क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – श्लोक 7

श्लोक ७ में क्षेत्र के भावात्मक तत्वों – इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख आदि – का उल्लेख है।

संस्कृत श्लोक

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः | एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् || ७ ||

icchā dveṣaḥ sukhaṃ duḥkhaṃ saṅghātaścetanā dhṛtiḥ | etatkṣetraṃ samāsena savikāramudāhṛtam || 7 ||

पदच्छेद / शब्दार्थ

इच्छा: इच्छा; द्वेष: द्वेष; सुखम्: सुख; दुःखम्: दुःख; सङ्घात: समूह (शरीर); चेतना: चेतना; धृति: धैर्य; एतत्: यह; क्षेत्रम्: क्षेत्र; समासेन: संक्षेप में; सविकारम्: विकारों सहित; उदाहृतम्: कहा गया

हिंदी अनुवाद

इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, सङ्घात (शरीर), चेतना और धृति – इस प्रकार यह क्षेत्र अपने विकारों सहित संक्षेप में कहा गया।

English Translation

Desire, hatred, pleasure, pain, the aggregate (body), intelligence, fortitude – thus the field has been briefly described with its modifications.

टीका / Commentary

इस श्लोक में क्षेत्र के भावात्मक पहलुओं का वर्णन है। ये सभी शरीर के धर्म हैं, आत्मा के नहीं। This verse describes the emotional and psychological aspects of the field, which belong to the body, not the Self.