पावन आरती संग्रह · स्तुति पाठ
श्री माँ गंगा आरती
30 पाठ

श्री गंगा जी की आरती - ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग कल्याण / यमन शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Suraj.Kumar.Bind रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री गंगा जी की आरती - ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति में माँ गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि हमारी आराध्य, लोकमाता और मोक्षदायिनी हैं। पुराणों के अनुसार, माँ गंगा का अवतरण स्वर्ग से पृथ्वी पर राजा भगीरथ के कठिन तप के फलस्वरूप हुआ था, ताकि उनके पूर्वजों का उद्धार हो सके। गंगोत्री से लेकर सागर तक बहने वाली यह पवित्र धारा करोड़ों सनातनियों के पापों का शमन करती है। संध्याकाल में गंगा तट पर होने वाली अलौकिक महाआरती और दैनिक जीवन में 'ॐ जय गंगे माता' आरती का गान साधक को असीम शांति, शुद्धि और परम चेतना की प्राप्ति कराता है। यह विस्तृत मार्गदर्शिका आपको माँ गंगा की आरती के संपूर्ण बोल, गहन भावार्थ, शास्त्रीय पूजा विधि और आध्यात्मिक रहस्यों से अवगत कराएगी।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल

ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता।
जो नर तुमको ध्यावत, मनवांछित फल पावत॥ ॐ जय गंगे माता॥

चन्द्र सी ज्योति तुम्हारी, जल निर्मल आता। शरण पड़ूं मैं तेरी, तो पातक मिट जाता॥ ॐ जय गंगे माता॥

पुत्र सगर के तारे, सब जग को ज्ञाता।
कृपा दृष्टि तुम्हारी, त्रिभुवन के पाता॥ ॐ जय गंगे माता॥

एक बार जो तेरी, जो शरण आ जाता।
यम के त्रास मिटाकर, परमधाम को जाता॥ ॐ जय गंगे माता॥

कमल समान तुम्हारा, जल अति सुखदाता।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करता॥ ॐ जय गंगे माता॥

मैया की आरती जो, कोई नर गावत।
कहें शिवानन्द स्वामी, मनवांछित फल पावत॥ ॐ जय गंगे माता॥

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

माँ गंगा की यह आरती अत्यंत सरल होने के साथ-साथ गंभीर आध्यात्मिक रहस्यों से परिपूर्ण है। इसके प्रत्येक शब्द में माँ के प्रति अगाध श्रद्धा और समर्पण छिपा है।

प्रथम पद का भाव: 'ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता। जो नर तुमको ध्यावत, मनवांछित फल पावत॥' - हे माँ गंगा! आपकी जय हो। जो भी मनुष्य सच्चे मन से आपका ध्यान करता है, वह अपनी सभी मनोकामनाओं (मनवांछित फल) को प्राप्त कर लेता है। आपके स्मरण मात्र से जीवन के संताप नष्ट हो जाते हैं।

द्वितीय पद का भाव: 'चन्द्र सी ज्योति तुम्हारी, जल निर्मल आता। शरण पड़ूं मैं तेरी, तो पातक मिट जाता॥' - हे मैया! आपका जल चंद्रमा की तरह शीतल, पवित्र और निर्मल है। जो भी भक्त आपकी शरण में आता है, उसके जन्म-जन्म के पाप (पातक) और संताप तुरंत नष्ट हो जाते हैं।

तृतीय पद का भाव: 'पुत्र सगर के तारे, सब जग को ज्ञाता। कृपा दृष्टि तुम्हारी, त्रिभुवन के पाता॥' - पूरा संसार जानता है कि आपने महाराज सगर के साठ हजार पुत्रों का उद्धार किया था। आपकी यह असीम कृपा दृष्टि तीनों लोकों (त्रिभुवन) के जीवों के लिए कल्याणकारी है।

चतुर्थ पद का भाव: 'एक बार जो तेरी, जो शरण आ जाता। यम के त्रास मिटाकर, परमधाम को जाता॥' - जो प्राणी जीवन में एक बार भी पूर्ण शरणागति भाव से आपकी शरण में आ जाता है, उसे मृत्यु के देवता यमराज का भय (त्रास) नहीं रहता और वह अंत में मोक्ष रूपी परमधाम को प्राप्त होता है।

पंचम पद का भाव: 'कमल समान तुम्हारा, जल अति सुखदाता। भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करता॥' - कमल के पुष्प के समान आपका जल अत्यंत कोमल, पावन और सुख प्रदान करने वाला है। आप अपने भक्तों के सभी संकटों और दुखों को क्षण भर में दूर कर देती हैं।

षष्ठ पद का भाव: 'मैया की आरती जो, कोई नर गावत। कहें शिवानन्द स्वामी, मनवांछित फल पावत॥' - स्वामी शिवानन्द जी कहते हैं कि जो भी मनुष्य श्रद्धा और भक्ति भाव से मैया गंगा की इस आरती का गान करता है, वह इस लोक और परलोक दोनों में सुख और मोक्ष पाता है।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

सनातन परंपरा में गंगा स्नान और गंगा दर्शन मात्र से मनुष्य पाप मुक्त हो जाता है। शास्त्रों में उल्लेख है:

'गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु॥'

गंगा का जल केवल पानी नहीं, बल्कि साक्षात अमृत है जिसमें ऋषियों के तप का बल और भगवान विष्णु के चरणों का प्रक्षालन तेज समाहित है। राजा भगीरथ के तप के बाद जब गंगाजी पृथ्वी पर उतरीं, तो भगवान शिव ने उन्हें अपनी जटाओं में धारण किया, जिससे उनका वेग नियंत्रित हुआ और पृथ्वी का कल्याण संभव हुआ। गंगा आरती करने से पितृ दोष, कालसर्प दोष और अनजाने में हुए पापों से मुक्ति मिलती है। संध्या के समय जब हजारों दीपों से गंगा तट जगमगाते हैं, तो वह दृश्य अलौकिक ऊर्जा का संचार करता है।

आरती करने की सही विधि एवं नियम

  1. स्थान का चयन: यदि संभव हो तो गंगा तट पर आरती करें, अन्यथा अपने घर के मंदिर में माँ गंगा की तस्वीर या मूर्ति स्थापित कर उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके आरती करें।
  2. शुचिता: स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। मन और आचार-विचार की पवित्रता अत्यंत आवश्यक है।
  3. दीप प्रज्वलन: तांबे या पीतल के दीपक में शुद्ध घी या तिल के तेल की बाती जलाएं। साथ ही कपूर आरती की थाली में अवश्य रखें।
  4. आचरण: आरती के समय शंख और घंटी बजाएं। आरती गाते समय हाथों में पुष्प लेकर माँ के चरणों में अर्पित करें।
  5. प्रदक्षिणा: आरती पूर्ण होने के बाद स्वयं की तीन बार परिक्रमा करें और दोनों हाथों से दीपक की ज्योति को अपनी आँखों से लगाएं।

आरती के समय आवश्यक सामग्री

सामग्री का नाम प्रयोजन एवं विवरण
पूजा की थाली तांबा, पीतल या चांदी की स्वच्छ थाली।
दीपक (पंचमुखी या साधारण) शुद्ध गाय का घी या तिल का तेल और रूई की बाती।
कपूर आरती को प्रज्वलित करने और सकारात्मक ऊर्जा हेतु।
शंख और घंटी नकारात्मक ऊर्जा दूर करने और देवता का आह्वान करने के लिए।
पुष्प एवं रोली माँ गंगा का स्वागत और अर्चन करने हेतु।
चरणामृत / जल पात्र आचमन और शुद्धि के लिए।

राग, ताल एवं गायन समय

गंगा आरती का गायन मुख्य रूप से संध्याकाल (प्रदोष काल) में किया जाता है, जब सूर्य अस्त हो रहा हो और तारों का उदय हो रहा हो। संगीत शास्त्र के अनुसार इस आरती को राग कल्याण या राग यमन की सुमधुर धुनों में गाया जाता है, जो मन को अगाध शांति और भक्ति रस से भर देती हैं। इसकी ताल कहरवा या दादरा होती है, जिसे सामान्य भक्त भी आसानी से ताली बजाकर गा सकते हैं।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

  • मानसिक शांति: प्रतिदिन गंगा आरती करने या सुनने से मन की चंचलता शांत होती है और मानसिक तनाव दूर होता है।
  • पाप मुक्ति: अनजाने में हुए पापों का प्रायश्चित होता है और अंतःकरण शुद्ध होता है।
  • परिवार में सुख-समृद्धि: घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और सुख-शांति बनी रहती है।
  • मोक्ष प्राप्ति: जीवन के अंतिम समय में गंगा स्मरण से सद्गति और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

१. श्री गंगा जी की आरती - ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री माँ गंगा के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

संबंधित पावन आरतियाँ

समस्त आरतियाँ देखें →

भक्त विचार एवं टिप्पणियां (0)

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं है। सर्वप्रथम अपने भक्ति विचार साझा करें!

भगवान श्री माँ गंगा जी की नित्य वंदना और आरती पाठ से मन की चंचलता शांत होती है, एकाग्रता बढ़ती है एवं जीवन के सभी विघ्न-बाधाएं नष्ट होती हैं।

श्री माँ गंगा की समस्त आरतियाँ
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!