क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – श्लोक 14

श्लोक १४ में परमात्मा के सर्वव्यापक स्वरूप का वर्णन है – उसके हाथ-पैर, आँखें, सिर सब ओर हैं।

संस्कृत श्लोक

सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् | सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति || १४ ||

sarvataḥ pāṇipādaṃ tatsarvato'kśiśiromukham | sarvataḥ śrutimalloke sarvamāvṛtya tiṣṭhati || 14 ||

पदच्छेद / शब्दार्थ

सर्वतः: सब ओर; पाणिपादम्: हाथ और पैर; तत्: वह (ब्रह्म); सर्वतः: सब ओर; अक्षिशिरोमुखम्: आँखें, सिर और मुख; सर्वतः: सब ओर; श्रुतिमत्: कान; लोके: संसार में; सर्वम्: सब कुछ; आवृत्य: व्याप्त करके; तिष्ठति: स्थित है

हिंदी अनुवाद

उस (परमात्मा) के हाथ-पैर सब ओर हैं, आँखें, सिर और मुख सब ओर हैं, कान सब ओर हैं, क्योंकि वह संसार में सब कुछ व्याप्त करके स्थित है।

English Translation

With hands and feet everywhere, with eyes, heads and mouths everywhere, with ears everywhere, He exists in the world, enveloping all.

टीका / Commentary

यह श्लोक परमात्मा की सर्वव्यापकता का वर्णन करता है। वह सभी इन्द्रियों से युक्त होते हुए भी उनसे परे है। This verse describes the all-pervasiveness of the Supreme; He is endowed with all senses yet transcends them.