अध्याय 33 : काशी, गया आदि तीर्थों का संक्षिप्त वर्णन
काशी, गया और अन्य प्रमुख तीर्थों की महिमा
ऋषियों ने कहा – “हे सूत जी! प्रयाग के समान ही काशी और गया का भी बड़ा माहात्म्य सुना जाता है। कृपया आप हमें काशी, गया, पुष्कर, कुरुक्षेत्र, सेतुबन्ध, नर्मदा-तट, गोदावरी-तट आदि प्रमुख तीर्थों का संक्षिप्त वर्णन सुनाइए। प्रत्येक का विशेष महत्त्व और वहाँ के प्रमुख तीर्थ-स्थल क्या हैं?” सूत जी ने कहा – “जैसे शरीर में मस्तक श्रेष्ठ है, वैसे ही तीर्थों में काशी सर्वश्रेष्ठ है। गया पितरों के लिए, पुष्कर ब्रह्मा के लिए और सेतुबन्ध रामेश्वर शिव के लिए परम पवित्र हैं।”
काशी – महाश्मशान और मोक्ष-नगरी
काशी भगवान शिव की नगरी है। यह तीनों लोकों से पृथक् है और प्रलय-काल में भी नष्ट नहीं होती। यहाँ मरने वाला मनुष्य शिव-कर्ण में तारक-मन्त्र पाकर मोक्ष प्राप्त करता है। यहाँ विश्वनाथ ज्योतिर्लिङ्ग, अन्नपूर्णा देवी, कालभैरव और गंगा का पवित्र घाट है। पञ्चक्रोशी यात्रा करने से सम्पूर्ण काशी की परिक्रमा का फल मिलता है।
गया, पुष्कर, कुरुक्षेत्र और सेतुबन्ध
गया पितरों के उद्धार का सबसे बड़ा तीर्थ है। यहाँ फल्गु नदी के तट पर पिण्डदान करने से पितरों को मोक्ष मिलता है। गया में विष्णु-पाद पर पिण्डदान का अक्षय फल है। पुष्कर राजस्थान में है, जहाँ ब्रह्मा जी का मन्दिर है और कार्तिक मास में स्नान का बड़ा महत्त्व है। कुरुक्षेत्र वह पुण्य-भूमि है जहाँ श्रीकृष्ण ने गीता का उपदेश दिया और जहाँ सूर्यग्रहण पर स्नान करने से राजसूय यज्ञ का फल मिलता है। सेतुबन्ध (रामेश्वरम्) में भगवान राम ने शिवलिङ्ग स्थापित कर सेतु-पूजा की थी। वहाँ स्नान करने से ब्रह्महत्या जैसे पाप भी नष्ट हो जाते हैं।
काशी मोक्षपुरी प्रोक्ता गया पितृगतिप्रदा ।
पुष्करं ब्रह्मणः स्थानं कुरुक्षेत्रं तु धर्मभूः ।।
सेतुबन्धं शिवस्यापि धनुष्कोटिरिति स्मृतम् ।
एतेषां स्मरणादेव सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
तीर्थ-वर्णन का फल
सूत जी ने कहा – “ये सब तीर्थ पाप-नाशक और पुण्य-वर्धक हैं। जो मनुष्य इन सब तीर्थों का नाम-स्मरण करता है, उसे तीर्थयात्रा का फल मिलता है और अन्त में वह स्वर्ग को प्राप्त करता है।”
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः समाप्तः ॥