आज का पंचांग | सूर्योदय: ०५:४५ AM | सूर्यास्त: ०६:५० PM

अध्याय सूचकांक 40 कुल

1. अध्याय 1 : मंगलाचरण, नैमिषारण्य आख्यान, सृष्टि-संवाद 2. अध्याय 2 : प्रलय और सर्ग का विस्तार 3. अध्याय 3 : महत्, अहंकार और तन्मात्राओं की उत्पत्ति 4. अध्याय 4 : ब्रह्मा के मानस पुत्रों की उत्पत्ति 5. अध्याय 5 : रुद्रदेव का प्रादुर्भाव और उनकी आठ मूर्तियाँ 6. अध्याय 6 : मनु और शतरूपा की उत्पत्ति, प्रियव्रत और उत्तानपाद का जन्म 7. अध्याय 7 : स्वायम्भुव मनु के वंश का वर्णन 8. अध्याय 8 : देवताओं, असुरों और प्रजाओं की उत्पत्ति 9. अध्याय 9 : कश्यप और उनकी पत्नियों की संतानें 10. अध्याय 10 : दनु और दिति के पुत्रों का वर्णन 11. अध्याय 11 : पृथ्वी का विस्तार और द्वीपों का वर्णन 12. अध्याय 12 : जम्बूद्वीप का विस्तृत वर्णन 13. अध्याय 13 : भारतवर्ष का वर्णन तथा उसके पर्वत 14. अध्याय 14 : भारतवर्ष की नदियाँ और जनपद 15. अध्याय 15 : किंपुरुष आदि वर्षों का वर्णन 16. अध्याय 16 : इलावृत वर्ष और मेरु पर्वत का वर्णन 17. अध्याय 17 : गंगावतरण की कथा 18. अध्याय 18 : समुद्र और उसमें स्थित द्वीपों का माहात्म्य 19. अध्याय 19 : प्लक्ष, शाल्मल आदि द्वीपों का वर्णन 20. अध्याय 20 : नरकों और कर्मफल का वर्णन 21. अध्याय 21 : सूर्यदेव की उत्पत्ति और उनका मण्डल 22. अध्याय 22 : चन्द्रमा और नक्षत्रों की उत्पत्ति 23. अध्याय 23 : ग्रहों की गति और उनका प्रभाव 24. अध्याय 24 : योग तथा ज्योतिष का संक्षिप्त वर्णन 25. अध्याय 25 : मन्वन्तरों का वर्णन – स्वायम्भुव मनु 26. अध्याय 26 : स्वारोचिष आदि मन्वन्तर 27. अध्याय 27 : भविष्य के मनुओं का परिचय 28. अध्याय 28 : पितरों के गण और श्राद्ध-कल्प 29. अध्याय 29 : श्राद्ध की विधि और ब्राह्मणों का महत्व 30. अध्याय 30 : यज्ञों और दानों का माहात्म्य 31. अध्याय 31 : तीर्थयात्रा का फल और नियम 32. अध्याय 32 : प्रयाग तीर्थ का माहात्म्य 33. अध्याय 33 : काशी, गया आदि तीर्थों का संक्षिप्त वर्णन 34. अध्याय 34 : दक्ष प्रजापति का चरित्र 35. अध्याय 35 : दक्ष यज्ञ का आयोजन 36. अध्याय 36 : सती का आत्मदाह और दक्ष यज्ञ का विध्वंस 37. अध्याय 37 : वीरभद्र द्वारा यज्ञ विध्वंस और देवताओं का स्तव 38. अध्याय 38 : शिव-पार्वती विवाह की कथा 39. अध्याय 39 : कुमार कार्तिकेय का जन्म 40. अध्याय 40 : तारकासुर वध और कार्तिकेय का माहात्म्य
Brahma Purana • अध्याय 34

अध्याय 34 : दक्ष प्रजापति का चरित्र

दक्ष प्रजापति का चरित्र और उनका सृष्टि-व्यापार

ऋषियों ने सूत जी से प्रार्थना की – “हे सूत जी! दक्ष प्रजापति का नाम हम बार-बार सुनते हैं। वे कौन थे? उनका जन्म कैसे हुआ? उन्होंने सृष्टि-विस्तार में क्या भूमिका निभाई? उनकी पुत्रियाँ कितनी थीं और उनका विवाह किन-किनसे हुआ? दक्ष के चरित्र की पूरी कथा हमें सुनाइए।” सूत जी बोले – “दक्ष प्रजापति ब्रह्मा जी के मानस पुत्र थे और सृष्टि-विस्तार में उनका अतुलनीय योगदान है। उन्होंने ही सम्पूर्ण प्रजाओं के वंश का सूत्रपात किया।”

दक्ष का जन्म और पूर्व-जन्म की कथा

दक्ष ब्रह्मा जी के दाहिने अंगूठे से उत्पन्न हुए थे। वे बड़े ही तेजस्वी और तपोनिष्ठ थे। एक बार ब्रह्मा जी के यज्ञ में उपस्थित ऋषियों और देवताओं के बीच दक्ष के प्रवेश पर सबने खड़े होकर उनका सम्मान किया, किन्तु शिव जी ने अहंकारवश उनके लिए खड़े न होकर अपमान किया। इस पर दक्ष ने शिव जी को शाप दे दिया। बाद में जब दक्ष ने बृहस्पति-उपदेश से अपना अहंकार त्यागा तो शिव जी ने भी उन्हें क्षमा कर दिया। दक्ष ने पुनः तपस्या की और ब्रह्मा जी के वर से प्रजापति-पद प्राप्त किया।

दक्षो नाम प्रजापतिर्ब्रह्मणः पुत्रको ह्यभूत् ।
अङ्गुष्ठाद्दक्षिणात् जातो वामाङ्गुष्ठाच्च तत्प्रिया ।।
तेन सृष्टं जगत् सर्वं स्थावरं जङ्गमं तथा ।
देवदानवगन्धर्वाः पशवः पक्षिणो मृगाः ॥

दक्ष की पुत्रियाँ और उनके वंश

दक्ष प्रजापति ने सबसे पहले अपनी मानसी पुत्रियाँ उत्पन्न कीं। इनमें से कुछ प्रमुख पुत्रियाँ हैं – श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, मेधा, तितिक्षा, स्वाहा और स्वधा। ये सब धर्म की पत्नियाँ बनीं। बाद में दक्ष ने साठ हजार कन्याएँ और उत्पन्न कीं, जिनमें से कुछ को कश्यप, चन्द्रमा, धर्म आदि को पत्नी-रूप में प्रदान किया। दक्ष की पुत्री सती का विवाह भगवान शिव से हुआ था। सती के योग-अग्नि में भस्म होने के बाद दक्ष ने शिव-विरोध में यज्ञ का आयोजन किया, जो बाद में विनाश का कारण बना।

दक्ष-चरित्र का निष्कर्ष

सूत जी ने कहा – “दक्ष प्रजापति ने अहंकार के कारण बहुत कष्ट पाया, किन्तु अन्ततः भगवान शिव की कृपा से ही उनका उद्धार हुआ। यह चरित्र मनुष्य को सिखाता है कि अहंकार ही पतन का मूल है और भगवत्-शरणागति ही मोक्ष का मार्ग है।”

॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे चतुस्त्रिंशोऽध्यायः समाप्तः ॥

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