अध्याय 28 : पितरों के गण और श्राद्ध-कल्प
पितरों के विविध गण और श्राद्ध-कल्प का विधान
ऋषियों ने सूत जी से प्रश्न किया – “हे सूत जी! आपने सृष्टि-उत्पत्ति में पितरों का उल्लेख किया था। पितर कौन हैं? इनके कितने गण और भेद हैं? श्राद्ध-कर्म किस प्रकार करना चाहिए? किन-किन तिथियों में श्राद्ध करने से पितरों को तृप्ति मिलती है? और श्राद्ध का महत्त्व क्या है? कृपया पितरों और श्राद्ध-कल्प का विस्तार से वर्णन कीजिए।” सूत जी ने कहा – “पितर हमारे पूर्वज हैं, जो हमें आशीर्वाद देते हैं। इनका ऋण चुकाने के लिए श्राद्ध-कर्म आवश्यक है। यह गृहस्थ-धर्म का अनिवार्य अंग है।”
पितरों के सात प्रमुख गण
ब्रह्मा जी ने सृष्टि के आरम्भ में पितरों को उत्पन्न किया। पितरों के सात प्रमुख गण हैं – अग्निष्वात्त, बर्हिषद, आज्यप, सोमप, रश्मिप, उपहूत और आयन्तुन। अग्निष्वात्त पितर देवताओं के भी पूज्य हैं और ये अग्नि-हव्य ग्रहण करते हैं। बर्हिषद पितर कुशा पर बैठकर हव्य स्वीकार करते हैं। आज्यप पितर घृत-प्रिय हैं और सोमप पितर सोमरस से तृप्त होते हैं। ये सब पितृगण पितृलोक में निवास करते हैं और यमराज के अधीन हैं। इनकी आज्ञा से ही मनुष्यों को सन्तान, धन और आरोग्य प्राप्त होता है।
अग्निष्वात्ता बर्हिषद आज्यपाः सोमपास्तथा ।
रश्मिपा उपहूताश्च आयन्तुन इति स्मृताः ।।
सप्त पितृगणा ह्येते सर्वेषां पितरः स्मृताः ।
तेषां श्राद्धेन तृप्यन्ति मानवाः पितृभक्तितः ॥
श्राद्ध-कल्प का विधान
श्राद्ध तीन प्रकार का होता है – नित्य, नैमित्तिक और काम्य। प्रतिदिन तर्पण करना नित्य श्राद्ध है। अमावस्या, पितृपक्ष आदि पर किया गया श्राद्ध नैमित्तिक है। किसी विशेष इच्छा से किया गया श्राद्ध काम्य कहलाता है। श्राद्ध के लिए अमावस्या, अष्टका, अन्वष्टका, पूर्णिमा और संक्रान्ति तिथियाँ सर्वोत्तम हैं। पितृपक्ष के सोलह दिनों में किया गया श्राद्ध अक्षय फल देता है। श्राद्ध में पिण्डदान, ब्राह्मण-भोजन और तर्पण का विशेष महत्त्व है। श्रद्धापूर्वक किया गया अन्न-जल का दान पितरों को वर्षों तक तृप्त रखता है।
श्राद्ध का फल और पितरों की प्रसन्नता
सूत जी बोले – “जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक पितरों का तर्पण और श्राद्ध करता है, उसके पितर प्रसन्न होकर उसे दीर्घायु, पुत्र, धन और स्वर्ग प्रदान करते हैं। श्राद्ध करने वाला मनुष्य पितृ-ऋण से मुक्त हो जाता है। इसके विपरीत जो श्राद्ध नहीं करता, उसके पितर निराश होकर शाप देते हैं, जिससे उसका वंश नष्ट हो जाता है।”
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे अष्टाविंशोऽध्यायः समाप्तः ॥