पावन आरती संग्रह · स्तुति पाठ
श्री भगवान गणेश आरती
54 पाठ

भगवान श्री गणेश जी की आरती - जय गणेश जय गणेश देवा माता जाकी पार्वती पिता महादेवा सम्पूर्ण बोल

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग यमन एवं बिलावल शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Deepak Kumar Bind रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ भगवान श्री गणेश जी की आरती - जय गणेश जय गणेश देवा माता जाकी पार्वती पिता महादेवा सम्पूर्ण बोल ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

आरती की पृष्ठभूमि व रचयिता

सनातन संस्कृति और हिन्दू धर्म में भगवान श्री गणेश को 'प्रथमपूज्य' की उपाधि प्राप्त है। किसी भी मांगलिक अनुष्ठान, यज्ञ, गृहप्रवेश, विवाह या धार्मिक उत्सव का शुभारंभ भगवान गणेश के स्मरण और पूजन के बिना अधूरा माना जाता है। विघ्नहर्ता, सुखकर्ता और दुःखहर्ता के रूप में पूजे जाने वाले गणेश जी की आराधना सम्पूर्ण ब्रह्मांड में सकारात्मक ऊर्जा और बुद्धि का संचार करती है।

भगवान गणेश की अराधना में गाई जाने वाली विश्वप्रसिद्ध आरती 'जय गणेश जय गणेश देवा, माता जाकी पार्वती पिता महादेवा' सनातन धर्मावलंबियों की जुबान पर हमेशा रहती है। इस पावन आरती के रचयिता के संबंध में विभिन्न लोक-कथाएं और ग्रंथ प्रमाण मिलते हैं। मुख्य रूप से इस आरती की रचना का श्रेय महान संत और कवि **श्री समर्थ रामदास स्वामी** को दिया जाता है। ऐसा माना जाता है कि जब समर्थ रामदास जी महाराष्ट्र के त्रिंबकेश्वर और गोदावरी तट के समीप साधना कर रहे थे, तब उन्होंने भगवान गणेश के इस दिव्य स्वरूप का दर्शन किया और उनके मुख से यह स्तुति प्रकट हुई। कालान्तर में यह आरती जन-जन की आस्था का केंद्र बन गई और आज देश-विदेश के हर मंदिर और घर में प्रतिदिन संध्या और प्रातः काल में गाई जाती है।

यह आरती केवल कुछ पंक्तियों का संकलन नहीं है, बल्कि यह जीव और ब्रह्म के मिलन का मार्ग है। इसमें भगवान गणेश के भौतिक स्वरूप से लेकर उनके आध्यात्मिक वैभव का अत्यंत सूक्ष्म और सुंदर चित्रण किया गया है। गणेश पुराण और मुद्गल पुराण में भी विघ्ननाशक गणेश जी की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है, जो इस आरती के भावों को और अधिक प्रगाढ़ बनाता है।

सम्पूर्ण आरती के प्रामाणिक बोल

यहाँ भगवान श्री गणेश जी की आरती के सम्पूर्ण और शुद्ध बोल प्रस्तुत किए गए हैं, जिनका उच्चारण करने से मन को शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा की प्राप्ति होती है:

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

एक दंत दयावंत, चार भुजा धारी।
माथे पर सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी॥

पान चढ़े फूल चढ़े, और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे, संत करें सेवा॥

अंधे को आंख देत, कोढ़िन को काया।
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥

हार ਚੜ੍ਹੇ फूल ਚੜ੍ਹੇ और चढ़े मेवा। (पुनरावृत्ति संदर्भ)
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा॥

सूरज श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

पद-दर-पद विस्तृत भावार्थ

आरती की प्रत्येक पंक्ति का गहरा दार्शनिक और आध्यात्मिक अर्थ है। आइए इसके हर पद का विस्तृत भावार्थ समझते हैं:

प्रथम पद: स्तुति और माता-पिता का स्मरण

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

भावार्थ: हे विघ्नहर्ता गणेश देव! आपकी जय हो, आपकी जय हो। आप ऐसे देवाधिदेव हैं जिनकी माता जगत जननी आदिशक्ति मां पार्वती और पिता देवों के देव महादेव भगवान शिव हैं। इस ब्रह्मांड की सर्वोच्च चेतना और शक्ति आपकी उत्पत्ति का स्रोत है, इसलिए हम नतमस्तक होकर आपकी वंदना करते हैं।

द्वितीय पद: दिव्य शारीरिक स्वरूप का वर्णन

एक दंत दयावंत, चार भुजा धारी। माथे पर सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी॥

भावार्थ: हे प्रभु! आपके मुख पर एक अद्वितीय दंत (एकदन्त) सुशोभित है जो आपके एकाग्रचित्त और अद्वितीय होने का प्रतीक है। आप अत्यंत दयालु (दयावंत) हैं। आपकी चार भुजाएं हैं जो भक्तों को अभयदान और वरदान प्रदान करती हैं। आपके मस्तक पर लाल सिंदूर की भव्य त्रिपुंड या टीका शोभायमान है, और आप अपने वाहन के रूप में छोटे से मूसक (चूहा) की सवारी करते हैं, जो यह सिखाता है कि अहंकार और चंचल मन पर नियंत्रण कैसे रखा जाए।

तृतीय पद: नैवेद्य और पूजन सामग्री

पान चढ़े फूल चढ़े, और चढ़े मेवा। लड्डुअन का भोग लगे, संत करें सेवा॥

भावार्थ: हे गणेश भगवान! आपके चरणों में श्रद्धापूर्वक पान, सुगंधित पुष्प और विभिन्न प्रकार के सूखे मेवे अर्पित किए जाते हैं। आपको मोदक और लड्डुओं का प्रिय भोग लगाया जाता है। बड़े-बड़े संत, महात्मा और भक्तजन आपकी निरंतर सेवा और स्तुति में लीन रहते हैं।

चतुर्थ पद: भक्तों के संकट निवारण की महिमा

अंधे को आंख देत, कोढ़िन को काया। बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥

भावार्थ: आपकी कृपा दृष्टि मात्र से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं। आप अंधे व्यक्ति को दृष्टि प्रदान करते हैं, रोगी या कुष्ठ रोगी को स्वस्थ काया (शरीर) देते हैं, निस्संतान दंपत्तियों को सुसंस्कारी पुत्र की प्राप्ति कराते हैं और दरिद्र तथा निर्धनों को धन-धान्य से परिपूर्ण कर उनकी समस्त आर्थिक विपत्तियों को दूर करते हैं।

पंचम पद: शरणागत की रक्षा

सूरज श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा। माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

भावार्थ: भक्त अपनी दीनता प्रकट करते हुए कहता है कि हे प्रभु! हम आपकी शरण में आए हैं। हमारी इस छोटी सी पूजा और सेवा को स्वीकार कर इसे सफल बनाएं। हे पार्वती और महादेव के लाडले पुत्र! हमारी हर मनोकामना पूर्ण करें।

गायन का राग, ताल एवं धुन

संगीत की दृष्टि से 'जय गणेश जय गणेश देवा' आरती अत्यंत मधुर और मनमोहक है। इसे शास्त्रीय और उप-शास्त्रीय संगीत के कई प्रमुख रागों में गाया जा सकता है:

  • प्रमुख राग: राग बिलावल, राग यमन और राग भैरवी।
  • ताल: कहहरवा ताल (8 मात्रा) या दादरा ताल (6 मात्रा), जो आमजन को आसानी से ताल मिलाने और गाने में सहायता करती है।
  • धुन का प्रभाव: इस आरती की धुन में एक अजीब सा ठहराव और उत्साह है। शुरुआत के 'जय गणेश' उद्घोष में उच्च स्वर का प्रयोग होता है, जो श्रोता के भीतर सकारात्मक ऊर्जा जगाता है, जबकि अंत तक आते-आते यह शांत और प्रार्थनात्मक रूप ले लेती है।

दीप प्रज्वलन, थाली घुमाने का क्रम व विधि

आरती केवल गाना नहीं है, बल्कि यह एक सूक्ष्म तांत्रिक और वैज्ञानिक अनुष्ठान है। आरती करने की उचित विधि निम्नलिखित है:

  1. थाली की सजावट: तांबे, पीतल या चांदी की थाली में कपूर, शुद्ध घी का दीपक (कम से कम पांच बत्तियों वाला या अखंड दीया), कुमकुम, चावल, पुष्प, और धूपबत्ती रखें।
  2. प्रज्वलन: दीपक और कपूर को प्रज्वलित कर सबसे पहले भगवान गणेश को नमन करें।
  3. थाली घुमाने का क्रम (Waving Protocol):
    • सबसे पहले भगवान के चरणों की तरफ 4 बार आरती की थाली घुमाएं (प्रतीक: पृथ्वी तत्व)।
    • नाभि या पेट के हिस्से की तरफ 2 बार घुमाएं (प्रतीक: जल तत्व)।
    • मुख और सिर के हिस्से की तरफ 3 बार घुमाएं (प्रतीक: आकाश और अग्नि तत्व)।
    • अंत में पूरे शरीर के चारों ओर 7 बार पूर्ण वृत्त (Clockwise) में आरती घुमाएं।
  4. आचमन और जल समर्पण: आरती पूर्ण होने के बाद थाली पर जल घुमाकर उसका आचमन करें और भक्तों पर उस पवित्र हवा व ऊर्जा का संचार करें।

कर्पूर गौरम का महत्व व फलश्रुति

गणेश आरती के समापन के पश्चात अक्सर कर्पूर आरती की जाती है। कर्पूर (Camphor) इस बात का प्रतीक है कि जिस प्रकार कपूर बिना कोई अवशेष छोड़े अग्नि में पूरी तरह जल जाता है, उसी प्रकार साधक का अहंकार और उसकी जीवात्मा परमात्मा में विलीन हो जानी चाहिए।

फलश्रुति: इस आरती का नित्य प्रातः और संध्या काल में गायन करने से घर में नकारात्मक ऊर्जा, वास्तु दोष और बाधाओं का नाश होता है। विद्या की चाह रखने वाले विद्यार्थियों को बुद्धि, व्यापारियों को सफलता और परिवार में सुख-शांति व आरोग्यता की प्राप्ति होती है। गणेश पुराण के अनुसार, जो व्यक्ति नियमित रूप से गणेश आरती करता है, उसके जीवन के सभी संकट स्वतः टल जाते हैं।

Frequently Asked Questions (FAQs)

प्रश्न 1: भगवान गणेश जी की आरती 'जय गणेश देवा' दिन में कितनी बार करनी चाहिए?
उत्तर: सामान्यतः यह आरती दिन में दो बार—प्रातः काल (सूर्योदय के समय) और संध्या काल (सूर्यास्त के समय) की जानी चाहिए। विशेष अवसरों जैसे गणेश चतुर्थी, दीपावली या किसी नए कार्य के आरंभ पर इसे विशेष रूप से गाया जाता है।

प्रश्न 2: क्या महिलाएं भगवान गणेश की आरती गा सकती हैं और थाली घुमा सकती हैं?
उत्तर: बिल्कुल! सनातन धर्म में पूजा, अर्चना और आरती करने का अधिकार स्त्री और पुरुष दोनों को समान रूप से प्राप्त है। माता पार्वती स्वयं शक्ति स्वरूपा हैं, अतः महिलाओं द्वारा गणेश जी की आरती करना अत्यंत शुभ और फलदायी माना गया है।

प्रश्न 3: गणेश आरती करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर: आरती करते समय आपका मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए। मन में शुद्धता, पवित्रता और अटूट श्रद्धा होनी चाहिए। आरती की थाली को हमेशा दक्षिणावर्त (Clockwise) दिशा में ही घुमाना चाहिए।

प्रश्न 4: गणेश जी की आरती के साथ कौन सा प्रसाद चढ़ाना सबसे उत्तम माना जाता है?
उत्तर: भगवान गणेश को मोदक, बेसन के लड्डू, बूंदी के लड्डू और दुर्वा घास (धूप) अतिप्रिय है। अतः आरती के समय इनका भोग अवश्य लगाना चाहिए।

१. भगवान श्री गणेश जी की आरती - जय गणेश जय गणेश देवा माता जाकी पार्वती पिता महादेवा सम्पूर्ण बोल का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री भगवान गणेश के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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