अध्याय 3: देवदानवोत्पत्ति-वर्णनम् - देवता, दानव और अन्य प्राणियों की उत्पत्ति
अध्याय 3 : तृतीयोऽध्यायः
ब्रह्मपुराणम् ११
युगे युगे भवन्वयेते पुनर्दक्षादयो नृपा । पुत्रैचेव निरध्यन्ते, विद्वास्तत्र न मृद्यतिष्पापाः
ज्येष्ठ्या कानिष्ठ्यमप्येता पुच्छं नाप्तद्विगोत्तमा । तप एव यरोयोऽभूतभावक्वैव कारणम् ॥ ५६॥
इमां विमुष्टि दक्षस्य यो विद्यात् सचराचराम् । प्रजावान्यायुरुतीर्णं स्वर्गलोके महीयते ॥५७॥
इति ब्राह्ममहापुराणे सृष्टिकथने नामद्वितीयोऽध्याय।
तृतीयोऽध्यायः
देवदानवोत्पत्ति-वर्णनम्
मुनय अचुः
देवानां दानवानां च गन्धस्वर्ग यरक्षसाम् । उत्पत्ति विस्तरेणैव लोमहर्षण कौत्तेय ॥१॥
लोमहर्षण उवाच
प्रजा सृजति व्यादिष्टं भुव्वं दक्ष स्वयम्भुवा । या सतनं भूतानि तया श्चणुत्त भो द्विजा ॥२॥
जाते हैं। विद्वान इसमें मोहित नहीं होता ॥५५॥। द्विजगण पहले नम श्येता तथा निष्ठता वा भेद नहीं भा प्रत्युत तप और तप का प्रभाव ही मुख्य कारण माना जाता था॥५६॥ दक्ष की इस चराचर सृष्टि को जो जानता है वह प्रजावान् और जायुष्मान् होकर स्वर्ग में पूर्जिते होता है ॥५७॥
श्री ब्रह्ममहापुराण में सृष्टि कथन नामक दूसरा अध्याय समाप्त॥२॥
अध्याय
देव और दानव को उत्पत्ति का वर्णन
मुनिगण बोले--आप लोमहर्षण ! देवता दानव मनुष्य नाग और राक्षस की उत्पत्ति का विवरण पृथक सुनाना था कृपया बरें ॥१॥
लोमहर्षण बोले--विप्रयण! ब्रह्मा द्वारा सृष्टि की प्रणति रचना वा अविन प्त कर दशन सिगार प्रणेयः सृष्टि के चदं (स्थरा विधान पहुंचे) शुचि ॥२॥ प्रारण चपर दे मानी सूट की ए्वन सो; हवा सा श्तं स्वे दशा ०। रक विपदन्ते। इकः न्ति! जम पैव विप्तिदव पूरा ध्व
१२ तृतीयोऽध्यायः
भानसान्यद भूतानि पूर्वमेवासृजत् प्रभुः । ऋषीन्देदानूष्ठरघवर्यानसुरान्यक्तराष्षसान् ॥३॥
यदारम मानसी दिप्रा न व्यवद्धत वै अर्जा। तदा सच्चिःत्य धर्म्मात्मा प्रजह्येनोः प्रजापतिः ॥४॥
स मेयुनेन धर्म्मेण सिसूक्षुविविधाः प्रजाः। अतिक्तौमावहत् पत्नौ धोरणस्य प्रजापतेः ॥५॥
सूतां सुतपसा श्युष्ता महती लोकधारिणम् । अय पुत्रसहस्राणि वैरण्यां पञ्च वीर्यवान् ॥६॥
मसिवन्यां जनयामास दक्ष एव प्रजापति: । तस्तु दृष्ट्या महाभागानृसंविवदधंपिषून् प्रजाः ॥७०॥
वेवापिः प्रियसंवादो नारद. प्राब्रदोदिदम् । माक्षाय वचनं तेषां झापायेवात्मनस्तथा ॥८॥
पं कदयपः सुतवरं परमेष्ठी प्यजीजनत् दक्षस्य वै दुहितरि दक्षशापभयान्मुनि: ॥९॥
पूर्व स हि समुत्पप्नों नारद: परमेष्ठिनः! असिषन्यामय वैरण्यां भूयो देवविसत्तम: ॥१०॥
तं भूयो जनयामास भ्पितेष मुनिपुद्धवम् ! तेन दक्षस्य ये पुत्रा हयंश्वा इति विधृता ॥११॥
निर्म्मथ्य नाशिता: सव्वं विधिना च न संश्ञपः। तस्योद्यतस्तदा दक्षो नाद्याभितयिक्रमः॥१२॥
ब्रहर्पोन् परतः त्या याचितः परमेष्ठिना । ततो ५भितसन्धिङचक्रे वै दक्षस्य परमेष्ठिना ॥१३॥
कन्यायां नारदो" मह्यं तव पुत्रो भवेदिि। ततो दक्षः सूतां प्रादात् प्रियां षै परमेछ्ठिने ॥
प्त तप्यं नारदो जे भूपः प्रापभपादृपिः ॥
फिर मुनि, देवता, गन्धर्व, दैत्य, यक्ष और राक्ष योनियों बी रचना वी ॥२॥ निन्त जद भानसी सृष्टिते प्रजा सही जड़ी, तव घर्मात्मा प्रजापति ने रजा बी वहि कै कारण पर अच्छी तरह विचार विया और मधुन चमं से अनेक दरबार वी प्रजाओ के रचने को इच्छा को!
फिर वीरण प्रजापति वी अत्यन्त तपस्विनी और लोव्घारिणी कन्धा असिकनो को पत्नी बनाया। ॥५३॥ शक्तिशाली दस प्र जापति ने वीरण-पु्री अिवनी से पाँच हजार पृष्ठ इत्यन्न दिये ॥६३॥
प्रजाओं को बदाने थी इच्छा करने वाले उन महामागों की देखकर प्रियमपी देवर्पि नारद ने उनम नाश के लिये और अपने शाप मे' लिये ह् बात कही ॥७-८ पितामह वश्यप ने जिस पुम-ध्रेष्ठ वो उलन्न शिया, वह मुनि नारद दक्ष बाप मै भय से कश्यप से ददा की बन्या में पहले उत्पन्न हो गया था! ९३॥।
फिर देवियों में श्रेष्ठ बद्मप ने उस मुनिश्येष्ट नारद को वौरण प्रजापति थी कन्या अखिफनी मे पिता वी तरह उत्पन्न पिया ॥१०२
नारद ने हर्यश्व नाम गे विख्यात दक्ष के पुत्रों को मथक्र निःश्देट् विनष्ट शिवा था। तद भयन्त पराक्रमी शेदरनारदंभानाराद्लेङेल्पि तयार हो गया ॥११-१२॥
कध्यपने द्रह्यापिय।क्मे आगे वसै दशा से याचनां की। इसरे वाद कश्यप में दण से प्रनिला को---।१३॥ "माप बच्या हो मेरा पुत्र मारद उत्पन्न होगा?" तब दक्ष ने अपनी प्रिय वस्या कश्यप को दे दो वह मुनि नारद शाप ने स्ये पिर उसमें इत्यन्न हुआ ॥
श्ण न्ति प्रशापतिएदासूजतू। ऋ०। रे, «रवपमिरान्पशादव रा०। इण. तान। से जुरप्टां। भक. वीर्यां स वीर्या! दर ह वीर्या छह. पीददौ। <. मुलिषुषय। स्प सदि 'कें। ण्व. ण्दोणपो।
॥ 7* भ्मुनय ञ्चुः
कयं प्रणाशिता: पुत्रा नारदेन महपिणा॥ प्रजापतेः, सूतवर्य श्रोतुमिच्छाम तत्वतः ॥१५॥
लोमहर्पण उवाच
दक्षस्य पुत्रा" हर्यश्वा विवद्धपिषवः प्रजा: । समागता महावी्था नारदस्तानुयाच ह ॥१६॥
नारद उवाच
बालिशा दत भ्पूयं वे नास्या जानीत वै भुवः) भ्रमाणं सष्टुकामा दे प्रजा: प्राचेतसात्मजाः ॥१७॥
अन्तरुदुष्वेमघदचंद कथं सजय, दे भ्रजाः। ते तु तदचनं धुत्वा प्रयाताः सर्व्वतो दिशषः॥१८॥
ध्ातृणां पदवी जातुं गन्तव्यं नात्र संशय: । जञाटवा अमां पृथ्व्याश्च सुखं स्यामहे प्रजाः ॥२२५॥
तेऽपि तेनैव मे प्रयाताः सवतो दिकम्। अदापि न निवत्ते समुद्ेग्य इवाप परदे
मुनिगण बोले---आयं सुतरी। मर्य नारद ने प्रजापति के प्रो का कँसे नाश किया-यह बात हम
शग यथां रूप से सुनना चाहते हैं १५॥
छोमहर्यण योलें--प्रजाओ को बढ़ाने दी इच्छा रखने वाले द के पुन महाबली हव॑स्य नारद के पास
हाये। नारद ने उनसे क्हा--॥ १६
नारद थोलें--दक्षभुवी ! तुम लोग मूं हो। प्रजा की सृष्टि करना चाहते हो, किन्तु इस पृथिवी
के प्रमाण--ऊपर, नीचे और मध्य--वो नही जानते। कंसे प्रजाओ की सृष्टि-स्वना कर॒सकोंगे ? ॥१५७२॥
मुनि की ऐसी वात सुनवर वे सब विभिन्न दिशाओं की ओर चले गये और जिस प्रवार नपियां समुद्र मे मिल जानें
के बाद फिर नही लौटती उसी प्रकार वे आज तक अपने-अपने स्थानो से नदौ लँटे॥१८१॥ हदवा ने नष्ट हो जानें
पर प्रचेता के पुत्र समय दक्ष ने फिर वेरणी से हजार प्रो को उत्पन्न दिया। उनकी शवलाइंव सज्ञा पडी।
उन्होंने प्रजाओ को वदान चाहा ॥१९-२०॥ उनसे मी नारद ने वही वात कही । वे परस्पर कहने छगे--मुनि नें ठीक
कहा॥२१। माइयो का मार्ग जानने के लिये जाना चाहिये। इसमें कोई सदेहं नहीं कि पृथिवी का प्रमाण जानकर
हम लोग सुख से प्रजाओं वी सृप्टि करेंगे॥॥रर॥। वे भी उसी मार्ग से विभिन्न दिशाओं की ओर प्रस्थित हुए मर
समुद्र से नदियों की तरह भज तक नहीं लौटे है ॥२३॥ तवसे माई की खोज में गया हुआ माई शीघ्र नप्ट हो जाता
शक. ऋषय। रक ख ०पतस्तु मयवञ्थोतु० । ३- नास्ति चवं वि०) धभक भूयो। पक रक्षय।
धच. दिशम्] छक. नः वीरिण्या०। <म् ब्चवात्ते तु। ¶कख श्देनेव यो०। रैक रहामुनि तरार कराण्णय
१४ तृतीयोऽध्यायः
तदा प्रमृति वै स्याता श्रातुरम्बेषणे द्विजः+ प्रयातो नद्यति क्षिप्रं तद्म काय्यं विपरिचता ॥२४॥
ताश्चैव नष्टान् विज्ञाय पुत्रान् दक्ष: प्रजापति: । षष्टं ततोऽसृजत् कन्या, वैरण्यामिति न्:शरुतम् ५,
तास्तदा प्रतिजग्राह 'भारयर्थि कश्यपः प्रभुः । सोमो धर्म्संश्च भो विप्रास्तयैवान्ये महर्षयः ॥ २६॥
ददौ च दश धर्माय कश्यपाय श्रयोदद। सरप्तवद्यति सोमाय चतस्रो्रिष्टनेमिने* रा
दे चैव बहुपुत्राय चेन्खिरसे तया दे ृशादवाय विदे तासां भामानि भे भृगु शरद॥
अरन्धतरी वसुर्यामी ९ लम्बा" भानुररत्वती । सद्धल्पा च मुहुर्त च साध्या विद्वा चं भो द्विजाः परर
धर््म॑पल्यो दश त्वेतास्तास्वपत्णनि ° बोधत । विदवेदेवास्तु विदवायाः साध्या साध्यान् ब्यलयात ॥३०॥
मस्त्वत्या मरत्वन्तो वसोस्तु वसवः+ सुता.^ भानोस्तु भ
मो, दो बहपुर दो, दो अधिरा को भर दो विद्रा हुशास्व को दी। अब उनके नाम मुझसे सुनिये-- २७-२८
विप्रवृन्द ! अरन्धती, बसु, यामी, लम्बा, भानु, सहस्त्वटी, सबस्पा, मुरर्ता, साध्या और दिव्वा--ये दस
सन्ध्या धर्म की पत्नी हुई, उनको दन्तान वे नाम सुनो--॥२९३॥ विश्वा से विश्वदेव, साध्या से साध्य, मस्त्वती से मरुत्वान्, वसु से बसु, मानु से मानु, मुहूर्ती से मुहूर्त भौर लम्बा से घोष उत्तन्न हुए। यामी से नागवीषौ उत्पन्न हुई६॥३० ३११॥
पृथिवी के एव विपय अरन्धती से उत्पन्न हुए। सार मे सव सबस्पा स्वन्पा से वृत्र हये। नागवीवी यापिनी हो बृहल उत्पन्न हुआ ॥३२-३३॥
प्रचेता-पुत्र दक्ष ने बाद में जो एन्ययें सोम को दीं, वे सय न नाम से ज्योतिष में कहीं गयो हैं ॥३४॥
जो दूसरे स्वातिमान्त तथा ज्योति के भाम चलने वाले देव हैं, बे बाद वगु वट्लाये। उनका मैं यहाँ पर विस्तृत-वर्णन करूंगा। ३५
वे बसु आए, धद, सौम, धव, ग्रनिल, अनत, प्रत्पूष और प्रमाप--इन नामों से ज्ञान हुए ॥३६॥
आपके वैतप्दूय, श्रम, धासत भौर मुनि नामता धुव वनम रा। सव ण्व्या दीरिप्या०। घ नन्दा बैरिष्या०। इक भाय्यि। ग मार्थत्वि। भ शरिषन! पस श्नि वोधत॥ अ एस न्मूर्जामो+ एय तदवा। लए नि यानि च। पि५। क़ शसवरनेयः) मार! न्य स्मूता। शेय घोधदरव। दरण. जामिया! १३ ०. गविग्या विषये सर! शष्के न्त्पायो तु चर्मा एष सर्वातदां। इस न्वीयौ च जामि०। ७. न्न्य पिददा- न्प्यदा०। १८९ शर्य वलश्यै०। १९९. चरदय०। ९०१. वतण्ड। रंग" पन्तो २९. न्व्ारानः।
ब्रह्मपुराणमु १५
सौमस्य भगवान् वर्चा वर्चस्वी येन जायते। वसस्य प्रो द्रविणो हुतह्व्यवहस्तया ॥३८॥।
मनोहरा या दिक्षिर प्राणोऽथ! रमणस्तस्या! अनिरूस्य शिवा भाया तस्था पुत्रो मनोजव। भविज्ञातगतिश्चेव द्वौ पूत्रावनिलस्य ष्व ५३९१
अग्तिपुत्र कुमारस्तु शरारस्तम्बे'धरिया वृत। तस्य हालौ विलाल मेगमेयश्च पृष्ठज स४०॥।
निपत्य कृत्तिकाना तु कात्तिकंय इति स्मृत। प्रत्युषस्य विद्रु पुत्रमूषि नाम्नाथ देवलम् ४ १॥
टी पुत्री देवलस्यापि क्षमावन्तौ मनोपिणी। बृहस्पतेस्तु भभिनी वरस्त्री श्रह्यवादिनो ))४२॥
योगसिद्धा जगत कृतसभमसवता° विचचार ह्। प्रभासस्य तु सा भार्य्या वसूनामष्टमस्य तु" ४३॥
विदवकर्म्मा महाभागो ध्यस्या' जञ "प्रजापति। कर्ता शिल्पसहस्राणा नरिदक्ानाव्च वाद्धकि ॥४४॥
भूषणनाञ्च स्व्वेदा कर्ता शिल्पवतां वर १य॒सरव्ेथा विमतानि दवताता चकार हं ५१४५१
मानुपाङ्चोपजीवन्ति यस्य॒ द्विस्प महात्मन। सरभो" कदयपादुदरानेकादज्ञ चिनिभ्ममे ॥४६॥
महादेवप्रसदेन तपसा भाविता सती \ अजेफ़पादहिबुंध-पस्त्वष्टा'* रुद्रदच वीग्यवान ॥\४७॥।
हरस्व बहुरूपपच शयम्बकरचापराछित वुवाकपिश्च शम्भुश्च कपदों रंवतस्तथा (४८
सूगन्पाधरच., दर्वेश्च कपाली च द्विनोत्तमा। ""एकदशेते विष्याता रद्ास्त्रिमुवनेश्वरा ५४९
प्रजापति विश्वकर्मा की उत्पत्ति हुई जो हजारों शिल्पों का निर्माता देवताओं का शिल्पी सब आश्रयणों का निर्माता और सर्वश्रेष्ठ शिल्पी हुआ ॥४३॥
उसने देवताओं के सारे विमान बनाये और उस मदा माता की शिल्पविद्या से मनुष्य जीविका उपार्जन करते हैं ॥४५॥
महादेव जी की प्रसन्नता से तप सिद्धा सती सुरभी ने कश्यप से ग्यारह रुद्रों को स्वना कौ ॥४६॥
ब्राह्मणश्रेष्ठो ! अजकपाद अह्निध्य त्वष्टा शक्तिशाली शर हर, वदन श्यम्भक अपराजित वृषाकपि धर्म कय रेवत मुद्गव्याघ्र शवः और कपालः--ये ग्यारह दोनों तीनों लोक के ईश्वर कहलाये ॥४७॥
मुनिवर्य ! इस तरह पुराण में अत्यन्त तेजस्वी एक सौ पचास प्रसिद्ध हुए, जिन्होंने चराचर सहित संसार को व्याप्त किया ॥५०॥
दरान् भृणुष्वं विद्येनाः कश्यपस्य प्रजापतेः । अदिति दिति दनु च एव अरिष्टा सुरसा लसा ॥५१॥
सुरमि धिनता चेद तामरा करोवश्वा इरा। कदु: मुनिश्च भो विप्रास् तास्वपयानि बोधत ॥५२॥
प्रमन्वन्तरे श्रेष्ठा द्वादशासन् सुरोत्तमाः। तुपिता नाम ते अन्योन्यभूचर ववस्वते अन्तरे ॥५३॥
उपस्थिते अति यशस् चाक्षुषस्य अन्तरे मनोः। हितार्थे सर्वलोकानां समागम्य परस्परम् ॥५४॥
भागच्छत दुत देवा अदिति सम्प्रवियय चै। मन्वन्तरे प्रसूयामस् तन् नः श्रेयो भविष्यति ॥५५॥
लोमहर्षण उवाच
एवं भषता तु ते स्वे चाभृषस्य अन्तरे मनोः। मारीचात् कश्यपाञ्जाताः सत् वदियुः दक्षकन्यया ॥५६॥
तत्र विष्णुश्च शङ्करः जज्ञाते पुनरेव हि। अर्यमा चैव धाता च त्वष्टा पूषा तथैव च ॥५७॥
विवस्वान् सविता चैव मित्रो वरुण एव च। अंशो भग रवाः तेजा आदित्या द्वादश स्मृताः ॥५८॥
सप्तविशति याः प्रोक्ताः सोमपल्यो महाश्रताः। तासाम् अपत्यानि अमदन् ष्दीप्तान् धमिततेजसः ॥५९॥
अरिष्टनेमि पत्नोनाम् अपत्यानी हु षोडश। बहुपुश्रस्य विदुषः चतस्रो विद्युतः स्मृता ॥६०॥
चाक्षुषस्य अन्तरे पूर्वे चो ब्रह्मपिः सत्कृताः। एशाश्वस्य च देवपे देवग्रहरणाः स्मृताः ॥६१॥
एते युगसहलान्ते जायन्ते पुनरेव हि। स्वे देवगणाद् चात्र श्रयस् तिश्चतु कामनाः ॥६२॥
तेषाम् अपि च भो विप्रा निरोधोत्पसि रुच्यते। यया सूर्यस्य भगन उदपास्तमयाविहि ॥६३॥
एवं देवनिकायास् ते सम्भवन्ति युगे युगे। उदिश्याः पुतं जके कश्यपाद् इति नः धुतम् ॥६४॥
द्विजश्रेष्ठो ! प्रजापति कश्यप की पत्नियों के नाम सुनिये--अदिति, दिति, दनु, अरिष्टा, सुरा, लसा, सुरभि, विनता, तामरा, त्रीयवदा, इरा, वहु जीर मुनि। विघ्रगण की उनकी सन्तानों के सम्बन्ध में सुन लीजिये ॥५१-५२॥
शूषं मन्वन्तर में पित नामक बारह उत्तम देवता हुए। ये वैवस्वत मन्वन्तर में एक-दूसरे से बहने लगे ॥५३॥
देव पतामो ! चाभू मन्वन्तर भाने पर सब लोगों के कल्याण के लिये परस्पर एवत्र होकर शीघ्र आओ। अदिति में प्रवेश कर मन्वन्तर में हम लोग जन्म लें। इससे हमारा कल्याण होगा ॥५४-५५॥
लोमहर्षण बोले--ये एव इस तरह बह
हुईं। देवापि कराय से देवप्रहरण नामक गण उलघ्र हुए रशा ये देवगण हजार पुमो के अस्त में फिर जस्म ग्रहण करत हैं। इनम दती बाम से उस्न होते ६।।६२॥
ब्राहमणो ! उनकी भी उत्यत्ति सौर लय होता है। चे भगाय मं मूं का उदय भीर मस्व होता है, उसी तरह देव-पमूह युग-युग में होते हैं। इंदेटें॥ हमने सुना है कि ग॒ रप्तानामतित०। रक. वैवूता। य, न्वा परत्यद्धिद्यवाः श्रेष्ठा ऋ०। अद परवभूमवा ीतिष०। पक. ण्मने विवह्। ख. नमने ष्ट्। ६. दिव्या।
हिर्यकश्षपुश्चेव हिरण्याक्षश्च वोरग्यवान् । सिहिका चाभवत् कन्या विप्रचित्तेः परिग्रहः ॥६५॥
सेहिकेया इति स्याता यश्य; पुत्रा महावलाः। हिरण्यकशिपोः पुवाइचत्वारः प्रथितौजस: ॥६६॥
हेषवश्च अनुह्लादइच प्रद्लादइचेव वोर्य्यंदानु। संह्लादइच चतूर्थोऽमूद्हादपु्रो हृदस्तया ॥६७॥
हरस्य पुत्रौ, हौ वीरौ शिव: कालस्तर्थव च। विरोचनस्तु प्राह्लादि्बलिजंशे विरोचनात् १६८१
वेः पुतं ह्वासीदुबाणस्येष्ठ॑ तपोधनाः । घृतराष्ट्रच सूरयश्च चनदमारचनदतापनः ।॥६९॥
कुम्भनाभो 'गदुर्दभाझ्षः ुक्षिरित्पेवमादयः। बाणरतेषामतिबलो उयेष्ठः पशुपतें: भियः ॥७०॥
पुरा कल्पे तु वाणेन प्रसाद्योमापतिं प्रभुम्। पा््वतो विहरिष्यामि द्येवं याचितौ षरः ॥७१॥
प्हिरप्याक्षसुताश्चेव विद्वांसश्च महाबलाः। म्भर्भरः शकुनिश्चैव भूतसन्तापनसतया ॥७२॥
पु ह! भू
महानाभइच विक्रान्तः कासनाभिस्तर्थव च। अभवन् दमुपुत्राइच इतं तीव्रपराक्रमाः ॥७३॥
तपस्विनो महाधीर्य्या: प्राधाम्येन ब्रवीमि तान् । ट्िंमू्ा झंकुकर्णश्च तथा 'हुयशिरा विभुः ॥७४॥
अयोमुख: शाम्बरइच कपिलो वाभनस्तथा । मारीचिर्मघर्वादच॑व इत्वलः स्वसुमरतया ॥१७५॥
विक्षोभणइच केतुश्च केतुवीष्यंशतह्वदौ । इन्द्रनित्सर््यजिच्चैव वज्नाभस्तयैव च ॥७६॥
एकचक्रो भमहावाहूस्तारयंश्च महाबसः। वैदवानरः पुलोमा च विद्वावणसहाशिरा: ॥७७॥
स्वर्भानुवृंपपर्ववा च विप्रचित्तिश्च वीय्यवान् ! सव्वं एते दनोः पुत्राः कदयपादसिजज्िरे ॥७८॥
कश्यप से दिति मे दो शषितशाली पुपर टए--दिरण्यवशि् और हिरण्याक्ष । । तथा सिका नाम की कन्या उत्पन हई, जो विप्रचित्त कय स्याही गई, आर जिसके महाय पु सैहिकेय (राहु) गण दे नाम से प्रत्तिद हुए ६४.६५१
दिस्प्िषु क महतिजघ्लो चार पुन--ह्लाद, अनुह्लाद, परात्रमी प्रह्माद भौर चौथा सहाद हुए । उसी तरदं छार वा पुत्र हद हुआ ॥६६-६३॥
हदवे" दो वीर पुत्र हुए--शिव और काल। प्रह्माद का धुन विरोचत हुआ ! विरोचने स वलि नामक पून उत्थन हु भा ।।६८॥
मुनिवृन्द । बलि के धृतराष्ट्र, सू, चन्द्रमा, चच्तापन, कुम्मनाम, गरदमाक्ष, कुक्षि दत्मादि नाम से विष्यात सौ पुर हुए॥६९३॥
उन सव मे जयेष्ठ वाथ अत्यन्त बलवान ओर शिव वा प्रिय पावर था ॥७०॥
पहले कल्प म वाण > उमापति मगवान् सिव को प्रसपन कर मैं (भवे पाम ही विहार क" ऐसा वरदान उनमे मागा ॥७१॥
हिरण्यक के पुन मर्भेर, शुनि, सूतसतापन, महानाग, विग्न्त और कालना बड़े बत्वान् और विद्वान हए ॥८२२॥
दनु के अप्यन्त पराक्रमी, तपस्वी अर महाशक्तिशाली सौ पुन ॥
उनम से प
तृतीयोऽध्यायः
विप्रचित्तिप्रधानास्ते दानवाः सुमहाबलाः। एतेषां पुत्रपोत्रांतु न तच्छक्यं द्विजोत्तमाः ॥७९॥
भरसंस्थातुं वहुत्वाच्च पुनः पीत्रमनन्तकम्। स्वर्भानोस्तु प्रभा कन्या पुलोम्नस्तु शची सुता ॥८०॥
षड्पदोत्तरयक्षिराः दार्मित्ठा चार्पपद्वणी। पुलोमा कालिका चैव दैत्यानरसुते उभे ॥८१॥
तयोः पत्नीये महापत्नीये मरीचेस्तु परिग्रहः। तयोः प्रभुत्राणि षष्टिर्दानिवनन्दनाः ॥८२॥
चतुर्दशषतानन्दान् हिरण्यपुरवासिनः। सारीचिर्जनयामास महता तपसान्वितः ॥८३॥
पौलोमा कालकेयाश्च दानवास्ते महच्छलाः। अवध्या देवतानां हि हिरण्यपुरवासिनः ॥८४॥
पितामहप्रसादेन मे हिताः सव्यसाचिना। ततोऽपरे महावीर्या दानवारत्वतिदारणाः ॥८५॥
सिहिकायामथोत्पन्ना विप्रचित्तेः सुतास्तया। दैत्यदानवसंयोगरारलातार्तोयपराक्रमाः ॥८६॥
व्सिहिकेया इति स्यातास्तरयोद्दा महाबलाः। वंशः शत्यहच दलिनी नरश्चैव तयाबलः ॥८७॥
ष्वातापिः सुचिदचैव दत्वलः स्वसृमस्तथा। अल्जिको नरकश्चैव कालनाभरतयेव च ॥८८॥
प्रमानस्तया चैव स्वरणतपंच वीर्यं वान्। एते चे दानवाः श्रेष्ठा दनोवंशविवर्धनाः ॥८९॥
तेषां पुत्राच पोत्रादच प्रतशोऽष्य सहलदः। संहारस्य तु दैत्यस्य निवातकवचा रुते ॥९०॥
समुत्पन्नाः सुभहता तपसा भावितात्मनः। तिक कोट सुतास्ते संणिवर्पां निवातिनः ॥९१॥
अवध्यास्तेऽपि देवानामञ्जुनेन निपातिताः। पट्सुताः सूमहाभागार्ता्ायाः परिकीत्तिता ॥९२॥
द्विजवर! धटूठ और अनन्त होने वे करण नदे पु्-मीप्रः को नही पिना सक्ता हूं॥९३॥ स्वरमनु वी कल्पा परम्म हुई। पुरोमा की सनी हुई। उपदानवी हयशिरा की और छमिष्टा दूषपर्वा की (कन्या) है। वैद्वानर की पुलोमा और कालिका--ये दो दन्यायें बहुत-सी सतान वाली हुईं। उनका विवाह मरीचि से हुआ। उनसे हजार दानव पुत्र उत्पन्न हुए। महान् तपस्वी मरीचि ने दूसरे चौदह सौ हिरण्यपुरवासी दानवों को उत्पन्न किया। वे हिरण्यपुरवासी महाबलवान दानव पौलोमा और कालकेया नाम से ज्ञात हुए, जो ब्रह्मा की तपस्या से देवताओं के अवध्य (न मारने योग्य) होते हुए भी अर्जुन से मारे गये थे। उन्होंने अतिदुर्लभ और महादैत्यशाली भवेद्य दानव विप्रचित्ति से विवाह में उत्पन्न हुए। विप्रचित्ति के तेरह पुत्र और भी हुए जो योग और दानव संयोग से बड़े पराक्रमी और तदल नाम से प्रसिद्ध हुए। उनके नाम थे--हैं। बड़ी बंद और दाय, नल, दल, दातापि, नमुचि, द्वच, स्वगु म, अलिक, नरक, वाल्ताम, सरमान और शिन। ये सब दानव दनु ने बंध को यदासे वाले हुए। उन्हें सैवड़ी और हजारों पुत्र और पौत्र हुए। स्कार नामक दैत्य के जन्म में निवातकवच नामक बड़े तपावी पुत्रगण उत्पन्न हुए। उन्होंने नशिवती में निवास करने वाले तीन करोड़ पुत्र उत्पन्न किए। ये भी देवताओं से न मारने योग्य हुए और अर्जुन द्वारा मारे गये।
क्रौञ्ची इयेनी च भासो चसूप्रोवो शुचिगृधिका। क्रौज्ची तु जनयामास उसूकमत्यदृककान् ॥९३॥
इयेनी इयेतांस्तया भासौ भासानुगुघादच गृध्यापि। शुचिरोदकानूपक्षिगणान्सुप्रीवी तु दवजेोत्तमाः ॥९४॥
अदवानुष्टरान् गद्देभांइच ताम्मावंश्ञः प्रको्तित। प्विनतापास्तु हो पुत्रौ विख्यातौ गरुडारणी ॥९५॥
शण्डः पततां ष्ठो दाच्णः स्वेन कम्मंणा। सुरसायाः सहलन्तु सरपणिाममितोजसाम् ॥९६॥
अनेकशिरसां विप्राः खचराणां महात्मनाम्। कप्रदेयास्तु बलितः सहसममितौजस: ॥९७॥
सुपणेवदगा नागा जरिरे नैकमस्तकाः। येषां प्रधानाः सततं शेषवा कितक्षका ॥९८॥
एरावतो महापद्मः कम्बलाश्वतरादुभौ। एलापनेश्च शवद्धदच कर्कोडिकघनऊजयों ॥९९॥
महानीलमहाकर्ण श्ृतरषष्टवलाहको। कुहरः पुष्पदंप्ट्रश्च दुर्म्मुखः सुमुखस्तथा ॥१००॥
शद्धश्च शद्धपालस्च कपिलो वामनस्तथा। नहुषः श्धरोमा च मणिरित्येवमादयः ॥१०१॥
तेषा पुत्राइच पौत्नाद्च शतशोध्य सहुख्रदा:। चतुर्दशसहस्राणि करूराणामनिारिनाम् ॥१०२॥
गणं रोधं विप्रास्तस्य सर्व्वे च द॑ष्ट्रिणः। स्यलजाः पक्षिणोऽब्जादच धरायाः प्रसवा स्मृताः ॥१०३॥
मास्तु वे जनयामास सुरसिर्महिपीस्तथा। इरा वृक्षलता बत्तीस्तृणजाती इच सर्वेश ॥१०४॥
खसा तु यक्षरक्षासि मुनिरप्सरसस्तथा। अरिष्टा तु महासिद्धा गंधर्व्वानमितौजसः ॥१०५॥
तान्ना के छह भाग्यशालिनी कन्याय हुई ॥९१-९२॥ मौरी, दयेनी, भासी, सुग्रीवी, शचि और गुध्िका। ज्ञाह्मण-सशिरौमणि! तरयो मे उदव (उन्स् पको) और प्रत्यदूकका को, श्येनौ मे श्येनो (वाजो) को, मासी ने मासो को, गृघ्नी न गिड़ों को, सुधि नजलपक्षियोको और सुग्रीवी ने धोडो, ऊँटो और गधो को उत्पस्र किया। यह् ताग्ना-
वे कहलाया ॥९३-९४॥ विनता क दो प्रसिद्ध दुन हुए--गरुड और भस्म ॥९५॥ पक्षियों में शष्ट यरुड अपन कम से मयकर हुआ। द्रिजवन्द ! सुरसा से अध्यन्ते तेजस्वी, आकाशचारी, मनस्वी और अनक फन वाले हजार साँप हुए। क्के महषर शक्तिशाली किन्तु मन्द के अधीनस्थ और अनक शिरवाले नाग हए, जिनमें सदा शेप, वसुक्र और तक्षव प्रधान रै ॥९६-९८॥ ऐ रावत, महापद्म, कम्बल, अश्वतर, एठापन्र, शल, कर्कोटक, घनजय, महानील, महाकर्ण, धृत राष्ट्र, बलाहक, कुहर पुष्परष्ट्र दुमुख, सुमुख, शस, झखपाल, कपिल, वामन, नप, झसरोमा,
मणि इन्यादि नागो के गाम है॥९९-१०१॥ उनके सैकड़ों हजारों पुन्न-पीभ हुए। ह्विजगण ! उन करर साँपी की सध्या चौदह हजार थी॥१०२॥ वे सब परोधो और बड़े नटे दांतों वाले थे। जल और स्थल में उत्पन्न पक्षी पृथिवो की सताने मानमये हैं ॥१०३॥ सुरभि ने गायो जर मैसो का उत्पन किया। इ रान वृक्षो, लठाओ कौर सपूर्ण तृण जाति को उप्पस किया ॥१०४॥ खसा से यक्ष बौर राक्षसो बी एवम मुनि से गप्लरा की उत्पत्ति हुई। महासिद्ध अस्प्टा ने अव्यन्त तेजस्वी गन्वर्वों का उत्पस क्या ॥१०५॥ ये स्थावर भौर जगम कद्यपजी के वश्ज कहरात है, जिनवा
१ख ऋची। २ख ऋची। ३ गे ०कचीं क्रौञ्चानजनयदुू०॥ ४ ख ग॒ ०वशा भ्र०। ५ सग र्ता। वि०। इक ख ०यारच पुत्री द्ावरण! गहडस्तथा। ७ ख ग़ सुपर्ण का प्ट्रमहाबली। बु०। ९ख न्लो मानसस्त०। १० व. ०थणि सर्पाणा०। ११ गे. ०ट्रपास्त०। १२ क शश शरमा य०॥ १३ ष.त महासत्त्ता।
२० तृतीयोऽध्याय
स च तस्मै वरं प्रादात् प्रार्थितः सुमहातपा । दत्वा च परमं ब्रह्मो नारोच समभापत ॥११२॥
इं पुमो निहन्ता ते सभे षै शरदो क्तम् । दि धारयसे झोचतत्परा म्रतसास्यिता ॥११३॥
तमेयभिहितो भरता या देव्या महातपाः । धारयामास गमं तु शुचि, सा मुनिसत्तमाः ॥११४॥
ततोऽप्युपागमदत्यां गर्भमाधाय कश्यपः । रोधयन् वे गण घेध्ठं देवानाममितौजसम् ॥११५॥
तेजः संहत्य दुर्धपं मवध्यमभरेरपि । जयाम पर्वतायैव तपसे सदितेप्रता ॥११६॥
तस्पाइचेवार्तरप्रेप्सुरम वत् पाकशासनः । जाते चर्षशते चास्या ददर्शान्तरमध्युतः ॥११७॥
अदत्वा पादयोः श्रौचं दितिः शयनमाविशत् । निद्रां चाहारयामास तरयां कु्ि प्रविदय सं॥११८॥
वद्यपाभिस्ततो गर्भ सप्ता तं भ्यङृन्तयत् । स पाट्यमानों गर्भोश्य वद्धे प्रररोद हु ॥११९॥
सैकडोन्हटजारों पुष्र्यीश्र हैं॥ १०६ इ्िंजगण ! स्वारोचिप नामव मवन्तद भे यह सुप्टि हुई। अव बैवरवत नाभक अन्यन्ते महान् मख्वत्तर में वरुण वे. विस्तृत यञ म आटूि देते हुए प्रह्माजी की प्रजा-मूध्टि वें" वारे में हैं बहा ॥१०७॥ ब्रह्य न पट सात महपियों की सादसी सृष्टि वी थी ॥१०८॥ द्िजदून्द । देव-दानव-मुझ में अपने देत्प-पुष ने सर जाने पर दिवि ने अदयप को गतुष्ट किया १०९३१ दिति हारा साम्पूजित प्रष ऋषि शदयप में उसगे वर माँगने दें लिए बहा। जय उने के वध के लिये अत्यन्त नेजरवी समर्थ पुत्र वो वर दान रुप में माँगा नो उस महान् सपम्वो मे उसे अदीष्ट वरदान दे दिया। वर देसें के बाद अति उप्र होकर बर्पप में दिति मे वहा-नाई सर रा तुम्हारा पुर इस्द्र हस्ता होगा, यदि तुम पववत बस परते हुए रो वर्षों तह गर्म पारण मगा ॥ह१३॥
मुनिशेष्ठ ! उस देवी मे गटन् तपस्य स्वामी से ऐसा हो गहेंगी बहार पदियताूदंद शमं पारण दिया ॥ १ टव दम अयन्त तरस्वी और श्रेष्ट देवसमूह को रोफते हुए देवता ते भी अवप्य अपने उप्ट तेज को दिति हे गमं मे रथागित वपे तपस्या थे लिये पर्वत पर चकते गवे ॥ ११५ ११६॥
न्ट दिजि के गम से प्रदेश करने था अवरार साकने रगा। सौथयंया जे परहस्द को अवसर मिला 30 (एक दिन) दिलि पिन पर थोये गया पर जाइ्र सा गई। हाथ मे वय लिए हुए इस्ट में उठने पेड़ मे पैंद गर (वसा से) उस गम के दात दुबई कर दिये 0८0 यद्यनो हिप जाते दाया गर्म {ह्यन ११. ध्य रथ एव दद शद ष सपना ५ ५ हो थे विरावा) ६ सं ग्य ण बरीयसामत। € ष स्पायमापाद ग्मेनायाय दारय। सेल ९ के ण्ट । त०। १० गु एना ।43.। (4)