क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – श्लोक 22

श्लोक २२ में बताया गया है कि पुरुष प्रकृतिगत गुणों का भोग करता है और उनके संग से जन्म-मरण में बँधता है।

संस्कृत श्लोक

पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् | कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु || २२ ||

puruṣaḥ prakṛtistho hi bhuṅkte prakṛtijān guṇān | kāraṇaṃ guṇasaṅgo'sya sadasadyonijanmasu || 22 ||

पदच्छेद / शब्दार्थ

पुरुष: पुरुष; प्रकृतिस्थ: प्रकृति में स्थित; हि: निश्चय ही; भुङ्क्ते: भोगता है; प्रकृतिजान्: प्रकृति से उत्पन्न; गुणान्: गुणों को; कारणम्: कारण; गुणसङ्ग: गुणों का संग; अस्य: इसका; सदसद्योनिजन्मसु: उत्तम और अधम योनियों में जन्म लेने में

हिंदी अनुवाद

यह पुरुष प्रकृति में स्थित होकर प्रकृति से उत्पन्न गुणों को भोगता है और इन गुणों का संग ही उसके सत्-असत् योनियों में जन्म लेने का कारण है।

English Translation

The Purusha seated in Prakriti experiences the qualities born of Prakriti; attachment to these qualities is the cause of his births in good and evil wombs.

टीका / Commentary

आत्मा प्रकृति के संपर्क में आकर गुणों का भोग करती है, और इन गुणों के प्रति आसक्ति ही जन्म-मरण का कारण बनती है। The soul, in contact with nature, experiences its qualities, and attachment to these qualities causes birth in various species.