अध्याय 6: सूर्य की उत्पत्ति का वर्णन (आदित्योत्पत्ति-कथनम्)
अध्याय 6 : षष्ठोऽध्यायः
षष्ठोऽध्यायः
अत्र व. कोतेपिप्यामि मनोर्वैवस्वतस्य वे विसमं भुनिशादूलाः साम्प्रतरप महायुते: भ६३॥
अम्र बंशप्रसज्रेन कथ्यमानं पुरातनम् ! यत्रोत्पप्नौ सहात्मा स हरिदृप्णिकुलेः प्रभुः ६४
हति श्रोप्राह्े महापुराभे मन्यन्तरकीर्तनं भामं
परवमोऽध्यायः ॥ ५५१
जादित्योत्पत्ति-कथनम्
लोमहेण उवाच
विवस्वान् कयपाज्जजे दाक्षायण्यां द्विजोत्तमा: । तस्य भार्य्यभिवत्संज्ञा त्वाष्ट्री देवौ विवस्वतः ॥ १॥
सुरेश्वरीति, धिस्याता तरिषु लोकेषु भविनी! सा वै भर्या भगवतो माततंण्डस्य महात्मनः शरत
भ्तर्पेण नातुष्यदरूपयवनशालिनी । संज्ञा नाम, सुतपसा सुदीप्तेन समन्विता ॥ ३॥
आदित्यस्य हि तद्रूपं मण्डलस्य सुतेजसा ९ गमेषु परिदग्धं वै नरतिकान्तमिवाभेदत् १४)
न खल्वमं मृतोऽण्डस्य इति स्तेहादभायत। अजानन् काइयपरतस्मान्मात्तंप्ड इति चोच्यते ॥ ५॥
तेजस्त्वम्पधिकं तस्थ नित्यमेव विवस्वत. येनातितापयामास त्रीरकोकान् पश्यपात्मजः ॥ ६॥
है॥६२॥ मुनिवयं । अत्र मैं वलंमान महातिजस्वी वैवस्वत मनु की सृष्टि का वणन आपसे केल्या ।१६३॥ वश वे
परसय से मैं उस प्रायोन वृष्णिकुल दर वर्णन करूँगा, जिसमे वे सरवंशक्तिमान भगवान् हरि उत्यय हुए ये ॥९४॥
श्री ब्रह्म महापुराण मे मन्वन्तर-कीतन नामक पाँचवाँ अध्याय समाप्त ॥५॥
अध्याय ६
सूरयै की उत्पत्ति का वणैन
लोमहर्षण ने कटा--विप्रवर! कश्यप आर दक्ष की पूरी वे' सयोग से विवस्वानू (सूर्य) उत्पन्न हुआ। उस विवस्वान् की पत्नी त्वष्टा को पुत्रों सा हुई १॥ मगवान् सूये की स्त्री (सजा) तीना लोक में सुरेश्वरी नाम से विख्यात है॥र॥। तपस्या और कान्ति से युक्त सज्ञा सौन्दर्य और यौवन से परिपूर्ण थी। स्वामी का रूप उसे पसन्द न था॥३॥ अगो में जखन पदा कर, दाला सूर्यमण्डल का वह् तेजस्वी रूप उसे नहीं माता था।॥४॥। उसने स्ह से कदा कि यह अण्डस्य मरा नही है। इसलिए कश्यप पुत्र (सूरये) कर नाम माहेण्ड पडा ॥।५॥॥ उस विवस्वानू में अत्यन्त तेज होगे के कारण वह तीनों लोको को तपाने लगा॥६॥ विभवृन्द ! अतितेजस्वी सूये मे शक ते लक ख गकुलोदूमवे । इ०। दे के उरेणुर्रित्ि। ख. सुरेणुरिति। क, सामिनी। ५
ब्रह्मपुराणम् २७
प्रीपयपरथानि, भो विप्राः र संज्ञायां तपतां वरः । आदित्यो जनयामास कयां हो च प्रजापती ॥ ७॥
भनुर्वेवस्वेतः पूर्वं श्वाद्धदेवः प्रजापतिः) यमदच यमुना चैव यमजो सम्बरवतुः ०८०
इयामवणेन्तु तदरूपं संज्ञा दृष्ट्वा विवस्वतः! असहन्ती तु स्वां छायां सवर्णा निम्भ॑मे ततः ०९०
मायामयो तु सासा तस्यां छायासमुत्थिताम् ! प्राञ्जछि; प्रणता भूवा छायासंज्ञा'हिजोत्तमाः ॥ १०॥
उवाचं किं मया कार्ये कथयस्व शुचिस्मिते । स्थितास्मि तरव निर्देश शाधि मां वरर्थाणनि ॥११॥
संज्ञोवाच
अहं यास्यामि भद्रं ते स्वमेव भवनं पितु। त्वरयैव भवने मह्यं, वस्तव्यं निविशड्ूया ॥१२॥
इमी च बालकौ मह्यं कन्या चेयं सुमध्यमा । सम्भाव्यास्ते न चाष्येयभिदं भगवते क्यचित् ॥१३॥
सवर्णोवाच
अकबग्रहणादुदेंवि आ दापालेव कटिचित्। आयास्यामि नमस्तुभ्यं गच्छ देवि ययातुलम् ॥१४॥
लोमहर्षणउवाच
समादिश्य सवर्णन्तु तथेत्युक्ता तथा च सा। त्वष्टुः समीयमगमद्रीडितेव तथस्विनौ ॥१५॥
पिहुः समोपगा सा तु पित्रा निर्भ्सिंता शुभा । भनुः, समोप च्छेति नियुषता च पुनः पुनः ॥१६॥
आगच्छद्वडवा भूर्वाच्छाद्य रूपमनिन्दिता। कुरूनयोत्तरान् गत्वा तृणान्यय चचार हुत ॥१७॥
सज्ञा से एक कन्या यु दो प्रजापतिया को उत्यते क्रिया ॥७॥ पहले प्रजापति श्वाद्धदेवं मनु विवस्वान् से उत्पन्न हुए।
फिर यम और यमुना दोना यमज (जुड़वाँ) उत्पन्न हुए। ॥८॥ विवस्वान् के श्यामवणं रूप की ने सहत हुई सभा ने अपन। छाया सवर्णा को रचा ९ ब्राह्मणवर्य । माया से रची हुई वह छाया अजलि बाँघकर सज्ञा के सामन खडी हो गई और बोछी--हे गु दरी मैं आपके अधीन हूँ आपने लिए मुझे कया करना है > बाश्ञा दीजिए ॥१०-११॥
सन्नाबोखी-तैरा कल्याण हो। मैं अपन पिता के घर जाङगी। तू मेरे घर में निशक होकर रह॥१२॥
इन दीनो वालक तथा इस सुन्दरी कन्या क पाछग-पोपण करना ! दिन्तु यह रहस्य कभी मगान् मयं स नहीं कहना ॥१३॥
शबर्णा शोली--जब तक मेरी चोटी नहीं पकड जायगी भर शाप नहीं पड़ेगा, तब तक मैं इस रहस्य वो भेक्ट नही कह्णी। देवि, सादर प्रणम। आप आनन्द से जाइये॥ १४॥
लोमहर्वग नें कहा- इस तरह सरणा के कहने पर उसको आशा देकर तपस्विनी सजा रण्जित-सी होती हुई त्वप्टा दे पास गई॥ १५॥ पिता के समीप जाने पर पिता ने झिडक््त हुए, उस साध्वी से बहा-- तु अपने पति वे पास जा!' मौर बार-बार इसके लिए प्रेरित क्या ६॥ तव बहू अपने रूप को छिपा कर घोड़ी का स्वरूप घारण कर उत्तर दिशा म इस्दे में जाकर घास चर+ रगी।।१७॥ य् सन्ना है एसा समझते हुए सूयं > दूसरी सज्ना में रख ०निकौरव्य स०। २क श्या भगबास्तत । आग ३ से. ण्डा ततौ द्विजा । उ०। चख त्वयेद् मण्य प्ख मत्वें। इव से शुभे) छवः गे न्मिमततुम्य। टस सदैव सा। ९क पितु । १० के. लमदुभीतेव चत्र०। ११क से पुरा। श२ग, ये!
३८ चष्ठोश्ध्याय
दवितोयायातु सला सेयमिति घितयन् । आदित्यो जनयामास पुश्रमात्मससम तदा ॥१८॥
ूव्वनस्य भनोधिप्रा = सदृक्लोऽयमिति प्रभु । भतुरेवाभव्नास्ना सादण' इति पच्यते ॥१९॥
द्वितीपो य सुतस्तस्या * स चिजञेय शर्नश्चर । सज्ञा तु पाधिवी दिप्रा स्वस्य पुत्रस्य वै तदा ॥२०॥
चकाराम्पथिक स्नेह न तथा पूर्वजेषु दै! मनुरतस्यप क्षमत्ततु यमस्तस्या ९ चक्षमे ॥२१॥
स व॑ रोपाच्च बाल्याच्च भाविनोऽर्थस्य वानघ । पदा ' सतर्जमामास सज्ञा वैवस्वतो यम ॥२२॥
त * शशाप तत॒ क्रौधात ^सावर्णजननौ तदा। चरण पततामेय तयेति भृशदु चिता ॥२३॥
यमस्तु प्ततपितु सव्वं प्राश्जलि' परत्यवेदयत । भृशा दापमयोदधिष्न सनावाषयेचिदाङ्धुत ॥२४॥
विवस्वानुवाच
अश्वशव पुत्र महुरभविष्यत्यत्र कारणम। येन त्वामादिदात श्रोधो धम्मन सत्यदादिनम॥०२८॥
न हाक्पमेतमिथ्या तु कत्तं मातृवचस्तव। शमयो मासमादाय यास्यन्त्यवनिमेव च॥२९॥
अपने सभा पुत्र उत्पन्न किया॥१८॥ ब्राह्मणों पहूं (वालके) अपने पूवज भनु न समान चा इसलिए मनु ही इसका नाम पडा! यह् सवण भी कहलाता है॥१९॥ उस (सवर्ण) के दूसरे पुत्र को शनञ्चर समिथे। पिप्रवत। सवर्णा सज्ञा के पुत्रों की अपेक्षा अपन पयो से अधिक स्नह करत" थी॥२०३॥ मनू ने तो छाया काह व्यवहार सह् लिया पर यम नही सह सका॥२१॥। उस सूयत थम न काव वे वारण या बचपन के कारण या होनहार के बल से सवणा को पैर से ताडन क्रिया॥२२॥ सवे अयन्त खी होकर क्रोप से सवर्णा + उसको चाप न्वि-- तेरा यह पर गिर जाए॥२३॥ ब्राह्मणों साप के भय से अयत चचल हषर छाया के वचनो से शक्त होत हुए यम ने हाथ जोग्वर अपने पितता से निवेदन किया-॥२४॥
मेरा शाप दूर कीजिये। मतिः को सव धूतो मे समान भाव से वतना चादिये। पर यह हमको छोडकर छोटो पर अयधिक स्नेह करती है। इसलिए बाल्माव से या मूसता से मैंने उसपर परतो उठाया पर देह पर गिराया नहीं।
यह मेरा अपराध क्षमा कीजिये। लोक-परति महातजस्विन माता + मुझ शाप दिया है, आप कृपा कर जिससे कि मेरा पर न गिरने पाये॥२७॥
सुय ने कहा--पुत्र नि सन्देह इसमे कोई महान कारण होगा जिससे कि तुम जसे धर्मात्सा अर सयदादी को क्रोध उत्पन हो गया।
तुम्दारी माता के वचन को मैं मिथ्या नहीं कर सक्ता! कृमि (छोटे कड) तुम्हारे पर से मास ले लेकर पथ्वी पर जायगे॥२९॥ इस तरह तुम्हारी माता का वचन सय होगा। शाप का
कृतमेवं वचस्तथ्यं मातुस्तव भरिष्यति! शापस्थ परिहारेण त्वं च त्रातो भविष्यत्ति॥३०॥
आदित्य वाव्रवौत् संज्ञां किमयं तनयेषु वै! तुत्पेष्वभ्यधिकः स्नेह एकस्मिन् करियते त्वया॥३१॥
सतत् परिहरन्ती तु नाचचक्षे विवस्वते! स चात्मानं समाधाय योगात्तव्यमपश्यत॥३२॥
तां शप्तुकामो भगवात्ता्पन्मुनिसत्तमाः\ मूदधनेषु निजग्राह स तु तां मुनिसत्तमा:॥३३॥
ततः सव्वं ययावृत्तमाचचक्षे विवस्वते! विवस्वान तच्छुत्वा सुद्टस्त्वष्टारमम्यगातू।॥३४॥
दष्ट्वा तुतं ययान्यायमच्च॑यित्वा विभावसुमू। निदेगधुकाम रोषेण साम्त्वयामास वे तदा॥३५॥
त्वष्टोबाच
तवातितेजसाविष्टभिद॑ स्पं न जोभते। सहन्तो च संज्ञा सा वमे चरति शादलेग॥०३६॥।
द्रष्टा हितां भवानद्य स्वा भाया जुभचारिणीम्। इलाघ्यां योगबलोपेतां योगमास्याय गोपते॥३७॥
अनुकूलं तु ते देव यदि स्यान्मम" सम्मतम्! रूपं निर्वर्तयाम्यद्य तव कान्तमरिन्दम॥३८०॥
तेतोऽम्युपायमत्वष्टा मण्डस्य धिवस्वत! स्रमिमारोप्य तत्तेनः" सातयामास भो द्विजाः॥३९॥
तते निर्मितं रूपं तेजसा सहतेन वं। कान्तात् कान्ततरं* द्रव्ुमधिकं सुशुभ तदा॥०४०॥
ददश योगमास्थाय स्वाः भार्य्या वडवा ततः! अधृष्या सब्यंभूतानां तेजसा नियमेन च॥४१॥।
वञ्वावेपृपा विप्रारचरन्तीमुतोमयाम्। सोध्ददरूपण भगर्वारिता मुखे समभावयत्॥४२॥
लगाकर सत्य का पता रखा ॥३२॥
मुनिश्रेष्ठो! भगवान् सूर्य उसको शाप देने को इच्छा रखने हुए भी शाप नहीं दिया, बल्कि उसका केश पकड़ लिया ॥३३॥
तब छाया ने सूर्य से सब वृत्तान्त कह दिया। सूर्य यह सुनकर त्वष्टा के पास गया ॥३४॥
अपनी पत्नी की इच्छा रखने वाले कुपित सूर्य को देखकर त्वष्टा ने समयाचित सत्कार करके उसकी शान्ति की ॥३५॥
त्वष्टा ने कहा--'आप! इस अत्यन्त तेजस्वी रूप को न सहती हुई छाया घोड़ी बनकर चन की दस्माली में चरती है॥३६॥
हे सूर्य! आज आप कल्याणमयी, प्रशस्त के योग्य और योगवल से मुक्त अपनी पत्नी को देखेंगे ॥३७॥
हे देव! यदि मेरी सलाह को आप अनुकूल समझें तो आज मैं आपके रूप को सुन्दर बना दूँ ॥३८॥
ब्राह्मणो! तब सूर्य की स्वीकृति पाकर त्वष्टा ने श्रामण-यन्त्र के द्वारा सूर्य के संज को छिन्न सिन अर्थात् सूक्ष्म कर दिया ॥३९॥
इससे (अर्थात् तेज के संक्षिप्त हो जाने से) अत्यन्त मृदु रूप हो गया। तब वेद सुन्दर से सुन्दररूप पहले से अधिक सुशोभित होने लगा ॥४०॥
ब्राह्मणों! सत्पश्वात् सूर्य ने समाधि लगाकर अपनी पत्नी घोड़ी को देखा। यद् तेज और नियमों में खव प्राणियों से वदकर थी ॥४१॥
घोड़ी का शरीर धारण कर निर्भय होकर वह चर रही थी। भगवान् सूर्य ने अश्व का स्वरूप बनाकर मैथुन के लिए चेष्टा करती हुई अपनी पत्नी के मुँह में रख दिया ॥४२॥
संयुनाय निचेष्टस्तों परपुंसोऽयदा दया। सा तक्चिरयमच्छू नासिक्ान्यां चिस्वत् ॥४३॥
उस दूसरे पुरुष की शका से सूर्य ने बीर्य को अपनी नाक के द्वारा बाहर निकाल दिया ॥४३॥
देवौ तस्यामजायेतामश्विनौ भिषजां वरौ। नासत्यश्चैव दल्भकश्च स्मृतो द्वाश्वितायिति ॥४४॥
उससे वयो में धृष्ट और निर्भय वाले अश्विनीकुमार उत्पन्न हुए। नासत्य अश्विनीकुमार नाम और दल्भक नाम से विख्यात हुए ॥४४॥
प्रजार्थ्ष्डस्पात्मजौ तौ षष्टमस्य प्रजापते। तौ तु स्पर्शेण कातेन दर्शयामास भास्कर ॥४५॥
ये दानव आठवें प्रजापति मातण्ड के पुत्र हुए। पश्चात् सूर्य ने दिव्य रूप से अपनी सर्यों को देखा ॥४५॥
ब्राह्मणश्रेष्ठो! वह अपने स्वामी को देखते ही सन्तुष्ट हो गई। यम उष कर्म से अत्यन्त खौ हणा और धमराज नाम से ख्यात होते हुए धमपूर्वक प्रजा का पालन करने लगा ॥४६॥
पितृगामाधिपत्य च लोकपालत्वमेव च। घर्मेण रञ्जयामास धर्मराज हमा प्रजा ॥४७॥
प्रचापारूप शुभ कर्म के द्वारा अत्यन्त कान्तिमान् यम ने पितरों का स्वामित्व तथा लोकपाल का पद प्राप्त किया ॥४७॥
स रेभे ब्रह्मणा तेन शमेन परमभक्तिः। मनु प्रजापतिस्त्वासीत् सावणि सु तपोधना ॥४८॥
बहु तपस्वी सवर्ण पूर्व सर्वाधिक मन्वन्तर में प्रजापति मनु होगा ॥४८॥
भाव्य समागते तप्मिन्मनु सवणिषेऽन्तरे मेयपृष्ठें तपो नित्यमद्यापि स श्वरत्यु ॥४९॥
वह आज भी मेस्पवत के पृष्ठभाग में तप कर रहा है ॥४९॥
मात् शनेश्सरस्तरय ग्रहत्व स सु लब्धवान्। त्वष्टा तु तेनसा तेल विष्णोत्रचभवंत्पयत् ॥५०॥
तदपरतिहत युद्धे दानवान्तधिकोपया। भवीयसी तु सप्यासोद्यामो रना यदस्विनी ॥५१॥
अभवच्च सरिच्छेष्ठा यमुना लोकपावनी। मनुरित्युच्यते लोके सवेण द्रति चोच्यते द्वितीयो ॥५२॥
य सृतेरतस्य मनोश्रतिः घनंइचर। ग्रहत्व स च लेभे वै सर्व्वलोराभिपुजिते
॥ ४९ ॥
उसका माता शनैश्चर ग्रह हुआ। त्वष्टा न दैत्य वे नाश कदे की इच्छा से सूर्य उस से युद्ध में नष्ट न होने वाला विष्णु को चक्र बनाया।
॥ ५० ॥
वह भी प्रशस्त यशवाली यम का छोटी बहू नदिया में श्रेष्ठ अरु लोगों को पवित्र करने वाली यमुना नाम से स्यात हुई।
॥ ५१ ॥
लोग मत अर्थात् सावण दोना नाम कहते हैं।
॥ ५२ ॥
सूर्य का दूसरा पुत्र जी मनु का माता शनैश्चर कहलाता है। सब छोगो फ पूजन योग्य ग्रह मात्व को प्राप्त हुआ।
॥ ५३ ॥
जौ मनुष्य देवताओ के इस जम को सुनता है वह सब विपत्तियों से वचक्षर धान्य यश प्राप्त करेगा।
॥ ५४ ॥
श्री ब्रह्म महापुराण में सूर्य-यम कथन नामक छठा अध्याय समाप्त।
॥ ६ ॥