क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – श्लोक 15
श्लोक १५ में परमात्मा के अद्भुत स्वरूप का वर्णन – इन्द्रियों से परे फिर भी उनके द्वारा प्रकाशित।
संस्कृत श्लोक
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् | असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च || १५ ||
sarvendriyaguṇābhāsaṃ sarvendriyavivarjitam | asaktaṃ sarvabhṛccaiva nirguṇaṃ guṇabhoktṛ ca || 15 ||
पदच्छेद / शब्दार्थ
सर्वेन्द्रियगुणाभासम्: सभी इन्द्रियों के गुणों को प्रकाशित करने वाला; सर्वेन्द्रियविवर्जितम्: सभी इन्द्रियों से रहित; असक्तम्: आसक्ति रहित; सर्वभृत्: सबका धारण-पोषण करने वाला; च: और; एव: ही; निर्गुणम्: गुणों से रहित; गुणभोक्तृ: गुणों का भोक्ता; च: और
हिंदी अनुवाद
वह सब इन्द्रियों के गुणों को प्रकाशित करने वाला है, परन्तु इन्द्रियों से रहित है, आसक्ति रहित है, फिर भी सबका धारण-पोषण करने वाला है, निर्गुण है, फिर भी गुणों का भोक्ता है।
English Translation
Shining by the functions of all the senses, yet without the senses; unattached, yet supporting all; devoid of qualities, yet their experiencer.
टीका / Commentary
यहाँ परमात्मा के विरोधाभासी स्वरूप का वर्णन है – वह इन्द्रियों से रहित होकर भी उनके द्वारा अनुभव किया जाता है। This describes the paradoxical nature of the Supreme – without senses yet perceived through them, unattached yet supporting all.