श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 13 (क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga))

अध्याय 13 · श्लोक 20

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 35 36 मिनट का पठन 119 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि | विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् || २० ||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
प्रकृतिम्
प्रकृति
पुरुषम्
पुरुष
च
और
एव
ही
विद्धि
जानो
अनादी
अनादि
उभौ
दोनों
अपि
ही
विकारान्
विकारों को
च
और
गुणान्
गुणों को
च
और
एव
ही
विद्धि
जानो
प्रकृतिसम्भवान्
प्रकृति से उत्पन्न

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

प्रकृति और पुरुष – दोनों को ही अनादि जानो और विकारों तथा गुणों को भी प्रकृति से उत्पन्न ही जानो।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय महत्ता

भारतीय सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता को केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला, मोक्ष का मार्ग और ब्रह्मांड के गूढ़ रहस्यों को सुलझाने वाली कुंजी माना गया है। विशेष रूप से, गीता का तेरहवां अध्याय, जिसे 'क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग' के नाम से जाना जाता है, संपूर्ण वेदांत दर्शन का सार प्रस्तुत करता है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को शरीर (क्षेत्र) और आत्मा (क्षेत्रज्ञ) के साथ-साथ प्रकृति और पुरुष के आत्यंतिक स्वरूप का बोध कराते हैं। प्रस्तुत श्लोक—"प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि | विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् || २० ||"—सनातन दर्शन के उन दो मौलिक स्तंभों को स्थापित करता है, जिन पर संपूर्ण ब्रह्मांड की संरचना, स्थिति और लय आधारित है।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से यह श्लोक मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप से परिचित कराता है। आधुनिक युग में, जहां भौतिकता और तकनीकी चकाचौंध ने मनुष्य को आंतरिक शांति से दूर कर दिया है, यह श्लोक हमें यह स्मरण कराता है कि हम केवल नाशवान शरीर (प्रकृति के विकार) नहीं हैं, बल्कि चैतन्य आत्मा (पुरुष) हैं। जब एक साधक इस दिव्यता को समझ लेता है, तब उसके जीवन से मोह, शोक, ईर्ष्या और अहंकार स्वतः ही समाप्त होने लगते हैं। यह श्लोक हमें प्रकृति के त्रिगुणों (सत्व, रज, तम) के प्रभाव से ऊपर उठकर तटस्थ दृष्टा बनने की प्रेरणा देता है। भक्तिलोक.इन के इस समर्पित अंक में, हम इसी अलौकिक श्लोक के शाब्दिक, दार्शनिक, पौराणिक और व्यावहारिक पक्षों का विस्तार से अध्ययन करेंगे, ताकि आप अपने दैनिक जीवन और आध्यात्मिक साधना में इसका पूर्ण लाभ उठा सकें।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय १३, श्लोक २०

प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्॥ २०॥


Prakritiṁ puruṣaṁ caiva viddhy-anādī ubhāv api,
Vikārāṁś ca guṇāṁś caiva viddhy-prakṛti-sambhavān.

श्लोक पाठ की सरल विधि एवं आचरण:

  • प्रातःकाल स्नान कर पवित्र मन से पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • श्रीगणेश और गुरुदेव का स्मरण करने के पश्चात गीता के इस तेरहवें अध्याय का विधिवत श्लोकबद्ध पाठ करें।
  • पाठ करते समय प्रत्येक शब्द के उच्चारण पर विशेष ध्यान दें ताकि उसकी ऊर्जा और कंपन आपके भीतर सक्रिय हो सके।
  • पाठ के अंत में भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पण भाव रखते हुए आत्म-कल्याण की प्रार्थना करें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक पद का सूक्ष्म अध्ययन करने से वेदों और उपनिषदों का मूल संदेश स्पष्ट हो जाता है। नीचे दी गई सारणी में प्रत्येक शब्द का शाब्दिक अर्थ और उसका विस्तृत दार्शनिक भावार्थ प्रस्तुत है:

पद / शब्द (Sanskrit Term) सरल हिंदी अर्थ (Literal Meaning) आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ (Spiritual Interpretation)
प्रकृतिम् (Prakritim) मूल प्रकृति को, जड़ शक्ति को यह संसार की उपादान कारण (Material Cause) है, जिससे यह संपूर्ण भौतिक जगत बना है।
पुरुषम् (Purusham) आत्मा को, चेतन पुरुष को यह चेतना का स्रोत और शरीर रूपी नगर में निवास करने वाला साक्षी दृष्टा है।
च एव (Cha Eva) और ही, तथा निश्चित रूप से इन दोनों की सह-स्थिति को जोर देकर सत्य सिद्ध करने के लिए प्रयोग किया गया है।
विद्धि (Viddhi) तू जान, समझ ले भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करने का दृढ़ निर्देश दे रहे हैं।
अनादी (Anadi) अनादि (जिसका कोई आदि या प्रारंभ नहीं है) इन दोनों का कोई निर्माता नहीं है; ये अनंत काल से अस्तित्व में हैं।
उभौ अपि (Ubhou Api) इन दोनों को ही प्रकृति और पुरुष दोनों ही शाश्वत और मूल सत्य हैं।
विकारान् च (Vikaran Cha) तथा समस्त विकारों को (परिवर्तनों को) शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार और इंद्रियों के सभी रूपांतरण या बदलाव।
गुणान् च एव (Gunan Cha Eva) और तीनों गुणों को ही सत्व, रज और तम—ये तीनों गुण प्रकृति की ही गोद से उपजते हैं।
विद्धि (Viddhi) तू ऐसा ही जान भ्रम का त्याग कर इस यथार्थ को पूरी तरह स्वीकार करो।
प्रकृतिसंभवान् (Prakritisambhavan) प्रकृति से उत्पन्न हुए इनका उद्गम स्थान केवल जड़ प्रकृति है, आत्मा इनका भोक्ता या रचयिता नहीं है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के तेरहवें अध्याय की पृष्ठभूमि कुरुक्षेत्र के मैदान में उठी उस असमंजस की स्थिति से जुड़ी है, जब अर्जुन अपने कर्तव्यों और सांसारिक मोह के बीच उलझ गए थे। कुरुक्षेत्र युद्ध के ठीकारंभ में, जब कौरवों और पांडवों की सेनाएं आमने-सामने थीं, तब जीवन के परम सत्य को समझने की जिज्ञासा अर्जुन के मन में प्रबल हुई। भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत अर्जुन को जो उपदेश दिए, वेदों, उपनिषदों और सांख्य दर्शन का सार बनकर उभरे।

सांख्य दर्शन के प्रणेता महर्षि कपिल माने जाते हैं, जिन्होंने सबसे पहले प्रकृति और पुरुष के अलगाव (विवेक ख्याति) का सिद्धांत प्रतिपादित किया था। गीता में भगवान श्रीकृष्ण इसी प्राचीन सांख्य परंपरा को और अधिक प्रांजल रूप में प्रस्तुत करते हुए अर्जुन को समझाते हैं कि मनुष्य अपने जीवन में जो कुछ भी अनुभव करता है—चाहे वह सुख हो, दुख हो, शरीर की बीमारियां हों, मन के आवेग हों या बुद्धि के निर्णय हों—वे सब 'प्रकृति' के त्रिगुणात्मक विकारों का परिणाम हैं। आत्मा (पुरुष) इन सबसे परे, निर्मल, अलिप्त और केवल दृष्टा रूप में स्थित है।

पौराणिक कथाओं और उपनिषदों (विशेषकर श्वेताश्वतर उपनिषद और कठोपनिषद) में भी इस बात का प्रचुर उल्लेख मिलता है कि कैसे क्षर (नश्वर प्रकृति) और अक्षर (अविनाशई पुरुष) मिलकर इस सृष्टि चक्र को गतिमान रखते हैं। जब तक मनुष्य प्रकृति और पुरुष के इस भेद को नहीं समझता, तब तक वह प्रकृति के बंधनों (मोह, राग, द्वेष) में बंधा रहता है। जिस क्षण वह अपने वास्तविक पुरुष (आत्मा) स्वरूप को पहचान लेता है, वह जीवन-मृत्यु के इस अंतहीन चक्र से मुक्त हो जाता है। यही इस श्लोक की ऐतिहासिक, पौराणिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि है जो आज भी मानवता के लिए उतनी ही प्रासंगिक है जितनी द्वापर युग में थी।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

गीता के इस विशिष्ट श्लोक का नियमित पठन, मनन और इसके अर्थ का चिंतन साधक के जीवन में अभूतपूर्व सकारात्मक परिवर्तन लाता है:

1. मानसिक शांति और स्थिरता

यह समझकर कि मन और शरीर के सभी विकार प्रकृति जनित हैं, साधक बाहरी परिस्थितियों से विचलित होना बंद कर देता है और गहरी मानसिक शांति प्राप्त करता है।

2. सकारात्मक ऊर्जा और औरा (Aura) का विकास

दिव्य वचनों के नियमित उच्चारण से शरीर के चारों ओर एक उच्च कंपन वाली सकारात्मक ऊर्जा का आवरण बनता है, जो नकारात्मक शक्तियों को दूर रखता है।

3. कर्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

अहंकार का शमन होता है क्योंकि मनुष्य यह जान लेता है कि कर्ता प्रकृति के गुण हैं, आत्मा नहीं। इससे नए कर्मबंधनों का निर्माण रुक जाता है।

4. ईश्वरीय कृपा और भगवद् प्राप्ति

भगवान श्रीकृष्ण के प्रिय इस ज्ञान को आत्मसात करने से साधक पर साक्षात केशव की अकृत्रिम कृपा बरसती है, जिससे भक्ति मार्ग सुगम हो जाता है।

5. मोह और भय से मुक्ति

मृत्यु, हानि और प्रियजनों के वियोग का भय समाप्त हो जाता है क्योंकि साधक आत्मा की अमरता और प्रकृति के नश्वर स्वरूप को भली-भांति जान लेता है।

6. निर्णय क्षमता और विवेक में वृद्धि

सही और गलत, शाश्वत और नश्वर के बीच भेद करने की बुद्धि (विवेक ख्याति) जाग्रत होती है, जिससे जीवन के निर्णय सटीक होते हैं।

7. तनाव और अवसाद (Depression) से राहत

अत्यधिक आत्मकेंद्रित होने या चिंताओं में डूबने की प्रवृत्ति समाप्त होती है, क्योंकि व्यक्ति खुद को प्रकृति के प्रवाह का एक तटस्थ साक्षी मानकर जीता है।

8. मोक्ष और आत्यंतिक मुक्ति का मार्ग

यह ज्ञान अज्ञानता के अंधकार को चीरकर मुक्ति के द्वार खोलता है, जो सनातन धर्म में मानव जीवन का सर्वोच्च पुरुषार्थ माना गया है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: भक्तिलोक.इन पर प्रस्तुत यह लेख हमारे वरिष्ठ संस्कृत भाषाविदों, वेदान्त आचार्यों और Google Helpful Content दिशानिर्देशों के विशेषज्ञों की देखरेख में तैयार किया गया है। श्रीमद्भगवद्गीता के मूल श्लोकों की व्याख्या करते समय महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत, आदि शंकराचार्य के गीता भाष्य और विभिन्न उपनिषदों (जैसे श्वेताश्वतर और कठोपनिषद) के पारंपरिक संदर्भों का कठोरता से पालन किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक वेदों और शास्त्रों का विशुद्ध, मिलावट-रहित और तार्किक ज्ञान पहुंचाना है, ताकि आधुनिक जीवन की भागदौड़ में भी सनातन संस्कृति की यह पावन धारा निरंतर बहती रहे। किसी भी प्रकार की धार्मिक भ्रांति से बचने के लिए मूल संस्कृत पदों का सटीक हिंदी रूपांतरण प्रस्तुत किया गया है ताकि साधक को प्रत्यक्ष और प्रामाणिक अनुभूति हो सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

सनातन दर्शन और सांख्य योग के अनुसार, 'प्रकृति' वह जड़ मूल शक्ति है जिससे संपूर्ण भौतिक जगत, शरीर, मन, बुद्धि और त्रिगुण (सत्व, रज, तम) बने हैं। वहीं 'पुरुष' वह चैतन्य, अविनाशी आत्मा या दृष्टा है जो इस शरीर में निवास करता है और समस्त अनुभवों का साक्षी बनता है। ये दोनों ही अनादि (बिना किसी आदि के) हैं।

इसका अर्थ यह है कि मनुष्य के शरीर में होने वाले शारीरिक परिवर्तन, मानसिक उतार-चढ़ाव, इच्छाएं, क्रोध, मोह, सुख-दुख तथा त्रिगुण (सत्व, रज, तम) सब कुछ जड़ प्रकृति की देन हैं। आत्मा (पुरुष) इन सभी विकारों से पूरी तरह अलिप्त और शुद्ध चैतन्य रूप में रहती है।

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के 13वें अध्याय (क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग) का 20वां श्लोक है। इस पूरे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने शरीर रूपी 'क्षेत्र' और आत्मा रूपी 'क्षेत्रज्ञ' के भेद को विस्तार से समझाया है।

इस श्लोक का नियमित स्मरण करने से व्यक्ति को यह बोध होता है कि वह केवल शरीर या मन नहीं, बल्कि पवित्र आत्मा है। इससे सांसारिक दुखों, मानसिक तनाव, अनावश्यक चिंताओं और मोह से मुक्ति मिलती है तथा मन में अगाध शांति और स्थिरता आती है।

हाँ, सांख्य दर्शन के मूल सिद्धांतों में प्रकृति और पुरुष के द्वैतवाद का प्रमुख स्थान है। महर्षि कपिल द्वारा प्रतिपादित इस तत्वज्ञान को भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में अत्यंत सरल और व्यावहारिक रूप में समाहित किया है ताकि सामान्य साधक भी इसे समझकर मोक्ष मार्ग पर अग्रसर हो सके।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

प्रकृति और पुरुष दोनों ही अनादि हैं। और जितने भी विकार और गुण हैं, वे सब प्रकृति से उत्पन्न हैं – ऐसा जानो।

Know that Prakriti and Purusha are both beginningless; and know also that all modifications and qualities are born of Prakriti.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

संसार के सभी विकार प्रकृति के हैं, आत्मा उनसे अलिप्त है।

All worldly modifications belong to Prakriti; the Self is untouched by them.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 20 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 20/35 57% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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