श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 13 (क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga))

अध्याय 13 · श्लोक 15

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 35 40 मिनट का पठन 132 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् | असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च || १५ ||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

9 पद
सर्वेन्द्रियगुणाभासम्
सभी इन्द्रियों के गुणों को प्रकाशित करने वाला
सर्वेन्द्रियविवर्जितम्
सभी इन्द्रियों से रहित
असक्तम्
आसक्ति रहित
सर्वभृत्
सबका धारण-पोषण करने वाला
च
और
एव
ही
निर्गुणम्
गुणों से रहित
गुणभोक्तृ
गुणों का भोक्ता
च
और

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

वह सब इन्द्रियों के गुणों को प्रकाशित करने वाला है, परन्तु इन्द्रियों से रहित है, आसक्ति रहित है, फिर भी सबका धारण-पोषण करने वाला है, निर्गुण है, फिर भी गुणों का भोक्ता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता के पन्द्रहवें अध्याय (पुरुषोत्तम योग) के इस परम रहस्यमयी श्लोक की अगाध, पावन और विस्तृत व्याख्या

1. आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्माण्डकीय स्वरूप

सनातन धर्म के महान ग्रन्थ श्रीमद्भगवद्गीता को केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, अपितु अखिल ब्रह्माण्ड के गूढ़ रहस्यों को उद्घाटित करने वाला परम विज्ञान माना गया है। भगवान श्रीकृष्णा द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेशों में पन्द्रहवां अध्याय 'पुरुषोत्तम योग' के नाम से विख्यात है। इस अध्याय में भगवान ने संसार रूपी वृक्ष का वर्णन करते हुए उस परम तत्त्व को पाने के मार्ग को स्पष्ट किया है, जो इस नश्वर संसार से परे और शाश्वत है। प्रस्तुत श्लोक—"सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्..."—परमात्मा के उस अचिंत्य, अकलनीय और विरोधाभासी प्रतीत होने वाले स्वरूप का सजीव और अत्यंत सूक्ष्म चित्रण करता है, जिसे साधारण मानव बुद्धि से समझ पाना अत्यंत कठिन है।

भारतीय संस्कृति और वेदान्त दर्शन में ब्रह्म का स्वरूप निर्गुण और सगुण दोनों ही रूपों में स्वीकार किया गया है। जब हम सांसारिक चराचर जगत को देखते हैं, तो हमारी इंद्रियां रूप, रस, गंध, शब्द और स्पर्श का अनुभव करती हैं। परंतु इन सभी इंद्रियों को शक्ति प्रदान करने वाला, इनके माध्यम से संपूर्ण संसार का अनुभव करने वाला किंतु स्वयं समस्त इंद्रियों से रहित—ऐसा परमेश्वर का अद्भुत स्वरूप केवल योगियों और ऋषियों की पराविद्या का विषय है। इस श्लोक का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व इस बात में निहित है कि यह साधक को भौतिकता की संकीर्ण सीमाओं से ऊपर उठाकर उस असीम आकाश जैसे चेतना के सागर में डुबकी लगाने की प्रेरणा देता है, जहां न कोई भेद है, न कोई अभाव है, और न ही कोई कर्तापन का बंधन है।

ब्रह्माण्डकीय दृष्टिकोण से, यह श्लोक हमें सिखाता है कि जो शक्ति पूरे ब्रह्मांड को थामे हुए है, जो सूरज को तपा रही है, हवा को चला रही है और हमारे भीतर हृदय को स्पंदित कर रही है, वह स्वयं किसी भी भौतिक उपकरण या अंग की मोहताज नहीं है। वह 'असक्त' (अनासक्त) रहते हुए भी 'सर्वभृत्' (सबका भरण-पोषण करने वाला) है। यह विरोधाभास ही अद्वैत वेदांत का वह शिखर है जहाँ पहुँचकर द्वैत समाप्त हो जाता है और केवल शुद्ध सच्चिदानंद शेष रह जाता है। Bhaktilok.in के इस विशेष अंक में हम इसी परम पावन श्लोक के हर एक शब्द, उसके दार्शनिक निहितार्थ, पौराणिक पृष्ठभूमि और व्यावहारिक जीवन में उसके उपयोग पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

2. संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् |
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च || १५ ||

(śarvendriyaguṇābhāsaṁ sarvendriyavarjitam |
asaktaṁ sarvabhṛccaiva nirguṇaṁ guṇabhoktṛ ca || 15 ||)


सस्वर पाठ की विधि एवं ध्यान: प्रातकाल स्नानादि से निवृत्त होकर, पवित्र आसन पर बैठकर, भगवान श्री हरि विष्णु या श्रीकृष्ण के स्वरूप का मानसिक ध्यान करते हुए इस श्लोक का न्यूनतम 11 या 108 बार जप करना चाहिए। जप के समय मन को पूर्णतः शांत और अंतर्मुखी रखना परम आवश्यक है।

3. पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के शाब्दिक अर्थ को गहराई से समझने के लिए प्रत्येक पद का व्याकरणिक और दार्शनिक विश्लेषण नीचे दी गई सारणी में प्रस्तुत है। यह विश्लेषण साधकों को श्लोक के मर्म तक पहुँचने में सहायता करता है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
सर्व-इन्द्रिय-गुण-आभासं सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयों और गुणों को भासित करने वाला (प्रतीत कराने वाला) परमात्मा ही चक्षु, कर्ण आदि समस्त इंद्रियों और उनके विषयों (रूप, शब्द आदि) को अपनी चेतना से प्रकाशमान करते हैं। उनके बिना कोई भी इंद्रिय कार्य नहीं कर सकती।
सर्व-इन्द्रिय-विवर्जितम् समस्त इन्द्रियों से रहित (यानी भौतिक नेत्र, कर्ण आदि अंगों से शून्य) यद्यपि वह सब इंद्रियों के माध्यम से अनुभव होता है, तथापि उसका अपना कोई भौतिक शरीर या अंग नहीं है। वह अङ्गहीन, निराकार और अतीन्द्रिय चेतना है।
असक्तम् आसक्ति या मोह से सर्वथा रहित, अनासक्त वह संसार की किसी भी वस्तु, व्यक्ति या स्थिति से बंधा हुआ नहीं है। सब कुछ उसमें है, किंतु वह किसी में भी लिप्त नहीं होता, ठीक जैसे जल में कमल का पत्ता।
सर्व-भृत् सबका भरण-पोषण और धारण करने वाला अनासक्त होने के बावजूद, वह इस संपूर्ण ब्रह्मांड, समस्त लोकों, प्राणियों और उनकी गतिविधियों को अपनी ऊर्जा से थामे हुए है और सबका पालन करता है।
च एव और ही (निश्चय ही) यह अव्यय पद पूर्वोक्त और आगामी दोनों गुणों के बीच के अचूक संबंध और उसकी निश्चयात्मकता को रेखांकित करता है।
निर्गुणम् माया के तीन गुणों (सत्व, रज, तम) से परे प्रकृति के तीन गुण संसार को बांधते हैं, किंतु परमात्मा इन तीनों गुणों से अछूता, उनसे पूर्णतया अतीत और शुद्ध चैतन्य स्वरूप है।
गुण-भोक्तृ गुणों के कार्यों का अनुभव करने वाला या उनका स्वामी निर्गुण होने पर भी वह प्रकृति के गुणों के द्वारा रचे गए इस खेल का साक्षी और उसका आनंद लेने वाला (नियंता) है।
च और यह समुच्चय बोधक शब्द परमात्मा के इन सभी विरोधी प्रतीत होने वाले गुणों को एक अखंड इकाई में पिरोता है।

4. धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के पन्द्रहवें अध्याय की पृष्ठभूमि महाभारत के महायुद्ध के आरंभिक क्षणों से जुड़ी है, जब कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन भयंकर मानसिक द्वंद्व और विषाद से घिर गए थे। अर्जुन के इस मोह को दूर करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जीवन, मरण, आत्मा, परमात्मा और प्रकृति के गहन सत्यों से अवगत कराया। पन्द्रहवें अध्याय का नाम 'पुरुषोत्तम योग' रखा गया है, क्योंकि इसमें क्षर (नाशवान संसार) और अक्षर (कूटस्थ आत्मा) दोनों से परे उस सर्वोत्तम पुरुष यानी 'पुरुषोत्तम' (परमात्मा) की महिमा गाई गई है।

शास्त्रों और पुराणों (विशेषकर श्रीमद्भागवत महापुराण और उपनिषदों) में इस बात का बार-बार उल्लेख मिलता है कि मनुष्य जब तक भौतिक इंद्रियों के चंगुल में फंसा रहता है, तब तक वह सत्य को नहीं देख पाता। उपनिषदों में भी 'अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः' (वह बिना हाथ के पकड़ता है, बिना पैर के चलता है, बिना आँख के देखता है और बिना कान के सुनता है) कहकर इसी शाश्वत ब्रह्म का वर्णन किया गया है। गीता का यह श्लोक वस्तुतः वैदिक ऋचाओं और उपनिषदों के उसी अद्वैत ज्ञान का सबसे सरल और सारगर्भित गीतात्मक संस्करण है।

महर्षि वेद व्यास ने महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत इस गीता रूपी अमृत को संकलित किया है। इस श्लोक के माध्यम से वेदव्यास जी यह समझाना चाहते हैं कि परमेश्वर की महानता इस बात में है कि वह संसार के कण-कण में व्याप्त रहते हुए भी उससे परे (असंग) है। प्राचीन काल में बड़े-बड़े ऋषि-मुनि जंगलों और गुफाओं में इसी श्लोक का मनन कर समाधि की अवस्था को प्राप्त होते थे। वे यह समझ चुके थे कि जो व्यक्ति इस विरोधाभास को समझ लेता है—कि भगवान सब कुछ देखने वाले होने पर भी नेत्रहीन (भौतिक अर्थ में) हैं और सबका भरण-पोषण करने पर भी किसी से बंधे नहीं हैं—वह जीवन के सभी बंधनों से मुक्त हो जाता है।

5. नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस पावन श्लोक का नियमित पाठ, मनन और स्मरण करने से साधक के जीवन में अभूतपूर्व सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। इसके प्रमुख आध्यात्मिक एवं मानसिक लाभ निम्नलिखित हैं:

1. मानसिक शांति और स्थिरता

श्लक के स्मरण से मन की चंचलता शांत होती है। संसार की उथल-पुथल के बीच भी साधक भीतर से अडिग और शांत रहता है, क्योंकि उसे ज्ञात होता है कि सब कुछ एक सर्वोच्च नियंत्रण में है।

2. सकारात्मक ऊर्जा और औरा (Aura) का विकास

दिव्य शब्दों के उच्चारण से उत्पन्न होने वाले कंपन (Vibrations) शरीर के चारों ओर एक सुरक्षात्मक और उच्च आध्यात्मिक ऊर्जा का घेरा बनाते हैं, जिससे नकारात्मक शक्तियां दूर रहती हैं।

3. कर्म बंधनों से मुक्ति (अनासक्ति का भाव)

'असक्तं' शब्द के मर्म को आत्मसात करने से मनुष्य अपने दैनिक कर्मों में लिप्त हुए बिना, गीता के कर्मयोग के मार्ग पर चलते हुए अनासक्त रहना सीख जाता है।

4. आत्म-साक्षात्कार और अंतर्दृष्टि

यह श्लोक अंतर्दृष्टि (Intuition) को जागृत करता है। साधक को बाहरी दुनिया के परे उस आंतरिक चैतन्य का अनुभव होने लगता है जो सभी शरीरों में समान रूप से विद्यमान है।

5. भय, चिंता और अवसाद का नाश

जब यह विश्वास पुख्ता हो जाता है कि 'सर्वभृत्' (वही सबका पालनहार है) हमारी रक्षा कर रहा है, तो भविष्य की चिंता, मृत्यु का भय और अज्ञात आशंकाएं स्वतः समाप्त हो जाती हैं।

6. पापों और दुष्कर्मों के संस्कारों की शुद्धि

नियमित गीता अध्ययन और इस विशेष श्लोक का जप चित्त में जमे पुराने विकारों और नकारात्मक संस्कारों (कर्म फलों) को धोने में एक शक्तिशाली डिटर्जेंट की तरह कार्य करता है।

7. परमेश्वर की अहेतुकी कृपा की प्राप्ति

भगवान के निर्गुण और सगुण दोनों रूपों के इस सुंदर समन्वय का ध्यान करने से साधक पर भगवान श्रीकृष्ण की विशेष और अहेतुकी कृपा बरसती है।

8. मोक्ष और आत्यंतिक शांति का मार्ग प्रशस्त

जीवन के अंतिम समय में ऐसे उच्च आध्यात्मिक विचारों का स्मरण करने वाला जीव पुनरावृत्ति वाले इस संसार चक्र से छूटकर परम धाम को प्राप्त होता है।

6. संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह लेख सनातन धर्म के उच्चकोटि के ग्रंथों, आचार्यों के भाष्यों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप) के अध्ययन पर आधारित है। यह संपूर्ण पाठ संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जिसे आधुनिक पाठकों की सहज बोधगम्यता और पारंपरिक वेदान्त की शुद्धता दोनों को ध्यान में रखकर अत्यंत सावधानी से विकसित किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक भ्रामक दावों से दूर, तथ्यात्मक, शास्त्रीय और जीवनोपयोगी आध्यात्मिक ज्ञान पहुंचाना है ताकि वे अपनी आध्यात्मिक यात्रा में सुदृढ़ मार्गदर्शन प्राप्त कर सकें।

7. अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

उत्तर: इसका अर्थ यह है कि परमात्मा के पास हमारे जैसे भौतिक चक्षु, कर्ण या त्वचा नहीं है, परंतु वे ही समस्त इंद्रियों को उनकी शक्ति और कार्यक्षमता प्रदान करते हैं। जिस प्रकार बिजली के बिना पंखा या बल्ब कार्य नहीं कर सकता, उसी प्रकार परम चैतन्य (ब्रह्म) के बिना कोई भी इंद्रिय रूप, रस या गंध का अनुभव नहीं कर सकती। इसलिए वे इंद्रियों से रहित होते हुए भी उनके माध्यम से सब कुछ जानने वाले और अनुभव करने वाले प्रतीत होते हैं।

उत्तर: यही गीता का सबसे बड़ा दार्शनिक रहस्य है। संसार में जब कोई व्यक्ति किसी का पालन-पोषण करता है, तो वह मोह (आसक्ति) में बंध जाता है। किंतु परमात्मा सूर्य की तरह हैं, जो पूरी दुनिया को प्रकाश और जीवन देते हैं, पर किसी से बंधे नहीं होते। वे संसार को पालते-पोसते ('सर्वभृत्') जरूर हैं, किंतु उसमें लिप्त या आसक्त ('असक्त') नहीं होते। यह उनका अनूठा और स्वतंत्र स्वभाव है।

उत्तर: दैनिक जीवन में हम अक्सर पारिवारिक, व्यावसायिक और सामाजिक रिश्तों तथा जिम्मेदारियों में बहुत अधिक उलझ जाते हैं और तनावग्रस्त हो जाते हैं। यह श्लोक हमें सिखाता है कि हमें अपनी जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा से निभाना चाहिए (सर्वभृत् की तरह), परंतु मन में मोह या आसक्ति नहीं रखनी चाहिए (असक्त की तरह)। इस वैचारिक स्पष्टता से मानसिक तनाव स्वतः समाप्त हो जाता है।

उत्तर: यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के पन्द्रहवें अध्याय, जिसका नाम 'पुरुषोत्तम योग' है, उसका 15वां श्लोक है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने संसार रूपी उल्टे पीपल के वृक्ष का वर्णन करने के बाद उस परम पद को प्राप्त करने के उपायों का विस्तार से उपदेश दिया है।

उत्तर: सनातन वेदान्त के अनुसार भगवान एक ही समय में सगुण और निर्गुण दोनों हैं। स्वरूप से वे प्रकृति के तीन गुणों (सत्व, रज, तम) से अतीत ('निर्गुण') हैं, किंतु लीला के स्तर पर वे इन गुणों से रचे गए इस समस्त ब्रह्मांड के स्वामी और इसका आनंद लेने वाले ('गुणभोक्तृ') हैं। वे दोनों ही रूपों में पूर्ण हैं और उनके बीच कोई विरोध नहीं है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

वह सब इन्द्रियों के कार्यों को प्रकाशित करता है, किन्तु इन्द्रियों से रहित है; आसक्त न होकर सबका धारण-पोषण करता है; निर्गुण होकर भी गुणों का भोक्ता है।

He shines through the functions of all senses, yet is without senses; unattached, yet supports all; devoid of qualities, yet experiences them.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ईश्वर अद्वितीय है, वह एक ही साथ निर्गुण और सगुण है।

God is unique; He is simultaneously transcendent and immanent.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 15 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 15/35 43% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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