क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – श्लोक 5

श्लोक ५ में कहा गया है कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का ज्ञान ऋषियों, वेदों और ब्रह्मसूत्रों में वर्णित है।

संस्कृत श्लोक

ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् | ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः || ५ ||

ṛṣibhirbahudhā gītaṃ chandobhirvividhaiḥ pṛthak | brahmasūtrapadaiścaiva hetumadbhirviniścitaiḥ || 5 ||

पदच्छेद / शब्दार्थ

ऋषिभि: ऋषियों द्वारा; बहुधा: अनेक प्रकार से; गीतम्: कहा गया; छन्दोभि: वेदों के मंत्रों द्वारा; विविधै: विविध; पृथक्: अलग-अलग; ब्रह्मसूत्रपदै: ब्रह्मसूत्र के पदों द्वारा; च: और; एव: ही; हेतुमद्भि: युक्तियुक्त; विनिश्चितै: निश्चय किए हुए

हिंदी अनुवाद

इस विषय को ऋषियों ने अनेक प्रकार से कहा है, तथा विविध वैदिक मंत्रों द्वारा भी और युक्तियुक्त तथा निश्चयात्मक ब्रह्मसूत्र के पदों द्वारा भी (गाया गया है)।

English Translation

It has been sung by the sages in many ways, in various distinctive hymns, and also in the well-reasoned and conclusive words of the Brahma-Sutras.

टीका / Commentary

भगवान बताते हैं कि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का ज्ञान ऋषियों, वेदों और ब्रह्मसूत्रों में विस्तार से वर्णित है। The Lord indicates that the knowledge of the field and its knower is elaborately explained by sages, in Vedic hymns, and in the Brahma-Sutras.