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श्री श्री गणेश आरती
21 पाठ

श्री वरदविनायक जी की आरती - ॐ जय वरदविनायक देवा, स्वामी जय वरदविनायक देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग कल्याण / यमन शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Suraj.Kumar.Bind रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री वरदविनायक जी की आरती - ॐ जय वरदविनायक देवा, स्वामी जय वरदविनायक देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

भगवान श्री गणेश के अष्टविनायक स्वरूपों में वरदविनायक का अत्यंत विशिष्ट और महिमामंडित स्थान है। महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के महाड गांव में स्थित वरदविनायक मंदिर भक्तों की सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला वरद स्थल माना जाता है। यहाँ प्रत्यक्ष रूप से भगवान गणेश 'वरद' यानी वरदान देने वाले रूप में विराजमान हैं। किसी भी अनुष्ठान, पूजा या संकट निवारण के समय 'श्री वरदविनायक जी की आरती' का गान करना भक्तों के जीवन में असीम शांति, सुख, समृद्धि और विघ्ननाशक ऊर्जा का संचार करता है। भक्तिलोकम डॉट इन (Bhaktilok.in) के इस पावन आलेख में हम वरदविनायक जी की आरती के संपूर्ण बोल, उसका गूढ़ भावार्थ, नियमबद्ध पूजा विधि और इसके अलौकिक आध्यात्मिक लाभों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल

ॐ जय वरदविनायक देवा, स्वामी जय वरदविनायक देवा।
संकट हरण मंगलगुरु, तुम सम कोउ देवा॥ ॐ जय...॥

सुंदर रूप विराजत, मूषक वाहन साजे।
मोदक हाथ विराजे, भक्तन मन भाजे॥ ॐ जय...॥

ऋद्धि-सिद्धि के दाता, तुम जग के स्वामी।
अष्टविनायक मध् में, महिमा तव नामी॥ ॐ जय...॥

संकट मोचन स्वामी, तुम हो सुखकारी।
जो कोई तुमको ध्यावे, भव से तर नारी॥ ॐ जय...॥

धूप दीप नैवेद्य, आरती हम गावें।
चरण कमल तेरे निशिदिन शीश नवावें॥ ॐ जय...॥

दास कहे कर जोरी, विनती सुन मेरी।
दरस दिखाओ प्यारे, काटो जम फेरी॥ ॐ जय...॥

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

ॐ जय वरदविनायक देवा, स्वामी जय वरदविनायक देवा: इस प्रारंभिक पंक्ति में भक्तगण भगवान श्री वरदविनायक के चरणों में अपनी पूर्ण निष्ठा और वंदना अर्पित करते हुए उनके जयकारे लगा रहे हैं। हे प्रभु! आप सभी प्रकार के वरदानों को देने वाले वरदविनायक हैं, आपकी जय हो।

संकट हरण मंगलगुरु, तुम सम कोउ देवा: हे प्रभु! आप भक्तों के सभी बड़े से बड़े संकटों को हरने वाले और संपूर्ण सृष्टि को मंगल प्रदान करने वाले गुरु हैं। आपके समान दयालु, कृपालु और शक्तिशाली दूसरा कोई देवता नहीं है।

सुंदर रूप विराजत, मूषक वाहन साजे: आपका यह स्वरूप अत्यंत मनमोहक, दिव्य और सुंदर है। आपका वाहन मूषक (चूहा) आपकी शोभा को और अधिक बढ़ाता है, जिस पर आसीन होकर आप भक्तों के कल्याण के लिए प्रस्थान करते हैं।

मोदक हाथ विराजे, भक्तन मन भाजे: आपके एक हाथ में मोदक (लड्डू) सुशोभित है, जो आध्यात्मिक आनंद का प्रतीक है। आपका यह रूप सभी भक्तों के मन को अत्यंत भाता है और उनके हृदय में प्रेम व भक्ति जागृत करता है।

ऋद्धि-सिद्धि के दाता, तुम जग के स्वामी: हे गणेश जी! आप माता ऋद्धि और सिद्धि के प्रदाता हैं तथा इस संपूर्ण चराचर जगत के स्वामी और संचालक हैं।

अष्टविनायक मध् में, महिमा तव नामी: महाराष्ट्र और पूरे भारत में स्थित अष्टविनायक (आठ प्रसिद्ध गणेश मंदिर) स्वरूपों में आपके वरदविनायक रूप की महिमा अत्यंत अलौकिक और प्रसिद्ध है।

संकट मोचन स्वामी, तुम हो सुखकारी: हे स्वामी! आप सभी प्रकार के कष्टों को दूर करने वाले संकटमोचन हैं और अपने भक्तों को परम सुख प्रदान करने वाले हैं।

जो कोई तुमको ध्यावे, भव से तर नारी: जो भी मनुष्य या स्त्री सच्चे मन से आपका ध्यान करती है, वह इस भवसागर (जन्म-मृत्य के चक्र) से आसानी से तर जाता है और मोक्ष को प्राप्त होता है।

धूप दीप नैवेद्य, आरती हम गावें: हे प्रभु! हम धूप, दीप, नैवेद्य और विभिन्न पूजन सामग्रियों के साथ आपकी यह पावन आरती प्रेमपूर्वक गा रहे हैं।

चरण कमल तेरे निशिदिन शीश नवावें: हमारे दोनों हाथ जोड़कर और शीश झुकाकर हम आपके इन पावन चरण कमलों में दिन-रात नमन करते हैं।

दास कहे कर जोरी, विनती सुन मेरी: आपका यह दीन दास हाथ जोड़कर आपसे प्रार्थना करता है कि हे प्रभु! मेरी इस विनय को अवश्य स्वीकार करें।

दरस दिखाओ प्यारे, काटो जम फेरी: हे प्रिय भगवान! हमें अपने दिव्य दर्शन प्रदान करें और हमारे जीवन से जन्म-मरण तथा यमराज के भय के चक्र को हमेशा के लिए समाप्त कर दीजिए।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

हिन्दू सनातन संस्कृति में भगवान गणेश को 'प्रथमे पूज्य' का स्थान प्राप्त है। किसी भी शुभ कार्य, यज्ञ, अनुष्ठान या नए कार्य के आरंभ से पहले गणेश वंदना अनिवार्य मानी गई है। वरदविनायक मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा के अनुसार, यहाँ प्राचीनकाल में रुक्मांगद नामक राजा और मुचुकुंद ऋषि से जुड़ी कथाएं प्रचलित हैं। भगवान गणेश ने राजा को वरदान दिया था कि जो भी भक्त इस स्थान पर सच्चे भाव से उनकी आराधना करेगा, उसकी हर मनोकामना पूर्ण होगी और उसे रिद्धि-सिद्धि की प्राप्ति होगी। वरदविनायक जी की आरती का गान करने से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है, राहु-केतु के दोष शांत होते हैं और बुद्धि, विवेक तथा यश में वृद्धि होती है।

आरती करने की सही विधि एवं नियम

  • शुद्धता: प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें।
  • आसन: पूजा के दौरान ऊनी या कुशा के आसन पर बैठना अत्यंत शुभ माना जाता है।
  • पंचोपचार या षोडशोपचार पूजन: भगवान वरदविनायक की मूर्ति या चित्र के समक्ष दीपक प्रज्वलित करें, रोली, अक्षत, दूर्वा घास, मोदक और पुष्प अर्पित करें।
  • आरती गान: हाथ में कपूर या घी का दीपक लेकर पूरी श्रद्धा, ताल और स्वर के साथ 'ॐ जय वरदविनायक देवा' आरती का सस्वर गान करें।
  • परिक्रमा और प्रदक्षिणा: आरती पूर्ण होने के बाद भगवान की तीन बार परिक्रमा करें और शंख-घंटी बजाकर वातावरण को दिव्य बनाएं।

आरती के समय आवश्यक सामग्री

सामग्री का नाम धार्मिक महत्व एवं उपयोग
पीतल या चांदी की थाल आरती की सभी सामग्रियों को सुव्यवस्थित रूप से रखने के लिए।
शुद्ध घी का दीपक अंधकार और नकारात्मकता को दूर कर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने हेतु।
कपूर आरती के अंत में प्रज्वलित कर भगवान को आरती समर्पित करने के लिए।
घंटी और शंख नकारात्मक शक्तियों को दूर भगाने और सकारात्मक कंपन उत्पन्न करने के लिए।
दूर्वा और मोदक गणेश जी को अतिप्रिय वस्तुएं जो भोग और अर्पण में उपयोग होती हैं।

राग, ताल एवं गायन समय

श्री वरदविनायक जी की आरती को शास्त्रीय संगीत के राग कल्याण या राग यमन की सुमधुर धुनों में गाया जा सकता है। यह राग मन को शांति और एकाग्रता प्रदान करता है। आरती के गायन के लिए सर्वश्रेष्ठ समय प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय के समय) तथा संध्याकाल (प्रदोष काल) का माना गया है। सामूहिक रूप से परिवार के साथ संध्या के समय इस आरती का गान करने से घर में पारिवारिक सौहार्द और सुख-समृद्धि बनी रहती है।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

नियमित रूप से भगवान वरदविनायक की पूजा और आरती करने से साधक को निम्नलिखित आध्यात्मिक और भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • विघ्ननाशक कृपा: जीवन में आने वाली समस्त बाधाएं और रुकावटें स्वतः दूर होने लगती हैं।
  • बुद्धि और एकाग्रता: विद्यार्थियों के लिए यह आरती स्मरण शक्ति और बौद्धिक विकास में सहायक होती है।
  • धन और समृद्धि: व्यापार, नौकरी और आजीविका के क्षेत्रों में स्थिरता एवं धन-धान्य की वृद्धि होती है।
  • मानसिक शांति: तनाव, चिंता और मानसिक अशांति का नाश होता है तथा आत्मबल में वृद्धि होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

१. श्री वरदविनायक जी की आरती - ॐ जय वरदविनायक देवा, स्वामी जय वरदविनायक देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री श्री गणेश के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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