अध्याय 2 : प्रलय और सर्ग का विस्तार
प्रलय और सर्ग का विस्तार
प्रथम अध्याय में मंगलाचरण और सृष्टि के आरम्भिक स्वरूप का संक्षिप्त वर्णन किया गया। अब सूत जी ऋषियों के आग्रह पर प्रलय और सर्ग (पुनः सृष्टि) के विस्तृत रहस्य को खोलते हैं।
त्रिविध प्रलय का वर्णन
सूत जी बोले – “हे महर्षियो! ब्रह्माण्ड में तीन प्रकार के प्रलय होते हैं – नित्य प्रलय, नैमित्तिक प्रलय और प्राकृतिक प्रलय।”
नित्य प्रलय प्रतिदिन घटित होता है। जब प्राणी सोता है, उसके लिए जगत का लय हो जाता है। यह नित्य है।
नैमित्तिक प्रलय ब्रह्मा के एक दिन (कल्प) की समाप्ति पर आती है। तब सम्पूर्ण त्रिलोकी जल में डूब जाती है और ब्रह्मा की रात्रि आरम्भ होती है।
यदा स दिवसो याति ब्रह्मणः परमेष्ठिनः ।
तदा सर्वाणि भूतानि संहरन्ति यथाक्रमम् ॥
सर्वप्रथम सूर्य का ताप सात गुना बढ़ जाता है। पृथ्वी सूखकर काँच के समान हो जाती है। फिर मेघों की भयानक वर्षा से सम्पूर्ण धरती जलमग्न हो जाती है। अन्ततः भगवान संकर्षण के मुख से निकली कालाग्नि से तीनों लोक भस्म हो जाते हैं।
प्राकृतिक प्रलय – महाप्रलय
जब ब्रह्मा की पूर्ण आयु (100 दिव्य वर्ष) समाप्त होती है, तब प्राकृतिक प्रलय होता है। इसमें पंचमहाभूत भी प्रकृति में लीन हो जाते हैं। पहले पृथ्वी जल में, जल अग्नि में, अग्नि वायु में, वायु आकाश में और आकाश अहंकार में विलीन होता है। अहंकार महत् तत्त्व में और महत् तत्त्व प्रकृति में लीन हो जाता है। अन्ततः केवल अव्यक्त ब्रह्म ही शेष रहता है।
पुनः सर्ग (सृष्टि) का आरम्भ
प्रलय के बाद जब भगवान नारायण की इच्छा से सृष्टि का समय आता है, तब वे प्रकृति और पुरुष के संयोग से पुनः सृष्टि करते हैं। ब्रह्मा पुनः प्रकट होते हैं और सातों लोकों, देवताओं, असुरों और मनुष्यों की रचना करते हैं।
सप्तलोक और पाताल
सूत जी ने बताया – ऊपर सात लोक हैं – भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः और सत्य लोक। नीचे सात पाताल लोक हैं – अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल। इन लोकों में असंख्य जीव निवास करते हैं। ब्रह्मा का निवास सत्यलोक में है, विष्णु का क्षीरसागर में, और शिव का कैलाश पर्वत पर।
समुद्र और द्वीप
सृष्टि-रचना में सात महाद्वीप – जम्बू, प्लक्ष, शाल्मल, कुश, क्रौंच, शाक और पुष्कर – और सात समुद्र – लवण, इक्षुरस, सुरा, घृत, दधि, दुग्ध और शुद्ध जल के समुद्र बनाए गए। जम्बूद्वीप के मध्य में सुमेरु पर्वत स्थित है।
जम्बूद्वीपः समस्तानां द्वीपानां मध्यतः स्थितः ।
तत्रापि मेरुर्भगवान् काञ्चनो विश्वरूपवान् ॥
सर्ग के चार भेद
ब्रह्मा जी ने नौ प्रकार की सृष्टि की, जिन्हें तीन मुख्य सर्गों में बाँटा गया – प्राकृत सर्ग (महत् तत्त्व, अहंकार, तन्मात्राएँ), वैकृत सर्ग (स्थावर, तिर्यक्, मानुष, देव आदि) और कौमार सर्ग (सनकादि का उद्भव)।
अध्याय की फलश्रुति
सूत जी बोले – “जो मनुष्य इस प्रलय और सर्ग के रहस्य को जान लेता है, वह मोह-माया से मुक्त होकर परब्रह्म को प्राप्त करता है। यह ज्ञान समस्त पापों का नाश करने वाला है।”
प्रलयं सर्गमेवं च यो जानाति नरोत्तमः ।
स मुक्तः सर्वपापेभ्यः प्राप्नोति परमां गतिम् ॥
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे द्वितीयोऽध्यायः समाप्तः ॥