अध्याय 10: पुरूरवा की कथा और चन्द्रवंश का वर्णन
अध्याय १०: दशमोऽध्यायः
६० ददामौऽध्यायः
तं निवा्धं ततो ब्रह्मा तारां प्रपच्छ संशयम् । दन्न तथ्यं तद्बूहि तारे कस्य पुतरत्वयम् ॥३०॥
उवाच प्रान्जलि: सा तं सोमस्येति पितामहम् । तदा तं मूध्नि चाधाय सोमो प्राजा सुतं प्रति ॥ ३१॥
वृध इत्यकरोन्नाम तस्थ बालस्य धीमतः । प्रतिकूरस्च गगने समरयुन्तष्ठते बुधः ॥३२॥
उत्पादयामास तदा पुत्रं वे राजपुत्रि मुर। तस्याप्त्थं भहातेजा बभूवैल पुरूरवाः ॥३३॥
उर्व्यां जशिरें यस्य पुराः सप्तं महात्मनः । एतत् सोमस्य वो जन्म कीत्तित कौत्तिवद्धंनम् ॥३४॥
वंशमस्य मुनिषवेष्ठा कौच्यंमानं निबोधत । धन्यमायुष्यमारोग्यं पुष्यं सड.कटपस्ताघनम् ॥३५॥
सोमस्य जन्म शुत्देव पापेर्यों विप्रमुच्यते ॥३६॥
इति श्रीब्राह्मे महापुराणे सोमोत्पत्तिकथनं नाम नवमोऽध्यायः ॥९॥
अध्याय १०
तत्रादौ सोमोत्पत्ति-वणेनम्
॥ लोमहर्पण उवाच ॥
बुधस्य तु मुनिश्नेष्ठा विद्वान् पुत्र: पुरूरयाः। तेजस्वी दानशीलदच यञ्वा विपुरुदक्षिणः ॥१॥
शाप देने के लिए वह तैयार हो गया ॥२॥ उसको निवृत्त कर ब्रह्मा ने तारा से संदेह पूछा—'तारे ! सत्य बतलाना। यह किसका पुत्र है?' ॥३०॥ उसने हाथ जोड़कर ब्रह्माजी से कहा—'चन्द्रमा का'। तब राजा सोम ने बालक के मस्तक की सूँघ कर उस बुद्धिमान् बालक का नाम 'बुध' रखा। अतएव बुध का आकाश में प्रतिकूल उदय होता है ॥३१-३२॥ वैराज मनु की कन्या से बुध ने पुत्र उत्पन्न किया! उसका इला से उत्पन्न पुरूरवा नामक पुत्र महातेजस्वी हुआ ॥३३॥ पुरूरवा से उर्वशी ने सात पुत्र उत्पन्न किए। मुनिभेष्ठ ! चन्द्रमा की यह कीर्ति बढ़ानेवाली कथा मैंने आपको कही ॥३४॥ अब इसके वंश का वर्णन सुनिए! धन्य के पाव, आयु और आरोग्य के दायक तथा अभिलाषा को पूर्ण करनेवाले चन्द्रमा के जन्म को सुनने से मनुष्य के सभी पाप दूर हो जाते हैं ॥३५-३६॥
श्री ब्रह्मपुराण में सोमोत्पत्तिकथन नामक नवां अध्याय समाप्त ॥९॥
लोमहर्पण बोले—
सुनिए। बुध के विद्वान्, तेजस्वी, दानी, यश बढ़ानेवाला, बहुत दक्षता देनेवाला पुत्र पुरूरवा का वर्णन करूँ ॥१॥
ब्रह्मपुराणम् ६१
ब्रह्मवादी पराकान्तः श्रोत्रुनिर्युधि परदेमः। आचर्ता चाग्निहोत्रस्य श्यज्ञानाञ्च महीपतिः ॥२॥
सत्यवादी पुण्यमतिः प्रसम्यक् संवृत्तमेयुनः। अतो त्रिषु लोकेषु यञसाप्रतिमः सदा ॥३॥
तें ब्रह्मवादिनं शान्तं धर्ममीनं सत्यवादिनम् । उर्वशी अरयामास हित्वा मानं यशस्विनौ ॥४॥
तया सहाचसद्राजा दश घर्षाणि पञ्च च। पट्पञ्च सप्त चाष्टौ च दश वाष्टो च मो दिजाः ॥५॥
चने चैत्ररथे रम्ये तथा मन्दाकिनीतटे । अलकायां दिशालायां तन्दमें च वनोत्तमे ॥६॥
उत्तरान् स कुरुम् प्राप्य मनोरमफकूदुमान् ! गन्धमादनपादेषु वेरश्रद्ध तथोत्तरे ॥७॥
एतेषु वनम् ख्येत्, सुरेराचरितेषु च। सर्वन्द्या सहितो राजा रेमे परमया मुदा॥८॥
देशे पुण्यतमे चैव महर्षिभिरभिष्टुते। राज्यं स कारयरमास प्रयागे पृथिवीपतिः॥९॥
एवम्प्रभावो राजास्तैलस्तु नरसत्तमः॥१०॥
लोमहर्षण उवाच
एषपुत्रा बभूवुस्ते, सप्त देवसुतोत्तमाः। भूमिकर्त्तव्य लोकं विदितो आयुविद्वानमावसुः॥११॥
विद्वायुश्चैव धर्मात्मा श्रुतायुश्च तथापरः। दृढायुश्च वनायुश्च व हवायुचोष्वंशीसुताः॥१२॥
अमावसोस्तु दायादो भौमो राजाथ राजराट्। धीमान् भीमस्य दायादे राजासोत्कांचनप्रभः॥१३॥
ब्रह्मवेत्ता, युद्ध मे शत्रुओं से अजेय, अग्निहोत्री, राजा, सत्यवक्ता, पवित्र विचार वाला मैथुन में संयमी और तीनों लोकों मे सदा अनुपमेय यशस्वी पुरूरवा नामक पुत्र उत्पन्न हुआ॥१-३। उस ब्रह्मवादी, सत्यवादी, शान्त और धर्मज्ञ पुरूरवा को यशस्विनी उर्वशी ने मान त्याग कर वरण किया॥४। विप्रवृन्द! राजा ने उर्वशी के साथ चैत्रस्थ नामक सुन्दर वन में दस वर्ष, मदाक्रिनी नदी के तट पर पाँच वर्ष, अलकापुरी में छह वर्ष, बदरी पुरी में पाँच वर्ष, नन्दन वन मे सात वर्ष, मनोरम फलवृक्षों से युक्त उत्तर कुरु के देश मे आठ वर्ष, गंधमादन पर्वत पर दस वर्ष और पर्मे भवन के उत्तर मार्ग में आठ वर्ष तक वास किया॥५-७। इन प्रधान मनों में सौर देवताओं के कौडानस्यानों मे उर्वशी के साथ राजा परम हर्ष से रमण करता रहा॥८। राजा ने पवित्रतम और महर्षियों से स्तु प्रयाग-क्षेत्र मे अपनी राजधानी बनायी॥९। इस प्रकार प्रभाववली, महामानव और महायशरवी पुरूरवा गंगाजी के उत्तर तट पर रहता था॥१०॥
सोमहर्षण ने कहा--देवशुन्द्र के समान पुरूरवा के सात पुत्र हुए। आयु, विद्वान, अमावसु, निश्वायु, धर्मात्मा श्रुतायु, दृढायु, वनायु और हवायु- ये उर्वशी के पुत्र हैं॥११-१२। अमावसु के, राजाओं का भव राजा भीम नामक धुव हुआ। भीम के श्रीमान् कांचनप्रभ पुत्र हुआ॥१३। कांचनप्रभ के महावली सुहोय पुत्र हुआ।
विद्वास्तु प्लञ्गस्यापि सुहोश्रेऽभू महावसु। सुहोजस्याभवश्चहनु क्षेत्रिया गर्भसम्भव॥१४॥
भजे यो महत् सत्र सर्पमेध महामखम। पतिलोभेन य मद्धा पतित्वेन ससार ह॥१५॥
नैच्छत् प्लावयामास तस्य गधा तदा सदः। स तया प्लावित दृष्टवा यज्ञवाट समततम्॥१६॥
सौहोधिरशपदगद्धा शुद्धो राजा द्विजोत्तमः। एव ते, विफल यत्न पि्ननम्भ करोम्यहम्॥१७॥
छस्य शद्धेऽवतेपस्य, स्य पल्मवाप्नुहि जह नुराजपिणा पीता गद्धा दृष्टवा महर्षय॥१८॥
उपनियुमहाभारतागा हितत्वेन जाह नवों। युवनाश्वस्य पुत्री तु: काबेरी जह् सुरावहत्॥१९॥
युवनाश्वस्य तापेन गबद्धाद्देन विनिगंता। कावेरीं सरिता ष्ठा जह्लो्भाय्यमि्निदिताम्॥२०॥
कह नुत दयित पुत्र सनद्य नाम धाभ्मिंकम्। कावेर्या जनयामास अ्यस्तस्य चात्मज॥२१॥
अपकस्य त् दायादो वलाकाड्वो महीपति। वभूव मृगयादमौर कुशस्तस्यात्मजोऽभवत्॥२२॥
भुदापुम्रा यभूवुहि चस्वारो देवव्यः। कुशिफ पुशनामर्च पु शाम्बो मूत्तिमारतया॥२३॥
कछभेयमिति तझाप्रस्त्रासादम्पेत्य जसिवानु। पूर्ण यर्पसहस्रे चै ततं क्षधो दयपश्यत ॥२५॥
कषत्पुप्रतपस दुष्ट्वा सहस्राक्ष पुरन्दर। समय प्रजनने स्वयमेवास्य श्राक्ष्वत ॥२६॥
भगिनी क गम स उत्पभ्न हुआ जिसने सपमेध अर महामख सनक मटायन बिय अर जिसके पास पति बनाने बे लोम से गमाजी गई थी।
गगा जी से विरत जनुः यन-स्पल को गमा डयो दिया। चारों तरफ यन-रथस वो जलमग्न देवशर राजा जहनु ने क्रोध मे आपर गंगा को शाप दिया वि गग! मैं जल पवर तम्हारे पला को विष्टर बता हू। समं अपन रस अभिमान वा पद सकाड प्राप्त बरो। ॥१६-१७॥
राजपि जह न द्वारा पियी गर गगा वो देलदर सहपिया न उनकी जेट न की पत्रा वना त्वा ॥१८१॥
पपात् जहनु न घुथनाव पी पुत्री कावेरी स विवार विया ॥१९॥
युवनातव के नाप से गगा आध भाग से नदिया से श्रप्ठ तथा अनिरटर्स य जरनु वा पत्नी कावेरी मे पि गर ॥२०॥
उन्हने गुनद नामक धर्मा सा प्रभ दो षविरी श उत्पन्न रिया ॥२१॥
उस अजफ नामक प्र हुआ। अजब वा पत्र राजा धटाहाव दिहार सेरन से बहाएं धा उसे भुला नापक ये हजा।
करा दा देवा न एमन तजरवी पार पुत्र टूग-सतित कुलनाम वृशाम्ब आर मतिमान् शर।
राजा बतिक रहा वन ही से अरीरा वे साथ पारा गया। मैं दाह थे गमान ये प्राप्त करू से रस्तग गदर तप करस लगा। य उक्र भयवता उसके पास गए। हजार दप वात जाने पर शाद्र ने उस रखा। गे अयनं उग्र तपस्वी का दगकर पृथ्रापारन म समय गुरधष्ट दत स्वय उगर धत वन निक।
शग श्यूयकलम्तः ॥२३॥
करवरइस देव रे यिध नोदय सनिप्याप पिवम्य। गजप।
पस रखतयन्यागि मर इक से रमाया। ज्ने। शरानेत हाथ नयी परचादिनिसम पल।
पिज कार कै मग के भ क के यथ्जकण य गावामूतिाग दावा मूल।
श्या। पर्व सनिराधामराजा। से प्रभुसू।
(पृष्ठ 113) ब्रह्मपुराणम्
प्राय कल्पयामास देवेन्द्र सुरसत्तम से गाधिरभवद्राजा मघवान् कौशिक स्वयम् ॥२७॥
पौरा यस्याभवद्वार्या गाधिस्तस्यामजायत। माधे कल्या महाभागा नाम्ना सत्यवती शुभा ॥२८॥
ता गाधि काव्यपुनाय ऋचोकाय ददो प्रमु। सस्या प्रोत स वै भर्ता नार्गवो भृगुगन्दन ॥२९॥
पुत्रां साधयामास खर गाधेस्तथैव च। उवाचाहूय ता भार्यामृचीको भागंवस्तदा ॥३०॥
उपयोज्यहचररय त्वया मात्रा स्वय शुभे। तस्या जनिष्यते पुत्रों दोप्तिमानूक्षत्रियपम ॥३१॥
मनेय क्षप्रियेलोंकि क्षत्रियषंमसूदन। तवापि पुन्न कतयाणि घूतिमत्त तपोधनम् ॥३२॥
कमात्मक द्विजप्रेवठ चरुरेवः दिधारयति। एवमुक्त्वा तु ता भर्यासृकीको भृगुनन्दन ॥३३॥
तपस्यभिरतो नित्यमरष्य प्रवियेश ह्। गाधि सदारस्तु तदा ऋवीकाद्समस्धयात् ॥३४॥
यहा--॥२९ ३०॥ श्रिये यह चरु तुम अपनी माता को देना! इसवे खान से तुम्हारी माता अत्यन्त तजस्वी कषत्रिय-धप्ठ पुत्र बो उत्पन्न करेगी जो इस लोक में राजाआ से अजय तया नृप-श्रप्ठा का सतापक हागा॥३११॥
कल्याणः! तुम्हे भ, इस दूसरे चट व खान से धीर, तपस्वी शान्त अर द्रिजवर पुत्र उत्पन्न हागा। ॥३२१॥
दृ परकर पत्नी से बहन सुगु-दु चचतः तपस्या म निरत हो बन में प्रविष्ट हुआ। तदुपरान्त तोषयच वा
मसग से पुत्री को देसन ये ल्ए राजा गाधि अपनी साया सहित स्वक आधम मे गया॥३३ ३४१॥ सयबता ~ ऋषि व दोन चदा को ल्ावर माता करो झमर्पित दिया) ३ ५२॥ परन्तु ददयोग से माता « पया का अपना च दे दिया अर अनानता से उका चर स्वय खा लिया॥३६ २॥
इसक बाद सयव = सब क्षत्रिया कामदा क्सन बाला गम धारण रिया! शरीर म तज श्टृत हुए मा वह देख+ म मयकर लगता यी ।(३७१॥
ऋषाव उस देखत ही योगबल सं सब बुछ समझ गया भर बोला-- मद । माता ^ चुम्ह ठय ल्या। चख बदल जान मै कारण तुम्हे
अत्पन्त मय कर अर कूर बम करन बाला ष्व उत्पन्न होगा पर तुम्द्दारा माद् ब्रह्मबत्ता तपरवा होगा ३८ ४०॥
१ ख श्म्ययात्।२क चर चिपरा गृहत ततमृप । ३ के ण्दा। विपययात्तदात्वं सा! क सं तरभदेन। ५४ भ्वत्वा आत्म० |
3, दशमोऽध्यायः
विद्व" हि ब्रह्य तपसा मया तस्मिन् सर्मापितम् । एवमुवता सहाभागा भेरा सत्यवती तदा ॥४१॥
प्रसादयामास पति पुत्रो मे नेदृशो भवेत् ! ब्राह्यणापसदर्त्वत्त इत्युक्तो मुनिरद्रवीत् १।।४२॥१
ऋषचीक उवाच
नैप सकल्पत कामो मया भद्रे तथास्त्विति । उग्रकर्मा भवेत् पुत्र पितुर्मातुदच कारणात् ॥४ ३
धन॒ सत्यवत्ती वाक्यमेवमुवत्वाग्रवीदिदम् । इच्छरलोकानिपि सुने सूजेथा कि पुन सुतम् ॥ ४०५१
झामात्मकमूजु त्व मे पुत्र दातुमिहाहंि। काममेवविध पौत्रो, मम स्यात्तव च प्रभो ।४५॥
यद्यम्यया न श्वय वै कर्तुमेतदुद्धिजोत्तम। तत प्रसादमकरोत् स तस्यास्तपसो बलातु ॥४६॥
पुमे" नास्ति विशेपो मे पौत्रे था चरर्वाणनि ॥ त्वया ययोवत वचन तथा भद्रे भविष्यति ॥४७॥।
ततं॒स्ररयवती पुत्र जनयामासं भागेवम् । तपस्यभिरत दान्त जमदग्नि शमात्मकम् ॥४८॥।
भुगोर्जगर्या वदोऽसिमिल्जमदग्निरनायत। सा हि सस्यवती पुष्या सत्यधर्मपरायणा ।४९॥
कौदिकोति समास्याता प्रवत्तेय महानदी । द््वाङुवकषप्रभवो रेणुर्नाम = नराधिप ॥५०॥
तस्य कन्या महाभागा कामी नाम रेणुका । रेणुकाया तु कामस्या तपोविद्यासमग्वित ॥५१॥
आर्चीको जनयामास जरमदभ्य सुदारुणम्।, ्तब्दंदिद्यान्तग श्रेष्ठ घनुर्वेदरय पारगम् ।५२॥
था कयानि उख चरु में मैं, तपस्या के वख से विश्वरूपी ब्रह्म को निहित कर दिया था। पति से यह वात सुनकर सौमाग्यवतं। सत्यवती > उनसे यह प्रथना कौ, दि आप जैसे ब्राह्मण-श्रेष्ठ से मुझे इस
मुरनि उन हुए। सत्य तपा घम म परायणं अर पवित्र वह सत्यवती बौरिदी नाम स विस्यात महानदी हुई॥ ४९३॥।
इस्वादु वरा मे उत्पप्न दगु नामक राजा की क्त्या, कामररी और रेणुका नाम से प्रसिद्ध थी॥प५०३॥ उस
रेणुका मे सपत्वी मार् विद्धान् जमदण्ति » अतिमयानव सब विचा से निष्णात्, धनुवेंद म पारग, झत्रियों था विनादाव अपर आतिति थे मात तजस्वी राम (परयुराम) सामव' पुर को उत्पप्र दिया ५५१-५२३॥ इस रस दितपया ब्रह्मा म०्। रब न्त्ानखस्०्। रंग सुत्री। ध्म स भद्े। ५क «योर्चरविपयति जम्०। गे श्यारचध्विपयदधि रौददप्यवया पुरा। यजनाईँप्णव चाद्य जम०। ६क स ०द्यानुगधे ० ।
शरहयपु रणम् ६५
शम॑ क्षत्रियहन्तारं प्रदोप्तमिद पाचकम्! मोवेस्य॑वमृचोकरय' सत्यदर्यां महायशाः ॥५३॥।
जमदरिनस्तपोदौर्य्यास्जिते.. शरह्मदिदावर:। मभ्यमर्च शुनःशेपः जुनपुच्छः कनिष्ठकः ।।५७॥
विश्वामित्रं तु दायादं गाधिः कुशिकनन्दन:। जनपासास पुत्रं तु भ्तपोविचाश्रमात्मकस् ॥५५।
प्राप्य ब्रह्मपि्मतां योऽयं. बरह्यपितां गतः! दिदवामिन्रस्तु धर्मात्मा नाम्ना पिर्वरयः स्मृतः ॥५६॥
भजे मुगुसष्देन . कौशिकाइंडाद््धन: । विददामित्रत्य च सुता देवरात्पदयः स्मृताः ११५५७११
प्रस्यातास्तिषु लोकेषु तेषां नामान्यतः धरम् । देवरातः कतिइचेव यस्मात् कात्यायनाः स्मृताः ॥५८॥।
शालावत्यां हिरण्याक्षो रेणुजजेश्य रेणुः! संतिर्गालवश्चेव मुव्गस्दचैव विधुतः ॥५९॥
मधुच्छम्दो जयश्चैव देदलदच सथाध्टसः। कच्छपो हारितश्चैव विश्वामित्रस्य ते सुताः ६०
तेवां" ख्यातानि गोधाणि कौशिकानां महत्मना । पाणिनो षय्रव्चेवध्यानजप्यास्तयैव च॥६ १0
गाधिया देवराताइच शालड, कायनबावकलाः १ श्छोहिता 'यसदूतारच तया "कार्याः सनुतः थे दूर
पौरवस्य मृनिधेष्ठा श्रह्मपेः फोध्रिकष्य च} सम्बन्धोधप्पर्य वंशेश्रिमनु ब्रहमसष्नस्य विधुतः ॥ ददा
विधवामिन्नात्मजानों तु शुनःवोपोऽप्रनः स्मृतः । भार्गवः कौशिक हि प्राप्तः सं मुनिसत्तमः ॥ ६४0
विश्वामिनस्य पुत्रस्तु शुनःशेपोध्मदत् किल। हरिदश्वस्य यज्ञे तु पशुत्वे विनियोजितः ॥ ६५
देवतः शरुम-शेपो विश्वासिमाथ वै पुनः देवदत्तः स॒ थे थस्मादूदेवरातस्ततोऽभवत् ॥६६॥।
अवार तप शक्ति से श्रह्मवेत्ताओ म श्रेष्ट और महायशस्वी जमदग्नि मुनि सत्यवती से उत्पत हए मङ्गले पूव वा नाम शूनः देप और छोटे पुत्र का नाम शुन पृच्छ हुमा ॥५३-५४॥ वुक् वे- पृ गावि ने तपस्वी, विदान् भीर धान्तं निद्वामित नामक पुत्र को उत्पन्न किया १५५ वरमात्मा विस्वामिय, जिसका नाम दिद्वत्म भी था, म्रदापियों की समानता को प्राप्त करके दृह्ापि बन गया ।५६॥ भुगू की कपा से कौशिव' दे ववा को बढाने दाल पुत्र हुआ । चिश्वाभित्र के पुष देवरात आदि नाम से विष्यात हुए ॥५७। दनो छोको में प्रस्यात मे पुत्री मे नाम मुनिये--देवरात और क्ति, निमे कति के बात्यायन नाम से धरसि पुव हए ॥५८॥ छालावती नामक स्त्री से दिस, उत्पन्न हुआ। रेणु, रेणुक, साति, ग्व, मुद्गल, मपुच्छन्द, जय, देवल, अष्टक,
९