॥ श्री संकटनाशन गणेश आरती - संकटनाशन गणेश स्तोत्र व आरती: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★हिन्दू सनातन संस्कृति में भगवान श्री गणेश को 'प्रथमे पूज्य', 'विघ्नहर्ता' और 'मंगलमूर्ति' के रूप में पूजा जाता है। किसी भी शुभ कार्य, अनुष्ठान, यज्ञ या पूजा की शुरुआत श्री गणेश के आह्वान के बिना पूर्ण नहीं मानी जाती है। भगवान गणेश न केवल विघ्नों का नाश करते हैं, बल्कि अपने भक्तों को बुद्धि, विवेक, रिद्धि-सिद्धि और सुख-समृद्धि का वरदान भी प्रदान करते हैं। जब भक्त जीवन के किसी गंभीर संकट, बाधा या वित्तीय संकट से घिर जाता है, तब 'श्री संकटनाशन गणेश आरती' और 'संकटनाशन गणेश स्तोत्र' का पाठ एवं गान सूर्य के समान अंधकार को चीरकर प्रकाश लाने का कार्य करता है। Bhaktilok.in के इस पावन लेख में हम श्री संकटनाशन गणेश आरती के संपूर्ण बोल, उसका सरल हिंदी भावार्थ, पूजा की विधि, आवश्यक सामग्री और इसके अनंत आध्यात्मिक एवं ज्योतिषीय लाभों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा, माता जाकी पार्वती पिता महादेवा। एकदंत दयावन्त चार भुजा धारी, मस्तक सिंदूर सोहे मूस की सवारी। जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा... अंधन को आँख देत कोढ़िन को काया, बांझन को पुत्र देत निर्धन को माया। सूर्य सहन सिंगार नयनन में पानी, जय गणेश कहत सब गुन की कहानी। जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा... पान चढ़े फूल चढ़े और चढ़े मेवा, लड्डुअन का भोग लगे संत करें सेवा। दीनन की लाज रखो शंभु सुत वारी, कामना को पूर्ण करो जाऊं बलिहारी। जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा... संकट नाशन गणेश स्तोत्र नित गावै, जो जन ध्यावै फल मनवांछित पावै। उठत सवेरे जो नर पूजा पाठ लावै, संकट सब भागे रिद्धि सिद्धि घर आवै। जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा, माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
श्री गणेश की इस पावन आरती का प्रत्येक शब्द भगवान की महिमा और उनके करुणामयी स्वरूप का बखान करता है। आइए इसके गहन आध्यात्मिक भावार्थ को समझते हैं:
- जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा, माता जाकी पार्वती पिता महादेवा: हे गणेश देव! आपकी जय हो, आपकी जय हो। आपकी माता आदि शक्ति माँ पार्वती हैं और आपके पिता देवों के देव महादेव (भगवान शिव) हैं, आप ऐसे महान कुल के स्वामी हैं।
- एकदंत दयावन्त चार भुजा धारी, मस्तक सिंदूर सोहे मूस की सवारी: हे एकदंत (जिनका एक दाँत टूटा हुआ है और दूसरा अखंड है), अत्यंत दयालु और चार भुजाओं वाले प्रभु! आपके मस्तक पर लाल सिंदूर सुशोभित है और आप चंचल मूषक (चूहा) की सवारी करते हैं।
- अंधन को आँख देत कोढ़िन को काया, बांझन को पुत्र देत निर्धन को माया: हे दीनबंधु! आप दृष्टिहीनों को दृष्टि प्रदान करते हैं, रोगियों को स्वस्थ काया देते हैं, निसंतान को संतान सुख और दरिद्र को धन-धान्य की अपार माया प्रदान करते हैं।
- पान चढ़े फूल चढ़े और चढ़े मेवा,ड्डुअन का भोग लगे संत करें सेवा: आपके दरबार में भक्तजन श्रद्धा से पान, पुष्प और मेवे अर्पित करते हैं। आपको मोदक (लड्डू) अति प्रिय है जिसका भोग लगाया जाता है और संत-महात्मा आपकी सेवा में लीन रहते हैं।
- दीनन की लाज रखो शंभु सुत वारी, कामना को पूर्ण करो जाऊं बलिहारी: हे भगवान शिव के पुत्र (शंभु सुत)! हम दीनों की लाज रखना। हमारी सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करो, हम आप पर बलिहारी जाते हैं।
- संकट नाशन गणेश स्तोत्र नित गावै...: जो मनुष्य नित्यप्रति इस संकट नाशन गणेश स्तोत्र और आरती का गान करता है, उसके जीवन के सभी संकट भाग जाते हैं और उसके घर में रिद्धि-सिद्धि का स्थायी वास होता है।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
हिन्दू पौराणिक ग्रंथों, विशेषकर मुदगल पुराण, गणेश पुराण और शिव पुराण में भगवान गणेश की उपासना को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। 'संकटनाशन' शब्द का शाब्दिक अर्थ है—संकटों का नाश करने वाला। जीवन में जब मार्ग न सूझ रहा हो, शत्रुओं का भय हो, व्यापार में भारी घाटा हो रहा हो या पारिवारिक अशांति हो, तब श्री संकटनाशन गणेश आरती और स्तोत्र का पाठ अचूक औषधि का काम करता है।
शास्त्रों के अनुसार, देवर्षि नारद द्वारा रचित 'संकटनाशन गणेश स्तोत्र' के पठन से महर्षि वेद व्यास ने महाभारत ग्रंथ की रचना को सुगम बनाया था। भगवान गणेश विघ्नहर्ता हैं। जब भक्त संध्याकाल में या प्रातःकाल स्नान करके विधि-विधान से गणेश जी की आरती उतारता है, तो वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा (Positive Energy) का संचार होता है। आरती की लौ नकारात्मक शक्तियों, बुरी नजर और अदृश्य बाधाओं को दूर भगाती है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
किसी भी देवाराधन की पूर्णता के लिए सही विधि और नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है। गणेश आरती के लिए निम्नलिखित चरणों का पालन करें:
- शुद्धता एवं स्नान: प्रातःकाल ब्रह्म बेला में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र (विशेषकर पीले या लाल रंग के वस्त्र) धारण करें।
- स्थान की शुद्धि: पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें। एक चौकी पर लाल या पीला आसन बिछाकर श्री गणेश की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
- षोडशोपचार पूजा: गणेश जी को दूर्वा (घास की तीन या पांच गांठें) अत्यंत प्रिय है। उन्हें सिंदूर, अक्षत (चावल), फूल, जनेऊ, मोदक या लड्डू का भोग अर्पित करें।
- धूप-दीप प्रज्वलन: घी का दीपक और धूपबत्ती जलाकर गणेश जी के समक्ष रखें।
- आरती गान: ताली बजाते हुए, घंटी और शंख की ध्वनि के साथ सस्वर भावपूर्ण 'जय गणेश जय गणेश' आरती गाएं। आरती के पश्चात कपूर प्रज्वलित कर आरती की थाली को भगवान के चरणों से लेकर सिर तक गोलाकार घुमाएं।
आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)
आरती को विधिपूर्वक संपन्न करने के लिए निम्नलिखित पूजन सामग्री का होना अनिवार्य है:
- पूजा की थाल: तांबे, पीतल या चांदी की स्वच्छ थाली।
- दीप (दीपक): गाय के शुद्ध घी का दीपक या तिल के तेल का दीपक।
- कपूर: शुद्ध भीमसेनी कपूर आरती को प्रज्वलित करने के लिए।
- घंटी और शंख: नकारात्मक ऊर्जा को दूर भगाने और सकारात्मक ऊर्जा के आह्वान हेतु।
- पुष्प और दूर्वा: ताजे फूल और ताजी हरी दूर्वा घास।
- नैवेद्य: मोदक, बेसन के लड्डू या बूंदी के लड्डू।
- रोली और अक्षत: तिलक लगाने हेतु लाल चन्दन/रोली और अखंड चावल।
राग, ताल एवं गायन समय
संगीत की दृष्टि से श्री संकटनाशन गणेश आरती को 'राग कल्याण' या 'राग यमन' की धुनों में गाना अत्यंत फलदायी माना जाता है। यह राग मन को शांति और एकाग्रता प्रदान करता है।
- गायन समय: प्रातःकाल (सूर्योदय के समय) या प्रदोष काल (संध्या के समय) आरती करना श्रेष्ठ माना गया है।
- ताल: कहहरवा ताल (८ मात्रा) या दादरा ताल (६ मात्रा) में इस आरती को आसानी से लयबद्ध रूप से गाया जा सकता है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
श्री संकटनाशन गणेश आरती का नियमित पाठ करने वाले साधक को निम्नलिखित अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- विघ्ननाश: जीवन के तमाम अदृश्य और दृश्य विघ्न स्वतः समाप्त हो जाते हैं।
- बुद्धि एवं विद्या में वृद्धि: विद्यार्थियों के लिए यह आरती स्मरण शक्ति और बुद्धि को तीव्र करती है।
- आर्थिक समृद्धि: कर्ज के बोझ से दबे व्यक्तियों को नए मार्ग मिलते हैं और धन-धान्य की प्राप्ति होती है।
- ग्रह शांति: कुंडली में केतु दोष और गणेश आराधना से जुड़े अन्य ज्योतिषीय दुष्प्रभावों का शमन होता है।