अध्याय 34 : दक्ष प्रजापति का चरित्र
दक्ष प्रजापति का चरित्र और उनका सृष्टि-व्यापार
ऋषियों ने सूत जी से प्रार्थना की – “हे सूत जी! दक्ष प्रजापति का नाम हम बार-बार सुनते हैं। वे कौन थे? उनका जन्म कैसे हुआ? उन्होंने सृष्टि-विस्तार में क्या भूमिका निभाई? उनकी पुत्रियाँ कितनी थीं और उनका विवाह किन-किनसे हुआ? दक्ष के चरित्र की पूरी कथा हमें सुनाइए।” सूत जी बोले – “दक्ष प्रजापति ब्रह्मा जी के मानस पुत्र थे और सृष्टि-विस्तार में उनका अतुलनीय योगदान है। उन्होंने ही सम्पूर्ण प्रजाओं के वंश का सूत्रपात किया।”
दक्ष का जन्म और पूर्व-जन्म की कथा
दक्ष ब्रह्मा जी के दाहिने अंगूठे से उत्पन्न हुए थे। वे बड़े ही तेजस्वी और तपोनिष्ठ थे। एक बार ब्रह्मा जी के यज्ञ में उपस्थित ऋषियों और देवताओं के बीच दक्ष के प्रवेश पर सबने खड़े होकर उनका सम्मान किया, किन्तु शिव जी ने अहंकारवश उनके लिए खड़े न होकर अपमान किया। इस पर दक्ष ने शिव जी को शाप दे दिया। बाद में जब दक्ष ने बृहस्पति-उपदेश से अपना अहंकार त्यागा तो शिव जी ने भी उन्हें क्षमा कर दिया। दक्ष ने पुनः तपस्या की और ब्रह्मा जी के वर से प्रजापति-पद प्राप्त किया।
दक्षो नाम प्रजापतिर्ब्रह्मणः पुत्रको ह्यभूत् ।
अङ्गुष्ठाद्दक्षिणात् जातो वामाङ्गुष्ठाच्च तत्प्रिया ।।
तेन सृष्टं जगत् सर्वं स्थावरं जङ्गमं तथा ।
देवदानवगन्धर्वाः पशवः पक्षिणो मृगाः ॥
दक्ष की पुत्रियाँ और उनके वंश
दक्ष प्रजापति ने सबसे पहले अपनी मानसी पुत्रियाँ उत्पन्न कीं। इनमें से कुछ प्रमुख पुत्रियाँ हैं – श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, मेधा, तितिक्षा, स्वाहा और स्वधा। ये सब धर्म की पत्नियाँ बनीं। बाद में दक्ष ने साठ हजार कन्याएँ और उत्पन्न कीं, जिनमें से कुछ को कश्यप, चन्द्रमा, धर्म आदि को पत्नी-रूप में प्रदान किया। दक्ष की पुत्री सती का विवाह भगवान शिव से हुआ था। सती के योग-अग्नि में भस्म होने के बाद दक्ष ने शिव-विरोध में यज्ञ का आयोजन किया, जो बाद में विनाश का कारण बना।
दक्ष-चरित्र का निष्कर्ष
सूत जी ने कहा – “दक्ष प्रजापति ने अहंकार के कारण बहुत कष्ट पाया, किन्तु अन्ततः भगवान शिव की कृपा से ही उनका उद्धार हुआ। यह चरित्र मनुष्य को सिखाता है कि अहंकार ही पतन का मूल है और भगवत्-शरणागति ही मोक्ष का मार्ग है।”
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे चतुस्त्रिंशोऽध्यायः समाप्तः ॥