अध्याय 22 : चन्द्रमा और नक्षत्रों की उत्पत्ति
चन्द्रमा का जन्म और नक्षत्र-राज्य
ऋषियों ने प्रश्न किया – “हे सूत जी! आपने सूर्यदेव की उत्पत्ति का सुन्दर वर्णन किया। अब हमें चन्द्रमा के जन्म की कथा सुनाइए। चन्द्रमा की कलाओं का घटना-बढ़ना क्या है? अट्ठाईस नक्षत्रों की उत्पत्ति कैसे हुई और चन्द्रमा से उनका क्या सम्बन्ध है? तथा सोमवार का क्या माहात्म्य है? कृपया यह रहस्य हम पर प्रकट करें।” सूत जी ने कहा – “चन्द्रमा मन को शीतलता प्रदान करने वाले देवता हैं। इनका सम्बन्ध औषधियों, ब्राह्मणों और जल से है। इनकी उत्पत्ति की कथा अत्यन्त रोचक और ज्ञानवर्धक है।”
चन्द्रमा का प्रादुर्भाव
प्राचीन काल में जब देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र-मन्थन किया तो अमृत-कलश के साथ ही चौदह रत्नों में से एक चन्द्रमा भी प्रकट हुए। इनके अलौकिक तेज और शीतलता को देखकर ब्रह्मा जी ने इन्हें नक्षत्रों, औषधियों और ब्राह्मणों का स्वामी नियुक्त किया। चन्द्रमा अत्रि ऋषि और अनसूया के पुत्र भी माने गये हैं। एक अन्य मान्यता के अनुसार ये भगवान विष्णु के मन से उत्पन्न हुए हैं।
दक्ष प्रजापति की पुत्रियों से विवाह
दक्ष प्रजापति की सत्ताईस पुत्रियाँ थीं, जो अश्विनी, भरणी, कृत्तिका आदि नक्षत्रों के रूप में प्रसिद्ध हैं। दक्ष ने इन सबका विवाह चन्द्रमा से कर दिया। चन्द्रमा इन सबमें रोहिणी को अधिक चाहते थे। शेष छब्बीस पत्नियों ने अपने पिता दक्ष से शिकायत की। दक्ष ने क्रोधित होकर चन्द्रमा को शाप दिया – “तुम्हारी कलाएँ क्षीण हो जाएँ और तुम राजयक्ष्मा (तपेदिक) से ग्रस्त हो जाओ।” शाप से चन्द्रमा घुलने लगे। देवताओं ने ब्रह्मा जी की शरण ली। ब्रह्मा जी ने उपाय बताया कि प्रभास तीर्थ में स्नान करने से चन्द्रमा पुनः कलाओं को प्राप्त करेंगे।
दक्षस्य तनयाः सप्तविंशतिश्चन्द्रवल्लभाः ।
नक्षत्राणि विमानस्थाः सोमपत्न्यः प्रकीर्तिताः ॥
चन्द्रमा की घटती-बढ़ती कलाएँ
चन्द्रमा ने प्रभास तीर्थ में जाकर भगवान शिव की आराधना की। शिव जी ने प्रसन्न होकर उन्हें अपने मस्तक पर धारण कर लिया। इसी कारण चन्द्रमा का एक नाम ‘सोमनाथ’ भी है। शिव जी के आशीर्वाद से चन्द्रमा की कलाएँ अब पूर्णतः समाप्त नहीं होतीं, अपितु कृष्णपक्ष में पन्द्रह दिनों तक घटती हैं और शुक्लपक्ष में पन्द्रह दिनों तक बढ़ती हैं। पूर्णिमा के दिन वे पूर्ण कलाओं से युक्त होते हैं और अमावस्या को एक कला मात्र शेष रहती है, जिसे वे अपनी रोहिणी के साथ पितृलोक में व्यतीत करते हैं।
सोमवार का माहात्म्य और व्रत
सूत जी ने बताया कि जो मनुष्य सोमवार का व्रत रखता है और चन्द्रमा की कथा सुनता है, उसकी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। सोमवार का व्रत विशेषकर स्त्रियों के लिए सौभाग्यदायक है। चन्द्रमा मन के कारक हैं, अतः इनका ध्यान करने से मानसिक शान्ति मिलती है और कुण्डली में चन्द्र दोष शान्त होता है।
सोमवारे विशेषेण ये चन्द्रं पूजयन्ति वै ।
तेषां नश्यति दारिद्र्यं प्राप्नुवन्ति मनोरथान् ॥
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे द्वाविंशोऽध्यायः समाप्तः ॥