पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदश्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
उस (परमात्मा) के हाथ-पैर सब ओर हैं, आँखें, सिर और मुख सब ओर हैं, कान सब ओर हैं, क्योंकि वह संसार में सब कुछ व्याप्त करके स्थित है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
सनातन धर्म, उपनिषदों और श्रीमद्भागवतगीता के अगाध समुद्र में आध्यात्मिक ज्ञान के ऐसे अनेक अनमोल रत्न छिपे हैं जो मानव जीवन को भवसागर से पार लगाने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। Bhaktilok.in के इस पवित्र मंच पर हम श्रीमद्भागवतगीता के तेरहवें अध्याय (क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग) के इस परम पावन और ब्रह्मांडीय चेतना से ओत-प्रोत चौदहवें श्लोक का अत्यंत सूक्ष्म, शास्त्रीय और दार्शनिक विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं। यह श्लोक परमात्मा की असीम, अनंत और सर्वव्यापक सत्ता का एक ऐसा जीवंत शब्द-चित्र प्रस्तुत करता है जिसे सुनकर मनुष्य की संकीर्ण दृष्टियाँ और भौतिक सीमाएँ स्वतः समाप्त हो जाती हैं।
भारतीय दर्शन में 'ब्रह्म' या 'परमात्मा' की अवधारणा को समझने के लिए ऋषियों ने वेदों, उपनिषदों और स्मृतियों में विभिन्न आयामों का वर्णन किया है। सामान्य मनुष्य अपनी सीमित इंद्रियों (आँख, कान, हाथ, पैर आदि) के माध्यम से ही इस संसार को अनुभव कर पाता है। हमारी आँखें एक सीमित दूरी तक देख सकती हैं, हमारे कान एक निश्चित आवृत्ति (Frequency) की ध्वनि सुन सकते हैं और हमारे चरण एक निश्चित दायरे तक चल सकते हैं। परंतु, जिस परम शक्ति ने इस संपूर्ण ब्रह्मांड की रचना की है, जो इस चराचर जगत का संचालक है, उसकी सीमाएँ इन भौतिक इन्द्रियों से परे हैं।
इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझाते हैं कि वह परम ब्रह्म इस संसार के कण-कण में किस प्रकार व्याप्त है। इस ब्रह्मांड में जितने भी जीव हैं, उन सबकी आँखें उसी की आँखें हैं; जितने भी हाथ और पैर इस सृष्टि में कार्य कर रहे हैं, वे सब उसी परमेश्वर के हैं; और इस ब्रह्मांड में जितनी भी श्रवण इंद्रियां हैं, वे सब उसी एक अविनाशी परमात्मा की ही अभिव्यक्ति हैं। यह श्लोक मनुष्य को अहंकेंद्रित जीवन शैली से मुक्त कर 'वसुधैव कुटुंबकम्' और 'सर्व खल्विदं ब्रह्म' (यह सब कुछ ब्रह्म ही है) की उस परम अवस्था की ओर ले जाता है जहाँ साधक को हर प्राणी में केवल और केवल ईश्वर के दर्शन होने लगते हैं। आधुनिक युग की मानसिक अशांति, तनाव और एकाकीपन के दौर में यह श्लोक व्यक्ति को यह अहसास कराता है कि वह कभी भी अकेला नहीं है, बल्कि वह उस सर्वव्यापी परमात्मा की अनंत गोद में ही सुरक्षित है।
संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि
ॐ श्री तथायै नमः | श्रीमद्भागवतगीता - अध्याय १३, श्लोक १४
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् |
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति || १४ ||
श्लोक का संस्कृत पदच्छेद (Word Splitting):
सर्वतः पाणिपादम् तत् सर्वतः अक्षि-शिरो-मुखम् ।
सर्वतः श्रुतिम् लोके सर्वम् आवृत्य तिष्ठति ॥
पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)
इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में अगाध दार्शनिक गहराई छिपी है। आइए, इसका शब्दशः और भावार्थीय विश्लेषण निम्नलिखित तालिका के माध्यम से समझें:
धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)
श्रीमद्भागवतगीता का तेरहवां अध्याय 'क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग' के नाम से विख्यात है। कुरुक्षेत्र के मैदान में जब अर्जुन युद्ध के पूर्व विषाद में डूब गए थे और उन्होंने जीवन, मरण, आत्मा और परमात्मा के संबंध में अनगिनत प्रश्न किए थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें वेदों और उपनिषदों के सार को अत्यंत सरल और वैज्ञानिक भाषा में समझाया। इस अध्याय का आरंभ ही 'क्षेत्र' (शरीर) और 'क्षेत्रज्ञ' (आत्मा/परमात्मा) के बोध से होता है।
वैदिक साहित्य, विशेषकर श्वेताश्वतर उपनिषद और पुरुष सूक्त में भी इसी प्रकार के मंत्र मिलते हैं, जहाँ विराट पुरुष का वर्णन करते हुए कहा गया है—"सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्" (उस विराट पुरुष के हजारों सिर, हजारों आँखें और हजारों पैर हैं)। श्रीमद्भागवतगीता का यह 14वां श्लोक उसी वैदिक 'पुरुष सूक्त' की दार्शनिक पुनरावृत्ति और विस्तार है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझाना चाहते हैं कि मनुष्य जिसे अपना शरीर समझकर अहंकार करता है, वह वस्तुतः उसकी अपनी बपौती नहीं है, बल्कि वह तो उस संपूर्ण ब्रह्मांडीय परमात्मा का एक छोटा सा अंश मात्र है।
पौराणिक कथाओं और आचार्यों की टीकाओं (जैसे शंकराचार्य, रामानुज आचार्य और ज्ञानेश्वर महाराज) के अनुसार, इस श्लोक की पृष्ठभूमि इस बात को स्थापित करती है कि भगवान अकर्त्ता होते हुए भी सब कुछ करने वाले हैं और इन्द्रियों से रहित होते हुए भी सभी इंद्रियों के स्वामी (हृषीकेश) हैं। जब महर्षि व्यास ने महाभारत की रचना की और गीता के माध्यम से इस परम ज्ञान को लोक कल्याण के लिए सुरक्षित किया, तो उनका मुख्य उद्देश्य मनुष्य को उसकी क्षुद्र वृत्तियों से ऊपर उठाकर उस अनंत आकाश जैसी चेतना से जोड़ना था। इस श्लोक का स्मरण करने मात्र से प्राचीन काल के ऋषिकुलों में शिष्यों को अद्वैत वेदांत की शिक्षा दी जाती थी, जिससे वे यह जान सकें कि द्वैत (मैं और दूसरा) का भ्रम केवल अज्ञान के कारण है, वास्तव में सब कुछ वही एक ब्रह्म है।
नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)
इस महान श्लोक का नित्य पाठ, मनन और जप करने से साधक को जीवन के विभिन्न आयामों में अकल्पनीय लाभ प्राप्त होते हैं:
1. मानसिक शांति और एकाग्रता
यह श्लोक मन की चंचलता को शांत करता है। जब व्यक्ति यह समझता है कि वह एक सर्वशक्तिमान सुरक्षा घेरे (ब्रह्म) में है, तो उसका अज्ञात भय और चिंता स्वतः समाप्त हो जाती है।
2. सकारात्मक ऊर्जा (Positive Aura) का विकास
संस्कृत के इन पवित्र अक्षरों के उच्चारण से उत्पन्न होने वाली ध्वनि तरंगें (Sound Vibrations) शरीर के चक्रों को संतुलित करती हैं और आसपास के वातावरण को पवित्र बनाती हैं।
3. अहंकार और ममत्व का नाश
"मेरा शरीर, मेरे हाथ, मेरी आँखें" का अहंकार इस श्लोक के निरंतर पाठ से गलता है, क्योंकि साधक को यह बोध हो जाता है कि सब कुछ उसी परमात्मा का है।
4. कर्म शुद्धि और नैतिकता
यह चेतना जागृत होने पर कि "परमात्मा हर ओर से सब कुछ देख और सुन रहा है", व्यक्ति अनैतिक कार्यों, छल और पाप कर्मों से स्वतः दूर रहने लगता है।
5. सर्वत्र ईश्वर दर्शन की दृष्टि
साधक की दृष्टि में भेद-भाव मिट जाता है। वह हर जीव, पशु, पक्षी और मनुष्य में उसी एक परमात्मा के हाथ, पैर और मुख के दर्शन करने लगता है।
6. आध्यात्मिक मुक्ति (मोक्ष) का मार्ग
क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के इस भेद को पूरी तरह समझकर भगवान की शरण जाने से मनुष्य जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त होकर परम शांति को प्राप्त करता है।
7. शारीरिक रोगों और तनाव से मुक्ति
तनाव जनित बीमारियाँ जैसे अनिद्रा, उच्च रक्तचाप आदि मानसिक शांति और भगवद् स्मरण से नियंत्रित होने लगती हैं।
8. ईश्वरीय कृपा और संरक्षण की प्राप्ति
नियमित रूप से इस श्लोक का जप करने वाले भक्त पर भगवान श्रीकृष्ण की अहेतुक कृपा बनी रहती है और संकट के समय उसकी रक्षा होती है।
संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in पर प्रकाशित यह लेख हमारे वरिष्ठ संस्कृत भाषियों, वेदों और उपनिषदों के मर्मज्ञों तथा वैदिक विद्वानों की देखरेख में तैयार किया गया है। श्रीमद्भागवतगीता के इस श्लोक की व्याख्या करते समय आदि शंकराचार्य की 'गीता भाष्य' और संत ज्ञानेश्वर महाराज की 'ज्ञानेश्वरी गीता' के मूल भावों का पूर्ण ध्यान रखा गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक सनातन धर्म के मूल ग्रंथों का शुद्ध, त्रुटिहीन और अकाट्य दार्शनिक ज्ञान पहुँचाना है ताकि आधुनिक संदर्भ में भी आध्यात्मिक जिज्ञासाओं का सटीक समाधान हो सके। सभी विवरण वेदों, उपनिषदों और श्रीमद्भागवतगीता के स्वीकृत संस्करणों पर आधारित हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
उस परमात्मा के हाथ और पैर सब ओर हैं, आँखें, सिर और मुख सब ओर हैं, कान सब ओर हैं, क्योंकि वह संसार में सब कुछ व्याप्त करके स्थित है।
That Supreme Being has hands and feet everywhere, eyes, heads, and mouths everywhere, ears everywhere; He exists in the world, enveloping all.
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
ईश्वर सर्वव्यापी है, वह हर जगह और हर कण में विद्यमान है।
God is omnipresent; He exists everywhere and in every particle.