श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 13 (क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga))

अध्याय 13 · श्लोक 22

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 35 40 मिनट का पठन 124 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् | कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु || २२ ||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

10 पद
पुरुष
पुरुष
प्रकृतिस्थ
प्रकृति में स्थित
हि
निश्चय ही
भुङ्क्ते
भोगता है
प्रकृतिजान्
प्रकृति से उत्पन्न
गुणान्
गुणों को
कारणम्
कारण
गुणसङ्ग
गुणों का संग
अस्य
इसका
सदसद्योनिजन्मसु
उत्तम और अधम योनियों में जन्म लेने में

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

यह पुरुष प्रकृति में स्थित होकर प्रकृति से उत्पन्न गुणों को भोगता है और इन गुणों का संग ही उसके सत्-असत् योनियों में जन्म लेने का कारण है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक परिचय, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय स्वरूप

सनातन धर्म के महान ग्रंथ श्रीमद्भागवतगीता के चौदहवें अध्याय (गुणत्रयविभागयोग) का यह बाइसवां (२२वां) श्लोक अपने आप में वेदान्त दर्शन का एक ऐसा स्तंभ है, जो मानव जीवन की सबसे बड़ी पहेली यानी 'जन्म-मरण के चक्र' और 'सुख-दुखों की अनुभूति' के मूल रहस्यों को अत्यंत वैज्ञानिक और दार्शनिक शैली में उद्घाटित करता है। Bhaktilok.in के इस विशेष आलेख में हम वेदों, उपनिषदों और गीता के परिप्रेक्ष्य में इस महामंत्र के आंतरिक भावों को समझेंगे।

सांसारिक धरातल पर जब कोई जीव जन्म लेता है, तो वह यह मान बैठता है कि वह शरीर ही है और इस संसार के समस्त सुख-दुख उसके अपने व्यक्तिगत कर्मों के कारण सीधे तौर पर उसे मिल रहे हैं। किंतु, महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित और भगवान श्री कृष्ण के मुख से निस्सृत यह श्लोक स्पष्ट करता है कि चेतना (आत्मा) और जड़ प्रकृति के परस्पर संपर्क के कारण ही यह सारा प्रपंच संचालित होता है। प्रकृति के तीन गुण—सत्त्व, रज और तम—इस ब्रह्मांड की हर गतिविधि को नियंत्रित करते हैं। जब तक मनुष्य अज्ञानतावश इन गुणों के साथ अपनी तदाकारिता (सङ्ग) बनाए रखता है, तब तक उसका आत्मावलोकन बाधित रहता है और वह बार-बार उच्च तथा निम्न योनियों (सदसद्योनिजन्मसु) में जन्म लेने के लिए विवश होता है।

इस श्लोक का सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक महत्व इस बात में निहित है कि यह साधक को आत्मज्ञान की ओर मोड़ने का कार्य करता है। यह हमें यह सोचने पर विवश करता है कि हमारी वास्तविक पहचान न तो इस नाशवान शरीर से है और न ही मन-बुद्धि के विकारों से, अपितु हम उस सच्चिदानंद स्वरूप परमात्मा के अंश हैं जो प्रकृति के इन तमाम द्वंद्वों से परे, एक उदासीन द्रष्टा के समान स्थित है। इस प्रकार, यह श्लोक मोक्ष मार्ग का एक महान प्रकाशस्तंभ है जो भक्त को अज्ञान के अंधकार से निकालकर विवेक के उजाले की ओर ले जाता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्|
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु || २२ ||


अन्वय: प्रकृतिस्थः हि पुरुषः प्रकृतिजान् गुणान् भुङ्क्ते, अस्य गुणसङ्गः सदसत्-योनि-जन्मसु कारणम् (भवति)।

श्लोकोच्चारण एवं पठन विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक शब्द के उच्चारण पर विशेष ध्यान देना चाहिए। 'पुरुषः' का विसर्ग स्पष्ट हो, 'प्रकृतिस्थो' में ओकार की ध्वनि और 'भुङ्क्ते' में अनुस्वार की शुद्धता साधक की एकाग्रता को बढ़ाती है। प्रातःकाल स्नान के पश्चात शांत चित्त से पूर्व दिशा की ओर मुख करके इस श्लोक का न्यूनतम ११ बार मानसिक जप करने से बुद्धि में सात्विक विचारों का प्रादुर्भाव होता है और सांसारिक आसक्तियों के प्रति विरक्ति का भाव जागृत होने लगता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

नीचे दी गई सारणी में इस श्लोक के प्रत्येक पद का सरल हिंदी अर्थ तथा उसका गहन आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
पुरुषः जीवात्मा, भोक्ता, देखने वाला यह वह चैतन्य सत्ता है जो मूल रूप से शुद्ध, बुद्ध और मुक्त है, किंतु प्रकृति के संसर्ग से खुद को शरीर मान बैठता है।
प्रकृतिस्थः प्रकृति में स्थित, शरीर-मन के साथ तदाकार हुआ आत्मा जब त्रिगुणात्मक माया रूपी प्रकृति के भीतर स्थित होकर उसके विकारों (काम, क्रोध, मोह आदि) को अपना स्वभाव मान लेती है।
हि निश्चय ही, क्योंकि यह एक अकादमिक और सार्वभौमिक सत्य को रेखांकित करता है जिसमें कोई अपवाद नहीं है।
भुङ्क्ते भोग करता है, अनुभव करता है सुख और दुःख, मान और अपमान, ठंड और गर्मी जैसे द्वंद्वों की अनुभूतियों को अपने ऊपर आरोपित करता है।
प्रकृतिजान् प्रकृति से उत्पन्न वे गुण जो आत्मा के मौलिक स्वभाव के नहीं हैं, बल्कि जड़ प्रकृति (माया) के गर्भ से पैदा हुए हैं।
गुणान् तीनों गुणों को (सत्त्व, रज, तम) सुख देने वाला सत्त्व, कर्म में प्रवृत्त करने वाला रज, और मोह-निद्रा में डालने वाला तमोगुण।
कारणं मुख्य कारण, जड़ किसी भी घटना या परिणाम के पीछे का वह निर्णायक आधार जिसके बिना कार्य संभव नहीं है।
गुणसङ्गः गुणों के प्रति आसक्ति / मोह "मैं सुखी हूँ, मैं दुखी हूँ, मैं ज्ञानी हूँ, मैं मूर्ख हूँ"—ऐसी आ सकती ही सारे बंधनों की जननी है।
अस्य इस जीवात्मा का उस अज्ञानी जीव का जो अपनी दिव्यता को भूलकर संसार के चक्र में उलझ गया है।
सदसद्योनि श्रेष्ठ (सत्) और नीच (असत्) योनियों में देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट-पतंग या नरक जैसी विभिन्न योनियों की प्राप्ति।
जन्मसु बार-बार जन्म लेने में मृत्यु के उपरांत पुनः योनि विशेष में गर्भधारण करना और कर्मफल भोगना।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

इस महान श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत के रणक्षेत्र कुरुक्षेत्र से जुड़ी हुई है, जहाँ भगवान श्री कृष्ण अर्जुन के विषाद को दूर करने के लिए उसे ज्ञान, कर्म और भक्तियोग का मर्म समझा रहे हैं। चौदहवें अध्याय के आरंभ में भगवान कृष्ण प्रकृति और पुरुष के मिलन को सृष्टि का आधार बताते हैं—"मम योनिमहर् महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भ दधाम्यहम्।" इसी श्रंखला को आगे बढ़ाते हुए भगवान ने अर्जुन को समझाया कि यह संपूर्ण संसार क्षेत्र (प्रकृति) और क्षेत्रज्ञ (पुरुष) के मेल से चल रहा है।

पौराणिक संदर्भों में यदि हम महर्षि वेद व्यास रचित श्रीमद्भागवत महापुराण और उपनिषदों (विशेषकर श्वेताश्वतर और कठोपनिषद) का अध्ययन करें, तो वहाँ भी इसी दार्शनिक सत्य का प्रतिपादन मिलता है। कठोपनिषद में रथ के रूप में शरीर का जो सुंदर रूपक प्रस्तुत किया गया है, उसमें आत्मा को रथ का स्वामी (यात्री), बुद्धि को सारथी, मन को लगाम और इंद्रियों को घोड़े बताया गया है। जब घोड़े (इंद्रियां) और लगाम (मन) अनियंत्रित हो जाते हैं और रथ का स्वामी (पुरुष) उनके अधीन हो जाता है, तब वह भटक जाता है। यही 'गुणसङ्ग' (प्रकृति के गुणों से आसक्ति) है।

महाभारत के अनुशासन पर्व और शांति पर्व में भीष्म पितामह और युधिष्ठिर के संवाद में इस बात का बार-बार उल्लेख आया है कि जीव जब तक अपने मूल स्वरूप—जो कि सच्चिदानंद परमात्मा का अंश है—को भूलकर प्रकृति के विकारों (काम, क्रोध, लोभ, मोह) में रम जाता है, तब तक वह चौरासी लाख योनियों के इस चक्रव्यूह से बाहर नहीं निकल सकता। राजा जनक और अष्टावक्र के संवाद में भी इसी अध्यात्म को परिलक्षित किया गया है जहाँ यह सिखाया गया कि शरीर प्रकृति का हिस्सा है और साक्षी भाव में स्थित पुरुष इससे सर्वथा निर्लेप है।

इस प्रकार, यह श्लोक केवल गीता का एक पद नहीं है, बल्कि संपूर्ण भारतीय वैदिक वांग्मय के उस सार का निचोड़ है जो मनुष्य को अज्ञान जनित बंधनों से मुक्त कराकर मोक्ष के द्वार तक पहुँचाने की सामर्थ्य रखता है। इसे समझना और जीवन में उतारना ही मानव योनि की सार्थकता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस श्लोक का नियमित चिंतन, मनन और स्मरण करने से साधक के जीवन में निम्नलिखित चमत्कारी और सकारात्मक परिवर्तन आते हैं:

१. मानसिक शांति और स्थिरता

व्यक्ति बाहरी परिस्थितियों (सुख-दुख, लाभ-हानि) से विचलित होना बंद कर देता है और उसके मन में एक गहरी मानसिक शांति स्थापित होती है।

२. सकारात्मक ऊर्जा का संचार

सात्विक विचारों के प्रभाव से शरीर और मन के आसपास एक उच्च आध्यात्मिक ऊर्जा (Aura) का निर्माण होता है, जिससे नकारात्मकता दूर होती है।

३. कार्मिक शुद्धि (कौशल एवं कर्म शुद्धि)

जब साधਕ यह समझ जाता है कि कर्म प्रकृति के गुण कर रहे हैं, तो वह कर्तापन के अहंकार से मुक्त हो जाता है, जिससे नए कर्मों का बंधन नहीं बनता।

४. ईश्वरीय कृपा और भगवद् प्राप्ति

आसक्ति के क्षीण होने पर भगवान के चरणों में अनन्य भक्ति स्वतः उत्पन्न होती है, जिससे साधक को भगवद्धाम की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।

५. मोह और भय से मुक्ति

मृत्यु, हानि और प्रियजनों के वियोग से उत्पन्न होने वाला अस्वाभाविक भय इस आत्मज्ञान के प्रकाश में समाप्त हो जाता है।

६. जन्म-मरण के चक्र से छुटकारा

गुणों के प्रति आसक्ति का सर्वथा नाश होने से जीव पुनर्जन्म के दुखों से मुक्त होकर मोक्ष (कैवल्य पद) को प्राप्त करता है।

७. उत्तम विवेक शक्ति का विकास

क्या करने योग्य है और क्या त्यागने योग्य है (कर्तव्य-अकर्तव्य), इसका स्पष्ट विवेक साधक की बुद्धि में हमेशा जागृत रहता है।

८. साक्षी भाव की प्राप्ति

व्यक्ति सुख और दुख दोनों ही स्थितियों में तटस्थ रहकर जीवन के हर पल का एक दृष्टा (Witness) बनकर आनंद का अनुभव करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख सनातन संस्कृति के मूल ग्रंथों जैसे श्रीमद्भागवतगीता, उपनिषदों तथा वेदान्त दर्शन के प्रामाणिक आचार्यों के भाष्यों (विशेषतः आदि शंकराचार्य एवं स्वामी रामसुखदास जी महाराज के दृष्टिकोण) के आधार पर संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। हमारा मुख्य उद्देश्य आधुनिक पाठकों को गूढ़ भारतीय वेदान्त दर्शन को सरल, सुबोध और व्यावहारिक हिंदी भाषा में उपलब्ध कराना है ताकि प्रत्येक साधक अपने आध्यात्मिक मार्ग पर सुगमता से आगे बढ़ सके। सभी श्लोकों के अर्थ और व्याख्याएं पूरी तरह से शास्त्रीय परंपरा और पारंपरिक मान्यताओं के अनुरूप सत्यापित हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

उत्तर: वेदान्त दर्शन में 'पुरुष' उस शुद्ध चैतन्य, आत्मा या दृष्टा को कहा गया है जो अमर और निर्विकार है। वहीं 'प्रकृति' जड़ माया है, जिससे यह संपूर्ण भौतिक जगत, शरीर, मन, बुद्धि और अहंकार बने हैं। जब आत्मा इस प्रकृति के संपर्क में आती है, तो वह स्वयं को शरीर मानकर इसके गुणों (सुख-दुख आदि) का अनुभव करती है।

उत्तर: जब मनुष्य प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) से बहुत अधिक आसक्त हो जाता है—जैसे सुख या प्रशंसा की इच्छा रखना, भोग-विलासों में लिप्त रहना, या अज्ञान व आलस्य में डूबे रहना—तो उसकी आत्मा उन संस्कारों को अपने साथ बांध लेती है। मृत्यु के समय जैसी भावना और जैसी आसक्ति होती है, जीव को वैसी ही उत्तम या नीच (सत्-असत्) योनियों में जन्म लेना पड़ता है।

उत्तर: बिल्कुल। जब भी हमारे जीवन में कोई संकट, अपमान या अत्यधिक सुखद परिस्थिति आती है, तब यदि हम इस श्लोक का स्मरण करें कि "यह सब शरीर और प्रकृति के स्तर पर हो रहा है, मैं तो केवल दृष्टा आत्मा हूँ", तो हम मानसिक रूप से शांत रह सकते हैं। यह हमें अति-सुख और अति-दुख दोनों से बचाता है और जीवन को संतुलित बनाता है।

उत्तर: यह श्लोक श्रीमद्भागवतगीता के चौदहवें अध्याय (गुणत्रयविभागयोग) का २२वां श्लोक है। इस अध्याय में भगवान श्री कृष्ण ने विस्तार से समझाया है कि कैसे त्रिगुणात्मक माया पूरे संसार को बांधती है और इससे ऊपर उठने वाले महापुरुष किस प्रकार गुणातीत होकर मोक्ष को प्राप्त करते हैं।

उत्तर: भगवान कृष्ण ने इसी अध्याय के अंत में बताया है कि जो अनन्य भक्तियोग के द्वारा निरंतर परमात्मा का भजन करता है, वह इन तीनों गुणों को लांघकर ब्रह्मभाव को प्राप्त करने योग्य बन जाता है। सात्विक आचरण अपनाते हुए कर्तापन के अहंकार को त्यागना और ईश्वर को ही सर्वस्व मानना ही इनसे मुक्ति का एकमात्र उपाय है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

प्रकृति में स्थित पुरुष प्रकृति से उत्पन्न गुणों का भोग करता है, और गुणों का संग ही उसके उत्तम-अधम योनियों में जन्म का कारण है।

The Purusha seated in Prakriti experiences the qualities born of Prakriti; attachment to these qualities is the cause of his births in good and evil wombs.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

गुणों से आसक्ति ही बंधन है। गुणों से ऊपर उठना ही मुक्ति है।

Attachment to qualities is bondage. Rising above them is liberation.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 22 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 22/35 63% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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