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सनातन दिव्य लिरिक्स

जय गणेश जय गणेश देवा आरती (Jai Ganesh Jai Ganesh Deva Aarti) – Lyrics in Hindi

जय गणेश जय गणेश देवा – यह प्रसिद्ध गणेश आरती भगवान गणेश की महिमा का गुणगान करती है। हिंदी लिरिक्स, अर्थ और विशेष जानकारी सहित।

देव: श्री गणेश कुल पाठ: 336 बार

घंटी बजाकर आशीर्वाद लें

आरती दिव्य तरंग (Ambient Temple Chants)

मंदिर घंटियों और ॐ जप के पावन स्वर के साथ आरती का अनुभव करें।

जय श्री गणेश आरति लिरिक्स

🙏 जय गणेश जय गणेश देवा

(Jai Ganesh Jai Ganesh Deva) – प्रसिद्ध गणेश आरती 2026

परंपरागत आरती ॥

📝 आरती विवरण

🎤 परंपरा: सनातन
🏷️ श्रेणी: गणेश आरती / भगवान गणेश
📍 भाव: आस्था, समर्पण, मंगलकामना

📜 आरती लिरिक्स (हिन्दी में)

जय गणेश जय गणेश देवा,
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा।
जय गणेश जय गणेश देवा,
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥

एक दंत दयावंत, चार भुजा धारी,
माथे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी।
एक दंत दयावंत, चार भुजा धारी,
माथे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी॥

अंधन को आँख देत, कोढ़िन को काया,
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया।
अंधन को आँख देत, कोढ़िन को काया,
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥

पान चढ़े फूल चढ़े, और चढ़े मेवा,
लड्डुअन का भोग लगे, संत करें सेवा।
पान चढ़े फूल चढ़े, और चढ़े मेवा,
लड्डुअन का भोग लगे, संत करें सेवा॥

दीनन की लाज रखो, शंभु सुतवारी,
कामना को पूरा करो, जय बलिहारी।
दीनन की लाज रखो, शंभु सुतवारी,
कामना को पूरा करो, जय बलिहारी॥

जय गणेश जय गणेश देवा,
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा।
जय गणेश जय गणेश देवा,
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥

✍️ परंपरागत आरती (सनातन धर्म)

🙏 आरती का अर्थ और संदेश

यह प्रसिद्ध गणेश आरती भगवान गणेश की महिमा का गुणगान करती है। "जय गणेश जय गणेश देवा" – भक्त गणेश जी की जय-जयकार करता है। भगवान गणेश को एक दंत, चार भुजाओं वाला, मूषक वाहन पर विराजमान बताया गया है। वे दयालु हैं, अंधों को आँखें, कोढ़ियों को स्वस्थ शरीर, बांझों को पुत्र और निर्धनों को धन प्रदान करते हैं।

आरती में पान, फूल, मेवा चढ़ाने और लड्डुओं के भोग का वर्णन है। संत और भक्त उनकी सेवा करते हैं। अंत में भक्त प्रार्थना करता है कि हे शंकर के पुत्र, दीन-दुखियों की लाज रखो और हमारी कामनाएँ पूर्ण करो।

यह आरती सभी मंगल कार्यों के आरंभ में गाई जाती है और भक्तों में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है।

🔍 आरती का विशेष महत्त्व

प्रथम पूज्य: भगवान गणेश को सभी देवों में प्रथम पूज्य माना जाता है। इस आरती के माध्यम से भक्त उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

मंगलदायक: यह आरती हर शुभ अवसर पर गाई जाती है, क्योंकि गणेश जी विघ्नहर्ता और मंगलकर्ता हैं।

भक्ति भाव: आरती में वर्णित प्रत्येक पंक्ति भक्त के हृदय से निकली पुकार है, जो गणेश जी से दया और कृपा की याचना करती है।

💖 भक्ति रस का संगम

🎯 संदेश

भगवान गणेश सभी की मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं। सच्चे मन से की गई आरती और प्रार्थना से वे प्रसन्न होते हैं और भक्तों के सभी कष्ट दूर करते हैं।

✨ आस्था का प्रतीक

यह आरती उन सभी भक्तों के लिए प्रेरणा है जो गणेश जी की कृपा से अपने जीवन में सुख-समृद्धि और सफलता चाहते हैं।

🙏 ॐ गं गणपतये नमः ।। श्री गणेशाय नमः ।।

॥ इति श्रीगणेशारती सम्पूर्णम् ॥
॥ जय गणेश जय गणेश देवा ।।

आरती का शास्त्रीय व आध्यात्मिक महत्व

सनातन हिंदू धर्म में देव पूजा की पूर्णता आरती से होती है। आरती शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के शब्द 'आर्त्रिका' से हुई है, जिसका अर्थ होता है विपत्ति का हरण करना या संकट दूर करना। पूजा-पाठ के दौरान होने वाली त्रुटियों और कमियों को दूर करने के लिए पूजा के अंत में आरती करने का विधान शास्त्रों में निर्दिष्ट किया गया है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, आरती की थाली में सजाया गया दीया ईश्वर की दिव्य ज्योति का प्रतीक होता है। थाली में जलने वाली कपूर या घी की बत्तियां हमारे भीतर छुपे अंधकार (अज्ञान) को मिटाकर प्रकाश (ज्ञान) की ओर जाने का प्रतीक हैं। आरती के समय घंटियों और घड़ियाल की ध्वनि से वातावरण शुद्ध होता है तथा नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है।

आरती का वैज्ञानिक दृष्टिकोण

वैज्ञानिक शोध के अनुसार, आरती के दौरान जलने वाले कपूर (Camphor) और घी की सुगंध से वायुमंडल में मौजूद सूक्ष्म कीटाणु नष्ट होते हैं। आरती के समय बजने वाले शंख और तांबे की घंटियों की ध्वनि तरंगें मस्तिष्क को शांत करने और मानसिक तनाव दूर करने में सहायक सिद्ध होती हैं।

आरती करने की सही शास्त्रीय विधि (Aarati Vidhi)

हरिभक्ति विलास ग्रंथ के अनुसार, आरती घुमाने का एक निश्चित चक्र होता है, जिसका पालन अत्यंत आवश्यक है:

प्रथम चरण: चरणों की चार बार आरती आरती की थाली को भगवान के श्री चरणों की ओर सबसे पहले चार बार घुमाना चाहिए। यह समर्पण और नमन का सूचक है।
द्वितीय चरण: नाभि की दो बार आरती इसके बाद भगवान की नाभि की ओर दो बार थाली घुमाई जाती है, जो कि सृष्टि के केंद्र की वंदना मानी गई है।
तृतीय चरण: मुखमंडल की एक बार आरती भगवान के मुखारविंद के सामने एक बार आरती घुमाएं, जिससे उनके सौंदर्य और करुणामय स्वरूप का दर्शन होता है।
चतुर्थ चरण: सम्पूर्ण स्वरूप की सात बार आरती अंत में, भगवान के मस्तक से लेकर चरणों तक, सम्पूर्ण शरीर के चारों ओर चक्राकार रूप में सात बार आरती घुमाई जाती है।

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लेखन एवं संकलन

भक्तिलोक शोध मंडल (Bhaktilok Research Council)

सनातन संप्रदायों के शास्त्रों, भजनों और आरतियों का शोध कर प्रामाणिक पाठ उपलब्ध कराने वाली संस्था।

धार्मिक तथ्य-समीक्षा

डॉ. विकास शास्त्री (Dr. Vikas Shastri)

वैदिक संस्कृति व देव साहित्य के विद्वान। पीएचडी (वैदिक संस्कृत साहित्य)।

संदर्भ-आधारित समीक्षा
अंतिम संशोधन: ०८ अगस्त २०२६ अध्ययन काल: ५ मिनट पढ़ें