श्री गंगा जी की आरती - ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि
सनातन संस्कृति में माँ गंगा को लोकमाता, पापमोचनी और मोक्षदायिनी कहा गया है। 'ॐ जय गंगे माता' आरती के संपूर्ण बोल, भावार्थ और विधि सहित भक्तिमय मार्गदर्शिका।
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गंगा दशहरा के पावन पर्व पर माँ गंगा की पवित्र आरती 'ॐ जय गंगे सुरतरंगिणी' के संपूर्ण बोल, विस्तृत भावार्थ और शास्त्रीय पूजा विधि का आनंद लें।
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सनातन संस्कृति में माँ गंगा को केवल एक नदी नहीं, बल्कि मोक्षदायिनी, पतितपावनी और साक्षात देवी के रूप में पूजा जाता है। यहाँ पढ़ें श्री गंगा मैया की पावन आरती के संपूर्ण बोल और विस्तृत भावार्थ।
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सनातन हिंदू धर्म में आरती की परंपरा अत्यंत प्राचीन, पावन और फलदायी मानी गई है। 'आरती' शब्द संस्कृत के 'आरात्रिक' शब्द से उत्पन्न हुआ है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है — 'रात्रि या अंधकार को दूर करने वाला दिव्य प्रकाश'। भगवान श्री माँ गंगा की नित्य पूजा-अर्चना के समापन पर जब कपूर अथवा शुद्ध देसी घी के पंचमुखी दीपक से आरती की जाती है, तो वह भक्त के हृदय से अज्ञान, भय, और नकारात्मकता के अंधकार को समाप्त कर ज्ञान और भक्ति का दिव्य प्रकाश भर देती है।
"दीपज्योतिः परब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः। दीपो हरतु मे पापं दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते॥"
अर्थात्: दीपक की ज्योति साक्षात् परब्रह्म और भगवान जनार्दन का स्वरूप है। हे दिव्य ज्योति! आप हमारे समस्त पापों, संतापों और विघ्नों का हरण करें।
आरती करते समय कुछ विशेष शास्त्रीय नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक बताया गया है ताकि पूजा का पूर्ण फल प्राप्त हो सके:
आरती के दौरान शंख, घंटा और घड़ियाल बजाने की सुदीर्घ परंपरा है। स्कंद पुराण के अनुसार, घंटी की ध्वनि से निकलने वाली तरंगे वातावरण में उपस्थित नकारात्मक ऊर्जा, विषाणुओं और तामसिक शक्तियों को नष्ट करती हैं। इसके साथ ही जब भक्त एकाग्र होकर आरती का सामूहिक गान करते हैं, तो मंदिर अथवा गृह प्रांगण में सकारात्मक प्राण ऊर्जा (Positive Vibrations) का संचार होता है।
आरती संपन्न होने के उपरांत आरती की थाली को जल के छींटों से शांत (आचमन) किया जाता है। इसके पश्चात दोनों हाथों की हथेलियों को दीपक की ज्योति के ऊपर हल्के से घुमाकर अपने मस्तक, नेत्रों और हृदय पर लगाया जाता है। इसे 'आरती का तेज ग्रहण करना' कहा जाता है, जिससे अंतःकरण पवित्र और प्रफुल्लित होता है।
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