जय गणेश जय गणेश देवा आरती (Jai Ganesh Jai Ganesh Deva Aarti) – Lyrics in Hindi
जय गणेश जय गणेश देवा आरती के बोल हिंदी में पढ़ें। भगवान गणेश की यह प्रसिद्ध आरती संकट मोचन और मंगलकारी मानी जाती है। संदर्भ एवं व्याख्या सहित संपूर्ण पाठ यहाँ देखें।
भक्तिलोक पर भगवान श्री गणेश जी की समस्त पावन आरतियों, नित्य वंदना, राग-ताल, शास्त्रीय विधि, सरल भावार्थ एवं प्रामाणिक हिंदी लिरिक्स का संपूर्ण संकलन।
शुद्ध पाठ, राग-ताल, शास्त्रीय विधि और सरल भावार्थ सहित आरती संग्रह।
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भगवान श्री गणेश जी की अत्यंत लोकप्रिय आरती 'जय गणेश जय गणेश देवा माता जाकी पार्वती पिता महादेवा' के सम्पूर्ण बोल, विस्तृत भावार्थ और पूजन नियमों का प्रामाणिक संकलन।
श्री गणेश भगवान की पावन आरती 'जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा' के संपूर्ण बोल, विस्तृत भावार्थ, पूजा विधि और इसके अलौकिक आध्यात्मिक महत्व को यहाँ पढ़ें।
श्री संकटनाशन गणेश आरती और स्तोत्र के संपूर्ण बोल, भावार्थ, नियम और पूजा विधि की विस्तृत मार्गदर्शिका। भगवान गणेश जी की कृपा प्राप्ति का अनुपम साधन।
सनातन संस्कृति में प्रथम आराध्य भगवान श्री गणेश जी की सर्वप्रसिद्ध आरती 'जय गणेश जय गणेश देवा माता जाकी पार्वती पिता महादेवा' के सम्पूर्ण प्रामाणिक बोल, विस्तृत भावार्थ, इतिहास और पूजन विधान का संपूर्ण संग्रह।
श्री वरद विनायक की पावन आरती भगवान गणेश के अष्टविनायक रूपों में से एक को समर्पित है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में आरती के संपूर्ण बोल, भावार्थ, और पूजा विधि का वर्णन है।
श्री वरद विनायक जी की आरती (ॐ जय वरद विनायक) के संपूर्ण बोल, सरल हिंदी भावार्थ, अष्टविनायक महत्व और शास्त्रीय पूजा विधि का विस्तृत मार्गदर्शन।
श्री वरदविनायक जी की पावन आरती 'ॐ जय वरदविनायक देवा' के संपूर्ण बोल, सरल हिंदी भावार्थ, पूजा विधि और इसके अलौकिक आध्यात्मिक महत्व की विस्तृत जानकारी।
श्री विनायक चतुर्थी के पावन अवसर पर प्रस्तुत है भगवान श्री गणेश की सबसे लोकप्रिय और प्रसिद्ध आरती 'सुखकर्ता दुखहर्ता वार्ता विघ्नाची' के संपूर्ण बोल, भावार्थ और पूजा विधि का विस्तृत मार्गदर्शन।
सनातन हिंदू धर्म में आरती की परंपरा अत्यंत प्राचीन, पावन और फलदायी मानी गई है। 'आरती' शब्द संस्कृत के 'आरात्रिक' शब्द से उत्पन्न हुआ है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है — 'रात्रि या अंधकार को दूर करने वाला दिव्य प्रकाश'। भगवान श्री गणेश की नित्य पूजा-अर्चना के समापन पर जब कपूर अथवा शुद्ध देसी घी के पंचमुखी दीपक से आरती की जाती है, तो वह भक्त के हृदय से अज्ञान, भय, और नकारात्मकता के अंधकार को समाप्त कर ज्ञान और भक्ति का दिव्य प्रकाश भर देती है।
"दीपज्योतिः परब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः। दीपो हरतु मे पापं दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते॥"
अर्थात्: दीपक की ज्योति साक्षात् परब्रह्म और भगवान जनार्दन का स्वरूप है। हे दिव्य ज्योति! आप हमारे समस्त पापों, संतापों और विघ्नों का हरण करें।
आरती करते समय कुछ विशेष शास्त्रीय नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक बताया गया है ताकि पूजा का पूर्ण फल प्राप्त हो सके:
आरती के दौरान शंख, घंटा और घड़ियाल बजाने की सुदीर्घ परंपरा है। स्कंद पुराण के अनुसार, घंटी की ध्वनि से निकलने वाली तरंगे वातावरण में उपस्थित नकारात्मक ऊर्जा, विषाणुओं और तामसिक शक्तियों को नष्ट करती हैं। इसके साथ ही जब भक्त एकाग्र होकर आरती का सामूहिक गान करते हैं, तो मंदिर अथवा गृह प्रांगण में सकारात्मक प्राण ऊर्जा (Positive Vibrations) का संचार होता है।
आरती संपन्न होने के उपरांत आरती की थाली को जल के छींटों से शांत (आचमन) किया जाता है। इसके पश्चात दोनों हाथों की हथेलियों को दीपक की ज्योति के ऊपर हल्के से घुमाकर अपने मस्तक, नेत्रों और हृदय पर लगाया जाता है। इसे 'आरती का तेज ग्रहण करना' कहा जाता है, जिससे अंतःकरण पवित्र और प्रफुल्लित होता है।
प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।