क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – श्लोक 21
श्लोक २१ में प्रकृति को कर्ता और पुरुष को भोक्ता बताया गया है।
संस्कृत श्लोक
कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते | पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते || २१ ||
kāryakāraṇakartṛtve hetuḥ prakṛtirucyate | puruṣaḥ sukhaduḥkhānāṃ bhoktṛtve heturucyate || 21 ||
पदच्छेद / शब्दार्थ
कार्यकारणकर्तृत्वे: कार्य-कारण के कर्तृत्व में; हेतु: कारण; प्रकृति: प्रकृति; उच्यते: कही जाती है; पुरुष: पुरुष; सुखदुःखानाम्: सुख-दुःखों के; भोक्तृत्वे: भोक्तापन में; हेतु: कारण; उच्यते: कहा जाता है
हिंदी अनुवाद
प्रकृति कार्य और करण (इन्द्रियों) के कर्तृत्व में हेतु (कारण) कही जाती है और पुरुष सुख-दुःखों के भोक्तृत्व में हेतु कहा जाता है।
English Translation
Prakriti is said to be the cause of the agent and the instrument; Purusha is said to be the cause of the experience of pleasure and pain.
टीका / Commentary
प्रकृति क्रियाओं का कर्ता है, जबकि पुरुष उन क्रियाओं के फल (सुख-दुःख) का भोक्ता है। Prakriti is the agent of actions, while Purusha is the experiencer of their results.