अध्याय 3 : महत्, अहंकार और तन्मात्राओं की उत्पत्ति
महत्, अहंकार और तन्मात्राओं की उत्पत्ति
सूत जी ने ऋषियों को पूर्व अध्याय में प्रलय और सर्ग का सामान्य परिचय दिया। अब वे सृष्टि की मूलभूत तत्त्वों की उत्पत्ति को अत्यन्त गूढ़ रूप से समझाते हैं।
प्रकृति से महत् तत्त्व का प्रादुर्भाव
सृष्टि के आरम्भ में जब भगवान नारायण ने सृष्टि का संकल्प किया, तब उन्होंने अपनी प्रकृति को क्षुब्ध किया। सबसे पहले प्रकृति से महत् तत्त्व प्रकट हुआ, जो सृष्टि का प्रथम विकार है। यह महत् तत्त्व ही बुद्धि का कारण है और तीन गुणों – सत्त्व, रज, तम – से युक्त होता है।
प्रकृतेरभवन्महान् महतो ह्यहमुत्तमः ।
अहंकारात्त्रयो देवा गुणत्रयसमुद्भवाः ॥
महत् तत्त्व का स्वरूप
महत् तत्त्व को ही ब्रह्मा जी का ब्रह्म-रूप कहा गया है। यह सम्पूर्ण जगत का बीज है। यह अत्यन्त सूक्ष्म, व्यापक और चेतन है। इसी से अहंकार, इन्द्रियाँ और भूत उत्पन्न होते हैं।
त्रिविध अहंकार की उत्पत्ति
महत् तत्त्व के विकार से अहंकार उत्पन्न हुआ। यह अहंकार तीन प्रकार का कहा गया है –
वैकारिक (सात्विक अहंकार) – जिससे ग्यारह इन्द्रियाँ और मन उत्पन्न हुए।
तैजस (राजस अहंकार) – जिससे पाँच तन्मात्राएँ और दस इन्द्रियों की शक्ति प्रकट हुई।
भूतादि (तामस अहंकार) – जिससे पाँच महाभूत उत्पन्न हुए।
वैकारिकस्तैजसश्च भूतादिश्च त्रिधा स्मृतः ।
अहङ्कारस्त्रिधा भिन्नो महत्तत्त्वाद्व्यजायत ॥
पाँच तन्मात्राएँ
राजस अहंकार से सर्वप्रथम पाँच तन्मात्राएँ उत्पन्न हुईं। ये तन्मात्राएँ सूक्ष्म भूत हैं जो स्थूल महाभूतों के कारण हैं।
शब्द तन्मात्रा से आकाश, स्पर्श तन्मात्रा से वायु, रूप तन्मात्रा से अग्नि, रस तन्मात्रा से जल और गन्ध तन्मात्रा से पृथ्वी की उत्पत्ति हुई। प्रत्येक तन्मात्रा में अपने से पूर्व का गुण भी विद्यमान रहता है।
शब्दमात्रादभूदाकाशः शब्दस्पर्शगुणोऽनिलः ।
शब्दस्पर्शरूपगुणात्तेजश्च समजायत ॥
पञ्चमहाभूत और उनके गुण
तामस अहंकार से उत्पन्न पाँच महाभूत – आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी – ये पूरे जड़ जगत के मूल कारण हैं। इन्हीं के पारस्परिक संयोग से समस्त भौतिक पदार्थ बनते हैं। प्रत्येक भूत का एक विशेष गुण है – आकाश का शब्द, वायु का स्पर्श, अग्नि का रूप, जल का रस और पृथ्वी का गन्ध।
इन्द्रियों की उत्पत्ति
सात्विक अहंकार से दस इन्द्रियाँ और मन उत्पन्न हुए। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ – कान, त्वचा, आँख, जीभ, नाक – ज्ञान ग्रहण करती हैं। पाँच कर्मेन्द्रियाँ – वाक्, हाथ, पैर, पायु, उपस्थ – कर्म करती हैं। मन ग्यारहवीं इन्द्रिय है जो ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय दोनों का नियमन करता है।
सारांश और फलश्रुति
सूत जी बोले – “हे ऋषियो! जो मनुष्य इस प्रकार तत्त्वों की उत्पत्ति को जान लेता है, उसकी बुद्धि सांख्य-योग में स्थिर हो जाती है। वह क्रमशः स्थूल से सूक्ष्म की ओर अग्रसर होता है और अन्त में मोक्ष को प्राप्त करता है।”
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे तृतीयोऽध्यायः समाप्तः ॥