क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – श्लोक 9

श्लोक ९ में ज्ञान के साधनों के अगले दो गुण बताए गए हैं – वैराग्य और संसार के दोषदर्शन।

संस्कृत श्लोक

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च | जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् || ९ ||

indriyārtheṣu vairāgyam anahaṅkāra eva ca | janmamṛtyujarāvyādhiduḥkhadoṣānudarśanam || 9 ||

पदच्छेद / शब्दार्थ

इन्द्रियार्थेषु: इन्द्रियों के विषयों में; वैराग्यम्: विरक्ति; अनहङ्कार: अहंकार का अभाव; एव: ही; च: और; जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्: जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि और दुःख के दोषों का बार-बार दर्शन

हिंदी अनुवाद

इन्द्रियों के विषयों में वैराग्य, अहंकार का सर्वथा अभाव, तथा जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि और दुःख के दोषों का बार-बार दर्शन –

English Translation

Indifference to the objects of the senses, also absence of egoism, perception of the evil of birth, death, old age, sickness and pain.

टीका / Commentary

ये गुण ज्ञान के अग्रिम साधन हैं – विषयों से विरक्ति और संसार की अनित्यता का भान। These further virtues are detachment from sense objects and awareness of the evils of worldly existence.