क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – श्लोक 3

श्लोक ३ में भगवान कृष्ण कहते हैं कि वे सभी क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ हैं और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का ज्ञान ही सच्चा ज्ञान है।

संस्कृत श्लोक

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत | क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम || ३ ||

kṣetrajñaṃ cāpi māṃ viddhi sarvakṣetreṣu bhārata | kṣetrakṣetrajñayorjñānaṃ yattajjñānaṃ mataṃ mama || 3 ||

पदच्छेद / शब्दार्थ

क्षेत्रज्ञम्: क्षेत्रज्ञ को; च: और; अपि: भी; माम्: मुझको; विद्धि: जानो; सर्वक्षेत्रेषु: समस्त क्षेत्रों में; भारत: हे भारत; क्षेत्रक्षेत्रज्ञयो: क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का; ज्ञानम्: ज्ञान; यत्: जो; तत्: वह; ज्ञानम्: ज्ञान; मतम्: माना गया; मम: मेरे द्वारा

हिंदी अनुवाद

हे भारत! सम्पूर्ण क्षेत्रों में (स्थित) क्षेत्रज्ञ को भी तू मुझे ही जान। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है, वही (वास्तविक) ज्ञान मेरा मत है।

English Translation

Know Me also as the knower of the field in all fields, O Bharata. The knowledge of the field and its knower is considered by Me to be the (real) knowledge.

टीका / Commentary

भगवान स्वयं को सभी शरीरों में स्थित क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के रूप में घोषित करते हैं। क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का यथार्थ बोध ही सच्चा ज्ञान है। The Lord declares Himself to be the knower in all bodies. True knowledge is understanding the distinction between the field and its knower.