श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 13 (क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga))

अध्याय 13 · श्लोक 7

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 35 45 मिनट का पठन 125 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः | एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् || ७ ||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
इच्छा
इच्छा
द्वेष
द्वेष
सुखम्
सुख
दुःखम्
दुःख
सङ्घात
समूह (शरीर)
चेतना
चेतना
धृति
धैर्य
एतत्
यह
क्षेत्रम्
क्षेत्र
समासेन
संक्षेप में
सविकारम्
विकारों सहित
उदाहृतम्
कहा गया

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, सङ्घात (शरीर), चेतना और धृति – इस प्रकार यह क्षेत्र अपने विकारों सहित संक्षेप में कहा गया।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय दृष्टि

सनातन धर्म के सार्वकालिक और सार्वभौमिक ग्रंथ 'श्रीमद्भगवद्गीता' के तेरहवें अध्याय, जिसका नाम 'क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभाग योग' है, में मानव जीवन के सबसे गहरे रहस्यों का उद्घाटन किया गया है। जगतगुरु भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से संपूर्ण मानवता को यह समझाने का प्रयास करते हैं कि यह दृश्यमान भौतिक संसार और हमारा अपना शरीर क्या है, तथा इसे जानने वाला दृष्टा (आत्मा) कौन है। प्रस्तुत श्लोक—"इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः | एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् || ७ ||"—उसी क्षेत्र (शरीर एवं प्रकृति) के मनोवैज्ञानिक, संवेगात्मक और भौतिक विकारों का अत्यंत सूक्ष्म एवं वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

भारतीय मनीषियों और वैदिक आचार्यों ने मनुष्य के आंतरिक संसार का जितना सटीक मानचित्रण वेदों, उपनिषदों और गीता में किया है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। आधुनिक मनोविज्ञान जिस बात को आज समझ रहा है, उसे हमारे ऋषियों ने सदियों पहले ब्रह्मविद्या के अंतर्गत स्पष्ट कर दिया था। यह श्लोक हमें इस बात का बोध कराता है कि हमारे जीवन में उठने वाली इच्छाएं, किसी के प्रति ईर्ष्या या द्वेष, सुख-दुःख के द्वंद्व, शरीरों का यह संघात (संयोग), चेतना की स्फुरणा और मन की धैर्यशीलता—ये सभी वस्तुतः भौतिक प्रकृति (क्षेत्र) के धर्म हैं, न कि शाश्वत आत्मा (क्षेत्रज्ञ) के। जब एक साधक इस अंतर को स्पष्ट रूप से समझ लेता है, तब वह संसार के विकारों से ऊपर उठकर अपनी मूल आत्मकेंद्रित चेतना में स्थित हो जाता है। Bhaktilok.in के इस पावन मंच पर हम इसी श्लोक के माध्यम से आपके भीतर की आध्यात्मिक जिज्ञासा को शांत करने और आपको आत्मबोध की ओर अग्रसर करने का एक विनम्र प्रयास कर रहे हैं।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक एवं पाठ विधि

श्रीमद्भगवद्गीता — तेरहवें अध्याय (क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभाग योग) का श्लोक 7

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः |
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् || ७ ||

श्लोकान्वय एवं उच्चारण विधि:

इस श्लोक का उच्चारण करते समय 'सङ्घातश्चेतना' (सङ्घातः च चेतना) और 'सविकारमुदाहृतम्' (स-विकारम् उदाहृतम्) की संधियों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। अनुस्वार और विसर्ग का शुद्ध उच्चारण मानसिक एकाग्रता को बढ़ाता है। इसका नियमित पाठ साधक के चित्त को शांत करता है और उसे अपने शरीर और मन के अंतर्द्वंद्वों को तटस्थ भाव से देखने की शक्ति प्रदान करता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

नीचे दी गई सारणी में श्लोक के प्रत्येक पद का सरल हिंदी अर्थ तथा उसका गहरा आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ प्रस्तुत किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
इच्छा चाह, कामना, वांछा विषयों को भोगने की मानसिक वृत्ति। यह प्रकृति के गुणों (सत्त्व, रज, तम) के कारण उत्पन्न होती है, आत्मा का स्वभाव नहीं है।
द्वेषः बैर, घृणा, अरुचि अनुकूल न होने पर किसी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति के प्रति उत्पन्न होने वाली मानसिक प्रतिकार की भावना।
सुखम् प्रसन्नता, अनुकूलता का अनुभव इन्द्रियों और मन के अनुकूल विषयों की प्राप्ति होने पर होने वाला आनंद, जो कि अनित्य और परिवर्तनशील है।
दुःखम् पीड़ा, संताप, प्रतिकूलता इन्द्रियों के प्रतिकूल परिस्थितियों या वियोग के कारण मन में उत्पन्न होने वाली भारीपन और कष्ट की अनुभूति।
सङ्घातः समुच्चय, मेल, शरीर पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) का यह भौतिक पिंड या शरीर, जो कई अवयवों का संघटन मात्र है।
चेतना बोध, स्फुरणा, जीवन शक्ति शरीर और मन के स्तर पर कार्य करने वाली प्राणशक्ति और संवेदनशीलता (यह मूल शुद्ध चैतन्य आत्मा से भिन्न, अंतःकरण का परिणाम है)।
धृतिः धैर्य, धारण शक्ति, स्थिरता मन और इंद्रियों को संकट या प्रलोभन के समय थामे रखने की मानसिक क्षमता या शक्ति।
एतत् यह सब उपर्युक्त सभी मनोविकार और भौतिक तत्व मिलकर क्षेत्र का निर्माण करते हैं।
क्षेत्रम् खेतो जैसी भूमि, शरीर वह माध्यम जिसमें कर्मों के बीज बोए जाते हैं और उनके फल (कर्मफल) काटे जाते हैं।
समासेन संक्षेप में विस्तृत प्रकृति के इन विकारों को थोड़े में सार रूप से कहना।
सविकारम् विकारों सहित इन समस्त परिवर्तनों, भावनाओं और रूपांतरणों के साथ क्षेत्र का संपूर्ण वर्णन।
उदाहृतम् कहा गया है, वर्णित किया गया है भगवान श्रीकृष्ण द्वारा साधकों के बोधार्थ प्रस्तुत किया गया परम सत्य।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के तेरहवें अध्याय की पृष्ठभूमि कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में उस समय तैयार होती है जब अर्जुन विषादग्रस्त होकर जीवन के परम सत्य और धर्म के मर्म को जानने के लिए तत्पर होते हैं। यद्यपि गीता का पूरा उपदेश कर्म और कर्तव्य पर आधारित है, किंतु तेरहवां अध्याय विशेष रूप से 'तत्त्वज्ञान' (महान metaphysical truth) को समर्पित है। महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत आने वाली यह गीता केवल दो सेनाओं के बीच का संवाद नहीं है, बल्कि यह जीव (अर्जुन) और परमेश्वर (श्रीकृष्ण) के बीच का वह सनातन संवाद है जो हर मनुष्य के अंतःकरण में निरंतर चलता रहता है।

इस अध्याय के आरंभ में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से पूछते हैं— "प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च। एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव।।" (हे केशव! मैं प्रकृति, पुरुष, क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ, ज्ञान और ज्ञेय को जानना चाहता हूँ)। अर्जुन के इस गूढ़ प्रश्न के उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण क्षेत्र (शरीर/प्रकृति) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा/परमात्मा) का विस्तार से वर्णन करना शुरू करते हैं। श्लोक 5 और 6 में क्षेत्र के मूल तत्वों (महाभूत, अहंकार, बुद्धि आदि) को गिनाने के बाद, भगवान श्लोक 7 में क्षेत्र के मनोवैज्ञानिक और संवेगात्मक विकारों—जैसे इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, संघात, चेतना और धृति—को रेखांकित करते हैं।

वैदिक कथाओं और उपनिषदों (विशेषकर कठोपनिषद और श्वेताश्वतर उपनिषद) में भी शरीर को एक रथ या खेत (क्षेत्र) के रूप में चित्रित किया गया है। खेत में जिस प्रकार विभिन्न प्रकार के बीज उगते हैं, खरपतवार (इच्छा और द्वेष) पैदा होते हैं, और मौसम के अनुसार सुख-दुःख की फसलें लहलहाती हैं, ठीक उसी प्रकार यह मानव शरीर भी कर्मों का क्षेत्र है। पुराणों में विभिन्न ऋषियों—जैसे महर्षि याज्ञवल्क्य, ऋषि दधीचि और संत नारद—के संवादों में भी इस बात पर बल दिया गया है कि जो मनुष्य अपने शरीर और मन के इन विकारों को 'स्वयं' से अलग (असंलग्न) देखना सीख जाता है, वही जीवनमुक्ति का सच्चा अधिकारी बनता है। Bhaktilok.in का यह शोध लेख हमारे प्राचीन ग्रंथों के इन्हीं शाश्वत सत्यों को आधुनिक संदर्भों में जीवंत करता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

मानसिक शांति एवं स्थिरता

इस श्लोक का नियमित मनन और पाठ करने से मन में उठने वाले आवेगों (इच्छा और द्वेष) पर नियंत्रण पाने की अद्भुत मानसिक शक्ति प्राप्त होती है। साधक यह समझ जाता है कि सुख और दुःख केवल मन के धर्म हैं, जिससे उसकी मानसिक स्थिरता बढ़ती है।

सकारात्मक ऊर्जा और प्रकाशवान औरा

गीता के इन ज्ञानपरक श्लोकों का उच्चारण करने से सूक्ष्म शरीर शुद्ध होता है, जिससे व्यक्ति के चारों ओर एक सात्विक और उच्च कंपन वाली सकारात्मक ऊर्जा (Aura) का विकास होता है, जो नकारात्मक शक्तियों को दूर रखती है।

कर्म बंधनों से शुद्धि (कर्मिक प्यूरिफिकेशन)

जब मनुष्य यह जान लेता है कि वह शरीर (संघात) या उसके विकार नहीं, बल्कि शुद्ध चैतन्य आत्मा है, तब उसके द्वारा किए जाने वाले कर्मों से बंधने की प्रवृत्ति क्षीण होने लगती है और कर्मों की शुद्धि होती है।

दिव्य कृपा और आत्मबोध की प्राप्ति

भगवान श्रीकृष्ण के इन वचनों के प्रति अटूट निष्ठा रखने वाले साधक पर ईश्वर की विशेष कृपा बरसती है। उसे जीवन के हर मोड़ पर सही विवेक (धृति) की प्राप्ति होती है और वह माया के प्रलोभनों से सुरक्षित रहता है।

साक्षी भाव (Detached Witness) का विकास

यह श्लोक व्यक्ति को 'साक्षी दृष्टा' बनने की कला सिखाता है। जीवन की कठिन परिस्थितियों में भी व्यक्ति सुख-दुःख से विचलित हुए बिना एक दर्शक की भांति अपने जीवन को देख पाता है।

एकाग्रता और स्मरण शक्ति में वृद्धि

संस्कृत के इन गूढ़ पदों का उच्चारण और उनकी बौद्धिक व्याख्या विद्यार्थियों और साधकों की स्मरण शक्ति, बौद्धिक तीक्ष्णता तथा वैचारिक स्पष्टता को अत्यधिक सुदृढ़ करती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

Bhaktilok.in का यह लेख सनातन संस्कृति, वैदिक भाषा विज्ञान और श्रीमद्भगवद्गीता के विभिन्न प्रामाणिक भाष्यों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास जी और स्वामी विद्यारण्य जी के ग्रंथों) के गहन अध्ययन के पश्चात संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत प्रस्तुत किया गया है। हमारी संपादकीय टीम यह सुनिश्चित करती है कि प्रत्येक श्लोक की व्याख्या शास्त्रीय नियमों के अनुकूल हो, किसी भी प्रकार की अतिशयोक्तिपूर्ण या भ्रामक दावों से बचा जाए, और पाठकों को वेदों तथा पुराणों का शुद्ध, अकाट्य एवं व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त हो सके। हम डिजिटल माध्यम पर प्रामाणिक धार्मिक सामग्री के उच्चतम मानकों का पालन करने के लिए कटिबद्ध हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

उत्तर: श्रीमद्भगवद्गीता में 'क्षेत्र' का शाब्दिक अर्थ खेत या भूमि है। आध्यात्मिक संदर्भ में, यह संपूर्ण भौतिक शरीर, पंचमहाभूत, अहंकार, बुद्धि, मन तथा इस श्लोक में वर्णित इच्छा, द्वेष, सुख-दुःख जैसे सभी मानसिक और शारीरिक विकारों के समूह को 'क्षेत्र' कहा जाता है। यह वह भूमि है जिसमें जीव अपने कर्मों के बीज बोता है और उनके फल भोगता है। इसे जानने वाला चैतन्य 'क्षेत्रज्ञ' (आत्मा) कहलाता है।

उत्तर: भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से समझाते हैं कि इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, चेतना और धृति—ये सभी प्रकृति और शरीर के विकार (धर्म) हैं, शाश्वत आत्मा (क्षेत्रज्ञ) के नहीं। आत्मा तो केवल इनका द्रष्टा (साक्षी) मात्र है। अज्ञानतावश मनुष्य इन विकारों को अपना स्वरूप मान लेता है, जिससे वह दुखों में बंध जाता है।

उत्तर: 'संघात' का अर्थ है विभिन्न तत्वों (जैसे पंचमहाभूत, कर्मइंद्रियाँ, ज्ञानइंद्रियाँ और अंतःकरण) का इकट्ठा होना या मिलना, जिससे इस भौतिक शरीर की रचना होती है। वहीं 'चेतना' यहाँ उस प्राणशक्ति या संवेदनशीलता को दर्शाती है जो शरीर और मन के स्तर पर कार्य करती है (यद्यपि मूल शुद्ध चैतन्य आत्मा भिन्न है, किंतु यहाँ चेतना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले मानसिक स्फुरण के रूप में वर्णित है)।

उत्तर: जब भी हमारे जीवन में सुख या दुःख की स्थिति आए, या मन में कोई तीव्र इच्छा या द्वेष उत्पन्न हो, तो हमें तुरंत यह विचार करना चाहिए कि "यह भावना मेरे शरीर और मन (क्षेत्र) में हो रही है, मैं इसका दृष्टा हूँ।" इस प्रकार 'साक्षी भाव' का अभ्यास करके हम मानसिक तनाव से मुक्त हो सकते हैं और आंतरिक शांति प्राप्त कर सकते हैं।

उत्तर: हाँ, Bhaktilok.in पर प्रस्तुत सभी श्लोक और उनकी व्याख्याएं पारंपरिक आचार्यों के भाष्यों, उपनिषदों के संदर्भों और वैदिक व्याकरण के नियमों पर आधारित होती हैं। हमारी संपादकीय टीम यह सुनिश्चित करती है कि पाठकों को सनातन धर्म का शुद्ध, तार्किक और आध्यात्मिक रूप से पुष्ट ज्ञान ही प्राप्त हो।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, शरीर, चेतना और धैर्य – ये सब विकारों सहित क्षेत्र के लक्षण हैं।

Desire, hatred, pleasure, pain, the body, consciousness, and fortitude – these along with modifications constitute the field.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ये सभी मानसिक और शारीरिक अवस्थाएँ क्षेत्र (शरीर) की हैं, आत्मा इनसे अलिप्त है।

All these mental and physical states belong to the field; the Self is untouched by them.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 7 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 7/35 20% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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