क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – श्लोक 4
श्लोक ४ में भगवान क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के बारे में संक्षेप में बताने का आश्वासन देते हैं।
संस्कृत श्लोक
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् | स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु || ४ ||
tatkṣetraṃ yacca yādṛkca yadvikāri yataśca yat | sa ca yo yatprabhāvaśca tatsamāsena me śṛṇu || 4 ||
पदच्छेद / शब्दार्थ
तत्: वह; क्षेत्रम्: क्षेत्र; यत्: जो; च: और; यादृक्: जैसा; च: भी; यद्विकारि: जिसके विकार हैं; यतः: जिससे; च: और; यत्: जो; स: वह; च: और; य: जो; यत्प्रभाव: जिसका प्रभाव; च: और; तत्: उसको; समासेन: संक्षेप में; मे: मुझसे; शृणु: सुन
हिंदी अनुवाद
वह क्षेत्र क्या है, कैसा है, उसके क्या विकार हैं और किस कारण से क्या हुआ है, तथा वह (क्षेत्रज्ञ) कौन है और उसके क्या प्रभाव हैं – यह सब संक्षेप में मुझसे सुन।
English Translation
What that field is, of what nature, what its modifications, and from what cause, and who He is, and what His powers are—hear all this from Me in brief.
टीका / Commentary
भगवान अब क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के स्वरूप, उनके गुणों और प्रभावों का संक्षिप्त विवरण देने का वचन देते हैं। The Lord promises to briefly describe the nature, modifications, and powers of both the field and its knower.