॥ श्री वरद विनायक की पावन आरती - ॐ जय वरद विनायक, स्वामी जय वरद विनायक: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★भगवान श्री गणेश जी के अष्टविनायक स्वरूपों में श्री वरद विनायक का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण और महिमामंडित है। महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के महाड गांव में स्थित वरदविनायक भक्तों को मनचाहा वरदान प्रदान करने वाले देवता के रूप में पूजे जाते हैं। 'वरद' शब्द का शाब्दिक अर्थ ही होता है 'वरदान देने वाला'। जब कोई भक्त पूर्ण श्रद्धा, निष्ठा और भक्ति भाव से श्री वरद विनायक की पावन आरती का गान और स्मरण करता है, तो उसके जीवन के समस्त विघ्न, बाधाएं, कष्ट और संकट हमेशा के लिए समाप्त हो जाते हैं। Bhaktilok.in के इस पावन आलेख में हम श्री वरद विनायक की आरती के संपूर्ण बोल, उसका गहरा आध्यात्मिक भावार्थ, पूजा की शास्त्रीय विधि और इसके महिमामय इतिहास व महत्व का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल
ॐ जय वरद विनायक, स्वामी जय वरद विनायक।
संकट हरण मंगल मूरति, विघ्न विनाशक नायक॥ ॐ जय...॥
सिन्दूर चढ़े ललाटे, मस्तक पर चंदा।
सुधि लीजै मम स्वामी, हरिये सब धंदा॥ ॐ जय...॥
ऋद्धि सिद्धि के दाता, तुम हो सुखकारी।
चरणों में झुके शीश, महिमा अति भारी॥ ॐ जय...॥
मोदक भोग लगावै, मूषक वाहन साजे।
देव मुनि जन गावैं, डमरू मृदंग बाजे॥ ॐ जय...॥
अंधे को आंख देत, कोढ़ी को काया।
बांझन को पुत्र देत, निरखत तव छाया॥ ॐ जय...॥
जो जन शरण तुम्हारी, आवे सुख पावे।
मनवांछित फल पाकर, नित यश तेरा गावे॥ ॐ जय...॥
संकट मोचन स्वामी, तुम हो हितकारी।
दास कहे कर जोड़े, नैया पार उतारी॥ ॐ जय...॥
ॐ जय वरद विनायक, स्वामी जय वरद विनायक।
संकट हरण मंगल मूरति, विघ्न विनाशक नायक॥ ॐ जय...॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
श्री वरद विनायक की इस दिव्य आरती की प्रत्येक पंक्ति में भगवान गणेश के परम स्वरूप और उनकी असीम कृपा का वर्णन किया गया है। आइए इस पावन आरती के भावार्थ को विस्तार से समझें:
प्रथम चरण: 'ॐ जय वरद विनायक, स्वामी जय वरद विनायक। संकट हरण मंगल मूरति, विघ्न विनाशक नायक॥' - इस पंक्ति में भक्त भगवान वरद विनायक की जयकार करते हुए उन्हें पुकार रहा है। हे प्रभु! आप सभी संकटों को हरने वाले हैं, आप मंगल मूर्ति हैं और जीवन के समस्त विघ्नों का नाश करने वाले मुख्य नायक हैं। आपकी जय हो।
द्वितीय चरण: 'सिन्दूर चढ़े ललाटे, मस्तक पर चंदा। सुधि लीजै मम स्वामी, हरिये सब धंदा॥' - भगवान गणेश के मस्तक पर सिन्दूर का चोला सुशोभित है और चंद्रमा की भांति उनका मुखमंडल चमक रहा है। हे स्वामी! आप हमारी सुधि लीजिए (हमारी सुध-बुध लीजिए/हमारी रक्षा कीजिए) और हमारे जीवन के सभी कार्यों की उलझनों व कष्टों को हर लीजिए।
तृतीय चरण: 'ऋद्धि सिद्धि के दाता, तुम हो सुखकारी। चरणों में झुके शीश, महिमा अति भारी॥' - आप माता ऋद्धि और सिद्धि के स्वामी एवं दाता हैं। आप भक्तों को असीम सुख प्रदान करने वाले हैं। आपके श्रीचरणों में हम अपना शीश झुकाते हैं, क्योंकि आपकी महिमा इस ब्रह्मांड में सबसे भारी और अपरंपार है।
चतुर्थ चरण: 'मोदक भोग लगावै, मूषक वाहन साजे। देव मुनि जन गावैं, डमरू मृदंग बाजे॥' - भगवान गणेश को मोदक अति प्रिय है और उसका भोग लगाया जाता है। मूषक (चूहा) आपका वाहन बनकर सुशोभित होता है। देवगण और मुनि जन आपकी स्तुति में भजन गाते हैं और इस दौरान डमरू तथा मृदंग की मधुर ध्वनियां गूंजती हैं।
पंचम चरण: 'अंधे को आंख देत, कोढ़ी को काया। बांझन को पुत्र देत, निरखत तव छाया॥' - यह पंक्ति भगवान वरद विनायक की चमत्कारिक कृपा को दर्शाती है। आपकी कृपा मात्र से अंधे को दृष्टि मिल जाती है, रोगी को निरोगी काया प्राप्त होती है, और संतानहीन को संतान की प्राप्ति होती है। आपकी शरण और छाया मात्र से जीवन के सभी असंभव कार्य संभव हो जाते हैं।
षष्ठ चरण: 'जो जन शरण तुम्हारी, आवे सुख पावे। मनवांछित फल पाकर, नित यश तेरा गावे॥' - जो भी मनुष्य आपकी शरण में सच्चे मन से आता है, वह सभी प्रकार के सुखों को प्राप्त करता है। वह अपने मन की इच्छाओं (मनवांछित फल) को पाकर हमेशा आपकी यशोगाथा का गान करता रहता है।
सप्तम चरण: 'संकट मोचन स्वामी, तुम हो हितकारी। दास कहे कर जोड़े, नैया पार उतारी॥' - हे स्वामी! आप संकट मोचन हैं और सभी का हित करने वाले हैं। आपका यह दास हाथ जोड़कर प्रार्थना करता है कि आप हमारी जीवन रूपी नैया को भवसागर से पार उतार दीजिए।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
हिन्दू सनातन संस्कृति में भगवान गणेश को 'प्रथमे पूज्य' का स्थान प्राप्त है। किसी भी शुभ कार्य, अनुष्ठान, यज्ञ, विवाह या नए व्यापार की शुरुआत से पहले श्री गणेश की पूजा अनिवार्य मानी गई है। महाराष्ट्र में स्थित अष्टविनायक यात्रा का वरदविनायक मंदिर तीसरा महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, वरदविनायक मंदिर का इतिहास राजा रुक्मांगद और उनके पुत्र मुचुकंद से जुड़ा हुआ है। यहाँ स्थापित गणेश जी की मूर्ति स्वयंभू (स्वयं प्रकट) है। जो भक्त यहाँ आकर विधि-विधान से पूजा करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। मान्यता है कि इस मंदिर में स्थापित नंदा दीप (अखंड दीप) पिछले कई दशकों से लगातार जल रहा है, जिसका दर्शन मात्र अत्यंत पुण्यदायी है। इस पावन स्थान पर गाई जाने वाली वरद विनायक की आरती भक्तों के मन में एक नई ऊर्जा, सकारात्मकता और ईश्वरीय चेतना का संचार करती है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
भगवान श्री वरद विनायक की आरती का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए इसे विधि-विधान से करना अत्यंत आवश्यक है:
- स्थान की पवित्रता: प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा घर को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें।
- स्थापना: एक चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर श्री वरद विनायक (गणेश जी) की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
- षोडशोपचार पूजा: भगवान को जल, रोली, अक्षत (चावल), दूर्वा घास (गणेश जी को अति प्रिय), सिन्दूर, जनेऊ, मोदक या लड्डू का भोग अर्पित करें।
- प्रज्वलन: शुद्ध घी का दीपक और धूपबत्ती प्रज्वलित करें।
- आरती का क्रम: आरती की थाली में दीपक, कपूर और फूल सजाकर दाहिने हाथ से क्लॉकवाइज (घड़ी की दिशा में) कम से कम तीन बार घुमाते हुए 'ॐ जय वरद विनायक' का सस्वर गान करें।
- पुष्पांजलि: आरती के उपरांत भगवान को प्रणाम करें, शंख और घंटी बजाएं, और अंत में चरणों में पुष्पांजलि अर्पित करें।
आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)
पूजा और आरती को पूर्णता प्रदान करने के लिए निम्नलिखित सामग्री थाली में अवश्य रखनी चाहिए:
- आरती की थाली: तांबे, पीतल या चांदी की स्वच्छ थाली।
- दीपक: शुद्ध गाय के घी का दीपक (रूई की बत्ती के साथ)।
- कपूर: आरती की दिव्यता और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ाने के लिए कपूर की टिकिया।
- धूप और अगरबत्ती: वातावरण को सुगंधित और पवित्र करने के लिए।
- घंटी और शंख: नकारात्मक ऊर्जा को दूर भगाने और सकारात्मक स्पंदन स्थापित करने के लिए।
- पुष्प और दूर्वा: ताजे फूल और हरी दूर्वा घास।
- भोग सामग्री: मोदक, बेसन के लड्डू या पतासे।
राग, ताल एवं गायन समय
संगीत और भक्ति का गहरा नाता है। श्री वरद विनायक की आरती को शास्त्रीय धुनों में गाने से इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है:
- उपयुक्त राग: यह आरती मुख्य रूप से राग कल्याण, राग यमन या राग भैरवी में गाई जाती है। इन रागों में भक्ति भाव और शांति का अनूठा संगम होता है।
- ताल: इसे कहरवा ताल (8 मात्रा) या दादरा ताल (6 मात्रा) की लय पर आसानी से गाया जा सकता है, जिससे आम श्रद्धालु भी आसानी से सुर मिला सकें।
- गायन का सर्वोत्तम समय: प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त या संध्याकालीन बेला (संध्या वंदन के समय) में इस आरती का गान अत्यंत फलदायी माना गया है। विशेषकर गणेश चतुर्थी और अंगारकी संकष्टी चतुर्थी के दिन इसका गान विशेष रूप से करना चाहिए।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
नियमित रूप से श्री वरद विनायक की आरती करने और सुनने से साधक के जीवन में निम्नलिखित चमत्कारिक लाभ देखने को मिलते हैं:
- विघ्न बाधाओं का नाश: जीवन के हर क्षेत्र (व्यापार, शिक्षा, नौकरी, परिवार) में आ रही रुकावटें दूर होती हैं।
- बुद्धि और विद्या की प्राप्ति: विद्यार्थियों के लिए यह आरती स्मरण शक्ति और एकाग्रता को बढ़ाती है।
- मन की शांति: मानसिक तनाव, चिंता, भय और डिप्रेशन से मुक्ति मिलती है तथा मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
- पारिवारिक सुख-समृद्धि: घर-परिवार में सुख, शांति, वैभव और आपसी प्रेम का वास होता है।
- मोक्ष मार्ग की प्राप्ति: भगवान वरद विनायक की कृपा से भक्त के अंतःकरण से पापों का नाश होता है और अंत में वह गणेश लोक को प्राप्त होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
श्री वरद विनायक मंदिर कहां स्थित है?
श्री वरद विनायक का प्रसिद्ध मंदिर महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के कर्जत तालुका के महाड गांव में स्थित है। यह मुंबई और पुणे के निकट अष्टविनायक यात्रा का एक प्रमुख केंद्र है।
वरद विनायक आरती किस दिन गाना सबसे उत्तम माना जाता है?
बुधवार का दिन भगवान गणेश को समर्पित है, इसलिए बुधवार को और विशेषकर संकष्टी चतुर्थी तथा गणेश चतुर्थी के दिन इस आरती का गान अति उत्तम माना जाता है। हालांकि इसे प्रतिदिन सुबह और शाम भी गाया जा सकता है।
क्या महिलाएं श्री वरद विनायक की आरती गा सकती हैं?
हाँ, बिल्कुल। भगवान गणेश की पूजा, अर्चना और आरती का अधिकार सभी को समान रूप से है। महिलाएं पूरी श्रद्धा और पवित्रता के साथ वरद विनायक की आरती कर सकती हैं।
आरती के अंत में कपूर और घंटी क्यों बजाई जाती है?
घंटी बजाने से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है और नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं। कपूर जलाने का अर्थ है कि जिस प्रकार कपूर जलकर स्वयं को समाप्त कर देता है और चारों ओर सुगंध फैलाता है, उसी प्रकार अहंकार को मिटाकर हमें अपने भीतर ज्ञान की ज्योति जलानी चाहिए।