अध्याय 11 : पृथ्वी का विस्तार और द्वीपों का वर्णन
पृथ्वी के विस्तार और सप्तद्वीपों का परिचय
ऋषियों ने पूछा – “हे सूत जी! अब हम भूगोल का ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं। यह पृथ्वी कितनी बड़ी है? इसके कितने भाग हैं? इस पर कितने द्वीप और समुद्र हैं? कृपया पृथ्वी के विस्तार और उसके विभिन्न खण्डों का वर्णन कीजिए।” सूत जी ने उत्तर दिया – “यह पृथ्वी पचास करोड़ योजन विस्तार वाली है। इसके बीच में सुमेरु पर्वत स्थित है। इस पृथ्वी को सात द्वीपों और सात समुद्रों ने घेर रखा है। ये द्वीप एक-दूसरे को घेरे हुए क्रमशः स्थित हैं।”
सप्तद्वीपों का क्रम और नाम
सबसे भीतर जम्बूद्वीप है, जो सबसे प्रमुख है। इसे घेरकर खारे जल का लवण समुद्र है। लवण समुद्र के पार दूसरा द्वीप प्लक्ष है, जो इक्षुरस (गन्ने के रस) के समुद्र से घिरा है। तीसरा शाल्मल द्वीप है, जो सुरा (मदिरा) के समुद्र से घिरा है। चौथा कुश द्वीप है, जो घृत के समुद्र से घिरा है। पाँचवाँ क्रौञ्च द्वीप है, जो दधि के समुद्र से घिरा है। छठा शाक द्वीप है, जो दुग्ध के समुद्र से घिरा है। सातवाँ पुष्कर द्वीप है, जो स्वच्छ जल के समुद्र से घिरा है। पुष्कर द्वीप के बाद स्वर्णभूमि है और उसके पार लोकालोक पर्वत स्थित है।
जम्बूः प्लक्षः शाल्मलश्च कुशः क्रौञ्चः शाकस्तथा ।
पुष्करश्चेति सप्तैते द्वीपाः समुद्रसंवृताः ॥
द्वीपों का विस्तार
प्रत्येक बाहरी द्वीप अपने से भीतर वाले द्वीप से दुगुना विस्तार वाला है। जम्बूद्वीप एक लाख योजन विस्तार वाला है। प्लक्ष द्वीप दो लाख योजन, शाल्मल चार लाख योजन, कुश आठ लाख योजन, क्रौञ्च सोलह लाख योजन, शाक बत्तीस लाख योजन और पुष्कर द्वीप चौंसठ लाख योजन विस्तार वाला है। इन द्वीपों में पर्वत, नदियाँ, वन और अनेक प्रकार की जनपदीय व्यवस्थाएँ हैं। प्रत्येक द्वीप का अपना एक प्रधान पर्वत तथा अनेक उप-पर्वत होते हैं।
प्रत्येक द्वीप के स्वामी और निवासी
जम्बूद्वीप का अधिपति आग्नीध्र था, जो प्रियव्रत का पुत्र था। प्लक्ष द्वीप का स्वामी मेधातिथि, शाल्मल का वपुष्मान, कुश का ज्योतिष्मान, क्रौञ्च का द्युतिमान, शाक का भव्य और पुष्कर द्वीप का स्वामी सवन हुआ। इन द्वीपों में मनुष्य दीर्घायु, स्वस्थ और निरोग रहते हैं। वहाँ कोई वर्ण-व्यवस्था नहीं है; सब लोग एक समान होते हैं। देवताओं के समान उनकी आयु दस-दस हजार वर्षों की होती है।
आग्नीध्रो जम्बुद्वीपेशो मेधातिथिः प्लक्षपतिः ।
वपुष्मान् शाल्मले राजा ज्योतिष्मान् कुशशासकः ॥
पृथ्वी-विस्तार का आध्यात्मिक रहस्य
सूत जी बोले – “हे ऋषियो! यह पृथ्वी भगवान शेषनाग के फन पर स्थित है। इसका विस्तार और द्वीपों का वर्णन केवल भौगोलिक नहीं है, अपितु इसमें आध्यात्मिक सन्देश भी निहित है – जैसे बाहरी द्वीप भीतर से बड़े होते हैं, वैसे ही मनुष्य का अन्तर-ज्ञान बाह्य जगत से कहीं अधिक विशाल होता है। जो इस अध्याय का पाठ करता है, उसका ज्ञान-चक्षु खुल जाता है और वह भूगोल-खगोल के रहस्य को समझ लेता है।”
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे एकादशोऽध्यायः समाप्तः ॥