अध्याय 16 : इलावृत वर्ष और मेरु पर्वत का वर्णन
इलावृत वर्ष की दिव्यता और मेरु पर्वत का स्वरूप
नैमिषारण्य के ऋषियों ने सूत जी से पूछा – “हे लोमहर्षण! आपने किंपुरुष आदि वर्षों का अमृतमयी कथा सुनायी। अब हमें इलावृत वर्ष का विशेष माहात्म्य और सुमेरु पर्वत का विस्तृत स्वरूप सुनाइए। हमने सुना है कि सुमेरु सम्पूर्ण जम्बूद्वीप का केन्द्र है और इलावृत वर्ष स्वयं शिवजी का निवास-स्थान है। इसके रहस्य को जानने की हमारी गहरी लालसा है।” सूत जी ने आनन्दित होकर कहा – “हे मुनियो! सुमेरु पर्वत तीनों लोकों का आधार है। इलावृत वर्ष चारों ओर से इसी सुमेरु से घिरा हुआ है और यही एकमात्र ऐसा वर्ष है जहाँ सूर्य-चन्द्र का उदय-अस्त नहीं होता। इसकी कथा परम पुण्यदायिनी है।”
सुमेरु पर्वत का महाविस्तार
सुमेरु पर्वत चौरासी हजार योजन ऊँचा है और भूमि के भीतर सोलह हजार योजन गहराई तक धँसा हुआ है। इसकी चारों दिशाओं में चार विशाल शिखर हैं, जो इसके आधार स्तम्भ जैसे प्रतीत होते हैं। पूर्व में मन्दराचल, दक्षिण में गन्धमादन, पश्चिम में विपुल और उत्तर में सुपार्श्व नामक ये चार पर्वत सुमेरु की शोभा बढ़ाते हैं। इन्हीं पर्वतों पर देवताओं के अद्भुत उद्यान, सरोवर और नगर स्थित हैं। सुमेरु की चोटी पर ब्रह्मा जी की सभा है, जिसे मनोवती कहते हैं।
चतुरशीतिसहस्रं योजनानां समुच्छ्रितम् ।
मेरोः शिखरमत्युच्चैर्ब्रह्मणः स्थानमुत्तमम् ॥
इलावृत वर्ष का भौगोलिक विन्यास
सुमेरु के चारों ओर नौ भागों में बँटा जम्बूद्वीप है, जिनमें केन्द्र में स्थित वर्ष ही इलावृत है। इसका विस्तार नौ हजार योजन है। इसकी चारों दिशाओं में नील, श्वेत और श्रृंगवान पर्वत श्रृंखलाएँ खड़ी हैं। इलावृत वर्ष में मेरु की चोटी से झरने वाली दिव्य नदियाँ बहती हैं, जिनका जल अमृत के समान मीठा और पवित्र है। यहाँ का वृक्ष-समूह सदा फल-फूलों से लदा रहता है और वायु चन्दन-कुसुम की सुगन्ध से मादक बनी रहती है।
भगवान शिव का निवास और उमा-सहित आराधना
इलावृत वर्ष के मध्य में भगवान शंकर अपनी अर्धांगिनी पार्वती जी के साथ निवास करते हैं। यहाँ के निवासी दिव्य शरीरधारी हैं और सदा “नमः शिवाय” का जप करते हैं। कोई भी मनुष्य यहाँ जन्म लेकर विष्णु-माया से मोहित नहीं होता। सम्पूर्ण इलावृत वर्ष एक विशाल तपोवन के समान है, जहाँ अप्सराएँ नृत्य करती हैं और गन्धर्व गान करते हैं। सूर्य की किरणें यहाँ पहुँचती तो हैं, किन्तु मेरु के तेज के कारण वे मन्द पड़ जाती हैं। इसलिए यहाँ सदा वसन्त ऋतु का-सा सुहावना वातावरण रहता है।
इलावृते तु भगवानास्ते शूलभृदीश्वरः ।
उमार्धदेहः सततं ध्यायते योगिभिः सुरैः ॥
चार विष्कम्भ पर्वतों पर स्थित दिव्य उद्यान
मन्दराचल पर इन्द्र का नन्दनवन है, जहाँ कल्पवृक्ष और पारिजात हैं। गन्धमादन पर कुबेर का चैत्ररथ वन है, जहाँ अपार धन-सम्पदा है। विपुल पर्वत पर वरुण का वैभ्राज वन है, जो जल-क्रीड़ाओं का केन्द्र है। सुपार्श्व पर यमराज का सर्वतोभद्र वन है, जहाँ धर्म की स्थापना होती है। इन चारों पर्वतों के आगे-पीछे चार सरोवर हैं – अरुणोद, मानस, सितोद और भद्र। ये सरोवर अमृत के समान जल से भरे हैं और इनके तट पर देवियाँ जल-क्रीड़ा करती हैं।
मेरु के चारों ओर दिशाओं के स्वामी
सुमेरु के पूर्व में इन्द्र का अमरावती नगर है, दक्षिण में यमराज की संयमनी, पश्चिम में वरुण की सुखा और उत्तर में कुबेर की अलकापुरी है। इन नगरों के द्वार पर चार गजराज स्थित हैं – ऐरावत, पुण्डरीक, वामन और कुमुद। ये अपनी सूँड़ों में जल भरकर चारों दिशाओं की रक्षा करते हैं। मेरु पर्वत का स्मरण मात्र करने से मनुष्य के समस्त पाप धुल जाते हैं और उसे सद्गति प्राप्त होती है।
मन्दरो गन्धमादश्च विपुलः सुपार्श्व एव च ।
मेरोश्चतुर्दिशं दिव्या वनानि सुरसेविते ॥
इलावृत-मेरु वर्णन का फल
सूत जी ने कहा – “हे ऋषियो! जो मनुष्य इलावृत वर्ष और सुमेरु पर्वत के इस वर्णन का श्रवण करता है, वह साक्षात मेरु-दर्शन का पुण्य प्राप्त करता है। उसका शरीर निरोगी होता है और अन्त समय में उसे शिवलोक की प्राप्ति होती है। यह अध्याय सम्पूर्ण ब्रह्म पुराण का सार है।”
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे षोडशोऽध्यायः समाप्तः ॥