अध्याय 29 : श्राद्ध की विधि और ब्राह्मणों का महत्व
श्राद्ध की विस्तृत विधि और ब्राह्मणों का गौरव
ऋषिगण ने पूछा – “हे सूत जी! श्राद्ध-कर्म को उत्तम रीति से कैसे सम्पन्न करना चाहिए? इसके लिए किन-किन ब्राह्मणों को निमन्त्रित करना उचित है? कैसे ब्राह्मणों का भोजन पितरों को तृप्त करता है और कैसे ब्राह्मणों का अपमान पितरों को अप्रसन्न करता है? कृपया श्राद्ध की पूर्ण विधि और ब्राह्मणों के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।” सूत जी ने उत्तर दिया – “श्राद्ध में ब्राह्मण ही पितरों के प्रतिनिधि होते हैं। उनका यथोचित सत्कार करने से पितर तृप्त होते हैं और वंश का उद्धार होता है।”
श्राद्ध के योग्य ब्राह्मण और अयोग्य ब्राह्मण
श्राद्ध में ऐसे ब्राह्मणों को बुलाना चाहिए जो वेदज्ञ, सदाचारी, नियम-पालक और इन्द्रिय-संयमी हों। जो ब्राह्मण मित्र, गुरु, ऋत्विक्, जामाता और श्वशुर हों, वे श्राद्ध में विशेष पूज्य हैं। जो ब्राह्मण काणा, लंगड़ा, नपुंसक, रोगी, पतित, मिथ्याचारी, चोर, मद्यप और वेद-विक्रेता हो, उन्हें श्राद्ध में कभी नहीं बुलाना चाहिए। ऐसे ब्राह्मण का अन्न पितरों तक नहीं पहुँचता और वह राक्षसों का भाग बन जाता है। श्राद्ध में एक योग्य ब्राह्मण ही सैकड़ों अयोग्य ब्राह्मणों से श्रेष्ठ है।
श्रोत्रियो वेदविद् युक्तो ब्राह्मणः श्राद्धकर्मणि ।
योनिगोत्रमनुप्राप्तः स तु पङ्क्तिपावनः ।।
वर्जयेच्छ्राद्धकाले तु चिकित्सकमपण्डितम् ।
वेदविक्रेयकं चैव परान्नरतिमेव च ॥
श्राद्ध की विधि और सामग्री
श्राद्ध के दिन प्रातःकाल उठकर स्नान करना चाहिए और पवित्र वस्त्र धारण करने चाहिए। ब्राह्मणों को आमन्त्रित करके उनके पैर धोकर आसन देना चाहिए। दक्षिणाभिमुख बैठकर पिण्डदान करना चाहिए। श्राद्ध में कुश, तिल, जल, चावल, दूध, शहद, घी और पका हुआ भोजन आवश्यक है। पिण्ड चावल और तिल के बनाए जाते हैं। कौआ, कुत्ता और गाय को पिण्ड का अंश देना चाहिए, क्योंकि ये पितरों के प्रतीक हैं। ब्राह्मणों को भोजन कराते समय ‘अग्निदग्ध’, ‘अनग्निदग्ध’ और ‘पितृभ्यः स्वधा’ का उच्चारण करना चाहिए।
श्राद्ध में ब्राह्मणों का अपमान न करने की चेतावनी
सूत जी ने कड़े शब्दों में कहा – “यदि कोई मनुष्य श्राद्ध में ब्राह्मण का अपमान करता है या उन्हें अपर्याप्त भोजन देता है, तो उसका श्राद्ध राक्षसी कहलाता है। ऐसे श्राद्ध से पितर रुष्ट होते हैं और शाप देते हैं। ब्राह्मणों का तृप्त होना ही पितरों की तृप्ति का प्रमाण है। इसलिए श्राद्ध में ब्राह्मणों को श्रद्धापूर्वक भोजन कराना चाहिए और उन्हें दक्षिणा देकर संतुष्ट करना चाहिए।”
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे एकोनत्रिंशोऽध्यायः समाप्तः ॥