अध्याय 13 : भारतवर्ष का वर्णन तथा उसके पर्वत
भारतवर्ष का पवित्र भूगोल और पर्वत
ऋषियों ने हाथ जोड़कर कहा – “हे सूत जी! आपने जम्बूद्वीप और उसके नौ वर्षों की चर्चा की। अब हम भारतवर्ष के विषय में विशेष रूप से सुनना चाहते हैं। यह भूमि कर्मभूमि कहलाती है। यहाँ के पर्वत, नदियाँ और जनपद कौन-कौन से हैं? कृपया हमें इसका विस्तृत ज्ञान प्रदान करें।” सूत जी ने कहा – “भारतवर्ष अत्यन्त पुण्यप्रद है। यहाँ स्वर्ग और मोक्ष दोनों की प्राप्ति सम्भव है। यह भूमि हिमालय से लेकर दक्षिण समुद्र तक फैली हुई है। इसके नौ भाग माने गये हैं, जो पर्वतों और नदियों द्वारा अलग-अलग होते हैं।”
भारतवर्ष के प्रमुख पर्वत
भारतवर्ष में अनेक पर्वत हैं, जिनमें से कुछ मुख्य इस प्रकार हैं – हिमालय, हेमकूट, निषध, माल्यवान, परियात्र, गन्धमादन, विन्ध्य, ऋक्षवान, सह्य, महेन्द्र, मलय और श्रीपर्वत। हिमालय सबसे ऊँचा और पवित्र पर्वत है, जिसकी गोद में गंगा, यमुना, सरस्वती जैसी नदियाँ बहती हैं। विन्ध्य पर्वत उत्तर और दक्षिण भारत की सीमा बनाता है। मलय पर्वत से चन्दन उत्पन्न होता है, और महेन्द्र पर्वत पर परशुराम जी ने तपस्या की थी।
हिमवान् हेमकूटश्च निषधश्चापि पर्वतः ।
माल्यवान् परियात्रश्च गन्धमादन एव च ॥
विन्ध्यश्च ऋक्षवान् सह्यो महेन्द्रो मलयस्तथा ।
श्रीपर्वतश्च भारतवर्षे गिरयः स्मृताः ॥
पर्वतों का पौराणिक महत्त्व
हिमालय पर्वत को देवताओं का निवास-स्थान कहा जाता है। यहाँ अमरनाथ, केदारनाथ और बद्रीनाथ जैसे तीर्थ हैं। परियात्र (अरावली) पर्वत पर वशिष्ठ ऋषि का आश्रम था। ऋक्षवान पर्वत की गुफाओं में अनेक तपस्वी निवास करते थे। सह्य पर्वत (पश्चिमी घाट) पर गोदावरी नदी का उद्गम है। मलय पर्वत पर अगस्त्य ऋषि का आश्रम प्रसिद्ध है। ये सभी पर्वत केवल पत्थरों के ढेर नहीं हैं, अपितु तप, ज्ञान और साधना के केन्द्र रहे हैं।
पर्वतों की अद्भुत विशेषताएँ
प्रत्येक पर्वत की अपनी विशेषता है – हिमालय हिमाच्छादित है और यहाँ देवदार के वृक्ष बहुतायत में पाये जाते हैं। विन्ध्य पर्वत सूर्य की परिक्रमा में बाधक बनने लगा था, तब अगस्त्य मुनि ने उसे दक्षिण की ओर झुका दिया। मलय पर्वत की वायु चन्दन की सुगन्ध से युक्त होती है। महेन्द्र पर्वत पर कार्तिकेय जी का निवास है। श्रीपर्वत पर भगवान शिव का अद्भुत धाम है। ये पर्वत भारतवर्ष की आध्यात्मिक सम्पदा के प्रतीक हैं।
येषां सानुषु दृश्यन्ते देवर्षीणां महात्मनाम् ।
आश्रमाः पुण्यशीलानां तपसां परमा धराः ॥
भारतवर्ष-वर्णन का पुण्यफल
सूत जी बोले – “हे ऋषियो! जो मनुष्य भारतवर्ष के पर्वतों के इस वर्णन का पाठ करता है, उसे इन सब पर्वतों की यात्रा का फल प्राप्त होता है। भारतवर्ष कर्मभूमि है, जहाँ शुभ कर्म करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है और ज्ञान-वैराग्य से मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। यहाँ जन्म लेना दुर्लभ है; अतः मनुष्य को इसका सदुपयोग करना चाहिए।”
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे त्रयोदशोऽध्यायः समाप्तः ॥