श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 13 (क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga))

अध्याय 13 · श्लोक 2

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 35 42 मिनट का पठन 142 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्रीभगवानुवाच | इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते | एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः || २ ||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

16 पद
श्रीभगवान्
भगवान
उवाच
बोले
इदम्
यह
शरीरम्
शरीर
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
क्षेत्रम्
क्षेत्र
इति
इस प्रकार
अभिधीयते
कहा जाता है
एतत्
इसको
य
जो
वेत्ति
जानता है
तम्
उसको
प्राहु
कहते हैं
क्षेत्रज्ञ
क्षेत्रज्ञ
इति
इस प्रकार
तद्विद
तत्व को जानने वाले

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

श्रीभगवान् बोले: हे कुन्तीपुत्र! यह शरीर क्षेत्र कहा जाता है और जो इसको जानता है, उसे क्षेत्रज्ञ कहते हैं – ऐसा तत्ववेत्ताओं का कथन है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता के तेरहवें अध्याय, जिसे 'क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग' के नाम से जाना जाता है, का यह द्वितीय श्लोक आध्यात्मिक ज्ञान की पराकाष्ठा है। यहाँ से भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को प्रकृति और पुरुष, जड़ और चेतन, तथा शरीर और आत्मा के सूक्ष्म अंतर को समझाना प्रारंभ करते हैं। यह केवल एक श्लोक नहीं, बल्कि आत्म-साक्षात्कार की वह कुंजी है जो मनुष्य को देह-अभिमान से मुक्त कर ब्रह्म-बोध की ओर ले जाती है।

ब्रह्मांड के इस महानतम संवाद में, अर्जुन ने भगवान से छह प्रश्न पूछे थे: प्रकृति, पुरुष, क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ, ज्ञान और ज्ञेय। भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से 'क्षेत्र' और 'क्षेत्रज्ञ' की परिभाषा अत्यंत सरल और वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत करते हैं। 'क्षेत्र' का अर्थ है वह भूमि या आधार जहाँ कर्मों के बीज बोए जाते हैं, और 'क्षेत्रज्ञ' वह है जो उस भूमि की प्रत्येक गतिविधि को जानता है।

सांस्कृतिक और दार्शनिक दृष्टि से, यह श्लोक भारतीय मनीषा के उस सत्य को उद्घाटित करता है जहाँ शरीर को केवल हाड़-मांस का पुतला न मानकर एक 'कर्म-क्षेत्र' माना गया है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि हम यह शरीर नहीं हैं, बल्कि इस शरीर के भीतर वास करने वाली वह चेतना हैं जो इसके हर सुख-दुख, जन्म-मृत्यु और परिवर्तन की साक्षी है। इस बोध के जागृत होते ही मनुष्य के जीवन से भय, शोक और मोह का नाश हो जाता है। आधुनिक मनोविज्ञान और विज्ञान भी आज इस सत्य की ओर बढ़ रहे हैं कि 'प्रेक्षक' (Observer) और 'प्रेक्षित' (Observed) के बीच एक गहरा संबंध है, जिसे भगवान ने हजारों वर्ष पूर्व इस श्लोक में स्पष्ट कर दिया था।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

॥ श्रीभगवानुवाच ॥

इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते |
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः || २ ||


पठन एवं उच्चारण विधि:

इस श्लोक का पाठ अत्यंत श्रद्धा और एकाग्रता के साथ करना चाहिए। पाठ करने से पूर्व शुद्ध अवस्था में बैठकर, भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करें। 'इदं शरीरं' का उच्चारण करते समय अपने भौतिक अस्तित्व का स्मरण करें और 'क्षेत्रज्ञ' शब्द पर आते ही अपनी आंतरिक चेतना पर ध्यान केंद्रित करें। इस श्लोक का नियमित जप मानसिक स्पष्टता और आत्म-ज्ञान की प्राप्ति में सहायक होता है।

लिप्यंतरण (Transliteration):
idaṁ śarīraṁ kaunteya kṣetram ity abhidhīyate |
etad yo vetti taṁ prāhuḥ kṣetrajña iti tadvidaḥ || 2 ||

संदर्भ: यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के 13वें अध्याय (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग) का दूसरा श्लोक है। यहाँ भगवान अर्जुन को संबोधित करते हुए ज्ञान के सबसे गहरे आयाम को स्पर्श कर रहे हैं। इस अध्याय को 'प्रकृति-पुरुष विवेक' भी कहा जाता है, क्योंकि यह विवेक (Discrimination) की शक्ति को जागृत करता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
इदम् (Idam) यह यह दृश्यमान जगत और प्रत्यक्ष अनुभव में आने वाला भौतिक अस्तित्व।
शरीरम् (Śarīram) शरीर / देह पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से बना वह ढांचा जो परिवर्तनशील है।
कौन्तेय (Kaunteya) हे कुन्तीपुत्र (अर्जुन) भगवान अर्जुन को उनके मातृ-पक्ष से संबोधित कर रहे हैं, जो स्नेह और अधिकार का सूचक है।
क्षेत्रम् (Kṣetram) खेत / कार्यक्षेत्र वह स्थान जहाँ कर्म के बीज बोए जाते हैं और फल प्राप्त होते हैं। शरीर ही साधना का क्षेत्र है।
इति (Iti) इस प्रकार / ऐसा एक निश्चित परिभाषा या निष्कर्ष को दर्शाने वाला अव्यय।
अभिधीयते (Abhidhīyate) कहा जाता है शास्त्रों और ऋषियों द्वारा इस नाम से पुकारा या परिभाषित किया गया है।
एतत् (Etat) इसको उपरोक्त शरीर या क्षेत्र के संदर्भ में।
यः (Yaḥ) जो वह सत्ता या चेतना जो जानने की शक्ति रखती है।
वेत्ति (Vetti) जानता है अनुभव करना, साक्षी होना या पूर्णतः बोध प्राप्त करना।
तम् (Tam) उसको उस जानने वाले तत्व को।
प्राहुः (Prāhuḥ) कहते हैं विद्वानों और तत्वज्ञानियों द्वारा घोषित किया गया है।
क्षेत्रज्ञः (Kṣetrajñaḥ) क्षेत्र का ज्ञाता आत्मा या वह दृष्टा जो शरीर की क्रियाओं को बिना लिप्त हुए देखता है।
तद्विदः (Tadvidaḥ) तत्व को जानने वाले वे महापुरुष जिन्होंने सत्य का साक्षात्कार कर लिया है (The knowers of the truth)।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता का तेरहवाँ अध्याय महाभारत के युद्ध के उस महत्वपूर्ण मोड़ पर आता है जहाँ अर्जुन के मन में केवल युद्ध और विजय की इच्छा नहीं, बल्कि अस्तित्व के गहरे रहस्यों को जानने की जिज्ञासा उत्पन्न होती है। महाभारत के 'भीष्म पर्व' का हिस्सा होने के नाते, गीता का यह उपदेश कुरुक्षेत्र की रणभूमि में दिया गया था।

पौराणिक संदर्भों के अनुसार, जब अर्जुन ने देखा कि सामने खड़े सभी योद्धा, संबंधी और गुरुजन अंततः काल के गाल में समा जाने वाले हैं, तब उनके मन में यह प्रश्न उठा कि "वास्तव में सत्य क्या है? क्या यह शरीर ही सब कुछ है, या इसके भीतर कुछ और भी है?" भगवान श्रीकृष्ण, जो साक्षात् परब्रह्म हैं, अर्जुन की इस व्याकुलता को पहचान लेते हैं। वे जानते हैं कि जब तक मनुष्य 'स्व' (Self) और 'अनात्म' (Non-Self) के अंतर को नहीं समझेगा, तब तक वह मोह के जाल से मुक्त नहीं हो सकता।

इस श्लोक की पृष्ठभूमि सांख्य दर्शन (Sankhya Philosophy) और वेदांत (Vedanta) के संगम पर टिकी है। महर्षि व्यास ने इस संवाद को इस प्रकार संकलित किया है कि यह हर युग के मनुष्य के लिए प्रासंगिक रहे। 'क्षेत्र' शब्द का प्रयोग यहाँ अत्यंत गूढ़ है। जिस प्रकार एक किसान अपने खेत में जैसा बीज बोता है, वैसी ही फसल काटता है, उसी प्रकार यह शरीर भी एक खेत है। हमारे विचार, शब्द और कर्म बीज हैं। हमारी वर्तमान परिस्थितियाँ उन बीजों की फसल हैं।

प्राचीन काल में, उपनिषदों के ऋषियों ने भी इसी सत्य को 'अहं ब्रह्मास्मि' और 'तत्त्वमसि' के माध्यम से समझाया था। भगवान श्रीकृष्ण यहाँ उसी उपनिषदिक ज्ञान को सरल भाषा में अर्जुन को दे रहे हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि जो इस शरीर को 'मेरा' कहता है, वह 'क्षेत्रज्ञ' है। जैसे हम कहते हैं "मेरा हाथ", "मेरा सिर", "मेरा विचार", तो स्पष्ट है कि 'मैं' इन अंगों और विचारों से भिन्न हूँ। यही भिन्नता का बोध 'क्षेत्रज्ञ' होने का प्रमाण है। इस ज्ञान को 'तद्विदः' यानी तत्ववेत्ताओं ने प्रमाणित किया है, जिससे इसकी शास्त्रीय प्रामाणिकता सिद्ध होती है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • आत्म-साक्षात्कार की प्राप्ति: इस श्लोक के मनन से साधक को यह बोध होता है कि वह अविनाशी आत्मा है, न कि नश्वर शरीर।
  • मृत्यु के भय से मुक्ति: जब व्यक्ति स्वयं को 'क्षेत्रज्ञ' (ज्ञाता) के रूप में पहचान लेता है, तो शरीर के नष्ट होने का भय समाप्त हो जाता है।
  • मानसिक शांति और स्थिरता: शारीरिक कष्टों और बीमारियों के समय यह ज्ञान मानसिक संबल प्रदान करता है कि "कष्ट शरीर को है, मुझे (आत्मा को) नहीं।"
  • कर्मों के प्रति जागरूकता: शरीर को 'क्षेत्र' मानने से मनुष्य अपने कर्मों के प्रति सचेत हो जाता है, जिससे वह पाप कर्मों से बचता है।
  • अहंकार का शमन: यह श्लोक सिखाता है कि शरीर और उसकी उपलब्धियाँ प्रकृति की देन हैं, जिससे मिथ्या अहंकार दूर होता है।
  • सकारात्मक आभा (Aura) का निर्माण: इस उच्च विचार के निरंतर चिंतन से व्यक्ति के चारों ओर एक दिव्य ऊर्जा का संचार होता है।
  • इंद्रिय निग्रह: जब हम स्वयं को शरीर से अलग देखते हैं, तो इंद्रियों की वासनाओं पर नियंत्रण पाना सरल हो जाता है।
  • तनाव में कमी: आधुनिक जीवन की भागदौड़ में यह श्लोक एक 'डिटैचमेंट' (अनासक्ति) पैदा करता है, जो तनाव कम करने में सहायक है।
  • दिव्य कृपा का अनुभव: भगवान के वचनों का पाठ करने से साधक सीधे ईश्वरीय चेतना से जुड़ता है।
  • विवेक शक्ति का जागरण: सही और गलत, नित्य और अनित्य के बीच भेद करने की क्षमता विकसित होती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह लेख 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता के प्रामाणिक भाष्यों (जैसे आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य और आधुनिक संतों के टीकाओं) के आधार पर संकलित किया गया है। भक्तिलोक के विद्वानों ने इस बात का विशेष ध्यान रखा है कि श्लोक की दार्शनिक गहराई और संस्कृत व्याकरण की शुद्धता बनी रहे। यह सामग्री पाठकों को केवल सूचना देने के लिए नहीं, बल्कि उनके आध्यात्मिक उत्थान के उद्देश्य से तैयार की गई है। गीता का यह ज्ञान सार्वभौमिक है और किसी भी जाति, धर्म या संप्रदाय से परे मानवता के कल्याण के लिए है। हम पाठकों को परामर्श देते हैं कि वे इन सूत्रों को अपने दैनिक जीवन में उतारने का प्रयास करें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

भगवान ने शरीर को 'क्षेत्र' इसलिए कहा है क्योंकि जिस प्रकार एक खेत में बीज बोने पर फसल प्राप्त होती है, उसी प्रकार यह शरीर वह आधार है जहाँ हम अपने कर्मों के बीज बोते हैं। हमारे सुख-दुख, सफलता-असफलता और पुनर्जन्म इसी शरीर के माध्यम से किए गए कर्मों का परिणाम होते हैं। यह शरीर ही वह स्थान है जहाँ आध्यात्मिक साधना (खेती) करके मोक्ष की फसल काटी जा सकती है।

'क्षेत्रज्ञ' वह चेतना या आत्मा है जो शरीर के भीतर रहकर शरीर की सभी अवस्थाओं (बचपन, जवानी, बुढ़ापा) और अनुभवों (सुख, दुख, भूख, प्यास) को जानती है। इसे पहचानने का सरल तरीका 'साक्षी भाव' है। जब आप यह अनुभव करते हैं कि "मैं देख रहा हूँ कि मेरा मन अशांत है" या "मैं देख रहा हूँ कि मेरा शरीर थक गया है", तो वह 'देखने वाला' ही क्षेत्रज्ञ है।

'तद्विदः' का अर्थ है वे महापुरुष जिन्होंने सत्य को जान लिया है। भगवान श्रीकृष्ण यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि यह ज्ञान केवल उनकी अपनी कल्पना नहीं है, बल्कि अनादि काल से तत्वज्ञानियों और ऋषियों ने इसी सत्य का अनुभव और प्रचार किया है। यह इस ज्ञान की वैज्ञानिकता और ऐतिहासिक प्रामाणिकता को दर्शाता है।

जी हाँ, बिल्कुल। आज के समय में तनाव और अवसाद का मुख्य कारण 'देह-बुद्धि' (स्वयं को केवल शरीर मानना) है। जब हम इस श्लोक के माध्यम से यह समझते हैं कि हम शरीर से परे एक अविनाशी सत्ता हैं, तो छोटी-मोटी परेशानियाँ हमें विचलित नहीं करतीं। यह ज्ञान हमें मानसिक मजबूती, आत्मविश्वास और जीवन के प्रति एक व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करता है।

मोक्ष का अर्थ है अज्ञान के बंधनों से मुक्ति। जब मनुष्य क्षेत्र (जड़ प्रकृति) और क्षेत्रज्ञ (चेतन पुरुष) के अंतर को पूरी तरह समझ लेता है, तो वह प्रकृति के गुणों (सत्व, रज, तम) के प्रभाव से मुक्त हो जाता है। वह जान जाता है कि आत्मा अकर्ता और निर्लिप्त है। यही बोध उसे जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त कर परमात्मा में लीन कर देता है।

उपसंहार

श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक हमें आत्म-विश्लेषण की प्रेरणा देता है। यह हमें सिखाता है कि हम इस संसार में केवल भोगने के लिए नहीं, बल्कि अपने 'क्षेत्र' को शुद्ध कर 'क्षेत्रज्ञ' के वास्तविक स्वरूप को पहचानने के लिए आए हैं। भगवान श्रीकृष्ण का यह दिव्य संदेश मानवता के लिए प्रकाश स्तंभ के समान है, जो हमें अंधकार से ज्योति की ओर ले जाता है।

॥ जय श्री कृष्णा ॥

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कृष्ण कहते हैं कि यह शरीर क्षेत्र है, और जो इस शरीर को जानता है वह क्षेत्रज्ञ कहलाता है।

Lord Krishna says that this body is the field, and one who knows it is called the knower of the field.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

शरीर जड़ है, चेतन आत्मा उसका ज्ञाता है। यह विवेक ही आत्मज्ञान की नींव है।

The body is inert, the conscious self is its knower. This discernment is the foundation of self-realization.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 2 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 2/35 6% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!