क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – श्लोक 20

श्लोक २० में प्रकृति और पुरुष को अनादि तथा विकारों और गुणों को प्रकृतिजन्य बताया गया है।

संस्कृत श्लोक

प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि | विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् || २० ||

prakṛtiṃ puruṣaṃ caiva viddhyanādī ubhāvapi | vikārāṃśca guṇāṃścaiva viddhi prakṛtisambhavān || 20 ||

पदच्छेद / शब्दार्थ

प्रकृतिम्: प्रकृति; पुरुषम्: पुरुष; च: और; एव: ही; विद्धि: जानो; अनादी: अनादि; उभौ: दोनों; अपि: ही; विकारान्: विकारों को; च: और; गुणान्: गुणों को; च: और; एव: ही; विद्धि: जानो; प्रकृतिसम्भवान्: प्रकृति से उत्पन्न

हिंदी अनुवाद

प्रकृति और पुरुष – दोनों को ही अनादि जानो और विकारों तथा गुणों को भी प्रकृति से उत्पन्न ही जानो।

English Translation

Know that Prakriti and Purusha are both beginningless; and know also that all modifications and qualities are born of Prakriti.

टीका / Commentary

प्रकृति (मूल प्रकृति) और पुरुष (आत्मा) दोनों अनादि हैं। समस्त विकार और गुण प्रकृति से उत्पन्न होते हैं। Prakriti (nature) and Purusha (spirit) are both beginningless. All modifications and qualities arise from Prakriti.