अध्याय 9 : कश्यप और उनकी पत्नियों की संतानें
कश्यप ऋषि और उनकी तेरह पत्नियाँ
शौनकादि ऋषियों ने सूत जी से प्रश्न किया – “हे सूत जी! दक्ष प्रजापति की पुत्रियों का विवाह महर्षि कश्यप से हुआ था। हमने सुना है कि उन तेरह पत्नियों से ही सम्पूर्ण देवता, असुर, नाग, पक्षी और वृक्ष उत्पन्न हुए हैं। कृपया कश्यप की पत्नियों और उनकी सन्तानों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।” सूत जी ने उत्तर दिया – “यह एक महान वंश-वृक्ष का इतिहास है। महर्षि कश्यप ब्रह्मा जी के पौत्र और मरीचि ऋषि के पुत्र थे। उन्होंने दक्ष की तेरह पुत्रियों – अदिति, दिति, दनु, काष्ठा, अरिष्टा, सुरसा, इला, मुनि, क्रोधवशा, ताम्रा, सुरभि, सरमा और तिमि – से विवाह किया।”
अदिति से आदित्यों का प्रादुर्भाव
अदिति सबसे तेजस्वी पत्नी थीं। उनके गर्भ से बारह आदित्य उत्पन्न हुए – धाता, मित्र, अर्यमा, रुद्र, वरुण, सूर्य, भग, विवस्वान, पूषा, सविता, त्वष्टा और विष्णु। ये सभी देवता सूर्य के समान प्रकाशमान तथा सृष्टि-पालन में संलग्न हुए। विष्णु ने तो बाद में वामन अवतार लेकर तीनों लोकों को मापा।
अदित्यां द्वादशादित्याः सम्भूता लोकधारिणः ।
विष्णुश्चैव महातेजाः सर्वेषां प्रभुरीश्वरः ॥
दिति से दैत्यों और दनु से दानवों की उत्पत्ति
दिति के गर्भ से हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष जैसे प्रतापी दैत्य उत्पन्न हुए। इनके वंश में सिंहिका, राहु, प्रह्लाद, विरोचन और बलि आदि हुए। दनु के गर्भ से अनेक बलशाली दानव उत्पन्न हुए – विप्रचित्ति, शम्बर, नमुचि, पुलोमा आदि। ये दानव इन्द्र से सदा युद्ध करते रहे। कद्रू (जो कुछ ग्रन्थों में सुरसा से अभिन्न मानी गयी हैं) से नागों की उत्पत्ति हुई, जिनमें शेष, वासुकि, तक्षक आदि प्रमुख हैं।
विनता, ताम्रा और अन्य पत्नियों की सन्तानें
विनता के दो पुत्र हुए – अरुण और गरुड़। अरुण सूर्य के सारथि बने और गरुड़ भगवान विष्णु के वाहन हुए। ताम्रा से शुक, सारिका, भास, गृध्र आदि पक्षियों की उत्पत्ति हुई। क्रोधवशा से सिंह, व्याघ्र, भालू, भेड़िया आदि हिंसक पशु उत्पन्न हुए। सुरभि ने गौएँ और भैंसें उत्पन्न कीं। इला से वृक्ष-लताएँ, सरमा से कुत्ते और अन्य वन्य पशु, तथा तिमि से जलचर प्राणी उत्पन्न हुए।
विनतायां गरुडोऽरुणश्च ताम्रायां शुकसारिकाः ।
क्रोधवशात् सिंहव्याघ्राः सुरभ्यां गोकुलं तथा ॥
कश्यप-पत्नियों के वंश का महत्त्व
इस प्रकार एक ही पिता कश्यप की विभिन्न माताओं से उत्पन्न सन्तानों ने समस्त सृष्टि को भर दिया। देवता-असुर-नाग-पक्षी सब एक ही मूल स्रोत से निकले हैं, यह ज्ञान मनुष्य को जाति-भेद के संकीर्ण विचारों से ऊपर उठने की प्रेरणा देता है। इस अध्याय का श्रवण करने वाला मनुष्य वैर-विरोध से मुक्त होकर सबमें ब्रह्म-दर्शन करता है।
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे नवमोऽध्यायः समाप्तः ॥