अध्याय सूचकांक 13 कुल

1. अध्याय 1: ब्रह्म पुराण का मंगलाचरण, नैमिषारण्य का वर्णन और सूत-ऋषि संवाद 2. अध्याय 2: स्वायम्भुव मनु की वंश-परंपरा और शतरूपा की तपस्या 3. अध्याय 3: देवदानवोत्पत्ति-वर्णनम् - देवता, दानव और अन्य प्राणियों की उत्पत्ति 4. अध्याय 4: पृथु से लेकर सभी देव-दानवों के राज्याभिषेक का वर्णन 5. अध्याय 5: मन्वन्तरवर्णन - सभी मनुओं और उनके युगों का विस्तृत विवरण 6. अध्याय 6: सूर्य की उत्पत्ति का वर्णन (आदित्योत्पत्ति-कथनम्) 7. अध्याय 7: सूर्यवंश वर्णन - इला की कथा और मनु के पुत्रों की कहानी 8. अध्याय 8: सूरयेवश वर्णन - सत्यव्रत की तपस्या और वशिष्ठ का आशीर्वाद 9. अध्याय 9: चंद्रवंश-वर्णन और सोम की उत्पत्ति का विवरण 10. अध्याय 10: पुरूरवा की कथा और चन्द्रवंश का वर्णन 11. अध्याय 11: देवासुर-संग्राम, रजि की वरदान-विजय और ब्रह्मा का शस्त्र-उपदेश 12. अध्याय 12: ययाति का चरित्र-वर्णन और सोमवंश की महिमा 13. अध्याय 13: पुरु वंश का विस्तृत वर्णन और राजकुल का इतिहास
Brahma Purana • अध्याय 13

अध्याय 13: पुरु वंश का विस्तृत वर्णन और राजकुल का इतिहास

अध्याय 13 : त्रयोदशोऽध्यायः

पुरुवंश-वर्णनम्

ब्राह्मणा उचुः

पुरोर्वंशं वयं सूत श्रोतुमिच्छाम तत्त्वतः। दहयस्यानोर्यदोक्षैव तुर्वसोऽच पृथक् पृथक् ॥१॥

लोमहर्षण उवाच

शृणुध्वं मुनिकन्द्रूयः पुरोवंशं महात्मनः। विस्तरेणातुपुरूव्यां च प्रथमं ददतो मम॥२॥

पुरोः पुत्रः सुवीरोऽभून्मनस्यस्तस्य चात्मन। राजा चाभयदो नाम भ्रमणस्योर्भयत् सुतः ॥३॥

तथैवाभयदस्यासौत् सुधन्वा नाम पायवः। सुघन्वनः सुबाहुश्च रौद्रार्वरतरञ्च चात्मजः ॥४॥

रौद्रार्वस्य षड्दशार्णेयुः कृकणेयुस्तथैव च। कक्षेयु रथप्रेयुश्च प्रसद्देयुस्तमैव च ॥५॥

श्रह्वेयुद्रच जलेयुदच स्थलेयुश्च महाबलः। वनेयुश्च ष्वनेयुर्च पुत्रकाञ्च ददा स्यः ॥६॥

भद्रा शूद्रा च सद्रा च सालदा मलदा तथा। खलदा च नतो चिप्रा नलदा सुरसापि च ॥७॥

तया गोचपला च स्वरीरत्नकूटा च ता ददा। ऋपिर्ज्तोऽन्त्रिवंशो च तासां सर्व प्रभाकरः ॥८॥

भद्रापां जनयामास सृतं सोम यदस्विनम्। स्वर्भानुना हते सूर्ये पतमाने दिवो सहम् ॥९॥

अध्याय 13 - पुरु के वंश का वर्णन

ब्राह्मणों ने कहा

सुतजी, पुरु, षट्, अनु, यदु और तुर्वसु के वंश को हम लोग तत्त्वपूर्वक पृथक्-पृथक् सुनना चाहते हैं।

लोमहर्षण बोले

मुनियों के श्रेष्ठ! पहले आप पुरु के वंश का विस्तृत वर्णन सुनिए, मैं कह रहा हूँ।

पुरु का सुवीर नामक पुत्र हुआ। उसका पुत्र मनस्य था और मनस्य का पुत्र अभयद नामक राजा हुआ। इसी तरह अभयद का पुत्र सुधन्वा नामक क्षत्रिय राजा हुआ। सुधन्वा का पुत्र सुघन्वा था और सुघन्वा का पुत्र सुबाहु था जो रौद्र-आर्वरण्य का राजा था।

रौद्र-आर्वरण्य के सोलह पुत्र हुए - कृकणेयु, कक्षेयु, रथप्रेयु, प्रसद्दु, ऋचेयु, जलेयु, महाबली स्थलेयु, वनेयु और बनीयु ये दस पुत्र थे। उसके दस कन्याएँ भी थीं - भद्रा, शूद्रा, सद्रा, सालदा, मलदा, खलदा, नलदा, सुरसा, गोचपला और स्वरीरत्नकूटा।

इन कन्याओं से प्रभाकर नामक ऋषि को प्रमथ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। भद्रा से सोम को यदास्विनी नामक पुत्री हुई। जब स्वर्भानु ने सूर्य को मार दिया और वे पृथ्वी पर गिरने लगे, तब प्रभाकर ने ही अपने शरीर से युक्त प्रकाश डाला।

तमोऽभिभूते लोके च प्रभा येन प्रयतितम्। स्वस्ति तेऽस्त्विति चोवच्चैव वै पतमानो दिवाकरः ॥१०॥

धन्नात्तस्य विपर्षेन पपात दिवो महम्। उश्रिधेष्ठानि गोत्राणि यदचकार महातपा ॥११॥

तेष्वयेद्वन्त्यदेदेवैयेस्य प्रतिष्ठितम्। घ तासु जनयामास पुतरिकास्वात्मकामजान् ॥१२॥

दश पुनान्‌ महासरवांस्तपस्यपरे रतांस्तयार। ते तु भोन्रकरा दिया ऋषयो वेदपारगाः ॥ १३१॥

स्वस्त्यात्रेया इति स्याता पिञ्च त्रिधनवजिताः। पकषेयोस्तनयारत्वासंस्गय एव महारयाः ॥ १४॥

सभानरढचाकूषश्च परमन्यस्तयैव च॥ सभानरस्य पुभ्नस्त विदान्‌ फालानलो नृपः ॥ १५॥

कालानलस्य धर्मः सृञ्जयो नामं ये सृत! सुञ्जयस्याभवत्‌ पुष्नो घीरो राजय पुरञ्जय ॥ १६॥

जनमेजयो मुनिभरेष्ठा पुरड्जयसुतोऽवत्‌ ! जनमेजयस्य राज्पर्महादयालोऽमवत्‌ सूते ॥१७॥

देवेषु स परिजात. भ्रतिष्ठितयशा भुवि। महामना* नाम सुतो महाशारस्य विभुत. ॥ १८॥

जे वोरः सुरगण" पुलि. सुमहामना.) महाभनास्तु पुत्रौ द्रौ जनयामास भो द्विजा: ॥१९॥

उदीनरण्च धर्म्मं तितिषषुभ्च महावलम्‌ । उदीनरस्यं पट्यस्तु पञ्च राजयिवंशमाः ॥२०॥

नुगा शमिनंवा दर्व्व" पञ्यमी च दृषद्वती। उशीनरस्य पृद्रारतु घञ्च तासु शलोटराः॥२१॥

तपसा चव महता जाता युद्धस्य चात्मा । नुगायारतु नृग पुत्र: म्यां शूमिरजायत ॥२२॥

मैवायास्तु नवः पुत्रों दव्वों या सुव्रतोऽभवत्‌ । दृपद्रत्यारतु सञ्ज दिरि्रोशीनरों नूप' ॥२३॥

सिवनी

सूर्य से कहा--"तुम्हारा कल्याण हो ॥९-१०॥ उस विप्रषि के पचन से सुवं पृथ्वी पर नही भिरे? उसी तपस्वी नें

अगि के आभेय नाम से विषयात गोधो को बढाया मौर यततो में देवताओं दे" साथ अनि को भाग दिल्वाया ॥ है १२॥

उसने उन बेन्याओ से महासततवशाली और तपस्या मे निरत दस पुत्रो कौ उत्पन्न पिया! दे पव वेदपारगत, स्व

स्त्यानेय नाम से विख्यात, तीन प्रकार वैः धमौ से वर्जित और गोमवर्थव हुए॥१३॥ क्यु तीन ही

यहास्यौ पुत्र थे--समानर चासुष और प्ररमन्यु। शमानर का पच कालानल विद्ानू तथा राजा या॥ १४॥

रैंप कालानल था मृञ्जय नामक पुत्र धर्मन था। सृन्जय वा पुत्र पुरजय वीर राजा हुआ॥१६॥

मूनिवर। पुरजय के जनमेजय नामव' पूत हुआ। सजपि जनमेजयं वे महाशाल नामक पुत्र हुआ॥ १७॥

व्‌ देवताओं मे विश्यात और ससार मे महायदस्वी हभ महाशाल के महामना नामक पुत्र उत्पन्न हुआ; जो

देवताओ से पुर्जित्त तथा महादीर था॥ १८॥ विप्रवुन्द! महामना न दो पुन उत्यघ्र किये--पर्मेज् उशीनर

मौर महावली तितिषु । उरीनर वी राजपि-वश मे समृत्पघ् पाँच पत्नियाँ थी--॥१९-२०॥ नृगा इमि, नवा,

द्वा और दुपइती । उशीनर ने उनसे वद को धारण करनं वाले पाँच पुत्र उत्पन्न किये ॥ २१॥

बडी सपस्या बरतें मे बाद वृद्ध उपीवर के ये पचो युत उत्प हुए थे। नृणा से नूग मिरे मि, नवा से नव और दर्वा से सुवन इतर हुए ॥२२॥ दृपद्रवी से सिदि नामक औदीनर राजा की उत्पत्ति हुई। शिवि के दिवि नामक और टूग के पोवेय

बिवेस्तु शिवयों विप्रा योपेयास्तु नृगस्य ह। नवस्य 'नवराष्ट्रनतु कृमेंरतु 'कृमिला पुरी ॥ २४॥

सुध्नतस्य 'तथाम्बप्

पुष्टकलिद्धञ्च तथा वालेयं क्षत्रमुच्यते। बालेया ब्राह्मणादचैव तस्य वंशकरा मुवि॥३३॥

असेच ब्रह्मणा दत्तो वर प्रीतेन भो द्विजा। सहायोगित्वसायुइ्च कंरपस्य परिमाणत परेरा॥

भ्ये चाप्रतिमत्वं थे घर्म्मेतत्त्वार्थदर्शनम्। संग्रामे चाप्यजेयत्वं घर्मं चैव प्रधानताम्॥३४॥

पेलोक्यदर्ोनर्वापि प्राधान्यं प्रसवे तथा। चतुरो नियतान् व्णौसत्वल्च स्थापयितेति च दष॥

इत्युव्तो विभुना राजा बलि दान्ति पस ययौ। कालेन महता विपराः, स्वञ्व स्यानमूपाममत्॥४३५॥

लिन नामक परव उत्पन्न हुए। नव को राष्ट्र नव नामक था और कृमि वी राजधानी हृमिला पुरी नाम से विस्थाव थी॥२३-२७

सुकत के अम्वप्ठ नाम से स्यात युत्र हुए। अब शिवि के पुत्रो वे नाम सुनिये।

शिवि के शिवि सभा वाले चार पुत्र लोक में प्रसिद्ध हैं।२५॥ जिनका नाम बृपदर्म, सुवीर, क्य और

भटक हैं। उनम घन घाय-सपस् देश बेचय, मदव, वृपदर्म ओर सुदीर नाम से प्रसिद्ध हैं। ये प्रजाये तितिक्षु की है।२६३॥

विपवुद। ततिति पूर्व दिशा पेन राजा हुमा उसका पुर मसहाशव्तिशारी उपडेय हुआ। उपय्रथ के फेन नौमव पुत्र हुआ।

पेन थे सूतपद्ा नामक पुत्र उत्पन्न हुआ और सुतपा से वयि की उत्पत्ति दुई।२७-२८०

सुवणं ना तरकश धारण करने वाल्य राजा दलि मनुष्ययोनि मे उत्पन्न हुआ। वह् राजा बलि महायोगी था॥२९॥

उर अग, वग गुह, पुष्ट मौर विग नामक वश को अदानि वाले पाँच पुत्रों को उत्यप्न किया। यहं प्रसिद्ध झचिय-

अश यिय मम से बहा जाता है। दिके वामे बाटेयनाम से स्यात ब्राह्मण भी पुष्र हुए॥३०-३१

अदा प्रसर होकर वि कौ वरदान दिमा-- राजन! तुम महादोगी होगे, एक कल्प वी तुम्हारी आप होगी॥२३२॥

बल मे तुम्दारे समान कोट नहीं होया, तुम चमं वे तत्व को जानने वाले होगे, गुद मे तुमे मोर् नहीं जीत र्णा धर्मे में तुम्हारी प्रधानता रहेगी।३३

सुम तीनों रोक वे दर्शन करोगे। तुम्हारे पुषनो की स्याति वनी भरर तुम चारा वणो कौ स्थापना करोगे।३४

इस प्रकार शद्मा थे बहने पर राजा बलि परम शान्ति को प्राप्त टया।

विश्ववृत्द चिरकाल वे वाद राजा मपन स्थान पर माया॥।३५॥ उवे पुत्री वे देश भग, वग, युद्ा, बलिंग मोर्

क ररष्टृत्नुष्टु०। रन् शेभिभा। देस न्यातवेष्टाधि०? बा बृुगद्म।५१ वकद०

इस न्मा। तति। र न्मा। तैतिषवीपम०। ७ के०यें घालस्त०। ८ व दाल्प्य।९य बली! १० ग वास्य।

११ श०नगयुदूमदा। दर! १२ वर चाय्रतिम ठस्य दथा धर्मायेदितनम्। १३ ण्यं शर्दतरतथा षष्ठ दिया वर्जरया०।

्रहयपुराणम्।

तेषां जनपदाः पञ्च अद्धा बद्धा. ससुह्यकाः। कालिद्धः. ुण्डुकादचेव प्रनास्त्वद्स्य साम्पतम्॥३६०

भद्धपुत्रो महानासीद्राजेन्यो उविवाहनः। दधिवाहनयुत्रस्तु राजा दिविरोऽभवत्॥३७॥

प्रो दिविरथस्य

दाणादस्तस्य वैकर्णो विकर्णस्तस्य चात्मन। तस्य पदात त्वासीदद्धना पुटवदधंनम्। ॥४८॥

एतेऽद्धवक्षना सव्वं राजान् कौतिता भया। सतथव्रता महात्मान् प्रजादन्तो महारया॥४९॥।

नाम से विख्यात हैं। अव अग की सतानं का वर्णन सुनिये॥३६॥ अम का पुत्र महान् राजा दयिवादूनं शा दर्पिवाहन का पुत्र राजा दिनिंस्य हुआ॥३७॥ दिविरय या पुर इन्द्र क तुल्य पराक्रमी था। उक पुर विद्वातू धर्मस्य था। धर्मरथ बा पुत्र चित्रण था॥३८॥ कालजर नामव पढ़ांड पर इन्र वे साथ सम बरस हुए धर्मस्य से सोम (अमृत) वा पान क्या॥३९॥। चित्ररय वा पथ दशरथ हुआ, जिसरी स्वाति शोमपाद नाम मै थी, मौर निष्ठ सान्ता नामक वन्या र्द ऋष्ययूग सुधि को पा से देशरप के सठुर्ग नामक महायदस्वी भौर वश-वरथेव पुत्र उत्पन्न टुमा॥४है॥ चतुरग के कृथुलध नामव पुत्र हूंआा। पुपुलमाक्ष बा पुत्र महायदास्वी चम्प हुआ॥४रा॥ चम्प में मालिनी पुरी का नाम चम्या रख दिया मर्द मुनि की पासे चम्प के हयंग नामद पुत्र हुआ॥४३॥ उसी वे समय वैमण्डरि (प्यः ग मुनि) से मन्या के दल से इन्द्र बे एरावत नामक हाथी को पृथ्वी पर उतारा धा॥४१॥ हर्पग बा पुव राजा मदर हुआ भद्रर्कं बा पुम प्रजाजा मा स्वामी बृदतर्मा था॥४५॥ बृहुतर्मा बा पुत्र वृहडमं आर उम्ता पुषर यूहुस्मनो था। राजेंद्र बृहुमता दे जयदय नामेह पूवको उत्पभ दिया, जिससे दुढ़र्थ सामक राजा उत्प दभा॥४६३॥ दुकएय थे एय विदवजितू कर सास सुनरर स्व पते ये उदम पुर वैडर्ण और वंद्यो कर पु विरथं या उठकर सौ पुत्र थे, जो अयथ को बढ़ाने वते हुए॥४७-४८॥ अगनवदा म उत्पन्न शत्य, महात्मा, प्रजावान्।

५ श्ण दगाइच सुब्। रक ०रतो माज ३ चर्मरय। भष न्य चर्मर०। ५ब् क्पपवोःस्य॥ ६१ पंरप्य।७क्म श्स्यमू्न कर्णो

८० चयोदशोध्ध्याय

ऋचेपोस्तु मुनिश्नेष्ठा रोद्राइवतनपस्य वे। शृणुध्वं सम्प्रदशयामि वंशां राज्ञस्तु भो, दिजः॥१५०॥

ऋतचेपोस्तनपों राजा मतिनारो महीपतिः। भतिनारसुतारत्वासरद्रयः परमुघ्परिमंका:॥५६१॥

यसुरोध। प्रतिसथ- सुवाहुश्चेव धार्मिकः। सप्ये सेददिदव्यव ब्रह्यण्या। सत्यवादिन:॥५९॥।

इला नाम सु यस्यासीत् धन्या वै मुनिसत्तमाः। ग्रहावादिन्पधिर्त्री सा तंसुरतामभ्यगच्छत॥५३॥॥

तंसोः सुततोध्य राज्पिघम्भ नेत्र: प्रतापदानु। ग्रहमवादी पराश्ान्तस्तरप भाग्पॉपदारदी॥५४०

उपदानवौ ततः पुप्नाइचतुरोध्जनयरच्छुभानू। दुप्यन्तमथ सुध्मन्त प्रवीरमनघं तथा॥१५५॥

दुष्यन्तस्य तु दायादो भरतो नाम वौ्य वान्। स सर्वदमनो नाम नायायु्तदलो महानु॥५६॥।

शश्वता सुतो जे दुष्यन्तस्य महात्मनः। धवुन्तला्या भरतो यस्य नाम्ना तरु भारतताः॥५७।

भरतस्य विनष्टेषु तनयेषु महीपतेः। मतिणां तु प्रकोपेण मया तत्कयितं पुरा॥५८॥१

भृहस्वतेरद्धिरसः पुरो विध्रो महामूनिः। अयाजयद्भरद्वाजो महद्भिः धतुभिविभुः॥५१५९॥

पूष्वं तु चितये तत्य षट्ते वे पुद्रजन्मनि। ततोऽय दितयो नाम भरद्राजारसूतोऽभयत्॥६०॥

तयोऽय वित्ये जाते भरतस्तु दिवं यौ। वित्यं चाभिपिच्याय भरदाजों ध्नं रपौ॥६१॥

स श्चापि चितपः पुत्रान् जनपामास थ्व दे। सुहोप्रध्द सुहोतार गयं णप तथैव च॥६२५

शदयपुर

कपिलश्च महात्मानं सुहोत्रस्य सुतं हयम्। कारिकञ्च महासत्यं तया भूत्सतमतिं मुपम् ॥६३॥

तथा गृत्समते पुत्रा प्राह्यणाः क्षत्रिया विदाः। काशिकस्य तु कार्तोयः प्रो दोर्घतपास्तथा ॥६४॥

बभूव दोर्घतपसो विद्वान्‌ धन्वन्तरिः सुतः। धन्वन्तरेस्तु तनयः केतुमानिति विश्रुतः ॥६५॥

प्तय केतुमतः पुनो विद्वान् भीमस्यः स्मृतः। पुत्रो मीमस्थस्यापि वाराणस्यविपोऽभवत् ॥६६॥

दिवोदास इति ख्यातः सर्वदानुप्रणाशनः। दिवोदासस्य पुत्रस्तु वीरो राजा प्रतर्दन ॥६७॥

प्रतर्दनस्य पुत्री दी वत्सो भागव एव च। अर्को राजपुत्रस्तु राजा सन्मतिभान् भुवि ॥६८॥

हैहयस्य वु दायाय हुतवान् दे महीपतिः। आज पितृदायाद्यं दिवोदासहृतं नस्पत् ॥६९॥

भद्रघेण्यस्य पुत्रेण दुर्दमेन महात्मना। दिवोदासेन बाति घृणयासौ विखण्डितः ॥७०॥

अष्टारयों नाम नृषः सुतो भौमस्यस्य वै। तेन पुत्रेण बालस्य प्रहुतं तस्य भो द्विजाः ॥७१॥

वैरस्यान्तं मुनिभेष्ठाः क्षत्रियेण विधित्सता। अलकंः काशिराजस्तु ब्रह्मण्यः सत्यसज्ञरः ॥७२॥

पष्टिं चर्पसहस्राणि पष्टिं वपंकतानि च। युवा हषेण सम्पन्न आसीत् काशिकुलोद्भवः ॥७३॥

लोपामुद्राप्रसादेन परमायुरवाप्तवान्‌ सः। चयसोऽन्ते मुनिशेष्ठा हत्वा क्षेमकराक्षसम् ॥७४॥

रम्या निवेशयामास पुरीं वाराणसी नृपः। अलकंस्य तु दायादः क्षेमको नाम पार्थिवः ॥७५॥

क्षेमकस्य तु पुनो दो व्येतुस्ततोऽभवत्‌। दीर्घकेतोश्च दायादो विभूर्नाम प्रजेश्वरः ॥७६॥

के दो पुन हुए--सस्यवादी कारिक अर राजा गृत्समति ॥६१-६३॥ गृत्समति के पुत्र ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हुए। विदों में दौर्घतपा नामक पुत्र था ॥६४॥ दीर्घतपा ने विद्धान् घन्वन्तरि पुत्र हुआ। घन्वन्तरि का पुत्र केतुमान् नाम से प्रसिद्ध हुआ ॥६५॥ केतुमान् का पुत्र मीमरथ हुआ। मीमस्थ का पुत्र काशीपुरी का स्वामी हुआ, जो दिवोदास नाम से प्रसिद्ध था सब इन्द्रों का विनाशक था ॥६६॥ दिवोदास का पुत्र राजा प्रतर्दन था। प्रतर्दन के दो पुत्र थे--वत्स और माव ॥६७॥ वत्स नामक पुत्र अत्यन्त बुद्धिमान् राजा हुआ। राजा (दिवोदास) ने हैहय की पैतृक सम्पत्ति छीन ली ॥६८॥ भद्रघेण्य के दुर्दम नाम से ख्यात पुत्र ने, जिसको दिवोदास ने बालक जानकर दयावश छोड दिया था, दिवोदास से बलपूर्वक रण लिये गये अपने पितृ धन पर फिर विजय कर दिया ॥६९-७०॥ मीमस्य के पुत्र का नाम अष्टारय था। उसके पुत्र प्रतदन ने शतु का नाम बरतें हुए फिर यना तु वन प्राप्त कर लिया ॥७१॥ काशिराज अलकंश, जा ब्रह्मवादी तथा सत्यवादी था, छत्तीस हजार वपं तत् युद्ध हो दना रषा ॥७२-७३॥ लोपामुद्रा की प्रसन्नता से उसने परमायु प्राप्त की थी। मुनिवर अयु के अन्तिम भाग में प्रतर्दन ने सोमक नामक राक्षस को मारकर रमणीय वाराणसी को फिर से वसाया ॥७४॥

अलकंश का पुत्र क्षेमक नामक राजा हुआ। क्षेमक का पुत्र व्यकेतु हुआ। व्यकेतु का पुत्र विभू नामक प्रजापति शव बौशिक ॥७६॥

आनत्तस्तु विभो पुत्र सुकुमारस्ततोऽभवत्। सुकुमारस्य पुत्रस्तु सत्यकतुमंहारय ॥७७॥

अजमौढो द्विमीढश्च पुरमोदश्च वोय्यंवान । अजमीढस्य पत्न्यस्तु तिलो वे यदसान्विता ॥८१॥

नीली च फेशषिनो चैव धूमिनी च वराद्धना । अनमीडस्य केक्चि या जज्े जह्ल भरतापवान ॥१८२॥

आाजह् यो महसन सव्वमेघमख विभूम । पतिलोभेन घ शद्धा विनीतेव ससार ह ॥८३॥

मेच्छत प्तयवयामास तस्य पद्धा च तत्सद । तत्ता प्लावित दृष्टवा यज्ञा क्तम ततत ॥८४॥

भहवुरष्यद्रवौदगद्धा भुद्धो विप्रास्तदा नुप । एष ते निषु लोक्पू सक्षिप्याप पिवाभ्यहुम ॥८५॥

ग्जस्य गद्धेऽ्वरपस्य सदा फलमदाप्नुहिं। तत पीता महात्मानो दृष्टवा गञ्जा महषय ॥८६॥

उपचिन्युमद्यभागा दृहितुत्वन जाह्ववीस । युबनारवस्य पुरं तु सूपे नहररवहत ॥८७॥

गद्भाशापेन देहाद यस्या पद्चा्नदृतम । जह्कोस्तु दमित पुनो अजको नाम वीय्यंवान ॥

अजकस्य तु दायादो चल्यका्वो महीपति ॥८८॥

अभूव सृगथान्यील- कुशिकस्तरय चात्मन । पह्नवें सह सयुद्ध राजा वनरं सह ॥१८९॥

हुआ ॥७५॥ विम् बा पूतव्र जानत अर उसका पुत्र सुकुमार हुआ। सुकुमार का पुत्र महारथी महातेजस्यी भर

परमधर्मामा राना सयवतु हुआ ॥७७॥

खमूमि से व स अगर मायव स मगभूमि उपन्न टसा ॥७८॥ मुनिधष्टो!

भगवनवनमयसवरअगमिसकेपुतरब्रह्मण क्षत्रिय वन्य ओर द्र हुए ॥७९॥ द्विजश्रप्ठो। अव ऑजसीड़ नामक दूसरे वके विपय मे आप लोग सुनिये। सुहोत्र ब बहव नामव पुत्र हुआ। वदत् क तीन पुषर थे--अजमीद

द्िमीड सर् दार्थितिसम्पन्न पुरुमीढ ॥८०॥

अजमाढ की तीन यनस्विनौ एव सुदरी पायां ची-- नीला केचिनी

भौर धूमिनी ॥८१॥

वेगिनी से प्रतापी जल उत्यनन हुआ जिसने सवययं ममम मायन दिया यट जिसे पास पति बे लोप से (अर्थात् स्वामी बनान वे लिए) गणा मानो विर्न होरर गई च ॥८२ ८३॥ गगा का पत्नी रूप में न स्वका करन पर गगा ने जह्, के यन-स्यल को दुवो दिया। विपरवृ- चारा तरफ म यज्ञ-स्यल

को जलमग्न देतङ्रज न गगा से वड्ा--अमी मैं तेना लोगो भ तरे जर को क्म वर पी जाता हूँ।

गणे! तू अपन इस कम का तत्काद फल पा। तदुपरात माम्य मदपय न पियी हुई गंगा को देकर उसको जह्न, वी परी बना टिया। जह, ने युवनागवं वी पधा वावरी से विवाद त्रिष जिसका आपा शरीर गया व पापम नरी दतं गया था। जलल, त जकर नामक गमि मपन्र पुव हुआ। अजक बा पुत्र राजा बलाइातएवं शिहार सेल्स म आसक्त था) उदा पुव राना श्रनि हुआ जा प्व सागर वनवा

के शाप पापो गया था ॥८८८९॥

कतित ने इंद्र क समान पराभमी पुष्र को प्राप्त करने के है था ०स्तु च्यवनो नाम मागंद । ए०। २ ब ०यासत । अ०। हे क बसों स्पगणान्वि५। भष नीतिनी बेल । ५ वा ण्दम्य प्रस्तु जल्ल.जप धर ६ गे न्मेवमदारय। प०। छू थे तस्प। ८ वा ण्हाभोदस्य पर ९ का. ०कूता। ज०। १० क निया

कुशिकस्तु तपस्तेपे पुत्रभिन्धसमं विभुम् । लभेयमिति त -क्क्रस्त्रासादभ्यत्य जज्ञिवान् ॥९०॥

स पाधिरभवद्राजा मघवा कौशिकः स्वयम् ! यिदवामित्रसतु गधयो, विश्वामित्रा्तयाप्टकः ॥९१॥

सोमदत्तस्य दायादः सहदेवो महायशाः। सहदेवसुतदचापि सोमको सास विधुतः।।९९।।

अनमीढसुतो नातः क्षीणे वच्चे तु सोमकः। सोमकस्य सूतो जन्तुर्यस्य पुत्रशत बी।।१००।।

तेषां घवौयान्‌ पृषतो दुषदस्य पिता प्रभु: आज्मौढाः स्मृताश्चैते महात्मास्तु सोमकाः।।१०१।।

महियौ र्वजमीढत्य धूमिनी पुभ्रयूद्धिनो। पतिव्रता महाभागा कुलजा मुनिन्नतमाः।।१०२।।

सा च पुनाथिनौ देषी द्रतचरयेसमन्विता। ततो वर्षायुतं तप्टवा तपः परमदुश्चरम्‌।।१०३।।

षप तपस्या की। इन्द्र डर वर स्वय उसका पुत्र बन गये भौर गाधि नाम से प्रस्यात्त हुए। साधि के पत्र विश्वामित्र हुए। विश्वामित्र वे' अष्टक नामक पुर हुजा।।९०-९१।। अष्टक का पूर लौहि नाम से स्यात हुआ। मुनिश्रेप्ठो ! मैंने जल्लु-गण को ब्तला दिया। अव अजमीढ का वश-वर्णन सुनिये।।९२।।

अजमीढ से नीली में सुशान्ति नामक पुत्र उत्तन हुआ। सुशान्ति से पुहजाति और पुरुजाति से बाहेगदव की उत्पत्ति हुई।।९३।।

बाह्यारव के पांच पुर हुए--मुदूगर, सृन्जय राजा बृहृदिपु, पराक्रमी यवीनर भौर पाँचवाँ कृमिलाश्व।।९४।।

ये पचो देशो की रहा करने में समर्थ थे। उन पाँचो के पर्चा देश जनपदो से आवृते तथा समृद्ध थे। उनकी रक्षा करें में समर्थ होने वे कारण वे देश पश्चात नाम से प्रसिद्ध हुए।।९५-९६।।

मुदूगल वां पुत्र महायदास्वी मौद्गल्य हुआ, जिससे इन्दसेना में बरघ्नइव नामक पुत्र को उत्पन्न किया।।९७।।

महात्मा सुर्जय की पुत्र पल्‍्चजन हुआ। पञ्चजन वा पुव राजा सोमदत्त और उसका पुथ सहायदस्वी सहदेव हुआ।।९८।।

सहदेव का पत्र सोमक नाम से प्रस्पात हुआ। व मे स्रीण होने पर्‌ अजमीढ वे' सोमक नामक पुत्र हुआ।।९९।।

सोमक के जन्तु नामक पु उत्पन्न हआ, जिसके सौ प्रप।।९९-१००।।

उनमें युवक पूपत के दुपव नामक पु हुमा। ये सब महात्म सोसक के पुत्र अनसोद-वस के कल्ये।।१०१।।

मूनिवर! अजमीढ की पूमिनी नामक पली पतिश्रता, कुलौना मौर सहासार्यशालियी थी।।१०२।।

पुत्र की आवाक्षा से धूमिनी न ब्रत-तियमादि से समस्वित होकर दरा हजार वर्षों तक उग्र तपस्या की।।१०३।।

हुत्वार्तिं १निधिवत्सा तु 'पवित्रामितभोजना। अग्निहोत्रणुशेष्वेव सुष्वाप सुनिसत्तमाः।।१०४।।

धूमिन्या स तया देव्या त्वनमीढः समीधिवान्‌ १ ऋक्षं सञ्जनयामास धूपरचणं 'सुदर्नसू।।१०५।।

ऋक्षात्‌ संवरणो जन्ते कुरः संवरणात्तया। यः प्रयागादतिक्रम्य कुर्षेभं 'चफार हु।।१०६।।

पुष्यं च रमणीयं च पुण्यक्ृद्धिनिपेवितसु। तस्यन्धवायः सुमहान्‌ यस्य नाम्नाथ कोरबा:।।१०७।।

करोद्चं पूव्रादचत्वारः सुधन्वा सुधनुरतमा। 'परीक्षिच्च महाबाहुः प्रवरङ्चारिमेजयः।।१०८।।

परीक्षितस्तु दायादो धाम्मिको जनमेजयः। भुससनोऽगरसेनदच भीमसेनश्च नामतः।।१०९।।

एते स्वे महाभागा विक्रान्ता बलशालिन'। भननमेनयस्य पुघस्तु" सुरथो मतिर्मासतथा।।११०।।

सुरयस्यतु विकान्ता पुत्रों जे विदूरथः। विद्ररयस्प दायाद ऋक्षः एव महारयर।।१११।।

द्वितीयस्तु," भरद्वाजास्नाम्ना तेनैव विशुतः। द्वावृक्षौ सोमवंशऽस्मित्‌ १ द्वावेव च परीक्षितो।

अग्नि मे हवनं करली, पवित्रता से रहती परिमित मोजन करती अर अग्निरोवक्े बुशो पर ही सोती थी। एक समय राजा च घूनिनी से ससम दि दा, जिससे सुन्दर धूम्रवणे बाला च्या नामव पुत्र उत्पन्त हुआ ॥ १०४ १०५॥

पद वे सवरण नामक पुर टूआ और सवरण से डुरु की उत्ति टुई। कुर में वरप से जाकर पवित्र, सुन्दर कया धर्मात्सा व्यक से शुसेवित बुरे च निर्माण विया ५११०६११ उसमे सहानू दश म उत्पत लोग करब नाम से विग्यात हुए ॥१०७।

बुर वे चार पुल थे--सुपन्वा, सुधनु, परीकित्‌ और अरिमजय ॥१०८॥

परीक्षितू वा ्मत्सा पूव जनमजय या, परन्तु शरुतमेने अग्रसेत और मोमिन भी (उनके) पुव ये ११०९५ एव वटे सायकान्‌, य--वान्‌ तथा पराक्रमो ये। जनमेजय का पूप बुद्धिमान्‌ गुस्थ धा॥११०॥

रुरेय वै दिदूरस नामव पशात्रसी पुत्र उन एटुभा विदूस्य बे महारवी पुत्र ब।

साम क्र था है है है ऋा नाम से ही प्रधि दयतव्यानि मर्डाज दे उसपर हुआ चा। सोमदण मे दा स आर दो परीतितू उत्पन्न हुए थे ॥११२॥

तीन भीमपिन सर दो जनमेजय म, हुए थे। दवितीय कद मे पनेन नामक पृक हुआ ॥ सोसलेव से प्रदीप अर प्रवीप से लमत दरापि गार वाझिरना थे तीन ही महारधी पुष उतर हुए 0११४

वियग्रवर! वद यश म शान्तनु से ष्म उत्प हुआ। दिजगण! अव राजयि हिव का वस-्यणन सुनिय॥

वालिर वा पुत्र सहायशरवी सामदत्त हमा। सोमद्त से मूर्दि भूरियवा बौर शद की उसत्ति हुईं ॥ ११६0 मुनि देवापि देवान्न षा उपाध्याय टुआ। है के व्वदिप्राः पञ रेक बवित्रसि०। दे गे मुदधंनः। ष भ न्तन। य। ५ न परीक्षितो।

थे मरोविस्) ६ से जन्मजरा छम पुवो ममूरसुर०्य थे गुयी तु सुर। ८ गे शत ६ थे पे मरय) १८ श शौ पर्व परवदाजा नाम्ना। है है वे ४रिसिस्विस्यातों द्विजससमा। सी०। (व य दाने। एृदेष 0तरचासीत्वोम०। {४ थे न्तु हविरमूरि। ८ स न्दन पुत्हू०। १६ ग इल्दुइच यंग सदासति धार)

शन्तनुस्स्वभवदराजा कौरवाणां धुरन्धरः! जञान्तनोः सम्प्रवक्ष्यामि वंशं रखोक्यविभरुतम्‌ ॥ १११८

गाद्धं देवद्रतं लाम प्र सोऽजनयत्‌ प्रभुः! स तु भीष्म इति ख्यात पाण्डवाना पितामहः ॥१९९॥

काली विचित्रवीय्यं तु जनयामास भो दविजाः शान्तनोर्दयितं पुत्रं धर्म्मात्मानमकत्मपम्‌ ॥१२०॥

फष्णदेपायनाच्चैव सेते बेधियवोर्य्यके। धृतराष्ट्रं च पाण्डु च विदुरं चाप्यनीजनत्‌ ॥१२१॥

चृतराष्ठस्तु गान्धार्य्या पुत्रानुत्यादयच्छतम्‌। तेषा दुर्योधनः श्रेष्ठ स्वेषामपि स प्रभुः ॥१२२॥

पाण्डोधंनञ्जय, पुनः सौभद्रस्तस्य चातेमज। अभिमन्योः परीक्षित्तु पिता पारीक्षितस्य ह्‌ ॥ १२३

पारिक्षितस्य फाइ्याया दौ पुत्री सम्घभूवतु। चर्द्वापोडस्तु नृपतिः सूर्य्यापीडरच ग्मोक्षवित्‌ ॥ १२४॥

चन्द्रापीडस्य पुनाणां। शतमुसमधन्विनामु। ष्जाननेजयमित्येवं क्षाम भुवि परिभुतम्‌ ॥१२५

तेषां प्येष्ठस्तु तत्रासीत्‌ पुरे धाराणसह्ये। सत्यकर्णो महावष्ुयंवा विपुलदक्षिणः ॥ १२६॥

सत्यकर्णस्य दायाद शइवेतक्ण. प्रतापदान्‌। अपुन सं तु धर्मात्मा प्रविबेश तपोवनम्‌ ॥ १९७

तस्म

विषुर को उत्पन विया ॥१२१॥

घृतराष्ट्र ने न्धि में सौ पुन उत्पन किये। उनमे दुर्योधन सबसे बड़ा था ॥१२२॥

पाण्डु का पुत्र घनजय (अर्जन) हुआ और उसका पुर से मदर (अभिमन्यु)। अभिमन्यु वा. पुल वरीक्षित और परीक्षित का पुत्र पारिक्षित (जनमेजय) टभा॥१२३॥

पारीक्षित ^ क्या से दो पुत्र उत्पन्न क्यि--राजा चद्रपोड अं र मीक्ष सूर्यापीद ॥१२४॥

चन्द्रापीड के उत्तम धनुर्घारी स पुत्र हुए जिनको जनमेजय नामं से प्रसिद्ध क्षतियवण ससार मे प्रचलित हुआ ॥ १२५॥

उनम सबस ज्येष्ठ सत्यक, जो बहुत दक्षिणा देम वाला, गन कल वाला और पराक्रमौ था वाराणसी पुरी मे नास वरता था ॥१९६॥

सत्यकणं वै" दवेतकणं नामक प्रतापी पुत्र हुआ। धर्मात्मा सत्पकर्ण पुत्र की अभिलाया से तपोवनं में पत्नी सहित प्रविष्ट हुआ ॥ १२७॥

घन में यदुवर्श। सुचारु क) मालिनी नामक्‌ सुन्दरी कया ने उससे गर्भ धरण विया ॥१२८॥

गर्भं प्रकाशित होन पर राजा इवेतकर्ण स्वगं की यात्रा करने लगा ॥१२९॥

मालिनी न सी पति का अनुगमनं किया। वन मे (जाती हुई) कमलनयना पतित्रता मालिती में मार्ग मे सुदौमल वालव' को प्रसव विया॥१३०१॥

वालक को वही पर छोड़कर चह महामागा मालिनी राजा तेः पीछे-पीछे उसी प्रकार चलने लगी जिस प्रकार पतिता द्रौपदी में अपने पतियों के शक ख ०्यामिव स। देक मोदाजिद्‌। ३ क ख जान्मेजय व इत्ये०\ कख ण्त्वतुवि०।

८६ चमरोदशोऽध्याय।

पत्तिब्रता महाभागा 'द्रौपदीव' पुरा सती। कुमारः, सुकुमारोझ्सी गिरिपृष्ठे रुरोद ह^११३२॥

दयार्थं तस्थ मेघास्तु भरादुरासन्महरेपनः। श्रविष्ठायास्तु पुत्री दो 'ेप्पलादिदच कौशिक ५९३२॥

दुष्ट्दा कृपास्दिती गुहु तौ प्रालष्वयतां जले। निघृष्टौ तस्य पष्दवो" तु शिलायां रुधिरप्लुतौ ०१५१३४॥१

अजर्यामः+ स पार्वाम्यां,' धृष्टाम्या सुसमाहितः। अजया हु तत्पान्नौ देवेन सम्बभूवतुः ॥ १२५॥

अथाजपादवं इति वे चक्राते नाम तस्यतौ\ स तु रेमकशालाया द्विजास्यामसिवद्धितः ॥ १३६॥

रेमकस्य शु भार्या तमुदरहत्‌ पुत्रकारणात्‌। रेमत्या. स वु ॒पुनोऽमूद्त्रह्यणौ सचिवौ तु त) ॥ ११७५

तेषां प्राञ्च पौराश्च युगपततुर्यजीविनः। स एष परयो वंशः पाण्डवानां महात्मनाम्‌ ॥ १६८॥

शक्रोऽपि चात्र गौतोऽयं नाहुपेन ययातिना। जरासंक्रमणे पूव्यै तदा प्रीतेन धोमता॥ १३९0

अचन्दा्ग्रहा भूमिर्भवेदियमसंशयम्‌। अपौरवा सही नेव भविष्यति कदाचन॥ १४०५६

एव वः पौरो वंशो विरुपातः कथितौ सया। तुव्व॑स्तोसहु प्रयकष्यानि दरद्योऽयानोयदोस््या५ १४१

तुर्बसोध्स्नु सुतो वह्धिगेभिनुप्तस्यं चातजः! गोभानोस्तु सूतो राजा ऐंशञानुरपराजितःश ६४२॥

करन्धमस्तु एेशानो्मस्तस्तस्य चात्मजः। अन्पस्त्वाविक्षितों राजा मर्तः फयिततो भया ॥ १४३॥

गमन् का धुव ऐशानु नामक अजेय राजा हुआ ॥१५२॥

एलान का पुत्र करघम आर उसका पुत्र मत्त हुआ। दरगे अविक्षित देश राजा महत का वर्णन पहले ही दिया जा चुका है। मत्त के राज्य में पुरी। उसे सयता नामक कन्या उत्पन्न हुई जिसे उसने स्वत नामक महात्मा को दहेज में दे दिया। बहुत सी दक्षिणा दी।

दक्षिणायं तु सा दत्ता सवर्तामर महात्मने। दुष्यन्त पौरद चापि रेभे युत्रमकल्मपम् ॥१४५॥

एब यातिक्षपेन जरासक्रमणे तदा। पौरव तुव्वेसोर्श्न प्रविवेश द्विजोत्तमा ॥१४६॥

पुष्यन्तस्य तु दायाद कररोम प्रजेदवर। करूरोमादयाह्वीददचत्वारस्तस्य चाह्मजा ॥१४७॥

पाण्डूयडच फेरलश्यैव फाटङ्योल्कच पाधिव। दुद्योशच तनयो राजन मच्ुसेतुश्च पाधिव ॥१४८॥

अड्ारसेतुस्तत्पुत्षों मस्त यपतिरल्यते। यौदनास्देन समरे कृच्छेण निहतो बली ॥१४९॥

युद्ध सुमहदप्यासीन्मासान परिचतुर्दंश। अद्भारसेतोर्दावादो गान्धारे नाम पाधिव ॥१५०॥

श्यायते यस्ये नास्ता यै गान्धारदिपयो महान्। मान्धारदेशनाश्च तुरगा वाजिना वरा ॥१५१॥

अनोस्तु प्रो वर्म्मोऽभूदयुतस्तस्यात्मजोऽभवत्। चुताइनबुहों जज्ञे धरचेतास्तस्य चात्मज ॥१५२॥

भचेतस सुचेतास्तु कौत्तितस्तुर्वसोमंया। वभूदुस्ते यदो पुत्रा पञ्च देवसुतोपमा ॥१५३॥

सहस्राद पपोदरच श्रोष्टा नीलोऽङ्जिफस्तया। सहस्रादस्य दायादास्जय परमघा्मिका ॥१५८॥

हैहयश्च हयश्चैव राजा वेणुहमस्तया। हैहयस्याभवत् पूत्रो धम्मेनेन इति श्रुत ॥१५७॥

धम्मेनेनस्व कार्तस्तु साहञ्जस्तस्य चात्मज। साहञ्जनी नाम पुरी तेन राज्ञा निवेशिता ॥१५६॥

जासोत्महिष्मत पुत्रे भद्रशरेण्य प्रतापवान्। दर्रेण्यस्य दायादो दुमो नाम विश्रुत ॥१५७॥

इदमस्य सुतो धौमामूकनको नाम नामत। कनकस्य तु दायादाङ्चरवारो स्मेकविशरुतः ॥१५८॥

कृतबीय्यें कृतौजादच एत दा त्थ्य च। कृताग्निस्तु चतुर्योऽभूत कृतवीरयदियाउजुन ॥१५९॥

सयता से दृप्यत नामक पीरवं वशी निष्पाप पत्र उत्पन्न हुआ। देश में दे दिया।

द्विजवर इस प्रकार वद्धावस्था में राजा पयाति के ज्ञाप से तुवसु का वश पे रव वश में मिल गया।

दृप्यत्त का पुत्र करूरोम प्रजाओ का स्वामी हुआ। करूरोम का पुत्र अथाह्वोद और उसके चार भ्राता हुए--पाण्डय करर बाल और चोर। दधु का पुत्र राजा वशेत हुआ। वेभ्रसेतु अगारसेतु नामक पुत्र हुआ जो मरतो का स्वामी कहा गया है जिसे युद्ध में यौवनाई बड़ी कठिनारे से मारा था। चौदह मास तक उन दोनों में घमासान युद्ध हुआ था। अगार सेतु का पुत्र गाधार नामक राजा हुआ जिसके नाम से गाधार देश प्रसिद्ध है। गाधार देश के घोर अश्वत अच्छे होते हैं। अनु का पूर्व चम और उसका पुत्र दूत हुआ। यतसे बनेव उत्पन्न हुआ और उससे प्रचेता। प्रचेता के सुचेता नामक पुत्र हुआ। तुवसु का वेवा घणन मैंने कर दिया। यद् के देव-पुत्र के समान पाँच पुत्र उत्पन्न हुए--सहस्राद पयोद क्रोष्टा नील तथा अड्जिक। सहल्लाद के तीन परम धर्मात्मा पुत्र हुए--दैहंय हय भार वेणुहय। हैहय का पुत्र धमनेत्र हुआ। धमनेत्र का कार्त

त्रयोदद्योऽभ्याय

सोऽघ्तौ बाहुसहुखेण प्सप्तदरीपेश्वरोऽभवत । जिगाय पृथिवोमेको रथेनादित्यवच्चंसा ॥ १६०५॥

स हि वर्पायुत तप्त्वा तप परश्मदुश्चरम । दत्तमारप्चप्रामास फात्तवीयर्योऽत्निसम्भवम ॥ १६१॥

तस्म त्तौ वरान प्रादाच्चतुरो भूरितेजसः । पूच्वं बाहुसहस्र तु प्रथत स्‌ महरम ॥ १६२०॥

अवम्मेऽ्यीयमानस्ष साद्धिश्तत्र निचारणम। उपरेण पृथिवीं 'जिरदा धर्मेनेयानुरञजनम ॥ १६३१

सग्रामान सुबहून जित्वा हेत्वा चारोन सहस्रदा। सग्रामे वर्तमानस्य घध चाभ्यधिनतादरणे ॥ १६४॥

तस्थ बाहुसहसर तु पुष्यत किल भ द्विजा । योगादयौगीदवरस्पेव प्रादुनवति माया ॥ १६५॥

तनेय पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपत्तना \ ससमुद्रा सनगरा उग्रेण विधिना चिती॥ १६६१

लेन सप्तसु पेषु सप्त यदश्तानि वै! प्राप्तानि विधिना राज्ञा शरूयते मुनिसत्तम ॥ १६७५॥

सव्व यज्ञा मुनिश्रेष्ठा सह्सश्चतदक्षिणा । सव्यं काञ्चनयूपादच सव्व ५ एरचनवेदय ॥ १६८॥

स्वे देवेम्मुनिशरेष्ठा धिमानस्यैरल्ड्कृत । म धव्वरप्सरोभिरच नित्यमेवपञशोभिता 0 १६९॥

यस्थ यजे जगी गाथां य घर्थ्वा नास्दस्तथा + प्वसीदासास्मनो विष्ठा महिम्ना रस्य चिस्मित १९७०५

नारद उवच

म नूने कातवोम्यस्थ सति यास्यन्ति पायिवा । यजञेदनिंस्तपोमिदच^ विक्रमेण शतेन थ॥ १७१॥

स हि सप्तसु दवेषु चर्म खड्गो शरासनी । रयौ द्वीपाननुचरन धोगो सदृद्यते नृभि ॥ १७२॥

कृतवा सं अजुन की उत्पत्ति हुई जो हजार भुजा व प्रताप से सता द्वीपा का अय वर वन गया या) उसने

सयव समान प्जस्वास्यस जफेले सदूण पुथ्वा को जात ल्या ॥१६४॥ भ र उससे दश हुजार वर्षों तव बर्टिते

सपम्या कं अति मुनि थे पुत्र दत्त कप्र्त क्रिया ११६१५ श्त « उसे चार अयत संजस्वा सस्दान टिय।

वर्जन न प्रायना का~ मुन हजार मुजाएँ हो जाएँ सतुरुप मुझ मघम स वचाएं अपन पप्र कत्तव्य से पृथ्वी को

जीन कर परचात घम स मैं प्रनाभा का अनुश्सूजन कहे १६२ १६३॥ अर बटूत से राग्रामा को जातक द हजारों

दाजुआ को सार वर युद्ध से अपने स अधिक वलनाटा पुश्प व हाथ से मर ॥१६४॥ दविजवूर। जिरा प्रार

माय माथा के बड़ से यागी वर का चपर गति हो जाती है उस प्रहार युद्ध बर गमय उसर हजार भुनाप्‌

प्रमटोजादा था है६ । एर शुना जाती है दि उन नप उप्र काव्य सं मनात पवत सुर अर नगर रशित

इस पृथ्वी वो जात लिया आर सता इपा मे खतम यह रिय॥ह६६ १६७7 उर एकनएव रास दिया दी

थ सय पा में सुवण वी यजस्तम्म अर सुवरा की ढी वनो नार गई या ॥ १६८ भलत विनिः प्रर रियते

समा ददन गवव अर अप्सराए यज्रथर को सुगोमित बर थी ॥ १६९ भनूनद पशम गद अर बर दारा

केशव विद्वन्‌ नार ~ उसी सदिधा से दिस्सित होपर गाया गार्ड १५०

नारद ने कहा-- यह दान तथ

ब्रह्मपुराणम ८

भनष्टद्रव्यता चंवर न छोकों न चं विम्रमः प्रभावेण भया रा. प्रजा धम्मेंग रक्षत ॥१७३॥

भ्त सव्वरटनभाक्‌ सम्बाद्‌ चक्रवर्ती बभूव हु। स एव पदुपाकोऽभूत्‌ क्षेत्रपाल स एव चश १७४

स एव वृष्ट्या पर्जन्यो योगित्वादज्जुनोऽभवस्‌ । स चै वटुसहस्ेण उयाघातप दिनतवचा ॥ १७५

भाति रहिमिसहुसरेण झारदीव च मात्र. स हि नागान्पनुष्येषु साहिप्सस्या महादयुति १७६

कर्कॉरफलुनान निव प्यं तस्या न्यदेशयत्‌ । स वै देश समुद्रस्य प्रायुट्कालेंउम्बुजेक्षण ॥ १७७॥

परौडनिव भूर्जो वत्र प्प्निलोतदचकार ह। लुण्ठिता क्रीडता तेन, मदौ तदुद्ाममालिनी ॥ १७८॥

चनदुम्िपहस्ेण शद्धिताभ्येति नम्मंदा। तस्य बाहुसहस्रेण शिष्यमाणे सहोदधो ॥ १७९॥

भयक्षिलीना निद्चेष्टा पातालस्था महासुरा । चूर्णझतमहादीचि चरूम्मीनमहातिनिम्‌ ॥१८०॥

पास्ताविद्धतेनौधमावरतोभसडकुःखम्‌ प्रावर्तयत्तदा राजा सहसेणप च बाहुना ॥१८१॥

देचासुरसमाक्षिप्त क्षीरोदमिवे मन्दर १,। मन्दरक्षोभचकिता अमृतोत्पादश्चद्धिता ॥१८२॥

सहसोत्पतिनर मीता भोम दृष्ट्वा नृपौतमम्‌ ॥ नता निश्चलमूरानि बसूवुस्ते महोरगा ॥ १८३॥

सायाह्ं कदलीषण्डा कम्पिता इथ वायुना । स वै बद्ध्वा धनुरर्यानिरुस्सिवत पञ्चभि दारें ॥ १८४॥

धिचरण करता दुमा बह यागी यजनं सातादीपो मे मनुष्यों से देखा जाता है ॥१७२॥ प्रजाओ वा धमपुवव पालन कर हुए महाराज अजु न का दव्य-क्षये वृमः नहीं होता झाक अ र श्रम सी नहीं हात ॥ १७३॥ उसक पास सब मवार्‌ वे रत थ। वह्‌ चकवर्नी राजा था। वह्‌ प्रसुपाल अर क्षेत्रपाल सी था। १७४॥ योग के प्रताप से की मेघ रूप हकर वर्षो थी वरता था। वही शरद्‌ ऋतु म सूय की सट किरणों दे समान बनुप व आघात रे कठिन त्वचा वाली हजार मुजाओ स सुशोमित था ॥ १७५॥ उसी न बर्कॉटव ये पुत्रो को जीतवर माहिंप्सती पूरी में मनुष्यो व बीच नांगे को वसाया अँ र वर्षाकाल में समुद्र वेग मे शीट कत हुए अपनी मुजाओं से समुद्र पै वहुत-से सोत वना दिये ॥ १७६॥ १७७॥ उसी की क्रीडा के समय नमदा नदी जिसमें हजारों तरंग उठ रही थी शिति होकर सम्मुथ आई ॥ १७८॥ जत उर हजार वाहुआ से समुद को क्षोमित क्या तब पातालवासी महाराक्षम मय से निश्चेष्ट होकर छिप गये ॥ १७९॥ पूव काल मे जैसे देवता म र असुरा न मदराचल त समुद्र का सथन किया था उसी प्रकार उस राजा « हजार भुजाओ स समुद्र मथनं किया। समुद्र की महात्म चुरन्चूर कर दी गईं मच्छर महामच्छ कपिल लगे, पवने के वे से यथा का समूह उत्पन्न हो गया, अआक्त (मेवद) फैलने लगे ॥१८०-१८२॥ मदराचल के संचालन से चकित आर अमृतं की उत्पत्ति से शक्ति मे समुदवायी महाप हृमत्‌ उठकर चारा भौर निद्र लगे। उस मयानक राज-ध्रष्ठ को देखकर डर से उनके सिर निश्च ही गये आर सायकाल मे वाम्‌, से कपित केले ऋ पत्त वी परह्‌ ने थरयरान रगे ॥१८२॥ १८३॥ उसी रजा न घनुप की डो से मुक्त पाँच वाणो से सेनासहिंत खकापति रावण को मोहित कर अपने वश म करके माहिष्मती

१क स्त्छ्ते१म रक्षिता! रेक सतु स्वव मोगाढयदचफ०। २ ख गरतनमोमाद्थदवक्र०। ४ सख श्कयुतान््त्वा पुर ५ ग जन फेनदचोदाम० । ६ भ त्नी! क्क ७ ग ०डितसा स्ये ८ ग नवि वल०। ९ क्‌ *स्तोदिमितफं०। १० श॒ ०मदुसहम्‌। ११ क न्सेणैव त्रा { १२ °र। तत्सक्षीमेणा चक्तास्ताइरयागिमनश०। १९ के तास्तार्यागमनश०


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९५ वयोदगोऽध्याय

सद्धं मोहयित्वा तु सबलें! रावणं ब्रद्धातु। निजित्य वशमानीय माहिष्मत

श्रुत्वा शुबद्धं पौलस्त्यं रावणं त्वर्जुनेत च। ततो गत्वा पुरस्तमन्नुने वदुरो स्वयम्‌ ॥ १८६॥

मुमोच ऋषः पौलस्त्यं पुखस्त्येनाभियाचितः। यस्य बाहुसहस्रस्य बभूव उयातलस्वनः। ॥ १८७॥

युगान्ते तोयदस्येव स्फुटतो ह्यशनेरिव अहो बत मृधे वोय्यें भागंवस्य यदच्छिनत्‌ ॥ १८८॥

राज्ञी बाहुसलहलरस्य हेम तालवनं यथा! तुपितेन कदाचित्‌ स भिक्षितश्चिनभानुना ॥ १८९॥

स भिक्षामददद्वीरः सप्त द्वीपान विभावसोः! पुराणि ग्रामघोषांच विपयदचंव सर्वेश: ॥ १९०॥

जजवाल तस्य सर्वाणि चियभेःतुरिदृक्षणा! स तस्य पुरुपेखस्य प्रभावेण महात्मनः ॥ १९१॥

गाह कातदीर्णस्तु दालॉइचेव वनानि च। सदून्धमाश्नमं रस्यं वरुणस्यात्मजस्य च ॥ १९२॥

ददाह बलवद्धौतहिचनभानुः सहैहपः। मं सेमे वरुणः पुत्र पुरा भास्वन्तुत्तमम्‌ ॥ १९३॥

वश्षिष्ठं नाम स मृनिः हयात आपन इत्युत! तनापवस्तु तं प्रोघाच्छप्तवानर्जुन विभूः ॥ १९४॥

यस्मान्न बज्नितमिदं वनं ते मम हैहय। तस्मात्ते दुष्करं कम्मे कृतमन्यो हनिष्यति ॥ १९५॥

रामो नाम महाबाहुर्जामदभ्यः प्रतापवान्‌! छित्वा बाहुसहस्रान्तें प्रमथ्य तरसा बली ॥ १९६॥

तपस्वी प्राह्मणस्त्वां तु हनिष्यति, छ भार्गव! अनष्टद्रव्यता यस्य बभूवाभि्रकपिपः ॥ १९७॥

प्रतापेन नरेद्रस्य भरना धर्मेण रक्षत। प्राप्तस्तलो'स्य मृत्यु तस्य श्चापान्महामृनि ॥ १९८॥

पुरी मे चपा था ॥१८४-१८५॥ परन्तु अजुन वे दवाय वौ मयै पुरस्य रावण की दात सुनकर पुरुर्य-मुनि स्वयम्‌ अजुन के पात गये। १८६॥ पुल की याचत करने पर अजुन >, जिसके हजार मुंजाओ के घनुष की टकार प्रलयकालीन मेषो वे" गर्जन ने समान तया मिजली की कटक वे" रामान होती थी, रायण का मुक्त वर्‌ दिया ॥१८७॥

पर आश्चयं तो यह है कि परणुराम न संग्राम म उसी राजा की हजार मुजाभोको तासन के समान वाट दिया। ॥१८८॥ दिसी समय अग्नि ने तृष्णा से युक्त हो अर्जुन से मिझा मागी। उस बीर में अग्नि को साती दीप दिवस में दे दिये ॥१८९॥ तेव अग्नि उसके नगर, ग्राम और देशो को सब ओर से जलाने लगे! ॥१९०॥ उस महात्मा पुर्पेस्द अर्जुन मे प्रमाव से भगिनि न पर्दतों और वनों वो जला दाला उसी हैट्य (अजुन) वे राय होकर अत्यस्त मपमीत अग्निन वेषण मे पुर देः घुन्य तवा रमणीव आश्रम को मी जला हाल ॥१९१-१९२॥

पहले जिच ठेजम्बी तथा उत्तम पुर भौ वरुण में प्राप्त सा था, यह वनिष्ट निर मुनि आपव नाम हे भी प्रष्यत थाश ॥१९३॥ उस दाक्तिसपन्न आपव ने क्रोध से अजुस को ताप दिया-- हैटय जिस उदय से सुमन मेरे माधम की रहा नहीं की. उसे और तुम्हारे ष्णम भो कोई दूसरा सप्ट बरेगा ॥१९४-१९५॥ प्रतादी सया दक्तियाली जमदस्लिसुत्र परशुराम तुम्दारी हजार मुजाओ वो बाटकर वेग से मय वर तुमको मारेगा' ॥१९६॥ जिसे राजा मे इय्या गा झाय नहीं होता था, जो हाजुआ का सद्दार और धमय प्रजा गा पालन करता था, उसपी मृत्यु महामूनि है थे संग्ण।

वरस्तमेव भो द्विप्राः स्वयमेव यृतः धुरा तस्य पुनदातं! त्वासीत्‌ पञ्च शपा महात्मनः ॥ १९९॥

कृतास्या अक्तिनः, शूरा धर्म्मादमानो यशस्वितः। शूरसेनद

यादवा यदुनाम्ना ते निस्च्यन्ते च हैहयाः। न तस्मात् वित्तनाशः स्थाघ्नष्टं प्रतिलभेच्च सः॥ २०७॥

कार्तवीर्यस्य यो जन्म कथयेदिह नित्यशः। एते ययातिपुत्रायः पञ्च चन्दा द्विजोत्तमाः॥ २०८॥

कोटिता लोकवीराणां ये लोकान् धारयन्ति वे। भूतानीव मुनिशेष्ठाः पञ्च स्यात् स्थावरजङ्गमान्॥ २०९॥

श्रुत्वा पञ्च विसर्गस्तु राजा धर्मार्थविकोविदः। वशीभवति पल्यामामात्मजानां तयेश्वरः॥ २१०॥

लभन्तु पञ्च वरान्चैव सुलभानि हि लोकिकान्। आयुः कीर्तिं तथा पुत्रान्नन्दवर्धनं भूतिमेव च॥ २११॥

के झाप से हो गई॥१९७-१९८॥ विप्रृंद! उम स्वयं ही ऐसा वरदान पहले माँगा था। उसके सौ पुत्रों में से पाँच ही बची, अरूप-दस्त्री से सुसज्जित, धर्मात्मा, वीर, यशस्वी और महात्मा पुत्र ये गये थे, जिनका नाम था--शूरसेन, शूर, वुपण, मधुप्रध्वज और जयध्वज। जयध्वज अवन्तीपुरी का राजा हुआ॥ १९९-२००॥

कार्तवीर्य (अर्जुन) के सभी पुत्र महावीर्यवान् तथा शक्तिसंपन्न थे॥२०१॥ जयध्वज के तालजघ नाम का महावली पुत्र हुआ। उसके सौ पुत्र हुए; जो तालजघ नाम से प्रसिद्ध थे॥२०२॥

मुनिवर! उन महात्मा हैहयों में वशे में वीतिहोत्र, सुजात, मौनः, मवन्ति, तौष्डकेर, तालजघ और मरत--इन नामों से विख्यात पुत्र थे, जो विस्तार-मय से यहाँ नहीं बिने जा सकते हैं॥२०३-२०४॥

विप्रवृद्ध! बूप नामक राजा से लेकर यदुवंश का धर्मात्मा दय। वहां वशधर हुआ। उसने मधु नामक पुत्र हुआ॥२०५॥

मधु के सौ पुत्र थे। उसका वंशर सुपण हुआ। वृपण के वंज वृष्णि कुलये और मधु वे माधव॥ २०६॥

यदु के वंश में उत्पन्न वे हैहय यादव नाम से प्रख्यात हैं। जो व्यक्ति कृतवीर्य के पुत्र अर्जुन की जन्म-कथा नित्यप्रति पढ़ेंगा, सुनेगा, करेगा, उसका वित्तनाश नहीं होगा और नष्ट हुआ भी द्रव्य पुनः मिल जायगा॥२०७॥

द्विजवर! ये पाँचों वंश उन महावीर ययाति-सुतों के दैः जो पञ्चमहाभूतों की त्रस स्थावरजगत् सहित संतोगय को धारण करते हैं॥२०८-२०९॥

इन पाँचों वंशों को सुनकर धर्म-अर्थये को जानने वाला राजा पाँचों वंशों के अधीन अर्थात् प्रियपात्र तथा विभूतिमान् ही जाता है॥२१०॥

द्विजगण! इन पञ्च वंशों के धारण और श्रवण से मनुष्य संसार में दुर्लभ आयु, कीति, पुत्र, पव भर विभूतिरूप पाँच वसे को प्राप्त करता है॥२११॥

लड़ मोहयित्वा तु सबलें रावणं वताय्‌। निजित्य वदामानीय माहिष्मत्यां बबन्ध तम्‌॥ १८५॥

श्रुत्वा हु बद्धं पौलस्त्यं रावणं त्वर्जुनेन च। ततो गत्वा पुलस्त्यस्तमर्जुनं ददृशो स्वयम्‌॥ १८६॥

मुमोच रक्षः पौलस्त्यं पुलस्त्येनाभियाचितः। यस्य बाहुसहस्रस्य वभूव ज्यातरस्वनः॥ १८७॥

युगान्ते तोयदस्येव स्फुटतो हिमाशनेरिव। अहो बत मुधे वीर्यं भार्गवस्य यदच्छिनत्‌॥ १८८॥

राज्ञी बहुसहस्रस्य हैमं तालवनं यथा। तृप्तितेन कदाचित् स भिक्षितश्चिनमानुना॥ १८९॥

स भिक्षामददाद्वीरः सप्तं पान् विभावसोः। पुराणि ग्रामघोपांश्च विषयांश्चैव सर्वेशः॥ १९०॥

ज्ज्वाल तस्य सर्वाणि चिन्द्रभानूददृक्षया। स तस्य पुरुषेन्द्र्य प्रभावेण महामनः॥ १९१॥

वाह कार्सवोय्यंस्तु शलश्चैव वनानि च। सरून्यमाश्वमं रम्यं वरणस्यात्मजस्य दे॥ १९२॥

प्रतापेन नरेन्द्रस्य प्रजा धर्मेण रक्षत। प्राप्तस्ततोऽस्य मृत्युर्वे तस्य ध्यापान्महामुनेः॥ १९८॥

पुरी में वधा या॥१८४।१८५॥॥ परन्तु अर्जुन के द्वारा वारि गये पुलस्त्य-पुष्कर रावण की बात सुनकर पुलस्त्य-मुनि स्वयं अर्जुन के पास गये॥ १८६॥ पृलस्त्य की याचना करने पर अर्जुन ने, जिसके हजार भुजाओं थे घनुष की टवार प्रल्यकालीन मेषो वे गर्जन ने समान तथा बिजली की कवे ने समान होती थी, रमण को मुक्त कर दिया॥ १८७॥

पर आश्चर्य तो यह है कि परुराम ने संग्राम में उसी राजा की हजार भुजाओं को तावन मे दामान बाट दिया॥१८८॥ किसी समय अग्नि से तृष्णा से युक्त होकर अर्जुन से भिक्षा माँगी। उस वीर ने अग्नि को श्रातो दीप मिन्ना में दे दिये॥१८९॥ तेव अलिनि उसने नगर, ग्राम और देशों को सब ओर से जलाने लगे॥१९०॥ उस महात्मा पुष्य के अनन्त के प्रभाव से अग्नि में पर्वतों अर् वनों को जला डाला। उसी हैहय (अर्जुन) की साप होकर अग्यन्त सवमीत अग्निम सध्य के पुत्र केः धून्य तमा रमणीय आश्रम को भी जला डाला॥१९१-१९२॥ पहले जिस तेजस्वी तथा उत्तम पुत्र को वरुण में प्राप्त दिया था, वह दमिष्ट नामक मूनि आपव नाम से भी पस्थात था॥१९३॥ उस धक्निगियप्र पद ने कोष से अर्जुन को पाप दिया--हैहय। जिस उद्य से तुमने मेरे आश्रम को रा नहीं की, उसे और तुम्हारे दुष्वमं को कोई दूसरा नष्ट करेगा॥ १९४-१९५॥ प्रतापी तथा दारिशाली उमदनिुक परुराम तुम्हारी हजार भुजाओं को बाटकर वेग से मप अर तुमको सारेंगा॥१९६॥ जिय राजा ने त्रय्या की हाय नहीं होता था, जो दाशुम का सदार और परमपूर्वर प्रजा का पालन करता था, उसी मृत्यु महामूनि के संपा॥१९७-१९८॥

रस्त्वं भो विप्रा स्वयमेव वृतः पुरा। तस्य पुननत् त्वासोत् पञ्च शा महारमनः॥ १९९॥

कृतास्त्रा बलिन् शूरा धर्मात्मानो यदास्विन्। शूरसेनः शूरः बुपणो मधुपध्वजः॥२००॥

जयध्वजदव नाम्नासीदायन्त्यो नृपतिमहान्। कार्तेवीर्यस्य तनया वीर्यवन्तो महावला॥२०१॥

जयध्वजस्य पुत्रस्तु तालजद्धो महाबल्। तस्य पुत्रशतं रयातास्तालजद्धा इति स्मृता॥२०२॥

तेषां बुले सुनिभेष्ठा हैहयानां महात्मनाम्। बौतिहोत्राः सुजाताश्च भोजावचावन्तय स्मृतः॥२०३॥

प्रतोण्डिकेराङ्च वीर्यातास्तालजद्धास्तयंघ च। भरताः सुजातश्च बहुत्वाघानुकोत्तिताः॥२०४॥

वृषप्रभृतयो विघ्ना यादवा पुण्यफल्मिंग्। वृषौ वंशधरस्तत्र तस्य पुत्रो मधु मवन्मधु॥२०५॥

मधो पुत्रशतं स्वासोद्बुपणस्तस्य वंशत्। बुपणाद्बृष्णयः सर्वे मधोस्तु भाघवाः स्मृताः॥२०६॥

यादवा यदुनाम्ना ते निरुच्यन्ते च हैहया्। न तस्य वित्तनाशः स्यान्नष्टं प्रतिलभेच्च सः॥२००७॥

कार्तंबीर्यस्य यो जन्म कथयेदिह नित्यय्। एते यपातिपुनाणां पञ्च वंशा द्विजोत्तमा॥२०८॥

तिता लोकबीराणा ये लोकान् धारयन्ति वै। भूतानीव सुनिश्रेष्ठाः पञ्च स्थावरजज्ञमान्॥२०९॥

भत्वा पश्च वितर्गास्तु राजा धर्मविकोधिद्। वशीभवति पञ्चानामात्मजानां तयेश्वरः॥२१०॥

अमेतु पञ्च वराइचेव दुर्लेमानिह लौफिकान्। मायू कोति तया पुननानेश्वय्य भूतिमेव च॥२११॥

विधवृन्द। उसने स्वयं ही ऐसा वरदान पहले माँगा था। उसके अति पुत्रों में से पाँच ही बरी, अस्त्र-दस्त्रों से सुसज्जित, धर्मात्मा, वीर, यरद अर महात्मा पुत्र

जा सकते हैं॥२०३-२०४

विप्रृन्द । बृप नारं राजा से लेवर यदुवर घर्मात्मा दए । वह्‌ वशघर हुआ। उसे मधु नामव पुव भा ।॥२०५॥। मच्‌, वैः मौ पु थे | उसका वदाघर वृण हुआ । वृषण के वशज वृष कट्लयि मौर मयु मे माप ॥२०६॥

यदु वे वशा मे उत्पन्न वे हैहय यादव नाम से प्रयात हैं। जो व्यक्ति दृतवीयं के पुत्र अर्जुन की जम-क्थानित्ययति पदे, सुनया, व रेगा, उसपर वित्तताश नटी होगा और नप्ट टुआ भी दव्य पुन मिल जायमा ॥२०७॥

दिजवर! ये पांचावदा उन महादीर पयाहि-पुत्री वे हैं, जो पंचमहामूों कौ तरह स्थावर-जगम सरित शैटोवय को पाएग बरते हैं२०८-२०९॥। इन पचा वो को सुनकर धर्मे-अर्थ मो जानने वाला राजा पासो ववे अपीन भण कथा विमृनिमान्‌ हो जाता ै॥२१ा

द्विजयंण हन पाँच दरों वे धारण और श्रवण से मनुष्य र मे दुलेम आायू, कति, पुव, ऐश्वरय और विभूतिशुप पाँच वरो की प्राप्त कर्ता है ॥२११ मुनिशेष्टो है नव हब से न्दातायारन्यञ्य। व पत्दित। ३ गे. ०१च पूष्टोक्तः इध एवं च। ज० से

महावीर्य! ५१ «जात्याइन। ६ क सौढिये०। स तोश्दिके०। ७ क. च. । सार०। ८ च॒ «पमप्टतपों बिना ९ थे. ०णो साइपारणहतव । मूल १० स छोपास्तार०। ११ य या।