श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 13 (क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga))

अध्याय 13 · श्लोक 16

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 35 13 मिनट का पठन 129 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च | सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् || १६ ||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

16 पद
बहि
बाहर
अन्त
भीतर
च
और
भूतानाम्
भूतों (प्राणियों) के
अचरम्
स्थिर
चरम्
चर
एव
ही
च
और
सूक्ष्मत्वात्
सूक्ष्म होने के कारण
तत्
वह
अविज्ञेयम्
न जाना जा सकता
दूरस्थम्
दूर स्थित
च
और
अन्तिके
समीप
च
भी
तत्
वह

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

वह सम्पूर्ण प्राणियों के बाहर-भीतर है, स्थिर भी है और चर भी है; सूक्ष्म होने के कारण वह अज्ञेय (इन्द्रियों से अगोचर) है, वह दूर भी है और पास भी है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

व्यापकता और सूक्ष्मता का महात्म्य: एक विस्तृत आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक परिचय

भारतीय सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में श्रीमद्भागवतगीता का स्थान चोटी के सूर्य के समान प्रकाशमान है। गीता का तेरहवां अध्याय, जिसे 'क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग' के नाम से जाना जाता है, ब्रह्मांड के सबसे गूढ़ रहस्यों को उद्घाटित करता है। इस अध्याय का सोलहवां श्लोक—“बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च | सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ||”—वेदांत के सार को अत्यंत संक्षिप्त और वैज्ञानिक रूप में प्रस्तुत करता है। यह श्लोक उस परमब्रह्म, परमात्मा या ईश्वर की सर्वव्यापकता, सर्वज्ञता और अकल्पनीय सूक्ष्मता का सजीव वर्णन करता है जो चराचर जगत के कण-कण में विद्यमान होने के बावजूद सामान्य मानवीय इंद्रियों की पहुँच से परे है।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से, यह श्लोक मनुष्य को उसके अहंकार से मुक्त करने और ब्रह्मांडीय चेतना के साथ एकरूप होने की प्रेरणा देता है। जब एक साधक इस तथ्य को आत्मसात कर लेता है कि परमात्मा उसके भीतर (अंतर) भी है और बाहर (बहिः) भी, तो उसके मन से भय, ईर्ष्या, और द्वेष स्वतः समाप्त हो जाने लगते हैं। वह संपूर्ण सृष्टि को वासुदेवमय देखने लगता है (वासुदेवः सर्वमिति)। आधुनिक युग में जहाँ भौतिकवाद और मानसिक तनाव अपने चरम पर हैं, यह श्लोक मानव मन को आंतरिक शांति, स्थिरता और दिव्यता का अनुभव कराने वाला एक अचूक आध्यात्मिक नुस्खा सिद्ध होता है। इस श्लोक की महत्ता केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उच्चकोटि का दर्शन है जो क्वांटम भौतिकी के आधुनिक सिद्धांतों—जैसे कि 'नॉन-ड्युएलिटी' और 'एंटैंगलमेंट'—के साथ भी अद्भुत सामंजस्य बिठाता है।

भक्तिलोक (Bhaktilok.in) के इस विशेष आलेख में हम इसी विलक्षण श्लोक के प्रामाणिक अर्थ, व्याकरणिक संरचना, पौराणिक पृष्ठभूमि, नियमित जप के लाभ और जीवनोपयोगी दार्शनिक पहलुओं का विस्तार से अन्वेषण करेंगे, ताकि प्रत्येक पाठक भगवान की इस अद्भुत विभूति को अपने जीवन में उतारकर कृतार्थ हो सके।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक एवं सस्वर पाठ विधि

गीता के तेरहवें अध्याय के इस महत्त्वपूर्ण श्लोक को सस्वर पढ़ने और स्मरण करने से चित्त एकाग्र होता है। यहाँ इसका देवनागरी लिपि में पूर्ण मूल पाठ प्रस्तुत है:

|| श्रीमद्भागवतगीता अध्याय १३, श्लोक १६ ||

बहिः-अन्तश्च भूतानाम्-अचरं चरम् एव च।
सूक्ष्मत्वात्-तत्-अविज्ञेयं दूरस्थं च अन्तिके च तत्॥ १६ ॥


बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्॥ १६ ॥

श्लोक पाठ की विधि और नियम:

  • शुचिता: प्रात:काल स्नान करके पवित्र वस्त्र धारण करें और शांत स्थान पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें।
  • मानसिक एकाग्रता: पाठ से पूर्व तीन बार दीर्घ श्वास लें और भगवान श्रीकृष्ण के चतुर्भुज स्वरूप का ध्यान करें।
  • उच्चारण शुद्धता: श्लोक के प्रत्येक पद ('बहिः', 'अन्तः', 'अचरम्', 'सूक्ष्मत्वात्') का स्पष्ट उच्चारण करें ताकि नादब्रह्म की ऊर्जा जाग्रत हो सके।
  • नियमितता: कम से कम 11 या 21 बार इस श्लोक का दैनिक मानसिक जप आध्यात्मिक ऊर्जा में वृद्धि करता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

संस्कृत भाषा की विशेषता है कि एक ही शब्द में अनंत भाव छिपे होते हैं। इस श्लोक के प्रत्येक पद का व्याकरणिक और दार्शनिक विश्लेषण नीचे दी गई सारणी के माध्यम से समझें:

पद / शब्द (Sanskrit Term) सरल हिंदी अर्थ (Literal Meaning) आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ (Spiritual Meaning)
बहिः (Bahiḥ) बाहर परमात्मा केवल आकाश या पाताल में नहीं, बल्कि ब्रह्मांड के हर बाहरी आवरण और खाली स्थान में व्याप्त है।
अन्तः च (Antaśca) और भीतर वह शरीर के भीतर, मन के भीतर और हर जीव की आत्मा के अंदर अंतर्यामी रूप में विराजमान है।
अचरम् (Acharam) अचर (जो चलता नहीं) पर्वत, चट्टान, पृथ्वी और जड़ पदार्थों के रूप में भी वही अचल ब्रह्म ही प्रकट होता है।
चरम् एव च (Charam eva cha) और चर (चलने वाले) भी चलने-फिरने वाले जीव-जंतु और मनुष्य भी उसी की ऊर्जा से गतिमान हैं।
सूक्ष्मत्वात् (Sūkshmatvāt) अत्यंत सूक्ष्म होने के कारण वह आकाश या परमाणु से भी अधिक सूक्ष्म है, इसलिए स्थूल नेत्रों से सीधे दिखाई नहीं देता।
तत् अविज्ञेयं (Tat avijñeyam) वह दुर्जेय / कठिनता से जानने योग्य है अज्ञानी मनुष्यों के लिए उसे जानना अत्यंत कठिन है, केवल तीव्र भक्ति और ज्ञान से ही वह अनुभवगम्य है।
दूरस्थम् (Dūrastham) दूर स्थित है अज्ञानियों और अहंकारियों के लिए वह करोड़ों योजन दूर, अप्राप्य प्रतीत होता है।
च अन्तिके च (Cha antike cha) और अत्यंत पास में भी भक्तों और प्रेमियों के लिए वह उनके हृदय की धड़कन से भी अधिक पास और निकट है।
तत् (Tat) वह (परमात्मा) वही एकमात्र परम सत्य, सच्चिदानंद घन ब्रह्म है जो संपूर्ण अस्तित्व का आधार है।
दार्शनिक व्याख्या:

इस श्लोक का मूल संदेश यह है कि भगवान का अस्तित्व द्वैत से परे है। वह दूर भी है और पास भी—यह विरोधाभास (Paradox) केवल मानव बुद्धि की सीमा को दर्शाता है। वास्तव में, जो व्यक्ति आत्मज्ञानी हो जाता है, उसके लिए कोई भी वस्तु पराई या दूर नहीं रहती। वह कण-कण में परमात्मा के दर्शन करता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Context & Background)

श्रीमद्भागवतगीता के तेरहवें अध्याय का आरंभ अर्जुन के एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न से होता है—"प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च..."। अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि हे केशव! प्रकृति क्या है, पुरुष क्या है, क्षेत्र (शरीर) क्या है और क्षेत्रज्ञ (आत्मा/परमात्मा) क्या है?

इस प्रश्न के उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण ने क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का अत्यंत वैज्ञानिक और दार्शनिक विवेचन किया है। श्लोक 16 उसी शृंखला की अगली कड़ी है जहाँ परमात्मा के 'क्षेत्रज्ञ' या 'परमात्मा' स्वरूप का पर्दाफाश किया जा रहा है। वैदिक इतिहास में इस विषय को समझाने के लिए उपनिषदों के महान आख्यानों का भी सहारा लिया जाता है। उदाहरण के लिए, मुंडकोपनिषद और कठोपनिषद में भी यही बात कही गई है—"ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम्" (यह संपूर्ण ब्रह्मांड ब्रह्म ही है)।

महर्षि वेद व्यास का दृष्टिकोण

महाभारत के युद्ध के सन्निकट कुरुक्षेत्र की उस पवित्र भूमि पर रचित गीता के ये श्लोक महर्षि वेदव्यास की दिव्य दृष्टि का परिणाम हैं। व्यास जी ने स्पष्ट किया है कि परमात्मा किसी विशेष स्थान पर सिंहासन पर बैठा कोई राजा नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड का अंतर्यामी संचालक है जो अणु से लेकर महानारयण तक सब में समाहित है।

प्रह्लाद और हिरण्यकशिपु का प्रसंग

इस श्लोक के जीवंत उदाहरण श्रीमद्भागवत महापुराण के भक्त प्रह्लाद और उनके पिता हिरण्यकशिपु के संवाद में मिलते हैं। जब अहंकारी हिरण्यकशिपु ने खंभे की ओर संकेत कर पूछा—"क्या तेरा भगवान इस खंभे में भी है?" तो प्रह्लाद जी ने निर्भीक होकर उत्तर दिया—"वह बाहर भी है, भीतर भी है, वह चर और अचर सब में है।" और तभी भगवान नरसिंह रूप में उस खंभे को चीरकर प्रकट हुए, जो इस श्लोक की सत्यता का सबसे बड़ा पौराणिक प्रमाण है।

इस प्रकार, यह शास्त्रीय पृष्ठभूमि हमें सिखाती है कि परमात्मा की सर्वव्यापकता केवल किंवदंती नहीं, बल्कि सनातन सत्य है जिसे अनुभव करने के लिए निर्मल हृदय और अनन्य भक्ति की आवश्यकता होती है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस दिव्य श्लोक का निरंतर पठन-पाठन, स्मरण और इसके अर्थ पर मनन करने से साधक के जीवन में अभूतपूर्व सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। यहाँ इसके 8 प्रमुख आध्यात्मिक और मानसिक लाभों का वर्णन किया गया है:

1
मानसिक शांति और स्थिरता (Mental Peace)

परमात्मा के हर जगह होने का भाव मन की उथल-पुथल को शांत करता है। व्यक्ति यह समझकर तनावमुक्त हो जाता है कि वह कभी अकेला नहीं है, ईश्वर की दृष्टि हमेशा उस पर है।

2
सकारात्मक ऊर्जा का संचार (Positive Aura)

वैदिक मंत्रों और गीता के श्लोकों के नियमित उच्चारण से शरीर के चारों ओर एक उच्च कंपन वाली सकारात्मक ऊर्जा (Aura) का निर्माण होता है, जो नकारात्मक शक्तियों को दूर रखती है।

3
कर्म शुद्धि और नैतिकता (Karmic Purification)

जब मनुष्य के मन में यह विश्वास बैठ जाता है कि ईश्वर उसके भीतर और बाहर सब कुछ देख रहा है, तो वह अनैतिक कार्यों या पापों से स्वाभाविक रूप से बचने लगता है।

4
एकाग्रता और स्मरण शक्ति में वृद्धि

संस्कृत श्लोकों के सस्वर पाठ से मस्तिष्क की नसें उत्तेजित होती हैं, जिससे विद्यार्थियों और विचारकों की स्मरण शक्ति, बौद्धिक क्षमता और फोकस में उल्लेखनीय सुधार होता है।

5
अहंकार का शमन और नम्रता (Ego Dissolution)

यह श्लोक सिखाता है कि हम इस अनंत ब्रह्मांड का एक अत्यंत सूक्ष्म हिस्सा हैं। इससे व्यक्ति के भीतर अहंकार समाप्त होता है और उसके स्वभाव में करुणा एवं नम्रता आती है।

6
भय और असुरक्षा की भावना का नाश

भविष्य की अनिश्चितताओं या अज्ञात भय से ग्रसित व्यक्तियों के लिए यह श्लोक ढाल का काम करता है। अंतर्यामी परमात्मा पर भरोसा रखने से निर्भयता की प्राप्ति होती है।

7
समदर्शी भाव की प्राप्ति (Equanimity)

जब साधक सभी प्राणियों में उसी एक परमात्मा को देखता है, तो वह मित्र और शत्रु, सुख और दुःख में समान भाव (समत्व) रखना सीख जाता है, जो गीता का मुख्य संदेश है।

8
दिव्य कृपा और मोक्ष का मार्ग

भगवान श्रीकृष्ण के इस प्रिय श्लोक का निरंतर चिंतन साधक को भवसागर से पार लगाने में सहायक बनता है और अंततः मोक्ष या भगवद्प्राप्ति के मार्ग को प्रशस्त करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: भक्तिलोक (Bhaktilok.in) पर प्रकाशित यह आलेख सनातन संस्कृति, संस्कृत व्याकरण और श्रीमद्भागवतगीता के विभिन्न प्रामाणिक भाष्यों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और स्वामी ज्ञानानंद महाराज के दृष्टिकोण) के गहन अध्ययन के पश्चात तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को आधुनिक भ्रामक जानकारियों से दूर रखकर सीधे वेद-पुराणों और उपनिषदों की मूल भावना से जोड़ना है।

इस आलेख को तैयार करते समय संदर्भ के रूप में 'श्रीमद्भागवतगीता (गीता प्रेस गोरखपुर संस्करण)', 'मुंडकोपनिषद' तथा 'श्रीमद्भागवत महापुराण' के मूल श्लोकों और टीकाओं का आधार लिया गया है। यदि आपके पास इस विषय से संबंधित कोई सुझाव या प्रश्न है, तो आप हमारी संपादकीय टीम से संपर्क कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

उत्तर: यह श्लोक श्रीमद्भागवतगीता के तेरहवें अध्याय (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग) के सोलहवें श्लोक के रूप में आया है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को क्षेत्र (नश्वर शरीर) और क्षेत्रज्ञ (अविनाशी आत्मा/परमात्मा) के बीच के अंतर को समझा रहे हैं, और इसी क्रम में परमात्मा की सर्वव्यापकता का यह अद्भुत वर्णन किया गया है।

उत्तर: यहाँ 'अविज्ञेयं' का अर्थ है कि साधारण भौतिक इंद्रियों (आँख, कान, बुद्धि) से परमात्मा को सीधे नहीं पकड़ा जा सकता, क्योंकि वह आकाश या परमाणु से भी अधिक सूक्ष्म (Subtle) है। परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि वह अज्ञेय है; उसे शुद्ध अंतःकरण, ध्यान, योग और अनन्य भक्ति के माध्यम से पूर्णतः अनुभव किया जा सकता है।

उत्तर: यह दृष्टिकोण साधक की मानसिकता पर निर्भर करता है। जो लोग मोह-माया और अहंकार में डूबे रहते हैं, उनके लिए परमात्मा सात आसमान दूर या असंभव प्रतीत होता है (दूरस्थ)। इसके विपरीत, जो भक्त प्रेम और समर्पण से भरे हैं, उनके लिए भगवान उनके हृदय में ही विराजमान हैं, यानी सांस से भी अधिक पास (अंतिके)।

उत्तर: आप प्रातःकाल पूजा के समय या रात को सोने से पहले इस श्लोक का 11 बार सस्वर पाठ कर सकते हैं। इसके अलावा, जब भी आपको अकेलापन या तनाव महसूस हो, इस भाव का स्मरण करें कि "वह परमात्मा मेरे बाहर और भीतर दोनों जगह मौजूद है," जिससे आपको तुरंत मानसिक संबल मिलेगा।

उत्तर: हाँ, कई आधुनिक भौतिकবিদ (Physicists) इस बात को स्वीकार करते हैं कि प्राचीन वेदों और गीता में वर्णित सर्वव्यापक ऊर्जा (Omnipresent Energy) का सिद्धांत क्वांटम फील्ड थ्योरी (Quantum Field Theory) के बहुत निकट है। जिस प्रकार हर जगह एक अदृश्य क्वांटम फील्ड मौजूद है, उसी प्रकार सनातन दर्शन हर कण में ब्रह्म की उपस्थिति स्वीकार करता है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

वह सब प्राणियों के बाहर और भीतर है, स्थिर और चर दोनों रूपों में है; सूक्ष्म होने के कारण अगोचर है; वह दूर भी है और पास भी।

He is outside and inside all beings, both moving and unmoving; due to subtlety, He is incomprehensible; He is far away, yet He is near.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ईश्वर सर्वत्र है, इसलिए वह सदा हमारे समीप है, बस उसे पहचानने की आवश्यकता है।

God is everywhere, so He is always near; we only need to recognize Him.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 16 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 16/35 46% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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