ॐ जय शिव ओंकारा आरती (Om Jai Shiv Omkara Aarti) – Lyrics in Hindi
पढिए प्रसिद्ध शिव आरती 'ॐ जय शिव ओंकारा' हिंदी लिरिक्स और अर्थ के साथ। भगवान शिव की कृपा प्राप्ति के लिए यह आरती अत्यंत प्रभावशाली मानी जाती है।
भक्तिलोक पर भगवान श्री शिव जी की समस्त पावन आरतियों, नित्य वंदना, राग-ताल, शास्त्रीय विधि, सरल भावार्थ एवं प्रामाणिक हिंदी लिरिक्स का संपूर्ण संकलन।
शुद्ध पाठ, राग-ताल, शास्त्रीय विधि और सरल भावार्थ सहित आरती संग्रह।
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भगवान शिव के महामृत्युंजय स्वरूप की अराधना और 'ॐ जय महामृत्युंजय देवा' आरती के संपूर्ण बोल, भावार्थ तथा पूजा विधि का विस्तृत मार्गदर्शिका।
भगवान शिव की अत्यंत लोकप्रिय आरती 'ॐ जय शिव ओंकारा' के संपूर्ण बोल, भावार्थ, राग और आरती करने की शास्त्रीय विधि की विस्तृत जानकारी।
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भगवान शिव के स्वरूप भुवनेश्वर महादेव की इस पवित्र आरती के संपूर्ण बोल, विस्तृत भावार्थ और शास्त्रीय पूजा विधि के साथ आध्यात्मिक लाभ जानें।
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भगवान शिव के दसवें ज्योतिर्लिंग श्री नागेश्वर की पावन आरती का संपूर्ण संकलन, भावार्थ, पूजा विधि और इसके आध्यात्मिक महत्व की विस्तृत जानकारी।
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भगवान विष्णु (हरि) और भगवान शिव (हर) के संयुक्त स्वरूप 'हरिहर' की इस दिव्य आरती में जगत के पालन और संहार की शक्ति समाहित है। संपूर्ण बोल और भावार्थ पढ़ें।
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भगवान शिव के त्रैलोक्य स्वामी रूप 'श्री भुवनेश्वर महादेव' की पावन आरती। यहाँ पढ़ें संपूर्ण बोल, विस्तृत भावार्थ, पूजा विधि, आवश्यक सामग्री और इसके अलौकिक आध्यात्मिक लाभ।
समस्त त्रिभुवन के स्वामी देवाधिदेव भगवान भुवनेश्वर की यह पावन आरती असीम शांति, सुख-समृद्धि और मोक्ष प्रदान करने वाली है। यहाँ पढ़ें आरती के संपूर्ण बोल, विस्तृत भावार्थ और शास्त्रीय विधि।
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सनातन हिंदू धर्म में आरती की परंपरा अत्यंत प्राचीन, पावन और फलदायी मानी गई है। 'आरती' शब्द संस्कृत के 'आरात्रिक' शब्द से उत्पन्न हुआ है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है — 'रात्रि या अंधकार को दूर करने वाला दिव्य प्रकाश'। भगवान श्री शिव की नित्य पूजा-अर्चना के समापन पर जब कपूर अथवा शुद्ध देसी घी के पंचमुखी दीपक से आरती की जाती है, तो वह भक्त के हृदय से अज्ञान, भय, और नकारात्मकता के अंधकार को समाप्त कर ज्ञान और भक्ति का दिव्य प्रकाश भर देती है।
"दीपज्योतिः परब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः। दीपो हरतु मे पापं दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते॥"
अर्थात्: दीपक की ज्योति साक्षात् परब्रह्म और भगवान जनार्दन का स्वरूप है। हे दिव्य ज्योति! आप हमारे समस्त पापों, संतापों और विघ्नों का हरण करें।
आरती करते समय कुछ विशेष शास्त्रीय नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक बताया गया है ताकि पूजा का पूर्ण फल प्राप्त हो सके:
आरती के दौरान शंख, घंटा और घड़ियाल बजाने की सुदीर्घ परंपरा है। स्कंद पुराण के अनुसार, घंटी की ध्वनि से निकलने वाली तरंगे वातावरण में उपस्थित नकारात्मक ऊर्जा, विषाणुओं और तामसिक शक्तियों को नष्ट करती हैं। इसके साथ ही जब भक्त एकाग्र होकर आरती का सामूहिक गान करते हैं, तो मंदिर अथवा गृह प्रांगण में सकारात्मक प्राण ऊर्जा (Positive Vibrations) का संचार होता है।
आरती संपन्न होने के उपरांत आरती की थाली को जल के छींटों से शांत (आचमन) किया जाता है। इसके पश्चात दोनों हाथों की हथेलियों को दीपक की ज्योति के ऊपर हल्के से घुमाकर अपने मस्तक, नेत्रों और हृदय पर लगाया जाता है। इसे 'आरती का तेज ग्रहण करना' कहा जाता है, जिससे अंतःकरण पवित्र और प्रफुल्लित होता है।
प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।