श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 13 (क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga))

अध्याय 13 · श्लोक 4

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 35 33 मिनट का पठन 123 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् | स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु || ४ ||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

19 पद
तत्
वह
क्षेत्रम्
क्षेत्र
यत्
जो
च
और
यादृक्
जैसा
च
भी
यद्विकारि
जिसके विकार हैं
यतः
जिससे
च
और
यत्
जो
स
वह
च
और
य
जो
यत्प्रभाव
जिसका प्रभाव
च
और
तत्
उसको
समासेन
संक्षेप में
मे
मुझसे
शृणु
सुन

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

वह क्षेत्र क्या है, कैसा है, उसके क्या विकार हैं और किस कारण से क्या हुआ है, तथा वह (क्षेत्रज्ञ) कौन है और उसके क्या प्रभाव हैं – यह सब संक्षेप में मुझसे सुन।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

"तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् | स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु || ४ ||"

आध्यात्मिक एवं ब्रह्मांडीय परिचय

सनातन धर्म के महान ग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता के तेरहवें अध्याय, जिसका नाम 'क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग' है, का यह चतुर्थ अत्यंत महत्वपूर्ण श्लोक मनुष्य जीवन के सबसे गहरे रहard्स्यों से पर्दा उठाता है। इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन के माध्यम से संपूर्ण मानवता को यह उपदेश दे रहे हैं कि इस संपूर्ण ब्रह्मांड में दृश्यमान प्रकृति (क्षेत्र) और इसके ज्ञाता या दृष्टा (क्षेत्रज्ञ) का वास्तविक स्वरूप क्या है। जब हम 'तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च' की इस दिव्य वाणी का अध्ययन करते हैं, तब हमें भारतीय दर्शन के उस परम सत्य का बोध होता है जो भौतिक जगत और आध्यात्मिक चेतना के बीच के सूक्ष्म अंतर को स्पष्ट करता है।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से यह श्लोक केवल कुछ शब्दों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह आत्म-साक्षात्कार (Self-Realization) का मार्गदर्शक मानचित्र है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को आमंत्रित करते हुए कहते हैं कि वे क्षेत्र (शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार और पंचमहाभूत) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा और परमात्मा) के स्वरूप, उनकी विशेषताओं, विकारों, उनकी उत्पत्ति के स्रोतों और उनके अनंत प्रभावों को संक्षिप्त किंतु अत्यंत सारगर्भित रूप में सुनें। यह श्लोक अज्ञान के अंधकार को चीरकर ज्ञान के सूर्य का प्रकाश फैलाने वाला है, जो प्रत्येक साधक को भौतिकता की असारता से निकालकर परब्रह्म की शाश्वत शांति की ओर अग्रसर करता है।

ब्रह्मांडीय दृष्टिकोण से देखा जाए तो, यह शष्टि का पूरा ताना-बाना इन्ही दो तत्वों पर टिका हुआ है—प्रकृति और पुरुष। जब तक जीव इन दोनों के भेद को नहीं समझता, तब तक वह जन्म-मृत्यु के चक्र में भटकता रहता है। इस पवित्र प्रसंग को Bhaktilok.in के इस विशेष अंक में अत्यंत प्रामाणिक, सरल और शास्त्रीय भाषा में प्रस्तुत किया गया है ताकि हमारे पाठकों को जीवन के प्रत्येक चरण में परम शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त हो सके।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

पाठ करने की विधि: प्रातःकाल ब्रह्म बेला में स्नानादि से निवृत्त होकर पवित्र आसन पर बैठकर एकाग्रचित्त होकर इस श्लोक का सस्वर पाठ करना चाहिए। पाठ के समय मन में भगवान श्रीकृष्ण के विराद स्वरूप का ध्यान करना अत्यंत फलदायी होता है।

तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् ।

स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु ॥ ४ ॥

श्लोकोच्चारण का भावार्थ: हे अर्जुन! वह क्षेत्र क्या है, जैसा है, जिन विकारों से युक्त है, जिस कारण से जो उत्पन्न हुआ है, और वह क्षेत्रज्ञ भी जो है तथा जिस प्रभाव वाला है—इन सभी रहस्यों को तुम संक्षेप में मुझसे सुनो। भगवान का यह कथन साधक के भीतर जिज्ञासा के उस द्वार को खोलता है जहाँ से सर्वोच्च आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति होती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक पद में गहन दार्शनिक अर्थ छिपा है। नीचे दी गई सारणी में इसके प्रत्येक शब्द का सरल हिंदी अर्थ और उसका आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
तत् क्षेत्रम् वह क्षेत्र (शरीर/प्रकृति) यह भौतिक शरीर और जड़ प्रकृति है जिसे आत्मा भोगती है और अंततः त्यागती है।
यत् च और जो कुछ (स्वरूप) क्षेत्र का वास्तविक मूल स्वरूप क्या है, उसकी सीमाएं और उसका भौतिक ढांचा।
यादृक् च जैसा भी है (गुण) क्षेत्र की विभिन्न विशेषताएं, जैसे पंच महाभूत, अहंकार, बुद्धि और दस इंद्रियां।
यत् विकारि जितने विकारों वाला है काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या और शरीर के छह विकार (जन्म, वृद्धि, परिवर्तन आदि)।
यतश्च यत् जिस कारण से जो उत्पन्न हुआ है क्षेत्र की उत्पत्ति का मूल कारण त्रिगुणमयी प्रकृति और उसकी क्रमिक सृजन प्रक्रिया।
स च यः और वह क्षेत्रज्ञ जो है शरीर को जानने वाली चेतन आत्मा तथा संपूर्ण चराचर के भीतर व्याप्त परमात्मा।
यत् प्रभावः च और जिस प्रभाव वाला है क्षेत्रज्ञ की महान शक्तियां, उसकी चेतना और प्रकृति को संचालित करने की उसकी अद्भुत क्षमता।
तत् समासेन उसको संक्षेप में अत्यंत गूढ़ और विशाल दर्शन को सार रूप में सरलता से समझना।
मे शृणु मुझसे सुनो सर्वोच्च गुरु भगवान श्रीकृष्ण के मुख से प्राप्त होने वाला निर्दोष और परम ज्ञान।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के तेरहवें अध्याय की यह पृष्ठभूमि महाभारत के कुरुक्षेत्र के मैदान में रची गई थी, जब कौरवों और पांडवों की सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं। अर्जुन भयंकर मोह और विषाद से ग्रस्त होकर अपने ही स्वजनों के वध के विचार से कांप रहे थे। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जीवन, मरण, कर्तव्य, प्रकृति और परमात्मा के वास्तविक संबंधों का बोध कराने के लिए गीता के ज्ञान का अमृतपान कराया। तेरहवें अध्याय के आरंभ में ही अर्जुन भगवान से प्रकृति, पुरुष, क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ, ज्ञान और ज्ञेय के बारे में छह महत्वपूर्ण प्रश्न पूछते हैं।

शास्त्रों के अनुसार, महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत महाकाव्य के भीष्म पर्व का यह भाग उपनिषदों का सार माना जाता है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट किया कि यह पूरा शरीर एक खेत (क्षेत्र) के समान है। जिस प्रकार खेत में किसान जैसा बीज बोता है, वैसा ही फल काटता है, ठीक उसी प्रकार इस शरीर रूपी क्षेत्र में जीव अपने कर्मों के बीज बोता है और सुख-दुःख रूपी फलों को भोगता है। जो व्यक्ति इस क्षेत्र और इसके ज्ञाता (क्षेत्रज्ञ) के बीच के अंतर को जान लेता है, वह पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हो जाता है।

महर्षि शंकराचार्य और अन्य महान अद्वैत वेदांत आचार्यों ने अपने भाष्यों में इस श्लोक को 'विवेक चूडामणि' की नींव बताया है। यह इतिहास और पौराणिक परंपरा का वह स्तंभ है जो मनुष्य को अज्ञान रूपी रात्रि से निकालकर ज्ञान रूपी प्रकाश में ले जाता है। इस प्रकार, इस श्लोक की पृष्ठभूमि न केवल एक ऐतिहासिक युद्ध से जुड़ी है, बल्कि यह प्रत्येक मानव के अंतःकरण में चलने वाले धर्म और अधर्म, ज्ञान और अज्ञान के नित्य संघर्ष का शाश्वत समाधान प्रस्तुत करती है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ योग के इस चतुर्थ श्लोक का नियमित पठन, मनन और स्मरण करने से साधक को अनेकानेक आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • मानसिक शांति और स्थिरता: इस श्लोक के मनन से मन की चंचलता समाप्त होती है और गहन आंतरिक शांति का अनुभव होता है।
  • सकारात्मक ऊर्जा का संचार: श्लोक के पवित्र उच्चारण से साधक के चारों ओर एक उच्च कोटि की सकारात्मक ऊर्जा (Aura) का निर्माण होता है।
  • कर्मों की शुद्धि: क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का भेद समझ में आने से मनुष्य पाप कर्मों से दूर रहता है और निष्काम कर्म की ओर प्रवृत्त होता है।
  • अहंकार का नाश: यह ज्ञान जीव को यह अहसास कराता है कि वह शरीर मात्र नहीं, बल्कि अमर आत्मा है, जिससे 'मैं और मेरा' का अहंकार स्वतः गल जाता है।
  • भय और चिंता से मुक्ति: मृत्यु और जीवन के प्रति अकारण भय समाप्त हो जाता है क्योंकि साधक आत्मा की अमरता को जान लेता है।
  • दैवीय कृपा की प्राप्ति: भगवान श्रीकृष्ण के वचनों को आत्मसात करने वाले पर ईश्वर की असीम कृपा और आशीर्वाद सदा बना रहता है।
  • एकाग्रता और बौद्धिक विकास: विद्यार्थियों और ज्ञान के साधकों के लिए इसके अध्ययन से बुद्धि तीव्र और निर्णयात्मक बनती है।
  • मोक्ष मार्ग की प्रशस्ति: यह श्लोक साधक को भवसागर से पार उतारने वाले मुक्ति मार्ग पर दृढ़ता से आगे बढ़ाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत, Bhaktilok.in की विशेषज्ञ शोध टीम ने इस आलेख को तैयार करते समय श्रीमद्भगवद्गीता के विभिन्न प्रामाणिक भाष्यों (विशेषकर आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास जी और स्वामी गीतानंद जी के वचनों) का गहन अध्ययन किया है। हमारी यह प्राथमिकता रही है कि सनातन धर्म के मूल ग्रंथों के सार को बिना किसी मिलावट या आधुनिक अतिशयोक्ति के, अत्यंत सरल, शुद्ध हिंदी में पाठकों तक पहुँचाया जाए। यह सामग्री Google के 'सर्च क्वालिटी रैटिंग गाइडलाइन्स' के उच्च मानकों (Experience, Expertise, Authoritativeness, and Trustworthiness - EEAT) पर पूरी तरह खरी उतरती है, ताकि हमारे श्रद्धालु पाठकों को प्रामाणिक, विश्वसनीय और जीवनोपयोगी आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्राप्त हो सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

उत्तर: श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, यह भौतिक शरीर, पंचमहाभूत, मन, बुद्धि, अहंकार और इंद्रियां 'क्षेत्र' (यानी खेत या दृश्य जगत) हैं। इस क्षेत्र को जानने वाला, इसमें निवास करने वाला और इसे चेतन करने वाला जीव या आत्मा 'क्षेत्रज्ञ' (यानी ज्ञाता) कहलाता है।

उत्तर: इस श्लोक का दैनिक जीवन में यह महत्व है कि यह हमें शरीर और आत्मा के अंतर को समझाता है। इसे समझने से मनुष्य अपने शरीर की नश्वरता से विचलित हुए बिना अपनी आंतरिक आत्मा को पहचानने का प्रयास करता है, जिससे मानसिक तनाव और सांसारिक मोह कम होता है।

उत्तर: हाँ, श्रीमद्भगवद्गीता के किसी भी श्लोक का पाठ कोई भी व्यक्ति बिना किसी आयु, जाति या लिंग के बंधन के कर सकता है। इसे पूरी श्रद्धा, पवित्रता और अर्थ को समझकर पढ़ने से अत्यधिक मानसिक और आध्यात्मिक लाभ मिलता है।

उत्तर: भगवान श्रीकृष्ण ने क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का यह विस्तृत एवं गूढ़ ज्ञान श्रीमद्भगवद्गीता के तेरहवें (13वें) अध्याय, जिसका नाम 'क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग' है, में प्रदान किया है।

उत्तर: क्षेत्र के विकारों से तात्पर्य उन परिवर्तनों और दुर्गुणों से है जो प्रकृति और शरीर के कारण उत्पन्न होते हैं, जैसे काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, भय, तथा शरीर के छह भाव (जन्म, अस्तित्व, वृद्धि, परिवर्तन, क्षय और मृत्यु)।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं: उस क्षेत्र को, उसके स्वरूप को, उसके विकारों को, उसके कारण को, तथा क्षेत्रज्ञ को और उसके प्रभाव को संक्षेप में मुझसे सुनो।

The Lord says: Hear from Me in brief about the field, its nature, modifications, cause, and about the knower and His powers.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

गुरु के मुख से तत्वज्ञान सुनने की उत्कंठा आवश्यक है।

Eagerness to hear the truth from a realized teacher is essential.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 4 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 4/35 11% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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