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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 61

अध्याय 2 · श्लोक 61

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः | वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||६१||

tāni sarvāṇi saṃyamya yukta āsīta mat-paraḥ | vaśe hi yasyendriyāṇi tasya prajñā pratiṣṭhitā ||61||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

तानि: उन (इन्द्रियों) को; सर्वाणि: सब; संयम्य: वश में करके; युक्तः: योगी; आसीत: स्थित हो; मत्परः: मुझ परमात्मा में परायण; वशे: वश में; हि: निश्चय ही; यस्य: जिसके; इन्द्रियाणि: इन्द्रियाँ; तस्य: उसकी; प्रज्ञा: प्रज्ञा; प्रतिष्ठिता: स्थिर है।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

उन सब इन्द्रियों को वश में करके योगी मुझ परमात्मा में परायण होकर बैठे (स्थित हो)। क्योंकि जिसकी इन्द्रियाँ वश में हैं, उसकी प्रज्ञा स्थिर है।

English Translation

Having controlled all the senses, one should remain steadfast in yoga, devoted to Me. For one whose senses are under control, his wisdom is steady.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

इन्द्रिय-निग्रह के बाद योगी को भगवत्परायण होना चाहिए। ऐसे व्यक्ति की बुद्धि स्थिर होती है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।