क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – श्लोक 2
श्लोक २ में भगवान कृष्ण शरीर को क्षेत्र और आत्मा को क्षेत्रज्ञ बताते हैं। Verse 2: Krishna explains that the body is the field and the knower of the field is the self.
संस्कृत श्लोक
श्रीभगवानुवाच | इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते | एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः || २ ||
śrībhagavānuvāca | idaṃ śarīraṃ kaunteya kṣetramityabhidhīyate | etadyo vetti taṃ prāhuḥ kṣetrajña iti tadvidaḥ || 2 ||
पदच्छेद / शब्दार्थ
श्रीभगवान्: भगवान; उवाच: बोले; इदम्: यह; शरीरम्: शरीर; कौन्तेय: हे कुन्तीपुत्र; क्षेत्रम्: क्षेत्र; इति: इस प्रकार; अभिधीयते: कहा जाता है; एतत्: इसको; य: जो; वेत्ति: जानता है; तम्: उसको; प्राहु: कहते हैं; क्षेत्रज्ञ: क्षेत्रज्ञ; इति: इस प्रकार; तद्विद: तत्व को जानने वाले
हिंदी अनुवाद
श्रीभगवान् बोले: हे कुन्तीपुत्र! यह शरीर क्षेत्र कहा जाता है और जो इसको जानता है, उसे क्षेत्रज्ञ कहते हैं – ऐसा तत्ववेत्ताओं का कथन है।
English Translation
The Blessed Lord said: This body, O son of Kunti, is called the field; he who knows it is called the knower of the field by those who know of them.
टीका / Commentary
भगवान कृष्ण अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हुए क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) की परिभाषा बताते हैं। The Lord defines the body as the field and the knower of the field as the conscious self within.