द्वादश ज्योतिर्लिंग एवं सप्त मोक्षदायिनी पुरी

श्री काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग दर्शन सम्पूर्ण मार्गदर्शिका

उत्तर प्रदेश की प्राचीन आध्यात्मिक राजधानी वाराणसी में उत्तरवाहिनी पतितपावनी गंगा के तट पर स्थित भगवान त्रिलोचन विश्वेश्वर का पावन धाम। जानिए इसका पौराणिक इतिहास, अहिल्याबाई होल्कर पुनर्निर्माण, ज्ञानवापी रहस्य, ५ प्रहर आरती समय, काशी कॉरिडोर एवं सम्पूर्ण यात्रा मार्गदर्शिका।

महत्व: सप्तम द्वादश ज्योतिर्लिंग
स्थान: वाराणसी (बनारस), उत्तर प्रदेश
संदर्भ-आधारित एवं संपादकीय सामग्री
काशी खंड महात्म्य

"वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे। हिमालये तु केदारं घृष्णेशं च शिवालये॥"

मुख्य आराध्य बाबा विश्वनाथ (विश्वेश्वर)
तीर्थ स्वरूप अविमुक्त महाक्षेत्र (आनंदवन)
स्वर्ण शिखर निर्माता महाराजा रणजीत सिंह (१८३५)
नवीन कॉरिडोर विस्तार ५ लाख वर्ग फीट (गंगा से मंदिर)
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१. काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग परिचय एवं अविमुक्त क्षेत्र का रहस्य

विश्व की प्राचीनतम जीवित आध्यात्मिक नगरियों में मूर्धन्य वाराणसी (काशी) में पतितपावनी मां गंगा के पश्चिमी तट पर विराजमान श्री काशी विश्वनाथ मंदिर द्वादश ज्योतिर्लिंगों में सातवां अत्यंत पूज्य धाम है। इस ज्योतिर्लिंग को 'विश्वेश्वर' अथवा 'विश्वनाथ' (ब्रह्मांड के स्वामी) कहा जाता है।

स्कंद पुराण के 'काशी खंड' के अनुसार, काशी नगरी भगवान शिव के त्रिशूल की नोक पर टिकी हुई है। प्रलय काल में जब संपूर्ण सृष्टि जलमग्न हो जाती है, तब भी भगवान शिव काशी को अपने त्रिशूल पर उठाकर सुरक्षित रखते हैं। भगवान शिव इस भूमि को कभी विमुक्त (त्याग) नहीं करते, इसी कारण इसे 'अविमुक्त क्षेत्र' तथा 'आनंदवन' कहा जाता है।

२. पौराणिक उत्पत्ति कथा: ज्योतिर्लिंग प्राकट्य एवं मोक्ष सिद्धांत

शिव पुराण के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में जब ब्रह्मा और विष्णु जी के मध्य अपनी-अपनी श्रेष्ठता को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ, तब उनके मध्य एक अनंत, प्रकाशमान और आदि-अंत से रहित 'अग्नि स्तंभ' (ज्योतिर्लिंग) प्रकट हुआ।

ब्रह्मा जी हंस रूप धारण कर उस स्तंभ का ऊपरी छोर खोजने ऊपर गए और भगवान विष्णु वराह रूप धरकर नीचे पाताल की ओर गए। हजारों वर्षों के अन्वेषण के पश्चात भी दोनों इसका अंत न पा सके। तब ज्योतिर्लिंग के मध्य से साक्षात भगवान शिव प्रकट हुए और दोनों देवताओं को सत्य का बोध कराया। पृथ्वी पर उस ज्योतिर्मय स्तंभ का सर्वप्रथम और शाश्वत अंश काशी में विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।

"काशी मरणान्मुक्तिः — अर्थात काशी में प्राण त्यागने वाले किसी भी प्राणी के कान में स्वयं भगवान शिव 'तारक मंत्र' (राम नाम) फूंकते हैं, जिससे वह जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करता है।" — स्कंद पुराण, काशी खंड

३. ऐतिहासिक कालखंड: विध्वंस एवं अहिल्याबाई होल्कर का पुनरुद्धार

काशी विश्वनाथ मंदिर ने इतिहास में आक्रांताओं के अनेक भीषण प्रहार झेले हैं:

  • ११९४ ईस्वी: कुतुबुद्दीन ऐबक की सेना ने प्राचीन मंदिर को तोड़ा, जिसे बाद में स्थानीय गुजरात के व्यापारी ने पुनः बनवाया।
  • १५८५ ईस्वी: राजा टोडरमल और नारायण भट्ट के प्रयासों से मंदिर का भव्य जीर्णोद्धार हुआ।
  • १६६९ ईस्वी: मुगल शासक औरंगजेब ने मूल मंदिर को ध्वस्त कर दिया। उस समय मंदिर के मुख्य पुजारी ने ज्योतिर्लिंग की रक्षा हेतु उसे पास के ज्ञानवापी कूप में सुरक्षित स्थापित कर दिया।
  • १७८० ईस्वी (अहिल्याबाई होल्कर): इंदौर की धर्मपरायण महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने वर्तमान मंदिर का भव्य निर्माण कराया, जो आज भी मुख्य गर्भगृह के रूप में प्रतिष्ठित है।
  • १८३५ ईस्वी (स्वर्ण शिखर): पंजाब केसरी महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर के दोनों विशाल शिखरों को मढ़ने के लिए लगभग १ टन (८५० किग्रा) शुद्ध सोना दान में दिया था।
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४. ज्ञानवापी कूप एवं नंदी विग्रह का ऐतिहासिक तथ्य

मंदिर परिसर में स्थित ज्ञानवापी कूप (Well of Knowledge) का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। स्कंद पुराण के अनुसार, स्वयं भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से इस कूप का जल प्रकट किया था। १६६९ के आक्रमण के समय ज्योतिर्लिंग को इसी कूप में सुरक्षित रखा गया था।

परिसर में स्थापित विशाल पाषाण नंदी का मुख ज्ञानवापी की ओर है, जो इस बात का पौराणिक प्रमाण है कि मूल गर्भगृह उसी दिशा में स्थित था।

५. भव्य 'श्री काशी विश्वनाथ धाम' (कॉरिडोर)

१३ दिसंबर २०२१ को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उद्घाटित 'श्री काशी विश्वनाथ धाम' ने काशी के स्वरूप को ऐतिहासिक रूप से भव्य और सुगम बना दिया है। पहले मंदिर तंग गलियों में लगभग ३,००० वर्ग फीट में सीमित था, जो अब ५ लाख वर्ग फीट के विशाल परिसर में परिवर्तित हो चुका है।

इस परियोजना की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि यह गंगा नदी के ललिता घाट और मणिकर्णिका घाट से सीधे मुख्य मंदिर गर्भगृह को जोड़ती है। अब तीर्थयात्री गंगा स्नान कर हाथ में गंगाजल लेकर बिना किसी संकरी गली में भटके सीधे बाबा विश्वनाथ के दरबार में जलाभिषेक हेतु पहुँच सकते हैं।

६. दैनिक दर्शन एवं ५ प्रहर की आरती समय सारणी

काशी विश्वनाथ मंदिर में दिनभर में ५ विशेष प्रहर की आरतियां संपन्न होती हैं, जिनमें सम्मिलित होना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है:

आरती का नाम समय धार्मिक महत्व एवं विधान
१. मंगला आरती (Mangala Aarti) प्रातः ०३:०० से ०४:०० बजे सर्वप्रथम ब्रह्ममुहूर्त में पट खोलने व देव जागरण आरती
२. मध्याह्न भोग आरती (Bhog Aarti) दोपहर ११:१५ से १२:२० बजे दोपहर का राजभोग एवं नैवेद्य समर्पण
३. सप्तऋषि आरती (Saptarishi Aarti) सायं ०७:०० से ०८:१५ बजे सात विद्वान ब्राह्मणों द्वारा एक साथ की जाने वाली दिव्य वैदिक आरती
४. श्रृंगार / भोग आरती रात्रि ०९:०० से १०:१५ बजे भगवान का अलौकिक पुष्प व चंदन श्रृंगार
५. शयन आरती (Shayan Aarti) रात्रि १०:३० से ११:०० बजे कपूर आरती एवं रात्रि शयन कपाट बंद

७. काशी यात्रा के अनिवार्य सहयोगी तीर्थ

  • बाबा काल भैरव (काशी के कोतवाल): काशी विश्वनाथ दर्शन के बाद काल भैरव मंदिर जाना अनिवार्य है। मान्यता है कि उनकी अनुमति के बिना काशी यात्रा निष्फल मानी जाती है।
  • माँ अन्नपूर्णा मंदिर: विश्वनाथ मंदिर के ठीक समीप स्थित। यहाँ माँ अन्नपूर्णा की कृपा से काशी में कोई भूखा नहीं सोता।
  • साक्षी विनायक मंदिर: भगवान गणेश जी का वह मंदिर जो भक्त की काशी यात्रा का साक्ष्य (गवाही) महादेव के समक्ष प्रस्तुत करते हैं।
  • मणिकर्णिका एवं दशाश्वमेध घाट: संध्याकालीन विश्वप्रसिद्ध भव्य दशाश्वमेध गंगा आरती का अनुभव काशी यात्रा का चरम आनंद है।

८. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

श्री काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट के आधिकारिक पोर्टल (shrikashivishwanath.org) के माध्यम से मंगला आरती, सुगम दर्शन (VIP Darshan), रुद्राभिषेक और महामृत्युंजय जप की बुकिंग ऑनलाइन की जा सकती है।

सामान्य दिनों में प्रातः मंगला आरती के बाद एवं दोपहर के समय निर्धारित समयावधि में श्रद्धालु गर्भगृह में जाकर शिवलिंग का स्पर्श एवं जलाभिषेक कर सकते हैं। अत्यधिक भीड़ या विशेष पर्वों (सावन, महाशिवरात्रि) पर केवल झांकी दर्शन की व्यवस्था रहती है।

वाराणसी जंक्शन (कैंट - ४ किमी) और बनारस रेलवे स्टेशन (मंडुआडीह - ५ किमी) देश के सभी प्रमुख शहरों से जुड़े हैं। निकटतम लाल बहादुर शास्त्री अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा (बाबतपुर - २५ किमी) पर स्थित है।
संकलन व शोध: भक्तिलोक तीर्थ शोध मंडल धार्मिक तथ्य-समीक्षा: वैदिक एवं पौराणिक संदर्भ-आधारित समीक्षा
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