अध्याय 9: चंद्रवंश-वर्णन और सोम की उत्पत्ति का विवरण
अध्याय 9 : नवमोऽध्यायः
ब्रह्मपुराणम् ५५७
अतिथिस्तु कुशाज्जशे घर्म्मत्मा सुमहायज्षाः। सतियेस्स्वभवतपत्रो निषधो नाम दोर््यवान् ॥८८॥
निषधस्य नसः पुत्रो नभः पुत्रो नखस्य तु। प्नभस्य पुण्डरीकस्तु क्षेमघन्दा तत. रमृतः ॥८९॥
क्षेमघन्वसुतस्त्वासोदुदेवानी कः प्रतापवादू। माप्तीदहीनमुर्नाम देवानीकात्मजः प्रभु.॥९०॥
अहीनगोस्तु दायादः सुधन्वा नाम पार्थिवः! सुधन्वनः सुतश्चापि ततो जन्ते शल्ये नृपः॥९१॥
उक्यो नाम स धम्म्मा श्ञलषुरो बभूव ह्। व्रनाभः सुतस्तस्य नलस्तस्य महात्मनः ॥९२॥
नली. द्वावेव दिद्यातौ पुराणे सुनिसत्तमाः। बोरसेनात्मजइचेव यश्चेशष्वाकुदु रोहः ॥९३॥
दष्वङवेशप्रभवाः प्राधान्येन प्रकीतिता:। एते विवस्वतो वंशे राजानो भूरितेजसः ॥९४॥
पठन् सम्यगिमां सृष्टिमादित्यस्य विवस्वतः। श्राद्धदेवस्य ष्देदस्य प्रजानां पृष्टिदस्य च।
प्रजावानेति सायुञ्यमादित्यस्य विवस्वतः ॥९५॥
इति श्नीत्राह्ये महापुराणे भदिस्यवेश्ानुकीत्तनं नामाष्टमोऽध्यायः समाप्तः।
नवमोऽध्यायः
तत्रादौ सौमौत्पत्ति-वणैनम्
लोमहर्षण उवाच
पिता सोमस्य भो विप्रा जजञेऽत्रिभेषवानुषिः। ्रह्ःणो मानसात्पृध्वें प्रजासर्गे विधित्सतः ॥१॥
नामक पराश्रमी पुत्र हआ। ॥८८॥ निपघ के पुव दन और नल के पुत्र मम हुआ। नम से पुण्डरीक आर उससे क्षेमघन्वा उत्पन हुआ ॥८९॥ क्षेमधन्वा को पुत्र प्रतापं देवानीक था। देवानीक के पुत्र का गाम अहीनगु था ॥९०॥ अदीनगु का पत्र सुधस्वा नामक राजा हुआ। सुधन्वा से राजा शर की उत्पत्ति हुई॥९१॥ दाल कै उवय नामक घर्मात्मा पुन हुआ। नना उसके पुत्र हुआ। उस महात्मा के नल नामक पुत्र हुआ ॥९२॥ मुनिवद् पुराणों में दो हो नल प्रसिद्ध हैं--एक दौरमेन कर पुत्र और दूसरा इक्वाबु-वश मे समुद्भूत ॥९३॥ इ्वाकु-वश मे उत्पन्न भमुख राजाआ कर वर्णन कर दिया यया! ये समी परम तेजस्वी राजा सूवंवशि है।॥९४॥ प्रजा दै पोषक और श्राद्ध के देव भयवानु सूं की इस सुध्टि का पढ़ने दाला मनुष्य सूर्य की समानता पर्त स्ता है ॥९५॥ थी ब्रह्ममहयपुयण में आदित्य-वश-कीतेंत नामक मौठवी अध्याय समाप्त ॥८॥
अध्याय 9
चनद्रवश-वर्णेन
लोमहर्षण उवाच
विप्रवृन्द! पूवमा म प्रजा-सुप्टि के इच्छुक ब्रह्मा ने मन सै चन्द्रमा के पिता
५८ नवमोऽध्याय
अनुत्तर नाम, तथो येन तप्त हि तत्पुरा। तरीणि वंसूसाणि दिव्यानीति, हिः न तम् ॥२॥
ऊर्ध्वमाचक्मे तस्य रेतः सोमत्वमीतिवानु। नेत्राभ्याम् वारि सुखाय दक्षिणा दयोतयन् विशः ॥३॥
तत् शुं दिविनादिष्टा दज देव्यो दधुर्तत। समेत्य धारयामासुनं च ता समझवनुदन।
यदा न धारणे क्वचास्तस्य गर्भस्य ता दिव्यम्। ततस्ताभि स प्रपवतस्तु निपपात वसुर्धराम् ॥५॥
पतितं सोममालोक्य ब्रह्मा लोकपितामहः। रथमारोपयामास लोकानां हितकाम्यया ॥६॥
तस्मिन्निपतिते भूदेवा पयुने त्रे परमात्मनि। तुष्टुवुब्रह्मणः पुन्नारतथान्ये सुनिसत्तमाः ॥७॥
तस्य संस्तूयमानस्य तेजः सोमस्य भार्वत। आप्यायनाय लोकानां भावयामास स्वेतम् ॥८॥
सः तेन स्थापितः सागरपर्यन्तं चसुग्धरप्रणम्। त्रि सप्तकृत्वोदतियकारिशिप्रदक्षिणामः।
तस्य भ्रमणस्य तेजः पृथिवीमन्वपद्यत। ओषध्यस्ता समुद्भूता याभिः सन्धायते जगत् ॥१०॥
सर लब्धतेजा भगवान् सस्वर स्वप्नम्भि। तपरतेपे महाभाग पद्मानां दर्शनाय सम्।
ततस्तस्मै ददौ राज्यं ब्रह्मा ब्रह्मविदाम् वरः। वनस्पतीनां विप्राणाम् अपां च मुनिसत्तमाः ॥१२॥
सः तत्राप्य महाराज्यं सोम सौम्यवतावर। समाजे राजसूयः सहस्रशतदक्षिणम्।
दक्षिणामददात् सोमः त्रीलोकनीति न श्रुतम्। तेभ्यो ब्रह्मपमुरुपेम्य सकस्येम्यद्च भो द्विजाः ॥१४॥
हिरण्यगर्भो ब्रह्मा निमृगुश्च ऋषिविजो अभवत्। सदर्योऽभूद्धरिरतन् मुनिभिर्वेहुभियृत् ॥१५॥
भगवान् अत्रि मुनि उत्तप न हुए। है। मुनि हजार देवं वर्ष तक उग्र तपस्या का—एसा हेम सुना है।
उनका वीर्य शरीर वे ऊर्ध्वमार्ग में जाकर अमृत बन गया। दशो दिशाओं को प्रकाशित करते हुए जलदोनो यो स बहने लगा।
ब्रह्मा की आज्ञा से उस ज देव संयुक्त जल रूप यम को दशो दिगाओ मिलकर धारण विया। पर वे धारण करने में समर्थ नहीं हुइ।
तब उन्हान गम को त्याग दिया। गम पृथ्वी पर गिर पड़ा। भिरे हुए अमृत रूपा गम को देखकर लोव पितामह ब्रह्मा ने लोको के कल्याण के ल्ये गम को स्थ पर स्थापित कर दिया।
सुनिवर अति के उस परमा स पुत्र कर गिर जाने पर देवता अर ब्रह्मा वे दूसरे पुत्र उसकी स्तुति कर लगे। स्तुति रिय जान बाले उस प्रकागामान सोम (चद्रमा) का तद छोको की दुद्धि वे लिए सब तरफ पैल गया।
चद्रमा उस रथस समुद्र पयन्त पृथिवी की इक ख बार परिक्रमा का। चद्धमा का जो तज पृथ्वी म व्याप्त हुआ उससे रुव भोपवियां उत्तन्र हुइ। जिनसे ससार का पापण होता है।
अपन कर्मो से प्ज प्रप्त कर भगवान चपरम पद्माव दान बल्ए सस्या वाले वर्षों तक तपस्या की। तद ब्रह्मवेत्ता म भरष्ट ब्रह्मा चद्रमा को वजन अपव ब्राह्मण अर जल वा राज्य दिया।
उस महाराज्य को प्राप्त कर चद्रमा न एक लाखें दनिणा वि राजसूय यन को झम्पस् दिया। द्विजगण। ब्रद्धपि आदि खदस्या को सोम न दक्षिणाम तेनास) दिय एषा हमर सुना है।
यल म साक्षाद् ब्रह्मा रहा हुए। अत्रि आर मृगु क ल्विक हुए। बहुत गुनिया से युक्त यात्।
तं सिनश्च कुहूरचेद् युतिः पुष्टः प्रमा वतुः। कौतिर्धुतिश्च लक्ष्मी नव देव्यः सियेविरे ॥१६॥
प्राप्यावभुयमप्यगूपं सर्वदेवपिपूजितः। विरराजाधिराजेन्द्रो दशधा भासयन् दिशः ॥१७॥
तरय तत्प्राप्य दुषप्राप्यमेशवरययमूपिसत्कृतम्। विढस्वाम् भततिस्ताताविनयादनयाहता ॥१८॥
तत्र त्वयुद्धममयत् धरस्यातं तारकामयस् । देवनां दानवानां च लोकसंकर महत् ।। २३५१
तत्र शिष्टाश्च ये देवास्तुविताश्च ये द्विजाः । शरह्यां अरणं जम्मुरादिदेवं सनातनम् ।२४
तदा निवार्योशनसं तं वै शद्रन्च शङ्करम् । ददावागिरसे तारां स्वयमेव पितामहः ।।२५।।
तामन्त प्रसवां दृष्ट्वा करदः प्राह वृहस्पति । मदोयायां न तें योनो गर्भो धायः कथञ्चन ।।२६।।
इषोमास्तम्बमासाद्य गर्भ सा चोत्ससर्ज ह् । जातमामः स भगवान् देवानामाकषिपटपुः ।। २७।।
तत् संश्यमापतन्नास्तारामूचु सुरोत्तमा । सव्यं शरूहि सृतः कस्य सोमस्याय वृहस्पते ।।२८।।
पृच्छमाना यदा देवैर्नाह सा विबुधान् किम् । तदा तां दप्तुमारम्भः कुमारो दस्युहन्तमः ।।२९।।
हरि सदस्य हुए ।। सिनौवाली (पूर्व अमावस्या), कुहु (उत्तर अमावस्या), तिथि, षष्ठ, परमा, वसु, कीर्ति, धृति, छद्मी- ये नौ देवियाँ चन्द्रमा कहाँ सेवा करती थीं ।।१६।।
यज्ञ को समाप्त कर देवता और दानवों से युक्त हो राजाओं में प्रधान चन्द्रमा दशों दिशाओं को प्रकाशित करते हुए सुशोभित होने लगा ।।१७।।
किसी से सत्त उस अलभ्य ऐश्वर्य को प्राप्त कर चन्द्रमा की बुद्धि अनीति से उच्छृंखल हो उठी ।।१८।।
ऐश्वर्य के मद से मत्त चन्द्रमा ने वृहस्पति की पत्नी का अपहरण कर दिया ।।१९।।
देवताओं और मुनियों द्वारा बारबार समझाया जाने पर भी उन्होंने बृहस्पति को तारा नहीं लौटायी ।।२०।।
तब चन्द्रमा का पक्ष शुक्राचार्य ने लिया और वृहस्पति का पक्ष अग्रवणं नामक धनुष धारण कर महादेवजी ने लिया ।।२१।।
महात्मा शिव ने ब्रह्मशिर नामक एक महास्वर दैत्यों पर फेंका, जिससे दैत्यों का यश नष्ट हो गया ।।२२।।
वहाँ पर लोक-कल्य के लिए तारकामय नाम से विख्यात देव-दानव युद्ध हुआ ।।२३।।
द्विजगण उस युद्ध में जो तुपित नामक देवता वच गये, वे सब आदिदेव और सनातन ब्रह्मा की रण में गये ।।२४।।
तब शुक्राचार्य और महादेवजी का हटाकर स्वयं ब्रह्मा ने बृहस्पति का तारा लौटा दी ।।२५।।
गर्भवती तारा को देखकर बृहस्पति ने क्रोध से कामुके सम्बन्धित योनि में एक कमी गर्भ धारण नहीं कर सकती ।।२६।।
तब मूँज के गुच्छों पर तारा ने गर्भ का त्याग कर दिया। जन्म लेते ही वह बालक दिव्यरूपधारी हो गया ।।२७।।
देवताओं ने सदेह करके तारा से पूछा--त्य बोलो कि यह पूर्व चन्द्रमा का है या बृहस्पति का ।।२८।।
देवताओं से पूछी जाने पर जब वह नहीं बोली, तब चोरों का नाश करने वाला बालक उसको दत्त (गोद लेकर) गृहण करने के लिए तैयार हो गया ।।२९।।