानकर उनकी शरण में जाकर ही इन्द्रिय संयम साधना चाहिए। ईश्वर की कृपा के बिना पूर्ण संयम कठिन है।

शास्त्रों में इन्द्रियों के 'दमन' (जबरन उन्हें दबाने) की सलाह नहीं दी जाती, बल्कि 'संयम' (विवेकपूर्ण नियंत्रण) का मार्ग बताया गया है। जब मनुष्य अपनी इन्द्रियों को उनके उचित और शुभ कार्यों में लगाता है तथा अनावश्यक विषयों से हटाकर भगवद्भक्ति में जोड़ता है, तो वही सच्चा संयम कहलाता है।

जिस व्यक्ति की प्रज्ञा (बुद्धि) प्रतिष्ठित हो चुकी है, वह सुख-दुःख की प्राप्ति में हर्ष या शोक से विचलित नहीं होता। उसके मन में राग, द्वेष और भय सर्वथा समाप्त हो जाते हैं और वह हर परिस्थिति में आंतरिक आनंद व समता का अनुभव करता है।

गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी व्यक्ति अपनी दिनचर्या में थोड़ा अनुशासन लाकर इस श्लोक को अपना सकता है। प्रतिदिन कुछ समय भगवन्नाम स्मरण, स्वाध्याय, और अपने खान-पान व देखने-सुनने (इन्द्रिय आहार) पर नियंत्रण रखकर कोई भी गृहस्थ अपनी बुद्धि को स्थिर और जीवन को सार्थक बना सकता है।

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ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ॥

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

उन सब इन्द्रियों को वश में करके योगी मुझ परमात्मा में परायण होकर स्थित हो। क्योंकि जिसकी इन्द्रियाँ वश में हैं, उसकी प्रज्ञा स्थिर है। Having controlled all the senses, one should remain steadfast in yoga, devoted to Me. For one whose senses are under control, his wisdom is steady.

साधना / Practice

इन्द्रिय-निग्रह और ईश्वर-निष्ठा ही स्थितप्रज्ञता का मार्ग है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 61 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 61/72 85% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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