अध्याय 27 : भविष्य के मनुओं का परिचय
भविष्य के सात मनुओं का परिचय
नैमिषारण्य के ऋषियों ने सूत जी से पूछा – “हे लोमहर्षण! वर्तमान में सातवाँ वैवस्वत मन्वन्तर चल रहा है। आपने पूर्व के छः मन्वन्तरों का वर्णन कर दिया। अब हम भविष्य में आने वाले शेष सात मन्वन्तरों के विषय में जानना चाहते हैं। आने वाले मनु कौन-कौन से होंगे? उनके समय में इन्द्र, देवता और सप्तर्षि कौन होंगे? तथा भगवान विष्णु किन-किन नामों से अवतरित होंगे? कृपया भविष्य का यह रहस्य हमें बताइए।” सूत जी ने कहा – “भविष्य के मनुओं का यह ज्ञान ब्रह्माजी ने नारद जी को सुनाया था। इसे सुनकर मनुष्य काल के पार चला जाता है।”
आठवें से चौदहवें मनु का वर्णन
सूत जी बोले – “वैवस्वत मनु के पश्चात् आठवें सावर्णि मनु होंगे, जो सूर्यदेव और छाया के पुत्र हैं। इनके मन्वन्तर में इन्द्र का नाम बलि होगा (जो विरोचन-पुत्र बलि हैं) और देवता सुतप, अमिताभ आदि होंगे। सप्तर्षियों में गालव, दीप्तिमान्, परशुराम, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, ऋष्यश्रृंग और व्यास होंगे। भगवान विष्णु सार्वभौम नाम से अवतरित होंगे। नवें दक्षसावर्णि मन्वन्तर में मनु का नाम दक्षसावर्णि होगा। इन्द्र अद्भुत होंगे और देवता पार, मरीचिगर्भ आदि होंगे। दसवें ब्रह्मसावर्णि मनु होंगे, जिनके समय में इन्द्र शान्ति कहलायेंगे। ग्यारहवें धर्मसावर्णि मनु होंगे, बारहवें रुद्रसावर्णि, तेरहवें रौच्य और चौदहवें भौत्य मनु होंगे। इन सबके अपने-अपने इन्द्र, देवता और सप्तर्षि होंगे।”
सावर्ण्यः प्रथमो ज्ञेयो दक्षसावर्णिकस्तथा ।
ब्रह्मसावर्णिकश्चापि तथा धर्मसुतः स्मृतः ।
रुद्रसावर्णिको रौच्यो भौत्यश्चैव चतुर्दश ।
भविष्याणां मनूनां तु नामानि नियतानि वै ॥
भविष्य के मन्वन्तरों में भगवान के अवतार
सूत जी ने आगे बताया – “आठवें सावर्णि मन्वन्तर में भगवान विष्णु देवगुह्य और सार्वभौम नाम से प्रकट होंगे। नवें में ऋषभ, दसवें में विश्वक्सेन, ग्यारहवें में धर्मसेतु, बारहवें में स्वधामा, तेरहवें में योगेश्वर और चौदहवें भौत्य मन्वन्तर में भगवान बृहद्भानु नाम से अवतार लेंगे। ये सब अवतार धर्म की स्थापना और अधर्म के नाश के लिए होंगे। प्रत्येक मन्वन्तर में वेदों का विस्तार और यज्ञों का प्रचलन होगा।”
मन्वन्तर-वर्णन का माहात्म्य
“हे ऋषियो! यह चौदह मन्वन्तरों का वर्णन महापातकों का नाश करने वाला है। जो मनुष्य प्रतिदिन इस अध्याय का पाठ करता है, वह काल के फेर को समझ जाता है और भगवान विष्णु की माया से पार हो जाता है। भविष्य के मनुओं का परिचय पाकर मनुष्य को अपने कर्तव्य का बोध होता है और वह धर्म-मार्ग पर अडिग रहता है।”
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे सप्तविंशोऽध्यायः समाप्तः ॥