क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – श्लोक 16

श्लोक १६ में बताया गया है कि परमात्मा सबके भीतर-बाहर है, सूक्ष्म है, फिर भी दूर-निकट है।

संस्कृत श्लोक

बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च | सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् || १६ ||

bahirantaśca bhūtānāmacaraṃ carameva ca | sūkṣmatvāttadavijñeyaṃ dūrasthaṃ cāntike ca tat || 16 ||

पदच्छेद / शब्दार्थ

बहि: बाहर; अन्त: भीतर; च: और; भूतानाम्: भूतों (प्राणियों) के; अचरम्: स्थिर; चरम्: चर; एव: ही; च: और; सूक्ष्मत्वात्: सूक्ष्म होने के कारण; तत्: वह; अविज्ञेयम्: न जाना जा सकता; दूरस्थम्: दूर स्थित; च: और; अन्तिके: समीप; च: भी; तत्: वह

हिंदी अनुवाद

वह सम्पूर्ण प्राणियों के बाहर-भीतर है, स्थिर भी है और चर भी है; सूक्ष्म होने के कारण वह अज्ञेय (इन्द्रियों से अगोचर) है, वह दूर भी है और पास भी है।

English Translation

Without and within all beings, the unmoving and also the moving; because of His subtlety, He is incomprehensible; He is far away, yet He is near.

टीका / Commentary

परमात्मा की सर्वव्यापकता और सूक्ष्मता का वर्णन। वह सबमें व्याप्त है, फिर भी दुर्जेय है। Description of the omnipresence and subtlety of the Supreme. He pervades all yet is incomprehensible.