क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – श्लोक 12

श्लोक १२ में ज्ञान की परिभाषा दी गई है – आत्मज्ञान में स्थिरता और तत्त्व का साक्षात्कार।

संस्कृत श्लोक

अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् | एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा || १२ ||

adhyātmajñānanityatvaṃ tattvajñānārthadarśanam | etajjñānamiti proktamajñānaṃ yadato'nyathā || 12 ||

पदच्छेद / शब्दार्थ

अध्यात्मज्ञाननित्यत्वम्: अध्यात्म ज्ञान में नित्य स्थिति; तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्: तत्त्वज्ञान के उद्देश्य का दर्शन; एतत्: यह; ज्ञानम्: ज्ञान; इति: इस प्रकार; प्रोक्तम्: कहा गया; अज्ञानम्: अज्ञान; यत्: जो; अत: इससे; अन्यथा: अन्यथा

हिंदी अनुवाद

अध्यात्म-ज्ञान में नित्य स्थिति और तत्त्वज्ञान के उद्देश्य (परमात्मा) का साक्षात्कार – यह सब ज्ञान कहा गया है और जो इससे विपरीत है वह अज्ञान है।

English Translation

Constant state of knowledge of the Self, perception of the end of true knowledge – this is declared to be knowledge, and what is opposed to it is ignorance.

टीका / Commentary

यहाँ ज्ञान की पराकाष्ठा बताई गई है – आत्मज्ञान में स्थिरता और सत्य का साक्षात्कार। This describes the culmination of knowledge – steadfastness in Self-knowledge and realization of Truth.