अध्याय 32 : प्रयाग तीर्थ का माहात्म्य
प्रयागराज का अद्वितीय माहात्म्य
ऋषियों ने सूत जी से पूछा – “हे सूत जी! आपने तीर्थों की चर्चा में प्रयाग को तीर्थराज कहा है। हमने सुना है कि प्रयाग में गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम है। इस तीर्थ का ऐसा क्या विशेष माहात्म्य है? यहाँ स्नान, दान और तप का क्या फल है? कृपया हमें प्रयाग तीर्थ का विस्तृत माहात्म्य सुनाइए।” सूत जी ने कहा – “प्रयाग सम्पूर्ण तीर्थों का राजा है। यहाँ का कण-कण मोक्षदायी है। ब्रह्मा जी ने स्वयं इस तीर्थ की रचना की थी। यहाँ का स्मरण मात्र करने से पाप नष्ट हो जाते हैं।”
प्रयाग का भौगोलिक और आध्यात्मिक स्वरूप
प्रयाग गंगा, यमुना और अन्तर्वाहिनी सरस्वती के संगम पर स्थित है। यह स्थान साक्षात भगवान विष्णु का मस्तक माना जाता है। यहाँ पाँच कूप हैं, जिनका जल पवित्र है। प्रयाग का क्षेत्र पाँच योजन विस्तृत है और इसका हर कोना देवताओं का वास-स्थान है। माघ मास में यहाँ स्नान करने का विशेष महत्त्व है। माघ-स्नान करने वाला मनुष्य सीधे स्वर्गलोक जाता है। यहाँ अक्षयवट नामक एक प्राचीन वट-वृक्ष है, जिस पर बैठकर भगवान राम ने सीता-खोज के लिए प्रार्थना की थी।
प्रयागं सर्वतीर्थानां राजानं परमाद्भुतम् ।
गङ्गायमुनयोर्मध्ये सरस्वत्याश्च संगमे ।।
अक्षय्यवटमूलं तु विष्णोः स्थानं सनातनम् ।
तत्र स्नानेन दानेन सर्वं भवति चाक्षयम् ॥
प्रयाग में स्नान, दान और श्राद्ध का फल
प्रयाग में स्नान करने से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। यहाँ जो कुछ भी दान किया जाता है, वह करोड़ गुना होकर मिलता है। प्रयाग में पिण्डदान करने से पितरों को अक्षय तृप्ति प्राप्त होती है और वे मोक्ष को प्राप्त होते हैं। कहा गया है कि प्रयाग में प्राण त्यागने वाला मनुष्य पुनर्जन्म नहीं पाता और सीधे विष्णुलोक जाता है। यहाँ तप करने वाले ऋषि-मुनियों को सिद्धियाँ प्राप्त हुई हैं।
प्रयाग-माहात्म्य श्रवण का फल
सूत जी ने कहा – “जो मनुष्य इस प्रयाग-माहात्म्य का पाठ या श्रवण करता है, उसे प्रयाग-स्नान का फल मिलता है और वह जन्म-जन्मान्तर के पापों से मुक्त हो जाता है।”
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे द्वात्रिंशोऽध्यायः समाप्तः ॥