श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 13 (क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga))

अध्याय 13 · श्लोक 10

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 35 43 मिनट का पठन 135 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु | नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु || १० ||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

7 पद
असक्ति
आसक्ति का अभाव
अनभिष्वङ्ग
अत्यधिक स्नेह का अभाव
पुत्रदारगृहादिषु
पुत्र, स्त्री, घर आदि में
नित्यम्
सदा
च
और
समचित्तत्वम्
समान चित्तता
इष्टानिष्टोपपत्तिषु
इष्ट और अनिष्ट की प्राप्ति में

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

पुत्र, स्त्री, घर आदि में आसक्ति का अभाव और अत्यधिक स्नेह का न होना, तथा इष्ट और अनिष्ट की प्राप्ति में निरन्तर समान चित्त रहना –

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता के तेरहवें अध्याय (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग) का यह अत्यंत पावन और जीवनोपयोगी श्लोक ज्ञान प्राप्ति के सर्वोच्च साधनों का अनावरण करता है।

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय चेतना

सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता को संपूर्ण मानवता का मार्गदर्शक ग्रंथ माना गया है। भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को निमित्त बनाकर दिया गया यह उपदेश केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं है, अपितु यह भवसागर से पार उतरने का एक अचूक और शाश्वत नक्शा है। तेरहवें अध्याय में 'क्षेत्र' (शरीर और प्रकृति) और 'क्षेत्रज्ञ' (आत्मा और परमात्मा) के विस्तृत विवेचन के साथ-साथ ज्ञान के उन बीस साधनों का वर्णन किया गया है, जिन्हें अपनाकर मनुष्य अपनी दिव्यता को जागृत कर सकता है। प्रस्तुत श्लोक—"असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु | नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु"—उन्ही पावन और transformative गुणों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण आधारशिला है।

सांसारिक जीवन जीते हुए भौतिकता के जाल में उलझ जाना मानव स्वभाव की एक सामान्य कमजोरी है। पुत्र, पत्नी (दारा), घर (गृह) और अन्य संपत्तियां व्यक्ति को अपनी ओर आकर्षित करती हैं और वह इनके प्रति अंधी ममता में बंध जाता है। यह ममता और आसक्ति ही मनुष्य के दुखों का मूल कारण बनती है। जब तक जीव अज्ञान के अंधकार में रहता है, तब तक वह नाशवान पदार्थों और संबंधों को ही अपना सर्वस्व मान बैठता है। परंतु जब वैराग्य और विवेक का सूर्य उदय होता है, तब उसे समझ आता है कि यह संसार केवल एक रैन-बसेरा है। इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने स्पष्ट किया है कि ज्ञान वह नहीं है जो केवल ग्रंथों को रटने से आए, बल्कि ज्ञान वह है जो आचरण में उतरे। परिवार के प्रति मोह का शमन और जीवन के हर मोड़ पर—चाहे वह परिस्थिति अनुकूल हो या प्रतिकूल—मन की एकरसता बनाए रखना ही वास्तविक ज्ञानी की पहचान है। यह ब्रह्मांडीय चेतना से जुड़ने का मार्ग है, जहां व्यक्ति सुख और दुख के द्वंद्वों से ऊपर उठकर सच्चिदानंद स्वरूप परमात्मा में स्थित हो जाता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक एवं संदर्भ

अमानित्वमदंभित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।
आचार्योपासనం शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥ ८॥
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्॥ ९॥
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु॥ १०॥

मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥ ११॥

श्लोक का संदर्भ एवं अनुक्रमणिका
  • ग्रंथ: श्रीमद्भगवद्गीता (महाभारत के भीष्म पर्व का अंश)
  • अध्याय: तेरहवां अध्याय - क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग (Adhyaya 13)
  • वक्ता: भगवान श्री कृष्ण
  • श्रोता: पाण्डुपुत्र अर्जुन
  • मुख्य विषय: ज्ञान के लक्षण (Traits of True Knowledge)

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में अगाध दार्शनिक गहराई छिपी हुई है। आइए संस्कृत के इन पदों का सूक्ष्मता से विश्लेषण करें:

पद / शब्द (Sanskrit Term) सरल हिंदी अर्थ (Literal Meaning) आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ (Spiritual Interpretation)
असक्तिः (Asaktih) आसक्ति का अभाव, ममता का त्याग सांसारिक वस्तुओं, व्यक्तियों और परिस्थितियों में अत्यधिक लगाव या फंसाव न रखना। यह वैराग्य की वह अवस्था है जहां व्यक्ति चीज़ों को इस्तेमाल करता है पर उनसे बंधता नहीं है।
अनभिष्वङ्गः (Anabhishvangah) अत्यधिक मोह या तन्मयता का न होना 'अभिश्चङ्ग' का अर्थ है किसी प्रिय की हानि पर अत्यंत शोकग्रस्त हो जाना या उसमें पूरी तरह डूब जाना। इसका निषेध करते हुए मन की स्थिरता को 'अनभिष्वङ्ग' कहा गया है।
पुत्र (Putra) संतान, बेटा रक्त संबंधों और वंशीय मोह का प्रतीक। संतान के प्रति मोह में आकर मनुष्य अक्सर धर्म और न्याय का त्याग कर देता है, जिससे ज्ञान ढंक जाता है।
दार (Dara) पत्नी, सहधर्मिणी गृहस्थ जीवन का केंद्र बिंदु। वैवाहिक संबंधों में आत्मीयता होना स्वाभाविक है, परंतु उसमें अंधापन या अत्यधिक आसक्ति व्यक्ति को परमार्थ के मार्ग से भटका देती है।
गृह (Griha) घर, मकान, निवास स्थान ईंट-पत्थर और सीमेंट से बने ढांचे को अपना शाश्वत ठिकाना मान लेना। ज्ञानीजन घर को केवल एक साधन मानते हैं, मंदिर या विश्राम स्थल की तरह, न कि अंतिम सत्य।
आदिषु (Adishu) इत्यादि में, और भी अन्य वस्तुओं में इसके अंतर्गत धन, संपत्ति, वाहन, मित्र, समाज और प्रतिष्ठा जैसी वे तमाम चीजें आ जाती हैं जो मनुष्य को इस भौतिक संसार में बांध कर रखती हैं।
नित्यम् च (Nityam cha) और हमेशा, निरंतर, सर्वदा यह स्थिति कभी-कभार या संकट के समय नहीं, बल्कि जीवन की हर परिस्थिति में निरंतर बनी रहनी चाहिए। यह अभ्यास की निरंतरता को दर्शाता है।
समचित्तत्वम् (Samachittatvam) मन की समता, समान भाव, equanimity सुख और दुख, मान और अपमान, जय और पराजय—इन सभी द्वंद्वों में मन को शांत और अविकार रखना। चित्त में किसी प्रकार की उथल-पुथल न होने देना।
इष्ट (Ishta) मनचाहा, अनुकूल, प्रिय वे सभी घटनाएं, वस्तुएं या परिस्थितियां जो व्यक्ति को बहुत प्रिय लगती हैं और जिनसे उसे सुख की प्राप्ति होती है (जैसे धन लाभ, प्रशंसा, स्वास्थ्य)।
अनिष्ट (Anishta) अनचाहा, प्रतिकूल, अप्रिय वे स्थितियां जो मन के विरुद्ध होती हैं और जिनसे कष्ट या दुख मिलता है (जैसे अपमान, असफलता, प्रियजन का वियोग, बीमारी)।
उपपत्तिषु (Upapattishu) प्राप्ति होने पर, उपस्थित होने पर चाहे अनुकूल परिस्थितियां आएं या प्रतिकूल परिस्थितियां उपस्थित हों, दोनों ही अवस्थाओं में ज्ञानी पुरुष का आंतरिक संतुलन अटल रहता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के तेरहवें अध्याय की पृष्ठभूमि कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में रची गई थी। जब दोनों सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं और अर्जुन अपने स्वजनों (भीष्म, द्रोण, कर्ण आदि) को देखकर मोहग्रस्त हो गए, तब उनके रथ के सारथी बने भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें ज्ञान का पाठ पढ़ाया। अर्जुन का यह मोह और विषाद केवल उनका व्यक्तिगत मोह नहीं था, बल्कि यह संपूर्ण मानव जाति के उस मोह का प्रतिनिधित्व करता है जो हम अपने पुत्र, परिवार, और घरों के प्रति पालते हैं।

महाभारत और पुराणों में ऐसे अनेक आख्यान मिलते हैं जो इस बात को सिद्ध करते हैं कि अत्यधिक आसक्ति किस प्रकार पतन का कारण बनती है। उदाहरणस्वरूप, राजा धृतराष्ट्र का अपने पुत्र मोह (दुर्योधन के प्रति अंधा प्रेम) ने संपूर्ण कुरु वंश का सर्वनाश करवा दिया। धृतराष्ट्र सब कुछ जानते हुए भी अपने पुत्र के प्रति 'अनभिष्वङ्ग' (अंधे मोह) से मुक्त नहीं हो पाए और महाभारत जैसे महायुद्ध को रोक पाने में असमर्थ रहे। इसके विपरीत, महर्षि शुकदेव, राजा जनक और प्रह्लाद जैसे महापुरुषों का जीवन इस बात का प्रमाण है कि वे महलों में रहते हुए, राजपाट संभालते हुए भी पूर्ण रूप से असक्त (detached) रहे। राजा जनक को 'विदेह' कहा जाता था क्योंकि वे शरीर और महलों में रहते हुए भी उनसे आसक्त नहीं थे। उनके मिथिला के राजभवन में आग लगने की खबर मिलने पर भी जब वे विचलित नहीं हुए, तो यही 'समचित्तत्वम्' का सर्वोच्च उदाहरण बना।

वेदों और उपनिषदों में भी इस बात की बार-बार पुनरावृत्ति की गई है कि यह संसार स्वप्नवत है। कठोपनिषद में यमराज और नचिकेता के संवाद में भी सांसारिक प्रलोभनों (प्रेय और श्रेय) का भेद समझाया गया है। जो मनुष्य 'प्रेय' (आसक्ति वाले प्रिय विषयों) के पीछे भागता है, वह बंध जाता है; और जो 'श्रेय' (कल्याणकारी सत्य) को चुनता है, वह मुक्त हो जाता है। भगवान श्री कृष्ण का यह श्लोक अर्जुन को उसी 'श्रेय' मार्ग पर चलने का आह्वान करता है, जहां पारिवारिक कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए भी मन को परमपिता परमेश्वर मेंलीन रखा जाए।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस पावन श्लोक का स्मरण, मनन और इसके मर्म को जीवन में उतारने से साधक को असीम आध्यात्मिक और मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति और संतापों से मुक्ति

परिवार और वस्तुओं से अत्यधिक मोह न रखने से भविष्य की चिंताएं स्वतः समाप्त हो जाती हैं, जिससे चित्त में एक अगाध शांति बनी रहती है।

2. सुख-दुख के द्वंद्वों से तटस्थता

समचित्तत्व के अभ्यास से व्यक्ति लाभ में अत्यधिक हर्षित और हानि में अत्यधिक शोकाकुल नहीं होता, बल्कि जीवन को संतुलित भाव से जीता है.

3. कर्म बंधनों से शुद्धि (Karmic Purification)

जब कर्ता भाव और फल की आसक्ति छूट जाती है, तब कर्मों के नए बीज नहीं बनते और पुराने कर्मों का शमन होने लगता है, जिससे मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।

4. सकारात्मक ऊर्जा और औरा का विकास

क्रोध, ईर्ष्या, मोह और भय जैसी नकारात्मक ऊर्जाएं दूर होती हैं, जिससे साधक के चारों ओर एक उच्च कोटि के सात्विक आवरण (Auric Field) का निर्माण होता है।

5. दिव्य कृपा और भगवद् प्राप्ति

भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं इसे ज्ञान का अंग बताया है। इस गुण को अपनाने वाला भक्त भगवान को अत्यंत प्रिय होता है और उसे सहज ही भगवत कृपा प्राप्त होती है।

6. निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि (Decision Making)

भावनाओं में न बहने के कारण संकट के समय भी व्यक्ति विवेकपूर्ण और धर्मसंगत निर्णय लेने में सक्षम होता है।

7. भय और मृत्यु के त्रास से मुक्ति

जब अपनी प्रिय वस्तुओं और शरीर के प्रति आसक्ति कम हो जाती है, तो मृत्यु का भय भी स्वतः समाप्त हो जाता है क्योंकि आत्मा की अमरता का बोध हो जाता है।

8. समाज में आदर्श जीवन का उदाहरण

ऐसा ज्ञानी पुरुष अपने परिवार और समाज में रहते हुए भी कमल के पत्ते की तरह जल से अलिप्त रहता है, जो दूसरों के लिए प्रेरणा बनता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

Bhaktilok.in के इस प्रतिष्ठित मंच पर प्रस्तुत सामग्री वेदों, उपनिषदों, श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीमद्भागवत महापुराण जैसे प्रामाणिक ग्रंथों के गहन अध्ययन पर आधारित है। हमारे विद्वान आचार्यों और संस्कृत भाषाविदों द्वारा इस सामग्री को 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' के अंतर्गत अत्यंत सावधानी से सत्यापित किया गया है ताकि पाठकों को सनातन धर्म का शुद्ध, मिलावट-रहित और दार्शनिक रूप से सटीक ज्ञान प्राप्त हो सके। हमारा उद्देश्य आधुनिक जीवन की भागदौड़ और तनाव के बीच प्राचीन वैदिक ज्ञान के माध्यम से मानसिक शांति और आध्यात्मिक उत्थान का मार्ग प्रशस्त करना है। किसी भी श्लोक की व्याख्या केवल शाब्दिक अर्थ तक सीमित न रहकर उसके व्यावहारिक और आध्यात्मांत्रिक अनुप्रयोग पर केंद्रित है, ताकि हर साधक अपने दैनिक जीवन में इसका लाभ उठा सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

उत्तर: बिल्कुल नहीं! सनातन धर्म में पलायनवाद का कोई स्थान नहीं है। 'असक्ति' का अर्थ अपने कर्तव्यों से मुंह मोड़ना या परिवार को त्यागकर जंगलों में भाग जाना नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ है—परिवार के प्रति अपने कर्तव्यों का पूरी निष्ठा और प्रेम से निर्वहन करना, परंतु मन में यह भाव रखना कि ये सभी संबंध और वस्तुएं अस्थायी हैं। जैसे एक ट्रस्टी कंपनी की संपत्ति की देखभाल पूरी ईमानदारी से करता है पर उसे अपनी निजी संपत्ति नहीं मानता, उसी प्रकार गृहस्थ जीवन में रहते हुए आंतरिक मोह का त्याग ही सच्ची असक्ति है।

उत्तर: समचित्तत्व प्राप्त करने के लिए विवेक और अभ्यास की आवश्यकता होती है। जब मनुष्य यह समझ जाता है कि सुख और दुख धूप-छांव की तरह आते-जाते हैं और शरीर या मन के स्तर पर परिस्थितियां बदलती रहती हैं, तब वह उनके प्रति अति-प्रतिक्रिया (Over-reaction) देना बंद कर देता है। भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि मात्रास्पर्शास्तु कौतेय शीतोष्णसुखदुःखदाः—ये इंद्रियों और विषयों के संयोग से पैदा होने वाले स्पर्श ठंड और गर्मी की तरह आने-जाने वाले हैं। इन्हें सहन करना सीख लेना ही समचित्तत्व है।

उत्तर: तेरहवां अध्याय 'क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग' कहलाता है। इस अध्याय के श्लोक संख्या 7 से 11 तक भगवान श्री कृष्ण ने ज्ञान के 20 लक्षणों का वर्णन किया है। सांसारिक लोग जिसे 'ज्ञान' (जैसे पढ़ना-लिखना या विज्ञान) समझते हैं, भगवान ने उसे अज्ञान या विद्या का बाहरी आवरण माना है। असली ज्ञान वे आंतरिक गुण हैं जो मनुष्य को अहंकार, मोह और आसक्ति से मुक्त करते हैं। प्रस्तुत श्लोक (श्लोक 10) उसी ज्ञान के मुकुट का एक चमकता हुआ हीरा है जो परिवार और परिस्थितियों के प्रति दृष्टिकोण को बदल देता है।

उत्तर: दैनिक जीवन में इसे उतारने के लिए सबसे पहले अपने दिन की शुरुआत ईश्वर स्मरण और कृतज्ञता (Gratitude) के साथ करें। जब भी घर या कार्यक्षेत्र में कोई अनुकूल परिस्थिति आए, तो अत्यधिक प्रसन्न होकर अहंकार न करें; और जब कोई प्रतिकूल परिस्थिति या अपमानजनक स्थिति आए, तो धैर्य बनाए रखें। अपने परिजनों से प्रेम करें, उनकी सेवा करें, परंतु मन में यह स्पष्ट रखें कि अंततः सब ईश्वर के अधीन है। प्रतिदिन इस श्लोक का पाठ और मनन करने से यह भाव धीरे-धीरे स्वभाव में ढल जाता है।

उत्तर: निश्चित रूप से! आज के आधुनिक युग में अधिकांश मानसिक बीमारियां, डिप्रेशन और एंग्जाइटी का कारण अत्यधिक अपेक्षाएं, मोह और असफलताओं को स्वीकार न कर पाना है। यह श्लोक मनुष्य को 'असक्ति' (चीजों से मानसिक रूप से कम चिपके रहना) और 'समचित्तत्व' (परिस्थितियों में स्थिर रहना) सिखाता है। जब व्यक्ति यह सीख जाता है कि हर चीज उसके नियंत्रण में नहीं है और वह फल की चिंता छोड़े बिना अपना कर्म करता है, तो उसके आधे से अधिक मानसिक तनाव स्वतः समाप्त हो जाते हैं।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

पुत्र, स्त्री, घर आदि में आसक्ति न होना, और इष्ट-अनिष्ट की प्राप्ति में समान चित्त रहना – ये ज्ञान के लक्षण हैं।

Non-attachment to son, wife, home, etc., and constant equanimity in desirable and undesirable situations – these are marks of knowledge.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

समभाव ही योग है। सुख-दुःख में समान रहना आत्मज्ञान की निशानी है।

Equanimity is yoga. Being equal in pleasure and pain is a sign of self-realization.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 10 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 10/35 29% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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