श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 13 (क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga))

अध्याय 13 · श्लोक 3

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 35 31 मिनट का पठन 128 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत | क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम || ३ ||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
क्षेत्रज्ञम्
क्षेत्रज्ञ को
च
और
अपि
भी
माम्
मुझको
विद्धि
जानो
सर्वक्षेत्रेषु
समस्त क्षेत्रों में
भारत
हे भारत
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयो
क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का
ज्ञानम्
ज्ञान
यत्
जो
तत्
वह
ज्ञानम्
ज्ञान
मतम्
माना गया
मम
मेरे द्वारा

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे भारत! सम्पूर्ण क्षेत्रों में (स्थित) क्षेत्रज्ञ को भी तू मुझे ही जान। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है, वही (वास्तविक) ज्ञान मेरा मत है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में श्रीमद्भागवतगीता का स्थान परम पूज्य और मार्गदर्शक का है। यह ग्रंथ केवल युद्ध के मैदान में दिया गया उपदेश मात्र नहीं है, अपितु यह मानव जीवन के प्रत्येक प्रश्न, उसकी दार्शनिक जिज्ञासाओं और आध्यात्मिक उन्नति का सर्वोच्च मार्गदर्शक है। गीता के तेरहवें अध्याय, जिसका नाम 'क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग' है, में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के माध्यम से संपूर्ण मानवता को प्रकृति (क्षेत्र) और पुरुष (क्षेत्रज्ञ) के अत्यंत सूक्ष्म एवं गूढ़ अंतर को समझाया है। प्रस्तुत श्लोक—"क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत | क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम || ३ ||"—इस पूरे अध्याय का केंद्रीय स्तंभ और दार्शनिक आत्मा है।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से, यह श्लोक जीव और ब्रह्म के उस अद्वैत संबंध को उजागर करता है, जिसे समझकर मनुष्य जीवन के बंधनों से मुक्त हो सकता है। 'क्षेत्र' का अर्थ है यह भौतिक शरीर, जो जन्मता है, परिवर्तित होता है और अंत में नष्ट हो जाता है। वहीं दूसरी ओर 'क्षेत्रज्ञ' वह चेतना, वह आत्मा है जो इस शरीर को जानती है, इसका अनुभव करती है और इसके भीतर साक्षी भाव से विराजमान है। भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में स्पष्ट रूप से घोषणा करते हैं कि न केवल वे व्यक्तिगत आत्माओं के रूप में हर शरीर में निवास करते हैं, बल्कि वे ही समस्त ब्रह्मांड के मूल क्षेत्रज्ञ हैं। इस प्रकार, जब एक साधक अपने भीतर और बाहर स्थित क्षेत्र तथा क्षेत्रज्ञ के बीच के भेद को स्पष्ट रूप से जान लेता है, तो वही यथार्थ ज्ञान कहलाता है। Bhaktilok.in के इस विस्तृत आलेख में हम इसी महामंत्र के शाश्वत अर्थ, इसकी शास्त्रीय पृष्ठभूमि और इसके व्यावहारिक एवं आध्यात्मिक लाभों का गहन अन्वेषण करेंगे।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥ ३ ॥

श्रीमद्भागवतगीता — अध्याय १३, श्लोक ३

श्लोकोच्चारण एवं पाठ की विधि: इस पावन श्लोक का पाठ करने से पूर्व साधक को चाहिए कि वह पवित्र होकर शांत चित्त से आसन ग्रहण करे। श्लोक का उच्चारण स्पष्ट, सस्वर और इसके छंद (अनुष्टुप छंद) की लय के अनुसार होना चाहिए। इसका नियमित पाठ मन को अंतर्मुखी बनाता है और भौतिक विकारों से ऊपर उठकर आत्मिक चेतना को जागृत करता है। गीता के इस श्लोक का स्मरण करते समय यह भाव रखना चाहिए कि यह भगवान श्रीकृष्ण के सीधे मुख से निकला हुआ वह सत्य है जो अज्ञान के अंधकार को चीरकर ज्ञान का प्रकाश फैलाता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
क्षेत्रज्ञम् क्षेत्र को जानने वाला, आत्मा या चेतना वह दिव्य सत्ता जो शरीर रूपी क्षेत्र की हर गतिविधि, सुख, दुख और परिवर्तन को देखती और जानती है।
च अपि और भी, तथा निश्चित रूप से यह शब्द इस बात पर जोर देता है कि व्यक्तिगत आत्मा के साथ-साथ परमात्मा भी इसमें निहित हैं।
माम् मुझको (भगवान श्रीकृष्ण को) श्रीकृष्ण स्वयं को समस्त शरीरों में व्याप्त उस परम चेतना के रूप में स्थापित कर रहे हैं।
विद्धि तू जान, समझ ले अर्जुन को (तथा समस्त साधकों को) यह आदेश दिया जा रहा है कि इस सत्य को केवल सुनें नहीं, बल्कि भली-भांति अनुभव करें।
सर्वक्षेत्रेषु समस्त शरीरों में, सभी क्षेत्रों में यह व्यापकता को दर्शाता है; परमात्मा केवल एक शरीर में नहीं, बल्कि चराचर के हर शरीर में निवास करते हैं।
भारत हे भारत! (अर्जुन का संबोधन) वंश की महानता का स्मरण कराते हुए अर्जुन को इस उच्चकोटि के ज्ञान को ग्रहण करने योग्य बताया गया है।
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोः क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ दोनों का भौतिक प्रकृति (शरीर) और आध्यात्मिक चेतना (आत्मा/परमात्मा) दोनों का समग्र और पृथक ज्ञान।
ज्ञानम् यथार्थ बोध, विवेक, ज्ञान केवल किताबी ज्ञान नहीं, अपितु प्रत्यक्ष अनुभव जो माया के आवरण को हटा देता है।
यत् तत् जो वही उस विशिष्ट प्रकार का ज्ञान जो सभी ज्ञानों में श्रेष्ठ और सर्वोपरि माना गया है।
मतं मम मेरा मत है, मेरा अंतिम निर्णय है स्वयं भगवान श्रीकृष्ण की मुहर इस बात पर है कि यही सर्वोच्च आध्यात्मिक सत्य है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

महाभारत के युद्ध के आरंभ होने से ठीक पहले, जब कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों सेनाएं आमने-सामने थीं, तब अर्जुन अपने प्रियजनों को देखकर अत्यधिक मोहग्रस्त और विषाद से भर गए थे। उनका गांडीव हाथ से छूट रहा था और मन में कर्तव्य को लेकर भयंकर असमंजस था। ऐसे संकटपूर्ण क्षण में भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जीवन का परम पाठ पढ़ाया, जिसे हम श्रीमद्भागवतगीता के रूप में जानते हैं। गीता के अठारह अध्यायों को तीन प्रमुख भागों (षट्क) में बांटा गया है—पहला कर्मयोग, दूसरा भक्तियोग और बीच का हिस्सा ज्ञानयोग का है।

तेरहवां अध्याय इसी ज्ञानयोग के अंतर्गत आता है, जिसकी शुरुआत अर्जुन के दो अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्नों से होती है—प्रकृति क्या है, पुरुष क्या है, क्षेत्र क्या है, क्षेत्रज्ञ क्या है, ज्ञान क्या है और ज्ञेय क्या है? इन प्रश्नों का उत्तर देते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र की उस पावन भूमि पर अर्जुन को इस ब्रह्मांड के सबसे गहरे रहस्यों से परिचित कराया। वेदव्यास जी द्वारा रचित महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत आने वाली यह भगवद्गीता वस्तुतः उपनिषदों का सार है। इस श्लोक में भगवान ने वेदों के उस महावाक्य "अहं ब्रह्मास्मि" और "तत्त्वमसि" के व्यावहारिक रूप को स्पष्ट किया है, जहां जीव और जगत के बीच के भ्रम को मिटाकर केवल एक ही परम चेतना के दर्शन कराए गए हैं। महर्षि व्यास के अनुसार, जो इस क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को समझ लेता है, वह फिर कभी भी मोह के चक्रव्यूह में नहीं फंसता।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भागवतगीता के इस अद्भुत श्लोक का नियमित पाठ, मनन और इसके मर्म को आत्मसात करने से साधक को अनेकों आध्यात्मिक और मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • 1. मानसिक शांति और स्थिरता: शरीर और आत्मा का भेद समझ आने पर सांसारिक सुख-दुखों का प्रभाव मन पर कम होने लगता है, जिससे गहरी मानसिक शांति मिलती है।
  • 2. सकारात्मक ऊर्जा का संचार: यह श्लोक साधक के भीतर दिव्यता का अहसास कराता है, जिससे नकारात्मक विचार और भय स्वतः दूर हो जाते हैं।
  • 3. कर्म बंधनों से मुक्ति: जब व्यक्ति यह जान लेता है कि वह केवल इस शरीर (क्षेत्र) का भोग करने वाला नहीं बल्कि दृष्टा (क्षेत्रज्ञ) है, तो वह कर्मों के बंधनों से अनासक्त हो जाता है।
  • 4. अहंकार का नाश: 'मैं शरीर हूँ' यह भ्रांति समाप्त होती है और 'मैं शुद्ध चैतन्य हूँ' यह बोध जागृत होता है, जिससे अहंकार का शमन होता है।
  • 5. भगवत्कृपा की प्राप्ति: भगवान श्रीकृष्ण के इस प्रिय मत का स्मरण करने से साधक पर भगवान की अहैतुर्जी कृपा बरसती है।
  • 6. ध्यान और साधना में एकाग्रता: इस श्लोक के चिंतन से ध्यान (Meditation) की गहराई बढ़ती है क्योंकि मन बाहरी प्रलोभनों से हटकर भीतर की ओर मुड़ जाता है।
  • 7. जीवन के प्रति सही दृष्टिकोण: जीवन में आने वाली हर परिस्थिति को साक्षी भाव से देखने की क्षमता विकसित होती है, जिससे निराशा पास नहीं फटकती।
  • 8. मोक्ष मार्ग की प्रशस्ति: जन्म और मृत्यु के चक्र से छूटने का मार्ग यही ज्ञान प्रशस्त करता है, जो इस श्लोक के माध्यम से भगवान ने सीधे प्रदान किया है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख वेदों, उपनिषदों, श्रीमद्भागवतगीता के विभिन्न भाष्यों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास जी और स्वामी विवेकानंद के दृष्टिकोण) का गहन अध्ययन करके संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक सनातन धर्म के मूल ग्रंथों का शुद्ध, त्रुटिहीन और दार्शनिक रूप से प्रामाणिक ज्ञान पहुँचाना है। प्रत्येक श्लोक का अर्थ व्याकरणिक शुद्धता और परंपरा के अनुसार सत्यापित किया गया है, ताकि डिजिटल माध्यम पर पाठकों को उच्च कोटि की आध्यात्मिक सामग्री प्राप्त हो सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

श्रीमद्भागवतगीता के अनुसार, 'क्षेत्र' वह भौतिक शरीर है जिसमें पांच महाभूत, अहंकार, बुद्धि, मन और इंद्रियां शामिल हैं। यह परिवर्तनशील और नश्वर है। वहीं 'क्षेत्रज्ञ' वह अमर आत्मा या चेतना है जो इस शरीर को जानती है, इसका अनुभव करती है और इसमें साक्षी रूप से निवास करती है।

भगवान श्रीकृष्ण सर्वव्यापी परमात्मा हैं। यद्यपि प्रत्येक जीव की अपनी व्यक्तिगत आत्मा (क्षेत्रज्ञ) होती है, किंतु उन सबका मूल आधार और सर्वोच्च नियंता स्वयं परमेश्वर ही हैं। इसलिए वे घोषणा करते हैं कि समस्त शरीरों में स्थित मुख्य क्षेत्रज्ञ वे स्वयं ही हैं।

जब तक मनुष्य अपने शरीर (प्रकृति) और अपनी आत्मा (चेतना) के अंतर को नहीं समझता, तब तक वह शरीर को ही सब कुछ मानकर मोह, शोक और बंधनों में फंसा रहता है। इस यथार्थ ज्ञान के बिना मनुष्य जन्म-मृृत्यु के चक्र से मुक्त नहीं हो सकता।

हाँ, श्रीमद्भागवतगीता का प्रत्येक श्लोक संपूर्ण मानवता के कल्याण के लिए है। किसी भी आयु, वर्ग या पृष्ठभूमि का व्यक्ति पूरी श्रद्धा और पवित्रता के साथ इस श्लोक का पाठ और स्मरण कर सकता है।

दैनिक जीवन में जब भी सुख या दुख की परिस्थितियां आएं, तब यह स्मरण रखें कि शरीर और मन बदल रहे हैं, किंतु देखने वाली आत्मा अचल है। इस साक्षी भाव को जीवन में अपनाकर ही इस श्लोक के मर्म को उतारा जा सकता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं कि मैं सभी शरीरों में स्थित आत्मा के रूप में हूँ। क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) का यथार्थ ज्ञान ही सच्चा ज्ञान है।

The Lord says: I am the knower in all bodies. The true knowledge is the understanding of the field and its knower.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

परमात्मा सभी में व्याप्त है, और उसे पहचानना ही ज्ञान का लक्ष्य है।

The Supreme pervades all, and recognizing Him is the goal of knowledge.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 3 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 3/35 9% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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