श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 13 (क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga))

अध्याय 13 · श्लोक 13

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 35 44 मिनट का पठन 127 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते | अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते || १३ ||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

17 पद
ज्ञेयम्
ज्ञेय तत्व
यत्
जो
तत्
उसको
प्रवक्ष्यामि
अच्छी तरह कहूँगा
यत्
जिसको
ज्ञात्वा
जानकर
अमृतम्
अमृतत्व (मोक्ष)
अश्नुते
प्राप्त करता है
अनादिमत्
अनादि
परम्
परम
ब्रह्म
ब्रह्म
न
नहीं
सत्
सत्
तत्
वह
न
नहीं
असत्
असत्
उच्यते
कहा जाता है

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो ज्ञेय (तत्त्व) है, उसे मैं अच्छी तरह कहूँगा, जिसे जानकर मनुष्य अमृतत्व (मोक्ष) को प्राप्त हो जाता है। वह अनादि, परब्रह्म है, जो न सत् कहा जाता है और न असत्।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता - त्रयोदशोऽध्यायः (क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग)

Bhaktilok.in - Your Ultimate Spiritual Gateway for Authentic Vedic Knowledge

आध्यात्मिक परिचय एवं समग्र महत्व

सनातन धर्म और वेदान्त दर्शन के शिखर ग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता के त्रयोदशोऽध्याय (क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग) का यह तेरहवां श्लोक भारतीय अध्यात्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्तंभ है। इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन के माध्यम से समस्त मानवजाति को उस 'ज्ञेय तत्व' (जानने योग्य परम सत्य) का अत्यंत स्पष्ट और अकाट्य बोध कराते हैं, जिसे जान लेने के पश्चात मनुष्य इस नश्वर संसार के चक्रव्यूह से मुक्त होकर अमरता यानी मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। वैदिक संस्कृति में ज्ञान की पिपासा को सबसे बड़ा धर्म माना गया है, किंतु भौतिक ज्ञान और आत्मिक ज्ञान (ब्रह्मविद्या) में जमीन-आसमान का अंतर है। भौतिक ज्ञान मनुष्य को अजीविका और अहंकार दे सकता है, परंतु आत्मिक ज्ञान या 'ब्रह्मज्ञान' उसे जन्म-मृत्यु के बंधन से छुड़ाकर उस परम आनंद की अनुभूति कराता है जहाँ शोक, मोह और संताप का सर्वथा नाश हो जाता है।

सांस्कृतिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से यह श्लोक उपनिषदों के उस अद्वैत दर्शन का सार प्रस्तुत करता है, जहाँ ब्रह्म को शब्दों की सीमाओं से परे बताया गया है। जब भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि वह ब्रह्म 'अनादि' है और 'न सत् न असत्' कहा जाता है, तो वे मानवीय बुद्धि की विवशता को उजागर करते हैं। हमारी भाषा और बुद्धि केवल दृश्यमान और नाशवान पदार्थों को ही परिभाषित करने में सक्षम है, परंतु जो संपूर्ण ब्रह्मांड का आदिस्रोत है, जो इस सृष्टि के कण-कण में व्याप्त होने के बावजूद भौतिक इंद्रियों की पकड़ से कोसों दूर है, उसे साधारण शब्दों में नहीं बांधा जा सकता। यह श्लोक साधकों को यह सिखाता है कि सत्य की खोज में तार्किकता के साथ-साथ अंतःकरण की शुद्धि और समर्पण का होना कितना आवश्यक है। भक्तिलोक.इन के इस विशेष आलेख में हम इसी गूढ़ श्लोक के प्रत्येक शब्द, इसके ऐतिहासिक संदर्भ, और इसके दैनिक जीवन में आध्यात्मिक अनुप्रयोग का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक एवं संदर्भ

श्रीमद्भगवद्गीता के तेरहवें अध्याय (क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग) का यह श्लोक संस्कृत के प्रामाणिक छंद में पिरोया गया है। इसके उच्चारण मात्र से मन में एक अलौकिक शांति का संचार होता है:

ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते।

अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते।। १३।।

श्लोक का सामान्य हिंदी पद्यानुवाद:

"अब मैं उस जानने योग्य तत्व को भली-भांति कहूँगा, जिसे जानकर मनुष्य अमरता (मोक्ष) को प्राप्त होता है। वह अनादि और मत्पर (सर्वश्रेष्ठ) ब्रह्म है, जिसे न तो 'सत्' (व्यक्त/दृश्यमान) कहा जा सकता है और न ही 'असत्' (अव्यक्त/अदृश्य) कहा जा सकता है।"

यह श्लोक अर्जुन के उस प्रश्न की अगली कड़ी है जहाँ उन्होंने प्रकृति, पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के बारे में जानने की इच्छा प्रकट की थी। भगवान ने क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का विस्तार से वर्णन करने के बाद अब उस परम लक्ष्य को स्पष्ट करने का बीड़ा उठाया है जो हर साधना की पराकाष्ठा है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

संस्कृत व्याकरण और वेदान्त के सिद्धांतों के आधार पर इस श्लोक के प्रत्येक पद का सूक्ष्म विश्लेषण नीचे सारणी में प्रस्तुत है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
ज्ञेयम् (Gyeyam) जानने योग्य तत्व वह परम लक्ष्य जिसे जानने के बाद जीवन में कुछ भी जानना शेष नहीं रहता।
यत् तत् (Yat Tat) जो वह उस विलक्षण और अद्वितीय परमात्मा की ओर संकेत जो समस्त दृश्यों का आधार है।
प्रवक्ष्यामि (Pravakshyami) भली-भांति कहूँगा / बताऊंगा श्रीकृष्ण गुरु रूप में शिष्य अर्जुन को अत्यंत गोपनीय और कल्याणकारी ज्ञान प्रदान कर रहे हैं।
यत् ज्ञात्वा (Yat Jnatva) जिसे जानकर मात्र बौद्धिक ज्ञान नहीं, अपितु प्रत्यक्ष अनुभूति या अपरोक्ष ज्ञान प्राप्त करके।
अमृतम अश्नुते (Amritam Ashnute) अमरता को प्राप्त होता है / मोक्ष पाता है जन्म-मृत्यु के चक्र से छूटकर साधक सच्चिदानंद स्वरूप परमात्मा में लीन हो जाता है।
अनादिमत् (Anadimat) जो अनादि है (जिसका कोई आदि या प्रारंभ नहीं है) काल (समय) की सीमाएं जिस पर लागू नहीं होतीं; जो समय से भी सर्वथा परे है।
परं ब्रह्म (Param Brahma) सर्वश्रेष्ठ परब्रह्म समस्त ब्रह्मांडों का रचयिता, पालक और संहारक, किंतु इन सब से निर्लिप्त सर्वोच्च सत्ता।
न सत् (Na Sat) सत् नहीं है वह इस भौतिक जगत की तरह प्रकट या आँखों से दिखने वाला साधारण 'सत्' नहीं है।
न असत् (Na Asat) असत् नहीं है वह शून्य या असत्ता (Non-existence) भी नहीं है, क्योंकि उसका अस्तित्व सर्वोपरि है।
उच्यते (Uchyते) कहा जाता है वेदों और ऋषियों द्वारा इस प्रकार से उसका निरूपण किया गया है।

विशेष दार्शनिक टिप्पणी: जब श्लोक में कहा गया है कि वह 'न सत् है और न असत्', तो इसका तात्पर्य यह है कि 'सत्' शब्द सामान्यतः उन वस्तुओं के लिए प्रयोग होता है जो स्थूल रूप से इंद्रियों को दिखाई देती हैं (जैसे यह संसार), और 'असत्' उन वस्तुओं के लिए जो पूरी तरह से अवास्तविक हैं (जैसे गधे के सींग)। ब्रह्म इन दोनों कोटियों से परे है। वह इंद्रियों के लिए असत् (अगोचर) है, परंतु अपनी परम सत्ता के कारण वह एकमात्र वास्तविक 'सत्' (अस्तित्व) है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता का यह त्रयोदश अध्याय कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में भगवान श्रीकृष्ण और पांडव पुत्र अर्जुन के बीच हुए संवाद का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। महाभारत के युद्ध के ठीक पूर्व जब अर्जुन अपने स्वजनों को सामने देखकर विषाद से ग्रस्त हो गए थे, तब भगवान ने उन्हें कर्तव्य पथ का बोध कराने के साथ-साथ आत्मज्ञान की गंगा में स्नान कराया। अध्याय 13 का यह प्रसंग विशेष रूप से 'क्षेत्र' (शरीर/प्रकृति) और 'क्षेत्रज्ञ' (आत्मा/परमात्मा) के भेद को समझाने के लिए रचा गया है।

वैदिक और उपनिषदिक परंपरा में इस श्लोक की जड़ें बहुत गहरी हैं। मुण्डकोपनिषद और कठोपनिषद में भी इसी प्रकार की भाषा का प्रयोग किया गया है जहाँ ब्रह्म को 'अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययम्' (शब्द, स्पर्श, रूप और नाश से रहित) बताया गया है। महर्षि वेद व्यास ने महाभारत और पुराणों में इस बात पर विशेष बल दिया है कि मानव योनि का मुख्य उद्देश्य केवल भौतिक सुखों भोगना नहीं है, बल्कि उस 'अनादि परब्रह्म' की थाह पाना है जो समस्त वेदों का अंतिम गंतव्य है।

पौराणिक कथाओं और ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार, ऋषिगण जैसे नारद, सनतकुमार, और शुकदेव जी ने इसी ब्रह्मविद्या के बल पर संसार के दुखों पर विजय प्राप्त की थी। जब अर्जुन ने भगवान से यह पूछा कि हे केशव! प्रकृति क्या है, पुरुष क्या है, क्षेत्र क्या है और क्षेत्रज्ञ क्या है, तथा ज्ञान और ज्ञेय का स्वरूप क्या है—तब भगवान श्रीकृष्ण ने संक्षेप और विस्तार दोनों ही दृष्टियों से इस ज्ञेय तत्व का उद्घाटन किया। यह पृष्ठभूमि हमें सिखाती है कि जीवन के सबसे बड़े संकटों और भ्रम की स्थिति में केवल ईश्वर का शरणागत होकर और उनके द्वारा बताए गए ब्रह्मज्ञान को आत्मसात करके ही परम शांति पाई जा सकती है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के इन पावन श्लोकों का नियमित पठन, मनन और स्मरण करने से साधक के जीवन में निम्नलिखित चमत्कारी और सकारात्मक परिवर्तन आते हैं:

1. मानसिक शांति एवं स्थिरता

नियमित रूप से इस श्लोक का पाठ करने से मन की उथल-पुथल शांत होती है। संसार की नश्वरता का बोध होने पर छोटी-छोटी बातें मानसिक तनाव का कारण नहीं बनतीं और चित्त में प्रगाढ़ स्थिरता आती है।

2. सकारात्मक ऊर्जा और औरा का विस्तार

संस्कृत के इन वेदमंत्र तुल्य श्लोकों के दिव्य कंपन (Vibrations) से शरीर के चारों ओर एक सकारात्मक ऊर्जा का कवच बनता है, जो नकारात्मक विचारों और बुरी दृष्टियों से रक्षा करता है।

3. कार्मिक शुद्धि (कर्म बंधनों से मुक्ति)

जब साधक ब्रह्म को 'सत्-असत् से परे' समझ लेता है, तो उसके कर्मों में अनासक्ति आ जाती है। वह फल की इच्छा से मुक्त होकर कर्म करता है, जिससे उसके संचित पाप-कर्म क्षीण होने लगते हैं।

4. दिव्य कृपा और भगवद् प्राप्ति की सुगमता

ज्ञेय तत्व के प्रति समर्पण भाव रखने वाले भक्तों पर भगवान श्रीकृष्ण की अहैतुकी कृपा बरसती है। साधक को जीवन-मरण के भय से मुक्ति का मार्ग स्वतः प्रशस्त होने लगता है।

5. अद्वैत ज्ञान और अहंकार का नाश

यह बोध होने पर कि परम ब्रह्म सर्वव्यापी और इंद्रियों से परे है, मनुष्य के भीतर का 'मैं' (अहंकार) और 'मेरा' (ममत्व) का भाव धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है और सर्वभूत में ईश्वर दिखने लगते हैं।

6. निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि

जब आंतरिक बुद्धि आध्यात्मिक रूप से परिपक्व हो जाती है, तो जीवन के जटिल निर्णयों में मोह या भ्रम बाधा नहीं बनते, बल्कि सही और न्यायसंगत मार्ग स्वतः दिखाई देता है।

7. भय और मृत्यु के प्रति अरुचि

'अमृतमश्नुते' (अमरता को प्राप्त करना) के इस सिद्धांत को हृदयंगम करने से मृत्यु का स्वाभाविक भय समाप्त हो जाता है क्योंकि साधक आत्मा की अमरता को जान लेता है।

8. उच्चकोटि की एकाग्रता (Meditation Depth)

ध्यान साधना करने वालों के लिए इस श्लोक का अर्थ एक उत्तम ध्येय प्रदान करता है। मन को भटकाव से बचाकर एक अद्वितीय बिंदु पर केंद्रित करने में यह मंत्र अचूक है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context)

भक्तिलोक.इन पर प्रस्तुत यह लेख हमारे विद्वान संस्कृत भाषाविदों और वेदान्त आचार्यों की देखरेख में संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। इस सामग्री को तैयार करते समय श्रीमद्भगवद्गीता के आदि शंकराचार्य भाष्य, स्वामी रामसुखदास जी की 'गीता साधना', और विभिन्न उपनिषदों के प्रामाणिक संदर्भों का बारीकी से अध्ययन किया गया है। हमारा उद्देश्य सनातन संस्कृति के मूल संदेश को आधुनिक पाठकों तक सरल, सुबोध और पूर्णतः शुद्ध हिंदी में पहुंचाना है, ताकि प्रत्येक साधक वेदों और गीता के शाश्वत प्रकाश से अपने जीवन को आलोकित कर सके। किसी भी प्रकार के संशय की स्थिति में पारंपरिक गुरुजनों और प्रामाणिक ग्रंथों के स्वाध्याय का परामर्श दिया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

उत्तर: 'ज्ञेय तत्व' से तात्पर्य उस परम ब्रह्म या परमात्मा से है जो संपूर्ण ब्रह्मांड का मूल आधार है। उसे जान लेने के पश्चात मनुष्य के लिए जानने योग्य कुछ भी शेष नहीं रहता, क्योंकि वह समस्त ज्ञान का अंतिम छोर और परम सत्य है।

उत्तर: हमारी भाषा और बुद्धि केवल उन पदार्थों को समझ सकती है जो या तो भौतिक रूप से प्रकट (सत्) हैं या बिल्कुल अवास्तविक (असत्) हैं। परब्रह्म इन दोनों दृष्टियों से परे है; वह इंद्रियों से असत् (अगोचर) होते हुए भी परम सत् (वास्तविक अस्तित्व) है, इसलिए उसे इन दोनों शब्दों से सीधे परिभाषित नहीं किया जा सकता।

उत्तर: जब कोई साधक इस श्लोक के गूढ़ अर्थ को समझकर अपने आंतरिक स्वभाव में उतारता है, तो उसका अज्ञान और शरीर के प्रति मोह नष्ट हो जाता है। आत्मा की अमरता का यह बोध ही वस्तुतः 'अमृतमश्नुते' (अमरता की प्राप्ति) है, जो जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त कर देता है।

उत्तर: यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के त्रयोदशोऽध्याय (13वें अध्याय) में आता है, जिसका नाम 'क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग' है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने शरीर (क्षेत्र) और आत्मा/परमात्मा (क्षेत्रज्ञ) के अंतर को विस्तार से समझाया है।

उत्तर: हाँ, बिल्कुल। भगवद्गीता का ज्ञान केवल संन्यासियों के लिए नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग और गृहस्थों के लिए है। निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए यदि कोई व्यक्ति सच्चे गुरु के मार्गदर्शन में इस ज्ञान को अपनाए, तो वह गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी ब्रह्मज्ञानी बन सकता है।

भक्तिलोक.इन के साथ अपनी आध्यात्मिक यात्रा को आगे बढ़ाएं

ऐसे ही अन्य प्रामाणिक श्लोकों, वेदों, पुराणों और स्तोत्रों के अर्थ जानने के लिए हमारे पोर्टल से जुड़े रहें।

मुख्य पृष्ठ पर जाएं (Visit Bhaktilok.in)

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

मैं उस ज्ञेय तत्व को बताऊँगा, जिसे जानकर मनुष्य अमृत (मोक्ष) पाता है। वह अनादि परब्रह्म है, जिसे न सत् कहा जाता है और न असत्।

I will declare that which is to be known, knowing which one attains immortality – the beginningless Supreme Brahman, which is called neither being nor non-being.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

परम सत्य शब्दों और विचारों से परे है, केवल अनुभव से जाना जा सकता है।

The Supreme Truth is beyond words and thoughts; it can only be realized through experience.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 13 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 13/35 37% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!