क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – श्लोक 11
श्लोक ११ में ज्ञान के साधनों में अनन्य भक्ति, एकान्तवास और जनसमूह से अरुचि बताई गई है।
संस्कृत श्लोक
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी | विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि || ११ ||
mayi cānanyayogena bhaktiravyabhicāriṇī | viviktadeśasevitvamaratirjanasaṃsadi || 11 ||
पदच्छेद / शब्दार्थ
मयि: मुझमें; च: और; अनन्ययोगेन: अनन्य भक्तियोग से; भक्ति: भक्ति; अव्यभिचारिणी: अविचल; विविक्तदेशसेवित्वम्: एकान्त स्थान में रहने का भाव; अरति: अरुचि; जनसंसदि: लोगों की सभा में
हिंदी अनुवाद
तथा अनन्य योग द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति, एकान्त स्थान में रहने का भाव और मनुष्यों की सभा में अरुचि –
English Translation
Unswerving devotion unto Me by the yoga of non-separation, resort to solitary places, distaste for the society of men.
टीका / Commentary
भक्ति, एकान्तवास और जनसमूह से विरक्ति – ये ज्ञान के लक्षण हैं। Devotion, solitude, and distaste for crowds are also marks of knowledge.