अध्याय 8 : देवताओं, असुरों और प्रजाओं की उत्पत्ति
देव, असुर और प्रजाओं की उत्पत्ति का रहस्य
नैमिषारण्य के ऋषियों ने सूत जी से पूछा – “हे ज्ञाननिधे! आपने ब्रह्मा के मानस पुत्रों तथा प्रजापतियों की कथा सुनायी। अब हमें यह बताइए कि देवता, दानव, पितर, गन्धर्व और मनुष्य आदि विविध योनियों की उत्पत्ति किस प्रकार हुई? उनके रूप, गुण और कर्म क्या हैं?” सूत जी ने प्रसन्न होकर कहा – “यह प्रश्न अत्यन्त गूढ़ है। ब्रह्मा जी ने जब सृष्टि का विस्तार करने का संकल्प लिया तो सर्वप्रथम उन्होंने अपने शरीर के विभिन्न अंगों से प्राणियों की रचना की।”
मुख से देवताओं की सृष्टि
सूत जी बोले – “जब ब्रह्मा जी ने देखा कि सृष्टि नीरस है, तब उन्होंने सर्वप्रथम अपने मुख से देवताओं को उत्पन्न किया। वे देवता सात्विक स्वभाव के, तेजस्वी और धर्मपरायण थे। उनका आवास स्वर्गलोक में नियत किया गया और उन्हें यज्ञभाग प्राप्त करने का अधिकार दिया गया। इन्द्र, अग्नि, वरुण, वायु, सूर्य, चन्द्र, यम, कुबेर आदि ये सभी देवता सृष्टि के आरम्भ में प्रकट हुए। उनका कार्य सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का पालन करना तथा धर्म की रक्षा करना निश्चित किया गया।”
मुखतो देवताः सृष्टाः सर्वे सात्त्विकरूपिणः ।
यज्ञभागभुजः स्वर्गे स्थापिता लोकपालकाः ॥
जंघा से असुरों का जन्म
इसके पश्चात ब्रह्मा जी ने अपनी जंघाओं से असुरों को उत्पन्न किया। वे विशाल शरीर, महान बल तथा तामसी प्रवृत्ति के थे। उत्पन्न होते ही वे अहंकार से भरकर ब्रह्मा जी पर आक्रमण करने को उद्यत हुए। ब्रह्मा जी ने उनके इस दुस्साहस को देखकर कहा – “तुम लोगों का स्वभाव ही युद्ध और संघर्ष का होगा। तुम सदा देवताओं से स्पर्धा करोगे और अधर्म के मार्ग पर चलोगे।” यही कारण है कि असुर और देवताओं में अनादि काल से वैर चला आ रहा है।
जङ्घाभ्यामसुरान् सृष्ट्वा तामसान् बलदर्पितान् ।
देवानामेव सततं विरोधे विनियोजितान् ॥
हृदय से पितर और शरीर से मनुष्यों की उत्पत्ति
तत्पश्चात ब्रह्मा जी ने अपने हृदय से पितरों की रचना की। पितर सूक्ष्म शरीरधारी, ज्ञानवृद्ध और मोक्षमार्ग के अधिकारी हुए। उनका स्थान पितृलोक नियत किया गया और श्राद्ध-तर्पण के माध्यम से वे अपने वंशजों को आशीर्वाद प्रदान करने लगे। इसके बाद ब्रह्मा जी ने अपने सम्पूर्ण शरीर के तेज से मनुष्यों की उत्पत्ति की। मनुष्यों में तीनों गुणों – सत्व, रज और तम – का मिश्रण रखा गया ताकि वे अपने कर्मों के अनुसार उन्नति या अवनति कर सकें।
मन की तरंगों से अन्य प्राणियों की सृष्टि
ब्रह्मा जी ने अपने मन से गन्धर्वों को उत्पन्न किया, जो संगीत और गायन-कला में निपुण हुए। अपनी हँसी से यक्षों की रचना की, जिनका कार्य धन की रक्षा करना रहा। निद्रा से राक्षसों और पिशाचों को उत्पन्न किया, जो रात्रि में विचरण करने वाले तथा मांसाहारी हुए। अपनी इन्द्रियों की विभिन्न वृत्तियों से उन्होंने पशु, पक्षी, कीट-पतंग, जलचर, सरीसृप तथा वृक्ष-लताओं की रचना की। इस प्रकार तीनों लोक विविध प्राणियों से भर गए।
मनसा गन्धर्वान् हास्याद्यक्षान् प्रजज्ञिरे ।
निद्राया राक्षसांश्चैव तिर्यञ्चः करणैः स्मृताः ॥
प्रजापतियों द्वारा सृष्टि-विस्तार और फलश्रुति
ब्रह्मा जी ने मरिचि, अत्रि, अंगिरा आदि प्रजापतियों को आज्ञा दी कि वे इस सृष्टि को आगे बढ़ाएँ। उन प्रजापतियों ने अपनी पत्नियों के माध्यम से देवगण, दानव, नाग, पक्षी और समस्त जीव-जन्तुओं की असंख्य शाखाएँ उत्पन्न कीं। जो मनुष्य इस दिव्य उत्पत्ति-कथा का श्रवण करता है, वह अज्ञानरूपी अन्धकार से मुक्त हो जाता है और उसे सब प्राणियों में समत्व का ज्ञान प्राप्त होता है।”
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे अष्टमोऽध्यायः समाप्तः ॥