अध्याय 11: देवासुर-संग्राम, रजि की वरदान-विजय और ब्रह्मा का शस्त्र-उपदेश
अध्याय 11 : एकादशो अध्यायः
Page 116
६६ एकादशो अध्यायः
देवरातादथः सप्त दिश्वामिन्नस्प वै सुताः। दुषद्रतीसुतश्चापि वैश्वामित्रस्तयाप्टकः ॥ ६७॥
अष्टकस्य सुतो लोहिः भक्तो जहुनुगणों मया। अत उर्व प्रवक्ष्यामि वंदामापोमंहात्मनः ॥ ६८॥
इति श्रीब्रह्मः महापुराणे सोमवलो अमावसुवंशानूकीत्तनं नाम दशमो अध्यायः ॥ १०॥
एकादशो अध्यायः
तत्रादौ सोमवेदावर्णनम्
लोमहर्षण उवाच
मायः पुत्राश्च ते पञ्च सर्वे चौरा महारथाः। स्वर्भानुतनयग्यां च प्रभायां जजिरे नृपाः ॥ १०॥
नहरषः प्रथमं भने वृद्धशर्मा ततः परमः। रम्भो रजिरनेनादच त्रिपु लोकेष्वधिरुताः ॥ १२॥
सः पुत्रदातानीह जनयामास पञ्च चैव। राजेयमिति विख्यातं क्षत्रमिन्द्रभयगवहम् ॥ ३०॥
यत्र दैवासुरे युद्धे समुत्पन्ने सुदारुणे। देवादचैवासुरादचैव पितामहूमयागरुवन् ॥ १४॥
देवासुरा उचुः
आवयोर्भगवन् युद्धे को विजेता भविष्यति। बूहि नः सर्वभूतेश्च श्रोतुमिच्छाम ते यतः ॥ १५॥
देवरात आदि सात पुत्र थे। विश्वामित्र के द्वितीय से अष्टक नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १६॥ अष्टक के पुत्र लोहित हुआ। मैंने इस परिवार को वतदा दिया। अब इसके आगे महात्मा मयु नामक राजा के वंश का वर्णन करूंगा ॥ १७॥
श्री ब्रह्मपुराण के सोमवंश के वर्णन के अंग में अमावस्य सुत-वंशानुकीर्तन नामक दशवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १०॥
अध्याय ११
लोमहर्षण बोले
आपके यहाँ मौर महारथी पाँच पुत्र स्वर्भानु की प्रभा नामक पत्नी से उत्पन्न हुए ॥ १॥
प्रथम नट उत्पन्न हुआ। इसके पश्चात तनो लोट से विष्यात बुद्धार्मा, शर्मा, गिरि भौर अनेना उत्पन्न हुए ॥ २॥
इन सभी पुत्रों ने उत्तर दिये, जो इस देश को शासन दिये राजीय समाज से प्रिय रहे ॥ एक बार भगवान देवागुरसाप्राम ने जाने पर देववाणी सुनी और जब वह निवेदन किया ॥ ३॥
देवायुरों में वहाँ
महामत! आप एसी प्रार्थना स्वामी हैं, हम तर्दनः यह जानना चाहते हैं कि हमारे वंश में से कौन बलवान पुरुष होगा? कृपयः बताइए ॥ ४॥
ब्रह्मोवाच
येषामर्था संग्रामे रजिरत्तायुधः प्रभः। योत्स्यते ते धिजेष्यन्ति त्रीलोकाघ्नात्र संजयः ॥ १६॥
यतो रजिधुंतिस्तम्र श्रीवच तत्र यतो क्तिः। यतो धृतिच श्रीदचेव धर्मस्तन जयस्तया ॥ १७॥
ते देवा दानवाः प्रीता देयेनोवता रजि तदा। अस्ययुरजयमिच्छन्तो वृष्वानारते नरपंभस् ॥ १८॥
घ हि स्वर्भानुदौहित्रः प्रभायां भ्रमपद्यत। राजा परमतेनेस्वी सोसवंशघिवद्धनः ॥ १९॥
ते हृष्टमनसः सर्वे रजिं दे देवदानवाः उचुरस्मज्जयाय त्वं गृहाण वरदानस्मुपमू ॥ २०॥
Page 117
अयोवाच रजिस्तत्र तयो देवदैत्ययोः। अर्तः स्वार्थमुद्दिश्य यदा स्वं च प्रकाशयन् २११११
रजिर्वाच
यदि देत्यगणान् सर्व्वान् जित्वा धीय्यण वासवः। श्रो भवामि घम्मेण ततो योत्स्यामि संयुगे ॥ १२५॥
देवाः प्रयमतो व्रिप्राः प्रतीयुह पटसानसाः। एवं येष्टं नृपते फामः सम्पद्यतां तव ॥१३५॥
धूत्वा सुरगणानान्तु वावयं राजा रजिस्तदा। पप्रच्छासुरमुख्यास्तु यया देवानपृच्छत ॥ १४॥
दानवा दयसम्पर्णाः स्वार्थमेवावमम्य ह। प्रदयूचुस्तं मूपवरं सरभिमानमिदं ददः ॥ १५५॥
दानवा ऊचुः
भस्माकमिद्धः प्रद्धादों यस्या्ये विजयएयहे। अस्मिंस्तु समरे राजंस्तिष्ठ त्वं राजसत्तम॥ १६॥
लाया
ब्रह्मा ने कहा--युद्ध मे जिसके पस से शस्त्र धारण वर रजि युद्ध गरेया नि सदेह बही मैलोनय दिजयी होगा
॥६॥। क्योकि जहाँ रजि होगा वहाँ चैयं, जहाँ धयं वहाँ सदम, जहाँ कमी वहाँ चमं और जहाँ धर्म होगा वहाँ विजय निश्चि होगी।
0! ब्रह्मा के बदन को सुनकर देवता और दानद भर हः विजय की असिलाथा कमते हुए रजि वो वरुण करने बे" लिए उदकैः पास गये ॥८॥
स्वर्मानु वा नाती रजि, जो सोमदश को बढ़ाने दाला परम तेजस्वी राजा था, भ्रमा से उत्पघन हुआ था।।९॥। प्रसंप्चित्त देवता और राक्षस रजि से कहने लगे कि ब्गप हमारी जय के लिये नुषः धारण नीजिये॥ १०॥
तव अभिप्राय को जाननेवाले रजि ने स्वथं का उदेश्य सम्मुख रखरर अपनी कीति को प्रकाशित करते हुए देव-दानवो से कहां।११॥
रजि ने कहा--'धदि मैं शक्ति हे दैत्यगणौ को जीत वर धर्म से दर हो जाजें तो मैं सप्राम मयुदध कन्याः
॥१२॥
देवताओं ने प्रयमत' प्रचशच होगर कहा--राजनु यापक इच्छा पुरी होगी ॥१३॥
देवताओं कौ बात सुनकर राजा रजि ने प्रमुख राधसों ऐ सी वहीं बात प्री जो देवताओं से एूछी यौ।।१४।।
तव दपं से पूर्ण दानवो ने केवल अपने ही स्वायं को जानवर राजा से अमिमानपूर्वव' यह कहा ॥१५॥
दानवों ने कहा--'हमारे इन्द्र तो प्रद्धाद हैं, जिसके लिए हम विजय चाहते है! राजन्) यदि आप हमारे इन्द्र होने मी इच्छा रपने हैं तो माप इस युद्ध म दमारे विल दनिय'॥१६॥
राजा नै बहो--
१ स्॒भ्वन्शिप्त्दा दी०।
६८ एकादसोऽच्यायः
स तथेति भरुव्रेव देवैरप्यतिचोदितः। भविष्यसीस्द्रो जित्देन देवेखतस्तु पथवः ॥ १७॥
जघान शनवान् सर्व्वान् येऽवध्या चल््पाणिनः। स विप्रनष्टां देवानां परमधीः भिं वशी ॥१८॥
निहृत्य दानवान् सर्व्वानाजहार रजिः प्रमुः। ततो रजिं महावीर्यं देवैः सह इतक्तुः ॥ १९॥
रजिपुत्रोश्हमित्युवत्वा पुनरेवा्रनीद्रचः। इनद्रोऽप्नि तातः देवानां सर्व्वेषां नाज संदायः॥।२०॥
यस्पाहमिर्द्: पुन्नस्ते ख्यातिं यास्यामि कम्मंभिः। स तु इानुवचः श्रृत्वा वल्नवितस्तेन मायया ॥२१॥
क्यैवेतयन्रवीद्राजा प्रीयमाणः शतभतुम्। तस्मिंस्तु देवै
प्रतिक्षत्रसुतदचासौत् सञ्जयो नाम विभरुतः। सञ्जयस्य जयः पुत्रो विजयस्तस्य चात्मजः॥२८॥
"एवमस्तु" तव देवताओं ने राजा से कहा- आप इनको मार कर इन्द्र हो जाइए॥१७॥
राजा ने उन सभी दैत्यों को, जो इन्द्र से अवध्य थे, मार कर चिरकाल से नष्ट देवताओं की श्री की रक्षा की॥१८॥ तदुपरान्त इन्द्र ने देवताओं के साथ आकर राजा से कहा-- राजा, मैं आपका पुत्र हूँ। तात, निसंदेह आप यह देवताओं ने कहा है। जिन आप का पुत्र मैं इन्द्र हूँ-इस स्थिति को मैं ब्रह्मों से प्राप्त करूंगा॥१९-२०॥
वह राजा इन्द्र की बात सुनकर माया से मोहित हो संतुष्ट हो गया और इन्द्र से बोला-"ऐसा ही सही॥२१॥"
तब देवताओं के समान उस राजा के स्वर्ग चले जाने पर उसके पुत्रों में इन्द्र से राज्य छीन लिया। उसके पचास पुरों ने अनेक बार स्वर्गलोक पर अपिमण किया॥२२-२३॥
जब उन मूर, रागोन्मत्त, विषयी और ब्रह्मवेत्ता राजा-सुत का पराक्रम नष्ट हो गया, तब इन्द्र ने काम-क्रोध में रत इन सभी राजि-पुत्रों को मारकर अपने ऐश्वर्य और उत्तम स्थान को प्राप्त किया॥२४-२५॥
जो आदमी इन्द्र के इस उत्थान-पतन को सुनेगा और धारण करेगा, उसकी अपगति कभी नहीं होगी॥२६॥
लोमहर्षण बोले--हम्म, तो आपने कहा, इसलिये अनेना के वंश का वर्णन मैं करूँ। अनेना का पुत्र प्रतिक्षेत्र महान् यशस्वी राजा हुआ॥२७॥ प्रतिक्षेत्र का सञ्जय नामक पृथु बड़ा प्रसिद्ध था। सञ्जय का पुत्र विजय हुआ और उसका पुत्र विजय हुआ॥२८॥
विजयस्य कतिः पुत्रस्तस्य हय्यंतवतः सुतः। पट्टु्यह्वतसुतो राजा पट्देवः प्रतापवान्॥२९॥
सहदेदस्य धर्मात्मा नदीन, इति विभरतः। नदीनस्य जयत्तेनौ जयत्सेनस्य संद्तिः॥३०॥
संद्तेरपि, धर्म्मा क्षत्रवृद्धो महायदाः। अनेनस: समाख्याताः क्षत्रवृद्धस्य चापरः॥३१॥
क्षत्रवुद्धातमजस्तत्र सुनहोत्रो महायदाः। सुनहोत्रस्य दायादास्त्रयः धर्मधामिकयः॥३२॥
काव: क्षदच द्वावेती तया गृत्समदः प्रमुः। पूत्रो गृत्समदस्यापि शुनको यस्य दोनकः॥३३॥
ब्राह्यणाः क्षत्रियादचंव वैद्याः शूद्रास्तयंव च। झलात्मज आप्टिसिनस्तनयस्तस्य काश्यपः॥३४॥
काशस्य काशिपो राजा पुत्रो दोर्घतपारतया। धनुस्तुं दोधंतपसों दिद्रान् घन्वन्तरिस्ततः॥३५॥
तपसोऽन्ते सुमहतो जातौ वृद्धस्य धीमतः। पुनर्घन्वन्तरिर्वो सानुयेध्विट जन्मनि॥३६॥
स्प नेहे समृत्पन्नो देवो धन्वन्तरिस्तदा। काशिराजों महाराजः सर्व्रोगप्रणादनः॥३७॥
गुर्द भरद्रानात् प्राप्येह सं भिषक्क्रियः। समध्टया पुनव्वयंसय शिष्येभ्यः प्रत्यपादयत्॥३८॥
धन्वन्तरेस्तु तनयः केतुमानिति विभुः। अय केदुमतः पुत्रो वीरो भीमरयः रमृतः॥३९॥
प्रो भीमरयस्यापि दिवोदासः प्रजेश्वरः। दिवोदासस्तु धर्मात्मा वाराणस्यधिपोऽभयत्॥४०॥
तस्मिनेव काले तु पुरों वाराणसीं दविजाः। दुन्यां निवेशयामास क्षेमको नाम राक्षसः॥४१॥
धन्य नामक पत्र हया गौर उससे विदधान धन्वन्तरि उत्पन्न हुए ॥३५॥
वृद्ध और धीमान् घतु के कठिन तप के बनो भे देवता धन्वन्तरि मनुष्य योनि मे उत्पन्न हुए ॥३६॥
इस जन्म मे उसने घर में उत्पन्न देवं धन्वन्तरि ने, जो स्वरोग-विद्या शक तया सहाराज यपिराज कहलाते थे मरदाज मुनि से आयुर्वेद को प्राप्त पर उसदे आठ सांग करके शिष्यो को पढ़ा दिया ॥२७-३८॥
धन्वन्तरि वा पुन केतुमान् सास से प्रिद था। केतुमान् कय पृते सीमरप वशा दौर हुआ ॥३९॥
भीमरथ का पुत्र दिवोदास प्रजाओ वां स्वामी हुआ। धर्मात्मा दिवोदास काशी-नरिश हमा ॥५४०॥
विप्रदुन्द। इसी समय मक मामक राझस ने घून्य कासीपुरी में प्रवेश किया ॥४१॥ क्योनि महाता को हु्पेइवता! व हेदवन को येदवतमु०। ख.येदवनसु०। हे के नदीम! के दीनस्य! ग. सहति) य सहते०। स इतदर्मा। ये ०त्मज शस्णिसैऽ। ये स््तमास्त०+ ख धन्वस्तु। थे ब्तमसो। हैरे मणिराजो। क शन्तरे सुतो नर के०।
७५ एकादकोऽध्यायः
शप्ता हि सा मतिमता निकुम्भेन महात्मना। शून्या वधेसहस्रं थे भवित्रो तु न संश्रयः ॥४२॥
तस्यां हि शप्तमात्रायां दिवोदासः प्रजेदवरः। विषयान्ते पुरीं रम्यां गोमतथा संन्यवेशयत् ॥४३॥
भद्र्रेण्यस्य पूव्यं तु पुरी वाराणसी ह्भूत्। भद्र्रेण्यस्य पुत्राणां झतमुत्तमधन्विनामु ॥४४॥
हत्वा निवेशयामास दिवोदासो नराधिपः। भद्ररेण्यस्य तद्वारं हृतं येन बलीयसा॥४५॥
भद्र्रेण्यस्य पुत्रस्तु दुदंमो नाम विश्रुत। दिवोदासेन बालेति घृणया स विसर्जितः ॥४६॥
हैहयस्य घु दायाचं हृतवान् थे महीपतिः। आजल्ले पितृदायाद्यं दिवोदासहूतं बलात् ॥४७॥
भद्र्ेण्यस्य पुत्रेण दुर्दमेन महात्मना। वैरस्यान्तो महाभागा। एतहचारमीयतेजसा ॥४८॥
दिवोदासरादुदृषदत्यां वोरो जजे प्रतदनः। तेन बालेन पुतेण प्रहृतं तु पूर्वम् ॥४९॥
प्रतद॑नस्य पुचरौ द्रौ वत्समयो सुविश्रुतौ। वत्सपुत्रो ह्यलर्कस्तु सन्नतिस्तस्य चात्मज ॥५०॥
अलकंस्तस्य पुरस्तु ब्रह्मण्यः स्त्यसद्धरः। अलक प्रति राजपिं श्लोकौ गीतः पुरातनः ॥५१॥
पष्टिव्धसहस्नएणि। पर्टिदर्पदातानि च। युद रूपेण सम्पन्न प्रागासीच्च छुलोदहः ॥५२॥
लोपामुद्राप्रसादेन परमापुरवाप्तवानु। तस्यासीतु सुमहद्वाज्य रूपयौवनशालितः ॥५३॥
दाग्पस्याम्ते महाबाहुर्हत्वा क्षेमफराकषसम्। रम्यां निवेशयामास पुरों बासाणसीं पुनः ॥५४॥
सप्नतेरपि दायादः सुनोथो नाम घांमिकः। सुनीयस्य तु दायादः क्षेमो नाम सहायशाः ॥५५॥
कषेमस्य कंतुगान् पुः सुकेतुस्तस्य चात्मणः। सूकेतोरतनयज्चापि धर्मकेतुरिति स्मृतः ॥५६॥
निकुम्म ने काशी पुरी को शाप दिया था कि तुम हजार वर्ष तक नि सदेह दन्य रहोगी। ॥४२॥
जब काशीपुर शापग्रस्त ही गयी तद राजा दिवोदास ने गोमती नदी के तट पर सुन्दर नगर रचकर प्रजा को बसाया॥ ४३॥
पहले मदपरेण्य की कार्यापुरी हो गई थी। मद्रेण्य ने सौ उत्तम धनुर्धारी पुत्रो को मारकर राजा दिवोदास ने बसून मदधेष्य क्य राज्य-हरण कर अपना वना लिया ॥४४-४५॥
मद्रभेण्य के दुदेम माम से विख्यात पुत्र को दिवोदास ने बारक मह कर दयावश छोर दिया॥४६॥
राजा मे हैहय की पैतुत-सपत्ति छीन ली। महाभाग। मद्र-श्रेष्य के पुत्र महात्मा दुर्दम ने दिवोदास से वस्पूर्वेक हरण श्रि गये पितृ-धनं पर अपना प्रमुत्व फिर स्यापित कर लिया। यर् अपने परात्रम से शरु वा अन्त वार दिया ॥४७-४८॥
दिवोदास दी दु
अन्त में प्रतदन नेमव रक्षको मारकर रमणीय कानी पुरी को फिर से बसाया ॥५.४॥
सनति दा मी सुनीय नामक गृतर घम्म था। सुनीय वे कोम नामक सहाधदस्वी पुपर हुआ ॥१५॥
होम ङ पूवर बेतुमानु से सुवेतु उत्तर हुआ। सुतेलु का पुव थमंबेतु कटलाया॥५६॥
धर्मंकेतु का पुत्र महारयी सत्यकेतु हुआ। रयदेुने विमु एग ण्ादाद्न०। २व न्त्तयौतैगु०। ३ रा ण्नौ। दातुजिद्ररमपु्रोऽय तस्य पूत ऋतप्वज'। अभय