अध्याय 15 : किंपुरुष आदि वर्षों का वर्णन
भारतवर्ष से परे के दिव्य वर्ष
ऋषियों ने अत्यन्त विनम्र भाव से पूछा – “हे सूत जी! भारतवर्ष के वर्णन ने हमारा हृदय आनन्दित कर दिया। अब हम शेष आठ वर्षों के विषय में सुनना चाहते हैं। किंपुरुषवर्ष, हरिवर्ष, इलावृतवर्ष, कुरुवर्ष, भद्राश्ववर्ष, केतुमालवर्ष, हिरण्मयवर्ष और रम्यकवर्ष – ये भोगभूमियाँ कैसी हैं? वहाँ के निवासी कैसे हैं? वहाँ का जीवन किस प्रकार व्यतीत होता है?” सूत जी ने कहा – “ये सभी वर्ष स्वर्ग के समान सुखद हैं। यहाँ के निवासी पुण्यवान आत्माएँ हैं, जो अपने शुभ कर्मों के बल पर यहाँ जन्म लेते हैं।”
किंपुरुष और हरिवर्ष का सौन्दर्य
किंपुरुषवर्ष हिमालय और हेमकूट के बीच स्थित है। यहाँ किन्नर और किंपुरुष नामक दिव्य प्राणी निवास करते हैं, जो अत्यन्त सुन्दर और संगीतप्रिय हैं। यहाँ का प्रमुख वृक्ष प्लक्ष है। इस वर्ष में मनुष्य दस हजार वर्ष तक जीवित रहते हैं और सदा युवावस्था में रहते हैं। हरिवर्ष निषध और हेमकूट के बीच है। यहाँ के निवासी श्यामवर्ण और बलिष्ठ हैं। यहाँ इक्षु नामक वृक्ष की अधिकता है। हरिवर्ष में भगवान विष्णु की आराधना की जाती है।
किंपुरुषे तु किन्नर्यः पुरुषाश्चारुदर्शनाः ।
हरिवर्षे तु पुरुषा विष्णुध्यानपरायणाः ॥
इलावृतवर्ष का दिव्य वैभव
इलावृतवर्ष सुमेरु पर्वत के चारों ओर स्थित है। यह सब वर्षों का मध्य और सबसे पवित्र है। यहाँ स्वयं भगवान शंकर निवास करते हैं और उमा सहित उनकी आराधना होती है। इस वर्ष में सूर्य उदय नहीं होता, क्योंकि सुमेरु के प्रभामण्डल से ही यह सदा प्रकाशित रहता है। यहाँ के निवासी देवताओं के समान दीर्घायु होते हैं और स्त्रियाँ अप्सराओं के समान सुन्दर होती हैं। यहाँ के वृक्ष सदा फल-फूलों से लदे रहते हैं।
कुरु, भद्राश्व और केतुमाल का वर्णन
उत्तरकुरु वर्ष शृंगवान पर्वत के उत्तर में स्थित है। यहाँ के निवासी निष्पाप और सुखी हैं। यहाँ स्त्री-पुरुष सदा प्रसन्न रहते हैं और कोई रोग-शोक नहीं है। भद्राश्ववर्ष पूर्व में है, जहाँ का मुख्य वृक्ष माक्षिक (शहद देने वाला) है। केतुमालवर्ष पश्चिम में है, जो अपनी अप्सराओं और सुन्दर उद्यानों के लिए प्रसिद्ध है। हिरण्मयवर्ष में हेम नदी बहती है, जो स्वर्ण उत्पन्न करती है। रम्यकवर्ष में नील पर्वत से अनेक सरिताएँ बहती हैं।
इलावृते तु भगवानास्ते शूलभृदीश्वरः ।
कुरुष्वथ महाभोगो भद्राश्वे च सुखं परम् ॥
वर्ष-वर्णन का माहात्म्य
सूत जी बोले – “हे ऋषियो! ये सभी वर्ष उन पुण्यात्माओं के लिए हैं, जिन्होंने भारतवर्ष में कठोर तप और शुभ कर्म किये हैं। यहाँ कोई कर्म नहीं करना पड़ता, केवल पूर्व-संचित पुण्यों का उपभोग होता है। किन्तु जो साधक मोक्ष चाहता है, उसके लिए भारतवर्ष ही सर्वश्रेष्ठ है। इस अध्याय का श्रवण करने वाला मनुष्य पृथ्वी के समस्त रहस्यों को जान लेता है और भविष्य में श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त करता है।”
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे पञ्चदशोऽध्यायः समाप्तः ॥