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सनातन देव स्तुति

शिव आरतियाँ

भगवान श्री शिव जी की कृपा पाने और दैनिक पूजा संपन्न करने के लिए यहाँ उनके सभी लोकप्रिय आरती, चालीसा पाठ और मंत्रों का संकलन दिया गया है। श्रद्धापूर्वक आरती गान करें और सुख-समृद्धि पाएं।

आराध्य: श्री शिव आरतियाँ: 1 पाठ: असीमित

घंटी बजाकर आशीर्वाद लें

आरती दिव्य तरंग (Ambient Temple Chants)

मंदिर घंटियों और ॐ जप के पावन स्वर के साथ आरती का अनुभव करें।

शिव आरतियाँ फ़िल्टर

शिव

ॐ जय शिव ओंकारा आरती (Om Jai Shiv Omkara Aarti) – Lyrics in Hindi

ॐ जय शिव ओंकारा – यह प्रसिद्ध शिव आरती भगवान शिव की महिमा का गुणगान करती है। हिंदी लिरिक्स, अर्थ और विशेष जानकारी सहित।

आरती का शास्त्रीय व आध्यात्मिक महत्व

सनातन हिंदू धर्म में देव पूजा की पूर्णता आरती से होती. आरती शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के शब्द 'आर्त्रिका' से हुई है, जिसका अर्थ होता है विपत्ति का हरण करना या संकट दूर करना। पूजा-पाठ के दौरान होने वाली त्रुटियों और कमियों को दूर करने के लिए पूजा के अंत में आरती करने का विधान शास्त्रों में निर्दिष्ट किया गया है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, आरती की थाली में सजाया गया दीया ईश्वर की दिव्य ज्योति का प्रतीक होता है। थाली में जलने वाली कपूर या घी की बत्तियां हमारे भीतर छुपे अंधकार (अज्ञान) को मिटाकर प्रकाश (ज्ञान) की ओर जाने का प्रतीक हैं। आरती के समय घंटियों और घड़ियाल की ध्वनि से वातावरण शुद्ध होता है तथा नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है।

आरती का वैज्ञानिक दृष्टिकोण

वैज्ञानिक शोध के अनुसार, आरती के दौरान जलने वाले कपूर (Camphor) और घी की सुगंध से वायुमंडल में मौजूद सूक्ष्म कीटाणु नष्ट होते हैं। आरती के समय बजने वाले शंख और तांबे की घंटियों की ध्वनि तरंगें मस्तिष्क को शांत करने और मानसिक तनाव दूर करने में सहायक सिद्ध होती हैं।

आरती करने की सही शास्त्रीय विधि (Aarati Vidhi)

हरिभक्ति विलास ग्रंथ के अनुसार, आरती घुमाने का एक निश्चित चक्र होता है, जिसका पालन अत्यंत आवश्यक है:

प्रथम चरण: चरणों की चार बार आरती आरती की थाली को भगवान के श्री चरणों की ओर सबसे पहले चार बार घुमाना चाहिए। यह समर्पण और नमन का सूचक है।
द्वितीय चरण: नाभि की दो बार आरती इसके बाद भगवान की नाभि की ओर दो बार थाली घुमाई जाती है, जो कि सृष्टि के केंद्र की वंदना मानी गई है।
तृतीय चरण: मुखमंडल की एक बार आरती भगवान के मुखारविंद के सामने एक बार आरती घुमाएं, जिससे उनके सौंदर्य और करुणामय स्वरूप का दर्शन होता है।
चतुर्थ चरण: सम्पूर्ण स्वरूप की सात बार आरती अंत में, भगवान के मस्तक से लेकर चरणों तक, सम्पूर्ण शरीर के चारों ओर चक्राकार रूप में सात बार आरती घुमाई जाती है।

आरती सम्बन्धी प्रमुख प्रश्न (FAQs)

शास्त्रों के अनुसार, पूजा-पाठ में यदि कोई विधि-विधान की कमी या मंत्रोच्चारण में त्रुटि रह गई हो, तो अंत में श्रद्धापूर्वक आरती कर लेने से पूजा पूरी मानी जाती है।

आरती हमेशा सीधे हाथ (दाएं हाथ) से करनी चाहिए। आरती करते समय शरीर में विनम्रता का भाव होना चाहिए और शांत चित्त से देव मंत्र या आरती गान करना चाहिए।

कपूर को हिंदू धर्म में बहुत पवित्र माना गया है। कपूर बिना कोई अवशेष छोड़े पूर्णत: जल जाता है, जो हमारी अहंकार शून्यता का प्रतीक है। हालांकि, घी की बत्ती से भी आरती की जा सकती है।

आरती करने के बाद थाली के चारों ओर जल घुमाकर आचमन किया जाता है। माना जाता है कि ऐसा करने से आरती की पवित्र अग्नि शांत होती है और उसे शीतलता मिलती है।

संपादकीय विश्वसनीयता एवं समीक्षा जानकारी

लेखन एवं संकलन

भक्तिलोक शोध मंडल (Bhaktilok Research Council)

सनातन संप्रदायों के शास्त्रों, भजनों और आरतियों का शोध कर प्रामाणिक पाठ उपलब्ध कराने वाली संस्था।

धार्मिक तथ्य-समीक्षा

डॉ. विकास शास्त्री (Dr. Vikas Shastri)

वैदिक संस्कृति व देव साहित्य के विद्वान। पीएचडी (वैदिक संस्कृत साहित्य)।

संदर्भ-आधारित समीक्षा
अंतिम संशोधन: ०८ अगस्त २०२६ अध्ययन काल: ५ मिनट पढ़ें